आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62
श्लोक 63 से 71 परमेष्ठी मंत्रों का प्रारंभ
परमेष्ठी मंत्रों में ‘सत्यजाताय नमः’, ‘परमजाताय नमः’, ‘परमार्हताय नमः’, और ‘परमरूपाय नमः’ जैसे मंत्र उत्कृष्ट जन्म, धर्म, और निर्ग्रन्थ रूप की स्तुति करते हैं। ‘परमगुणाय नमः’, ‘परमस्थानाय नमः’, ‘परमयोगिने नमः’, और ‘परमविज्ञानाय नमः’ मंत्र परम गुण, मोक्ष, योग, और ज्ञान की महिमा गाते हैं। ये मंत्र परमेष्ठियों के अनंत गुणों को दर्शाते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 40- Shlok 63 to 71
श्लोक ( Shlok ) 63
चूणिः- सत्यजाताय स्वाहा, अहंज्जाताय स्वाहा, अनुपमेन्द्राय स्वाहा, विजयाच्यजाताय स्वाहा, नेमिनाथाय स्वाहा, परमराजाय स्वाहा, परमार्हताय स्वाहा, अनुपमाय स्वाहा, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे उग्रतेजः उग्रतेजः दिशांजय दिशांजय नेमिविजय नेमिविजय स्वाहा, सेवाफलं षट्परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु ।मन्त्रः परमराजादिर्मतोऽयं परमेष्ठिनाम् । परं मन्त्रमितो वक्ष्ये यथाऽऽह परमा श्रुतिः ॥६३॥
परमराजादि मन्त्रोंका संग्रह इस प्रकार है-
‘सत्यजाताय स्वाहा, अर्हज्जाताय स्वाहा, अनुपमेन्द्राय स्वाहा, विजयार्चजाय स्वाहा, नेमिनाथाय स्वाहा, परमजाताय स्वाहा, परमार्हताय स्वाहा, अनुपमाय स्वाहा, सम्यग्दृष्टे सम्यग्दृष्टे, उग्रतेजः, उग्रतेजः, दिशांजय दिशांजय, नेमिविजय नेमिविजय स्वाहा, सेवाफलं षट् परमस्थानं भवतु, अपमृत्युविनाशनं भवतु, समाधिमरणं भवतु । ये मन्त्र परमराजादि मन्त्र माने गये हैं।अब यहांसे आगे जिस प्रकार परम शास्त्रमें कहा है उसी प्रकार परमेष्ठियों के उत्कृष्ट मन्त्र कहता हूँ ।। ६३ ।।
Collection of the Paramarājādi Mantras:”Satyajātāya svāhā, Arhajjātāya svāhā, Anupamendrāya svāhā, Vijayārcajātāya svāhā, Nemināthāya svāhā, Paramajātāya svāhā, Paramārhatāya svāhā, Anupamāya svāhā, Samyagdṛṣṭe samyagdṛṣṭe, Ugratejaḥ ugratejaḥ, Diśāmjaya diśāmjaya, Nemivijaya nemivijaya svāhā, Sevāphalaṃ ṣaṭparamasthānaṃ bhavatu, Apamṛtyuvināśanaṃ bhavatu, Samādhimaraṇaṃ bhavatu.”“Oblation to the bearer of the True Birth, to him born worthy of Arhat-hood, to the matchless Indra, to the one radiant with victorious glory, to Neminātha, to him of supreme birth, to the exalted Arhat, to the Incomparable One.O Seer of Truth! O Fierce Radiance! O Conqueror of the Directions! O Victor like Nemi! To you all I offer sacred oblations.May devoted worship yield the fruit of the six supreme abodes,May untimely death be destroyed,May the end come through meditative liberation.”These are the sacred formulas known as the Paramarājādi Mantras.Now, in accordance with the supreme scriptures, I shall proclaim the sublime mantras of the Paramesthins, as taught by the ultimate revelation.॥63॥
श्लोक ( Shlok ) 64
तत्रादौ सत्यजाताय नमः पदमुदीरयेत् । वाच्यं ततोऽर्हज्जाताय नम इत्युत्तरं पदम् ॥६४॥
उन परमेष्ठी मन्त्रोंमें सबसे पहले ‘सत्यजाताय नमः’ (सत्यरूप जन्म लेनेवालेके लिये नमस्कार हो) यह पद बोलना चाहिये (सत्यरूप जन्म लेनेवालेके लिये नमस्कार हो) यह पद बोलना चाहिये और उसके बाद ‘अर्हज्जाताय नमः’ (अरहन्तके योग्य जन्म लेनेवालेके लिये नमस्कार हो) यह पद पढ़ना चाहिये ।। ६४।।
mong the Paramesthī Mantras, the very first to be spoken is:“Satyajātāya Namaḥ”– Obeisance unto Him who has taken birth in the form of Truth.Thereafter, one should recite:“Arhajjātāya Namaḥ”– Obeisance unto Him who has taken birth worthy of Arhat-hood.॥64॥
श्लोक ( Shlok ) 65
ततः परमजाताय नमः पदमुदाहरेत् । परमार्हतशब्दं च चतुर्थ्यन्तं नमः परम् ॥६५॥
तदनन्तर ‘परमजाताय नमः’ (उत्कृष्ट जन्म लेनेवाले के लिये नमस्कार हो) यह पद कहना चाहिये और इसके बाद चतुर्थी विभक्त्यन्त परमार्हत शब्दके आगे नमः पद लगाकर ‘परमार्हताय नमः’ (उत्कृष्ट जिनधर्मके धारकके लिये नमस्कार हो) यह मन्त्र पढ़ना चाहिये ।। ६५।।
Thereafter, one should utter:“Paramajātāya Namaḥ”– Obeisance unto Him who has taken an exalted and supreme birth.Following this, placing the word Namaḥ after the word Paramārhata in the dative case, one should recite:“Paramārhatāya Namaḥ”– Obeisance unto the bearer of the supreme Jina Dharma, the most excellent among the worthy.॥65॥
श्लोक ( Shlok ) 66
ततः परमरूपाय नमः परमतेजसे । नम इत्युभयं वाच्यं पदमध्यात्मर्दाशभिः ॥६६॥
तत्पश्चात् अध्यात्म शास्त्रको जाननेवाले द्विजोंको ‘परमरूपाय नमः’ (उत्कृष्ट निर्ग्रन्थरूपको धारण करनेवालेके लिये नमस्कार हो) और परम-तेजसे नमः (उत्तम तेजको धारण करनेवालेके लिये नमस्कार हो) ये दो मन्त्र बोलना चाहिये ।।६६।।
Thereafter, the twice-born who are well-versed in the Ādhyātmika-śāstra (the sacred science of the Self) should recite these two mantras:“Paramarūpāya Namaḥ”– Obeisance unto Him who embodies the supreme and unparalleled form of the Nirgrantha (the unattached).“Paramatejase Namaḥ”– Obeisance unto Him who is endowed with the highest divine radiance.॥66॥
श्लोक ( Shlok ) 67
परमादिगुणायेति पदं चान्यन्नमोयुतम् । परमस्थानशब्दश्च चतुथ्यन्तो नमोऽन्वितः ॥६७॥
फिर नमः शब्दके साथ परमगुणाय यह पद अर्थात् ‘परमगुणाय नमः’ (उत्कृष्ट गुण वाले के लिये नमस्कार हो) यह मन्त्र बोलना चाहिये और उसके अनन्तर नमः शब्दसे सहित चतुर्थी विभक्त्यन्त परमस्थान शब्द अर्थात् ‘परमस्थानाय नमः’ (मोक्षरूप उत्तमस्थानवाले के लिये नमस्कार हो) यह पद पढ़ना चाहिये ।। ६७।।
Thereafter, the mantra “Paramaguṇāya Namaḥ” should be recited—Obeisance unto Him who is endowed with supreme virtues.Following this, the twice-born should utter the mantra “Paramasthānāya Namaḥ”—Obeisance unto Him who abides in the highest realm, the abode of liberation (Mokṣa).॥67॥
श्लोक ( Shlok ) 68
उदाहार्य क्रमं ज्ञात्वा ततः परमयोगिने । नमः परमभाग्याय नम इत्युभयं पदम् ॥६८॥
इसके पश्चात् क्रमको जानकर ‘परम-योगिने नमः’ (परम योगीके लिये नमस्कार हो) और ‘परमभाग्याय नमः’ (उत्कृष्ट भाग्य-शालीको नमस्कार हो) ये दोनों पद बोलना चाहिये ॥६८॥
Thereafter, knowing the ordained sequence, one should recite the following two mantras:“Paramayogine Namaḥ” — Obeisance unto the Supreme Yogi,and“Paramabhāgyāya Namaḥ” — Obeisance unto Him who is supremely fortunate.॥68॥
श्लोक ( Shlok ) 69
परर्माद्धपदं चान्यच्चतुर्थ्यन्तं नमः परम् । स्यात्परमप्रसादाय नम इत्युत्तरं पदम् ॥६९॥
तदनन्तर जिसके आगे नमः शब्द लगा हुआ है और चतुर्थी विभक्ति जिसके अन्तमें है ऐसा परर्माद्ध पद अर्थात् ‘परमर्द्धये नमः’ (उत्तम ऋद्धियोंके धारकके लिये नमस्कार हो) और ‘परमप्रसादाय नमः’ (उत्कृष्ट प्रसन्नताको धारण करनेवाले के लिये नमस्कार हो) ये दो मन्त्र पढ़ना चाहिये ॥६९॥
Thereafter, one should recite the following two mantras, each bearing the word “Namaḥ” and ending in the dative case:“Paramarddhaye Namaḥ” — Obeisance unto the Possessor of supreme spiritual powers (ṛddhis),and “Paramprasādāya Namaḥ” — Obeisance unto Him who embodies the highest serenity and divine grace.॥69॥
श्लोक ( Shlok ) 70
स्यात्परमका अक्षिताय नम इत्यत उत्तरम् । स्यात्परमविजयाय नमः इत्युत्तरं वचः ।॥७०॥
फिर ‘परमकाक्षिताय नमः’ (उत्कृष्ट आत्मानन्दकी इच्छा करनेवालेके लिये नमस्कार हो) और परमविजयाय नमः (कर्मरूप शत्रुओंपर उत्कृष्ट विजय पानेवालेके लिये नमस्कार हो) ये दो मन्त्र बोलना चाहिये ॥७०॥
Thereafter, one should recite the following two mantras:“Paramakākṣitāya Namaḥ” — Obeisance unto Him who aspires for the supreme bliss of the Self,and “Paramavijayāya Namaḥ” — Obeisance unto Him who has attained the highest victory over the enemies in the form of karmic bonds.॥70॥
श्लोक ( Shlok ) 71
स्यात्परमविज्ञानाय नमो वाक्तदनन्तरम् । स्यात्परमदर्शनाय नमः पदमतः परम् ॥७१॥
तदनन्तर ‘परमविज्ञानाय नमः’ (उत्कृष्ट ज्ञानवाले के लिये नमस्कार हो) और उसके बाद ‘परमदर्शनाय नमः’ (परम दर्शनके धारकके लिये नमस्कार हो) यह पद पढ़ना चाहिये ।।७१।।
Thereafter, one should recite:“Paramavijñānāya Namaḥ” — Obeisance unto Him who possesses supreme knowledge,and then“Paramadarśanāya Namaḥ” — Obeisance unto Him who is endowed with the highest divine insight.॥71॥
श्लोक 72 से 81
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