आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 समवसरण में पूजा और भक्ति
समवसरण की कक्षाओं में देवांगनाओं के गीत-नृत्य से भरत का चित्त अनुरक्त हुआ। ऊँचे गोपुर मार्ग से वे गणधरदेव की सभा में पहुँचे। वहाँ तीन कटनी वाले पीठ की प्रथम कटनी पर चढ़कर धर्मचक्र की पूजा और प्रदक्षिणा की। दूसरी कटनी पर महाध्वजाओं की पूजा कर गंधकुटी के समीप पहुँचे। भक्तिपूर्वक वृषभदेव को नमस्कार कर, स्तोत्रों से स्तुति और विधिपूर्वक पूजा की। भक्ति से उनके परिणाम विशुद्ध हुए, जिससे अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ। धर्मरूपी अमृत का पान कर संतुष्ट होकर उन्होंने ब्राह्मण सृष्टि और ग्यारह प्रतिमाओं के यज्ञोपवीत के बारे में निवेदन किया।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
प्रतिकक्षं सुरस्त्रीणां गीतैर्नुत्तैश्च हारिभिः । रज्यमानमनोवृत्तिस्तत्रास्यासीत् परा धृतिः ॥२२॥
समवसरणकी प्रत्येक कक्षामें होनेवाले देवांगनाओंके मनोहर गीत और नृत्योंसे जिनके चित्त-की वृत्ति अनुरक्त हो रही है ऐसे महाराज भरतको बहुत ही संतोष हो रहा था ।। २२ ।।
As the celestial maidens within each chamber of the divine assembly sang and danced enchantingly, Maharaja Bharata—his heart enraptured by their graceful melodies and movements—felt a deep and abiding joy.22
श्लोक ( Shlok ) 23
ततः प्राविक्षदुत्तुङ्गगोपुरद्वारवर्त्मना । गणेरध्युषितां भूमि श्रीमण्डपपरिष्कृताम् ।।२३।।
तदनन्तर बहुत ऊंचे गोपुर दरवाजोंके मार्गसे उन्होंने जहां गणधरदेव विराजमान थे और जो श्रीमंडपसे सुशोभित हो रही थी एसी सभाभूमिमें प्रवेश किया ।। २३ ।।
Thereafter, passing through the lofty gateways crowned with towering spires, he entered the assembly hall—resplendent with the auspicious śrī-maṇḍapa—where the venerable Gaṇadharas were seated in serene majesty. 23
श्लोक ( Shlok ) 24
त्रिमेखलस्य पीठस्य प्रथमां मेखलामतः । सोऽधिरुह्य परीयाय धर्मचक्राणि पूजयन् ॥२४॥
वहांपर तीन कटनीवाले पीठकी प्रथम कटनीपर चढ़कर धर्मचक्रकी पूजा करते हुए प्रदक्षिणा दी ।॥ २४॥
There, ascending the first tier of the three-tiered throne, he worshipped the Wheel of Dharma and reverently performed its circumambulation.24
श्लोक ( Shlok ) 25
मेखलायां द्वितीयस्यां ‘वरिवस्यन् महाध्वजाम् । प्रापद् गन्धकुटीं चक्री न्यक्कृतत्रिजगच्छ्यिम् ॥२५॥
तदनन्तर चक्रवर्ती दूसरी कटनीपर महाध्वजाओंकी पूजा कर तीनों जगत्की लक्ष्मीको तिरस्कृत करनेवाली गन्ध-कुटीके पास जा पहुंचे ।। २५ ।।
Thereafter, the Emperor ascended to the second tier and, having worshipped the great victory-banners, proceeded toward the Fragrant Pavilion, whose divine splendour cast into shadow even the goddess of wealth of all three worlds.25
श्लोक ( Shlok ) 26
देवदानवगन्धर्वसिद्धविद्याधरेडितम् । भगवन्तमथालोक्य प्राणमद् भक्तिनिर्भरः ॥२६॥
वहांपर भक्तिसे भरे हुए भरतने देव, दानव, गन्धर्व, सिद्ध और विद्याधर आदिके द्वारा पूज्य भगवान् वृषभदेवको देखकर उन्हें नमस्कार किया ।।२६।।
There, filled with devotion, Bharata beheld Lord Ṛṣabhadeva—revered by gods, demons, celestial musicians, Siddhas, and Vidyādharas—and bowed before Him in deep reverence.26
श्लोक ( Shlok ) 27
स्तुत्वा स्तुतिभिरीशानमभ्यर्च्य च यथाविधि । निषसाद’ यथास्थानं धर्मामृतपिपासितः ॥ २७॥
महाराज भरत उन भगवान् की अनेक स्तोत्रोंके द्वारा स्तुति कर और विधिपूर्वक पूजा कर धर्मरूप अमृतके पीनेकी इच्छा करते हुए योग्य स्थानपर जा बैठे ।। २७।।
Maharaja Bharata then praised the Lord with many hymns, worshipped Him with due ritual, and—desiring to partake of the nectar of Dharma—took his seat at an appropriate place.27
श्लोक ( Shlok ) 28
भक्त्या प्रणमतस्तस्य भगवत्पादपङ्कजे । विशुद्धिपरिणामाङ्गमवधिज्ञानमुद्बभौ ॥२८॥
भक्तिपूर्वक भगवान के चरण-कमलोंको प्रणाम करते हुए भरतके परिणाम इतने अधिक विशुद्ध हो गये थे कि उनके उसी समय अवधिज्ञान उत्पन्न हो गया ।॥२८॥
As Bharata bowed with devotion at the lotus feet of the Lord, his inner disposition became so profoundly purified that, in that very moment, the divine knowledge of Avadhi-jñāna arose within him.28
श्लोक ( Shlok ) 29
पीत्वाऽथो धर्मपीयूष परां तृप्तिमवापिवान् । स्वमनोगतमित्युच्चैर्भगवन्तं व्यजिज्ञपत् ॥२९।।
तदनन्तर धर्मरूपी अमृतका पान कर वे बहुत ही संतुष्ट हुए और उच्च स्वरसे अपने हृदयका अभिप्राय भगवान से इस प्रकार निवेदन करने लगे ॥२९।।
Thereafter, having partaken of the nectar of Dharma, he was deeply satisfied, and with a voice full of earnestness, he began to lay bare the intent of his heart before the Lord in these words.29
श्लोक ( Shlok ) 30
मया सृष्टा द्विजन्मानः श्रावकाचारचुञ्चवः । त्वद्गीतोपासकाध्याय सूत्रमार्गानुगामिनः ॥३०॥
कि हे भगवन्, मैंने आपके द्वारा कहे हुए उपासकाध्याय सूत्रके मार्गपर चलनेवाले तथा श्रावकाचारमें निपुण ब्राह्मण निर्माण किये हैं अर्थात् ब्राह्मण वर्णकी स्थापना की है ।॥३०॥
“O Lord,” he said, “I have established the Brāhmaṇa order—fashioning those who walk the path laid down in the Upāsakādhyāya Sūtra spoken by You, and who are well-versed in the conduct befitting a true householder-devotee.”30
श्लोक ( Shlok ) 31
एकाद्येकादशान्तानि दत्तान्येभ्यो मया विभो । व्रतचिह्नानि सूत्राणि गुणभूमिविभागतः ॥३१॥
हे विभो, मैंने इन्हें ग्यारह प्रतिमाओंके विभागसे व्रतोंके चिह्न स्वरूप एकसे लेकर ग्यारह तक यज्ञोपवीत दिये हैं ।॥३१॥
“O Sovereign Lord, I have bestowed upon them the sacred thread (yajñopavīta)—from one up to eleven in number—as symbols of their vows, in accordance with the eleven stages of spiritual progression (pratimās).”31
श्लोक 32 से 41
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313
आदिपुराण पर्व 39 – दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
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