आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 211 इन्द्रत्याग क्रिया
इन्द्रत्याग क्रिया में इंद्र, आयु समाप्ति के निकट स्वर्ग के भोगों का त्याग करता है। वह देवों को उपदेश देता है कि उसने उन्हें पिता, पुत्र, मित्र, और सेवक के रूप में पाला और सम्मानित किया। अब वह स्वर्ग का साम्राज्य छोड़कर अगले इंद्र के लिए सौंपता है। वह उदासीनता के साथ धीर-वीर बुद्धि से यह त्याग करता है, जिससे वह दुखी नहीं होता। यह क्रिया स्वर्ग के ऐश्वर्य को बिना कष्ट छोड़ने की महिमा दर्शाती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
प्रोक्तास्त्विन्द्रोपपादाभिषेकदान’ सुखोदयाः । इन्द्रत्यागाख्यमधुना संप्रवक्ष्ये क्रियान्तरम् ॥ २०२॥
इस प्रकार इन्द्रोपपाद, इन्द्राभिषेक, विधिदान और सुखोदय ये इन्द्र सम्बन्धी चार क्रियाएं कहीं । अब इन्द्रत्याग नामकी पृथक् क्रियाका निरूपण करता हूं ॥ २०२॥
Thus have been described the four Indra-related rites: Indropapāda, Indrābhiṣeka, Vidhidāna, and Sukhodaya. Now, I shall expound a distinct rite known as Indratyāga—the Renunciation of Indraship. 202
श्लोक ( Shlok ) 203
किञ्चिन्मात्रावशिष्टायां स्वस्यामायुःस्थितौ सुरेट् । बुद्ध्वा स्वर्गावतारं स्वं सोऽनुशास्त्यमरानिति ।२०३।
इन्द्र जब अपनी आयुकी स्थिति थोड़ी रहनेपर अपना स्वर्गसे च्युत होना जान लेता है तब वह देवोंको इस प्रकार उपदेश देता है ॥ २०३॥
When Indra perceives that but little remains of his allotted lifespan, and knows that his departure from heaven is near, he then imparts the following counsel to the assembled gods.203
श्लोक ( Shlok ) 204 – 209
भो भोः सुधाशना यूयमस्माभिः पालिताश्चिरम् । केचित् पित्रीयिताः केचित् पुत्रप्रीत्योपलालिताः ॥ २०४॥पुरोधोमन्त्र्यमात्यानां पदे केचिन्नियोजिताः । वयस्यपीठ’ मदीयस्थाने दृष्टाश्च केचन ॥२०५॥ स्वप्राणनिर्विशेषं च केचित् त्राणाय सम्मताः । केचिन्मान्यपदे दृष्टाः पालकाः स्वर्निवासिनाम् ॥ २०६॥केचिच्चमूचरस्थाने केचिच्च स्वजनास्थयां । प्रजासामान्यमन्ये च केचिच्चानुचराः पृथक् ॥२०७॥केचित् परिजनस्थाने केचिच्चान्तःपुरे चराः । काश्चिद् वल्लभिका देव्यो महादेव्यश्च काश्चन ॥२०८।।इत्यसाधारणा प्रीतिर्मया युष्मासु दर्शिता । स्वामिभक्तिश्च युष्माभि र्मय्यसाधारणी धृता ॥२०९॥
कि भो देवो, मैंने चिरकालसे आपका पालन किया है, कितने ही देवोंको मैंने पिताके समान माना है, कितने ही देवोंको पुत्रके समान बड़े प्रेमसे खिलाया है, कितने हीको पुरोहित, मन्त्री और अमात्यके स्थानपर नियुक्त किया है, कितने हीको मैंने मित्र और पीठमर्दके समान देखा है। कितने ही देवोंको अपने प्राणोंके समान मानकर उन्हें अपनी रक्षाके लिये नियुक्त किया है, कितने हीको देवोंकी रक्षाके लिये सम्मानयोग्य पदपर देखा है, कितने हीको सेनापतिके स्थानपर नियुक्त किया है, कितने हीको अपने परिवारके लोग समझा है, कितने हीको सामान्य प्रजाजन माना है, कितने हीको सेवक माना है, कितने हीको परिजनके स्थानपर और कितने हीको अन्तःपुरमें रहनेवाले प्रतीहारी आदिके स्थानपर नियुक्त किया है। कितने ही देवियोंको वल्लभिका बनाया है और कितनी ही देवियोंको महादेवी पदपर नियुक्त किया है, इस प्रकार मैंने आप लोगोंपर असाधारण प्रेम दिखलाया है और आप लोगोंने भी हमपर असाधारण प्रेम धारण किया है ॥२०४-२०९॥
O noble gods! For a long span of time, I have nurtured and protected you all.Many among you I have regarded with the reverence due to a father; many others I have nourished with the deep affection reserved for a son.To some I appointed the dignified roles of priest, minister, or counselor; others I cherished as trusted friends and loyal guardians.There are those whom I esteemed as dearly as my own life, entrusting them with my personal protection; others I honored with roles for safeguarding the divine realm itself.
Many I designated as commanders of celestial armies; others I embraced as members of my own household.Some I considered the common folk of the heavens, others as devoted attendants;
some I held as intimate kinsmen, and others I appointed to the inner court as chamberlains and custodians.Numerous goddesses I made my beloved consorts, and many I elevated to the exalted rank of Mahādevī—Supreme Queen.In this way, I have shown you all extraordinary love, and you too have returned to me that love in boundless measure. 204 – 209
श्लोक ( Shlok ) 210
साम्प्रतं स्वर्गभोगेषु गतो मन्देच्छतामहम् । प्रत्यासन्ना हि मे लक्ष्मी रद्य भूलोकगोचरा ॥२१०॥
इस समय स्वर्ग के भोगोंमें मेरी इच्छा मन्द हो गई है और निश्चय ही पृथिवी लोककी लक्ष्मी आज मेरे निकट आ रही है ॥ २१०।।
At this moment, my longing for the pleasures of heaven has waned, and surely, the goddess of Earth’s fortune now draws near unto me.210
श्लोक ( Shlok ) 211
युष्मत्साक्षि ततः कृत्स्नं स्वः साम्राज्यं मयोज्झितम् । यश्चान्यो मत्समो भावी तस्मै सर्वं सर्पितम् ।।२११॥
इसलिये आज तुम सबकी साक्षीपूर्वक मैं स्वर्गका यह समस्त साम्राज्य छोड़ रहा हूं और मेरे पीछे मेरे समान जो दूसरा इन्द्र होनेवाला है उसके लिये यह समस्त सामग्री सर्पित करता हूं ।। २११।।
Therefore, today, in the presence of you all as witnesses, I renounce this entire dominion of heaven,and I entrust all its treasures and powers to him who shall succeed me as Indra, equal in virtue and stature to myself.211
श्लोक 212 से 223
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
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