आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 राजकीय और सामाजिक कर्तव्य
सभाभवन में राजसिंहासन पर विराजमान होकर भरत राजाओं को दर्शन, मुस्कान, वार्तालाप, सन्मान, और दान से संतुष्ट करते थे। दूतों और भेंट लाने वालों को सम्मानित कर उनके कार्य पूरे करते थे। नृत्य-कलाकारों को पारितोषिक देकर प्रसन्न करते थे। सभा विसर्जन के बाद क्रीड़ाएँ करते, स्नान-भोजन कर अलंकार धारण करते थे। परिवार की स्त्रियाँ उनकी सेवा करती थीं। दोपहर बाद विद्वानों के साथ विद्याचर्चा और वेश्याओं के हास्य-भोगों में समय बिताते थे।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
प्रजानां सदसद्वृत्तचिन्तनैः क्षणमासितः । तत आयुक्तकान् स्वेषु नियोगेष्वन्वशाद् विभुः ॥१२२॥
वहां प्रजाके सदाचार और असदाचारका विचार करते हुए वे क्षणभर ठहरते थे तदनन्तर अधिकारियोंको अपने अपने कामपर नियुक्त करते थे अर्थात् अपना अपना कार्य करनेकी आज्ञा देते थे ॥ १२२॥
There, reflecting briefly upon the virtuous and the wicked conduct of his subjects, he would then proceed to appoint the officials to their respective duties, thus commanding each to fulfill their proper tasks.122
श्लोक ( Shlok ) 123
नृपासनमयाध्यास्य महादर्शन मध्यगः । नृपान् सम्भावयामास सेवावसरकाङ्क्षिणः ॥१२३॥
इसके बाद सभाभवनके बीच में जाकर राजसिंहासनपर विराजमान होते तथा सेवाके लिये अवसर चाहनेवाले राजाओं का सन्मान करते थे ।।१२३।।
Thereafter, he would proceed to the hall of assembly and, seated upon the royal throne, bestow honor upon the kings who sought audience for their service.123
श्लोक ( Shlok ) 124
कांश्चिदालोकनैः कांश्चित्स्मितैराभाषणैः परान्। कांश्चित्समानदानाद्यैस्तर्पयामास पार्थिवान् ॥१२४।।
वे कितने ही राजाओंको दर्शनसे, कितनोंहीको मुसकानसे, कितनोंही को वार्तालापसे, कितनोंहीको सन्मानसे और कितनोंहीको दान आदिसे संतुष्ट करते थे ।।१२४।।
By his mere presence, by a smile, by conversation, by honor, and by gifts, he gratified countless kings—each touched in diverse measure by these tokens of his grace.124
श्लोक ( Shlok ) 125
तत्रोपायनसम्पत्त्या समायातान् महत्तमान् । वचोहरांश्च सम्मान्य कृतकार्यान् व्यसर्जयत् ।।१२५।।
वे वहांपर भेंट ले लेकर आये हुए बड़े बड़े पुरुषों तथा दूतोंको सन्मानित कर और उनका कार्य पूराकर उन्हें बिदा करते थे ।।१२५॥
There, receiving the tributes brought by venerable personages and envoys, he would honor them duly, accomplish their tasks, and then send them forth with due respect.125
श्लोक ( Shlok ) 126
कलाविदश्च नृत्यादिदर्शनैः समुपस्थि तान्। ‘पारितोषिकदानेन महता समतर्पयत् ॥१२६॥
नृत्य आदि दिखानेके लिये आये हुए कलाओं के जाननेवाले पुरुषोंको बड़े बड़े पारितोषिक देकर संतुष्ट करते थे ॥१२६।।
He gratified the skilled artists who came to perform dances and other arts by bestowing upon them generous rewards.126
श्लोक ( Shlok ) 127
ततो विर्साजतास्थानः प्रोत्थाय नृपविष्टरात् । स्वेच्छाविहारमकरोद् विनोदै सुकुमारकैः ॥ १२७॥
तदनन्तर सभा विसर्जन करते और राजसिंहासनसे उठकर कोमल क्रीड़ाओंके साथ साथ अपनी इच्छानुसार विहार करते थे ।। १२७ ।।
Thereafter, he would dissolve the assembly, rise from the royal throne, and engage in gentle pastimes, roaming freely according to his own desires.127
श्लोक ( Shlok ) 128
ततो “मध्यंदिनेऽभ्यर्णे कृतमज्जनसंविधिः । तनुस्थितिं स निर्वत्यं निरविक्षत् प्रसाधनम् ॥१२८॥
तत्पश्चात् दोपहरका समय निकट आनेपर स्नान आदि करके भोजन करते और फिर अलंकार धारण करते थे ।। १२८ ।।
Thereafter, as midday approached, he would bathe and partake of his meal, and then adorn himself with ornaments.128
श्लोक ( Shlok ) 129
चामरोत्क्षेपताम्बूलदानसं ‘वाहनादिभिः । ‘परिचेरुरुप्रेत्यैनं परिवाराङगनाः स्वतः ॥१२९॥
उस समय परिवारकी स्त्रियां स्वयं आकर चमर ढोलना, पान देना और पैर दाबना आदिके द्वारा उनकी सेवा करती थीं । ।।१२९॥
At that time, the women of the household would personally come forth to serve him—fanning him with fly-whisks, offering betel leaves, and gently massaging his feet.129
श्लोक ( Shlok ) 130
ततो भुक्तोत्तरास्थाने स्थितः कतिपर्यनृपैः । समं विदग्ध” मण्डल्या विद्यागोष्ठीरमावयत् ॥१३०।।
तदनन्तर भोजन के बाद बैठने योग्य भवनमें कुछ राजाओंके साथ बैठकर चतुर लोगों की मंडलीके साथ साथ विद्याकी चर्चा करते थे ॥ १३०॥
Thereafter, after the meal, he would retire to a suitable chamber and, seated with certain kings, engage in learned discourse alongside assemblies of the wise.130
श्लोक ( Shlok ) 131
तत्र वारविलासिन्यो नृपवल्लभिकाश्च तम् । परिवव्रुरुवारूढ तारुण्यमदकर्कशाः ॥१३१॥
वहां जवानीके मदसे जिन्हें उद्दण्डता प्राप्त हो रही है ऐसी वेश्याएं और प्रियरानियां आकर उन्हें चारों ओरसे घेर लेती थीं ॥१३१॥
There, women—both courtesans and beloved companions—drawn by the intoxication of youth and emboldened by audacity, would approach and surround them on all sides.131
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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