आर्यिका आस्थाश्री माताजी रचित चंदनषष्ठी व्रत विधान
स्थापना – चंदनषष्ठी व्रत विधान
अर्घ्य Arghya-1-to-8
दोहा
मन शुद्धि को छोड़कर, की पूजा अभिषेक ।
क्षमा करो हे नाथ ! अब, पूजें भक्त विशेष ।।
शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश ।
पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश ॥9॥
ॐ ह्रीं अर्ह मनकृत अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
वचनों से हमने किया, बिना शुद्धि गुणगान ।
पाप बंध उसमें किया, रहा नहीं कुछ भान ।।
शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश ।
पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश ॥10॥
ॐ ह्रीं अर्ह वचनकृत अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
काया को धोया मगर, किया नहीं मुख शुद्ध ।
शुद्ध वस्त्र धारण किये, छूकर किये अशुद्ध । शुद्धि..। 11 ।
ॐ ह्रीं अहँ कायकृत अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अ
निर्वपामीति स्वाहा।
किये विधान बड़े-बड़े, तजकर शुद्धि विवेक ।
भोजन पानी ले लिया, भूले वस्त्र विवेक ॥ शुद्धि..। 12 ।
ॐ ह्रीं अर्ह पूजा विधाने अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
छींक जंभाई खाँसी में, करके वस्त्र अशुद्ध ।
पाप बंध हमसे हुआ, कैसे हो हम शुद्ध । शुद्धि.. ।।13 ।।
ॐ ह्रीं अहँ सर्व अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
तीर्थों में हम जब गये, परिजन संग ले साथ।
खा पीकर हम पेट भर, गये प्रभु के पास ॥ शुद्धि.. । 14 ॥
ॐ ह्रीं अर्ह तीर्थक्षेत्रे अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य
निर्वपामीति स्वाहा।
गुरुओं के आहार में, पहने वस्त्र न शुद्ध ।
झूठ बोल शुद्धि कहे, मन-वच काय अशुद्ध ।। शुद्धि.. ।।15 ।
ॐ ह्रीं अर्ह पात्र दान संबंधि अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः
अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
प्रभु पूजा स्वाध्याय में, तन अशुद्ध जब होय ।
छिपा लिया वह दोष जब, तन कुष्ठी तब होय ।।
शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश ।
पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश ॥ 16 ।
ॐ ह्रीं अर्ह देवपूजा स्वाध्याय संबंधि अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय
नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा।
🌿 Chandanaṣaṣṭhī Vrat – Hindi – English Dual-script version
(Removal of Impurities Offering)
In Jain worship, purity of mind, speech, and body is essential. Even small mistakes during rituals — done knowingly or unknowingly — can create karmic bondage. The following verses humbly acknowledge such lapses and seek forgiveness from Śrī Chandraprabha Bhagwān, offering arghya for purification.
9️⃣ Mind-made Impurity (Man-kṛt Ashuddhi)
| Hindi (Doha) | English Meaning |
|---|---|
| मन शुद्धि को छोड़कर, की पूजा अभिषेक। क्षमा करो हे नाथ! अब, पूजें भक्त विशेष।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | Without purifying the mind, I performed the worship and abhiṣeka. Forgive me, O Lord! Now I worship You with true devotion. Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with precious offerings — remove all my sorrows. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह मनकृत अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
🔟 Speech-made Impurity (Vachan-kṛt Ashuddhi)
| Hindi | English |
|---|---|
| वचनों से हमने किया, बिना शुद्धि गुणगान। पाप बंध उसमें किया, रहा नहीं कुछ भान।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | With impure speech, I praised You without cleansing my words. I bound sin without even realizing. Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with pure offerings — remove all my troubles. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह वचनकृत अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
1️⃣1️⃣ Body-made Impurity (Kāya-kṛt Ashuddhi)
| Hindi | English |
|---|---|
| काया को धोया मगर, किया नहीं मुख शुद्ध। शुद्ध वस्त्र धारण किये, छूकर किये अशुद्ध।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | I cleansed my body but did not purify my mouth. I wore clean clothes but defiled them by impure touch. Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with valuable offerings — take away all sorrow. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह कायकृत अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
1️⃣2️⃣ Ritual Mistakes (Pūjā Vidhāna Ashuddhi)
| Hindi | English |
|---|---|
| किये विधान बड़े-बड़े, तजकर शुद्धि विवेक। भोजन पानी ले लिया, भूले वस्त्र विवेक।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | I performed grand rituals but forgot purity and discretion. I ate and drank, neglecting the sanctity of my clothes. Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with precious offerings — remove all my pain. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह पूजा विधाने अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
1️⃣3️⃣ General Impurities (Sarva Ashuddhi)
| Hindi | English |
|---|---|
| छींक, जंभाई, खाँसी में, करके वस्त्र अशुद्ध। पाप बंध हमसे हुआ, कैसे हो हम शुद्ध।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | By sneezing, yawning, or coughing, I defiled my clothes. Through such acts, I bound sins — how can I become pure? Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with fine offerings — destroy all my afflictions. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह सर्व अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
1️⃣4️⃣ Impurity in Pilgrimage (Tīrtha Kṣetra Ashuddhi)
| Hindi | English |
|---|---|
| तीर्थों में हम जब गये, परिजन संग ले साथ। खा पीकर हम पेट भर, गये प्रभु के पास।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | I visited the holy pilgrim places, taking family along. After eating and filling my stomach, I went before the Lord. Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with pure offerings — remove my sorrow and faults. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह तीर्थक्षेत्रे अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
1️⃣5️⃣ Impurity in Monastic Service (Pātra-Dāna Ashuddhi)
| Hindi | English |
|---|---|
| गुरुओं के आहार में, पहने वस्त्र न शुद्ध। झूठ बोल शुद्धि कहे, मन-वच-काय अशुद्ध।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | While serving monks their food, I wore impure clothes. I falsely claimed purity — yet my mind, speech, and body were impure. Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with pure wealth — take away my troubles. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह पात्र दान संबंधि अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
1️⃣6️⃣ Impurity in Worship & Study (Deva Pūjā / Svādhyāya Ashuddhi)
| Hindi | English |
|---|---|
| प्रभु पूजा स्वाध्याय में, तन अशुद्ध जब होय। छिपा लिया वह दोष जब, तन कुष्ठी तब होय।। शुद्धि से सिद्धी मिले, कहते चन्द्र जिनेश। पूजें हम वसु द्रव्य से, हरलो सब दुःख क्लेश।। | In deity worship or scriptural study, if the body is impure, and the fault is hidden, the body is like that of a leper. Purity brings perfection, says Lord Chandraprabha. I worship You with pure wealth — remove all my suffering. |
| Mantra: | |
| ॐ ह्रीं अर्ह देवपूजा स्वाध्याय संबंधि अशुद्धि दोष निवारणाय श्री चंद्रप्रभ जिनेन्द्राय नमः अर्घ्य निर्वपामीति स्वाहा। |
These verses remind us that in Jain worship, external offerings alone are not enough — antar śuddhi (inner purity) is the true offering that pleases the Lord. A sincere heart, free from deceit, is the purest arghya one can give.
अर्घ्य Arghya- 17 to 24
Home Page चंदनषष्ठी व्रत विधान

