आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 12 से 21 व्रतियों की परीक्षा और सत्कार
अव्रती लोग बिना सोच-विचार के आंगन में प्रवेश कर गए, जिन्हें भरत ने एक ओर हटा दिया। व्रतधारी, उच्च कुलों में जन्मे लोग हरे अंकुरों के कारण आंगन में प्रवेश नहीं करना चाहते थे, क्योंकि वे पाप और जीव हिंसा से डरते थे। भरत के आग्रह पर वे प्रासुक मार्ग से आए। उन्होंने बताया कि पर्व के दिन हरे अंकुर, पुष्प, और फलों में जीवों का विनाश नहीं करना चाहिए, क्योंकि सर्वज्ञ ने कहा है कि इनमें अनंत निगोदिया जीव रहते हैं। उनके वचनों से प्रभावित होकर भरत ने व्रतियों की प्रशंसा की और उन्हें दान, मान, और सत्कार से सम्मानित किया। पद्म निधि से प्राप्त ब्रह्मसूत्र से उनकी पहचान की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
तेष्वव्रता विना सङ्गात् प्राविक्षन् नृपमन्दिरम् । तानेकतः समुत्सार्य शेषानाह्वययत् प्रभुः ॥१२॥
उन लोगोंमें जो अव्रती थे वे बिना किसी सोच-विचारके राजमन्दिरमें घुस आये । राजा भरतने उन्हें एक ओर हटाकर बाकी बचे हुए लोगोंको बुलाया ।।१२।।
Those among them who had broken their vows entered the royal palace heedlessly,whereupon King Bharata bade them step aside,and called forth the remaining assembled guests.12
श्लोक ( Shlok ) 13
ते तु स्वव्रत सिद्धयर्थमीहमाना महान्वयाः । नैषुः प्रवेशनं तावद् यावदार्द्राङ्कुराः पथि ॥१३॥
परन्तु बड़े बड़े कुलमें उत्पन्न हुए और अपने व्रतकी सिद्धिके लिये चेष्टा करनेवाले उन लोगोंने जब तक मार्गमें हरे अंकूरे हैं तब तक उसमें प्रवेश करनेकी इच्छा नहीं की ॥१३॥
Yet those born of noble lineages, striving to fulfill their vows,refused to enter while the verdant sprouts still adorned the path—their hearts steadfast in devotion and discipline.13
श्लोक ( Shlok ) 14
सधान्यैर्हरितैः कीर्णमनाक्रम्य नृपाङ्गणम् । निश्चक्रमुः कृपालुत्वात् केचित् सावद्यभीरवः ॥१४।।
पापसे डरनेवाले कितने ही लोग दयालु होने के कारण हरे धान्योंसे भरे हुए राजाके आंगनको उल्लंघन किये बिना ही वापिस लौटने लगे ।।१४।।
Many, fearful of sin yet moved by compassion,turned away without violating the royal courtyard—laden with tender green grains—and silently withdrew from the presence of the king.14
श्लोक ( Shlok ) 15
कृतानुबन्धना भूयश्चक्रिणः किल तेऽन्तिकम् । प्रासुकेन पथाऽन्येन भेजुः क्रान्त्वा नृपाङ्गणम् ।।१५।।
परन्तु जब चक्रवर्तीने उनसे बहुत ही आग्रह किया तब वे दूसरे प्रासुक मार्गसे राजाके आंगनको लांघ-कर उनके पास पहुंचे ।।१५।।
Yet when the Chakravartin entreated them earnestly,they traversed an alternate path,crossing the royal courtyard by a different way,and approached the king with reverence.15
श्लोक ( Shlok ) 16
प्राक् केन हेतुना यूयं नायाताः पुनरागताः। केन ब्रतेति पृष्टास्ते प्रत्यभाषन्त चक्रिणम् ॥१६॥
आप लोग पहले किस कारणसे नहीं आये थे, और अब किस कारणसे आये हैं, ऐसा जब चक्रवर्तीने उनसे पूछा तब उन्होंने नीचे लिखे अनुसार उत्तर दिया ।।१६।।
When the Chakravartin inquired of them,“Why did you not come before, and what now compels your presence?”they responded with the words recorded below.16
श्लोक ( Shlok ) 17
प्रवालपत्रपुष्वादेः पर्वणि व्यपरोपणम् । न कल्पतेऽद्य तज्जानां जन्तूनां नो ऽनमिद्रुहाम् ॥१७॥
आज पर्वके दिन कोंपल, पत्ते तथा पुष्प आदिका विघात नहीं किया जाता और न जो अपना कुछ बिगाड़ करते हैं ऐसे उन कोंपल आदिमें उत्पन्न होनेवाले जीवोंका भी विनाश किया जाता है ॥१७॥
On this sacred festival day, it is forbidden to harm tender sprouts, leaves, or blossoms;nor may we destroy the countless lives that dwell within them—for even those beings, though born in fragile forms, do not bring harm to others.17
श्लोक ( Shlok ) 18
सन्त्येवानन्तशो जीवा हरितेष्वङ्कुरादिषु । निगोता इति सार्वज्ञं देवास्माभिः श्रुतं वचः ॥१८॥
हे देव, हरे अंकुर आदिमें अनन्त निगोदिया जीव रहते हैं, ऐसे सर्वज्ञ-देवके वचन हम लोगों ने सुने हैं ।॥१८॥
O Lord, we have heard the sacred words of the Omniscient—that within these green sprouts dwell infinite nigodīya beings,subtle and unseen, yet teeming with life.18
श्लोक ( Shlok ) 19
तस्मान्नास्माभिराक्रान्तम द्यत्वे त्वद्गृहाङ्गणम् । कृतोपहारमार्द्राद्रैः फलपुष्पाङ्कुरादिभिः ॥१९॥
इसलिये जिसमें गीले गीले फल, पुष्प और अंकुर आदिसे शोभा की गई है ऐसा आपके घरका आंगन आज हम लोगोंने नहीं खूंदा है ।।१९।।
Therefore, we have not trodden upon the courtyard of your palace today—for it was adorned with moist fruits, tender blossoms, and fresh sprouts,each teeming with delicate life. 19
श्लोक ( Shlok ) 20
इति तद्वचनात् सर्वान् सोऽभिनन्द्य दृढव्रतान् । पूजयामास लक्ष्मीवान् दानमानादिसत्कृतैः ॥२०॥
इस प्रकार उनके वचनोंसे प्रभावित हुए सम्पत्तिशाली भरतने व्रतोंमें दृढ़ रहनेवाले उन सबकी प्रशंसा कर उन्हें दान मान आदि सत्कारसे सन्मानित किया ॥२०॥
Thus moved by their noble words,the wealthy and mighty Bharata praised them all—those steadfast in their vows—and honored them with gifts, offerings, and tokens of reverence.20
श्लोक ( Shlok ) 21
तेषां कृतानि चिह्नानि सूत्रैः पद्माह्वयान्निधेः । “उपात्तै र्ब्रह्मसूत्रा ह्रैरे काद्येकादशान्तकै ॥२१॥
पद्म नामकी निधि से प्राप्त हुए एकसे लेकर ग्यारह तककी संख्यावाले ब्रह्मसूत्र नामके सूत्रसे (व्रतसूत्रसे) उन सबके चिह्न किये ॥२१॥
With the Brahmasūtra—the sacred thread of vows—ranging in count from one to eleven,and obtained from the Padma treasure,he marked each of them with due distinction.21
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 |
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