सोलह कारण विधान – कविवर श्री टेकचंद जी कृत
16. प्रवचनवात्सल्य भावना पूजा
(अडिल्ल छन्द)
तिनकी वानी प्रवचन जग में सार है, करुणासागर करत भव पार है। याको वत्सल भाव प्रीति मन लाय है, सो इहां प्रवचन थाप भावना भाय है।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावना ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावना । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावना । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधापनम् ।
(बेसरी छन्द)
गंगानदी की निर्मल नीरा, उज्ज्वल सुभगगन्ध ज्यों क्षीरा। भले पात्र में धर थुति गाई, पूर्जी प्रवचनवत्सल भाई ।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै जलम् निर्वपामीति स्वाहा। चन्दन वावन पावन कारी, घसिहों नीर डार हितधारी। कंचनझारी धर मन लाई, पूजों प्रवचनवत्सल भाई।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै चंदनम् निर्वपामीति स्वाहा। अक्षत उज्ज्वल बीन अनूपा, नखशिख जुत मुक्ताफल रूपा। भले पात्र में धर कर लाई, पूजों प्रवचनवत्सल भाई।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा। फूल गन्ध शुभ रंग को धरी, सुरतरु पुष्प भावना कारी। गूंथ माल अपने कर लाई, पूजों प्रवचनवत्सल भाई।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै पुष्पम् निर्वपामीति स्वाहा। षटरस जुत नैवेद्य बनाई, मोदक भले बनाकर लाई। नीके पात्र मांहि धर लाई, पूजों प्रवचनवत्सल भाई ।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै नैवेद्यम् निर्वपामीति स्वाहा। दीपक रतन ज्योति परकासो, तमनाशक निधूम सुवासी। कनक थाल भर आरति लाई, पूजों प्रवचन वत्सल भाई।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै दीपम् निर्वपामीति स्वाहा। धूप अगर चन्दन की ठानी, दसविध गन्ध और धरआनी। अगनि मांहि मैं खेवन लाई, पूजों प्रवचनवत्सल भाई।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै धूपम् निर्वपामीति स्वाहा। श्रीफल लोंग सुपारी जानो, खारक आदि भले फल आनो। स्वच्छ पात्र में धर कर लाई, पूर्जी प्रवचनवत्सल भाई ।।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै फलम् निर्वपामीति स्वाहा। नीर गन्ध अक्षत सुभ भाये, चरु दीपक फल धूप सु लाये।
English Meaning with Transliteration
Pravacana-Vātsalya Bhāvanā Pūjā
Opening Verse (अडिल्ल छन्द)
Transliteration:
Tinakī vānī pravacana jag meṁ sāra hai,
Karuṇā-sāgara karata bhava pāra hai।
Yāko vatsala bhāva prīti mana lāya hai,
So ihāṁ pravacana thāpa bhāvanā bhāya hai॥
English Meaning:
The words of the saints’ discourses are the true essence of the world.
Like an ocean of compassion, they help beings cross the ocean of worldly existence.
With love and affection, I fix my mind on this feeling of tenderness (vātsalya),
And establish here the worship of the Pravacana-Vātsalya Bhāvanā.
Mantras:
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावना ! अत्र अवतर अवतर संवौषट् आह्वाननम् ।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावना । अत्र तिष्ठ तिष्ठ ठः ठः स्थापनम् ।
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावना । अत्र मम सन्निहितो भव भव वषट् सन्निधापनम् ।
Verse 1 – Offering of Water (जल अर्पण) – (बेसरी छन्द)
Transliteration:
Gaṅgā-nadī kī nirmala nīrā,
Ujjvala subhaga-gandha jyoṁ kṣīrā।
Bhale pātra meṁ dhara thuti gāī,
Pūjī pravacana-vatsala bhāī॥
English Meaning:
Like the pure waters of the river Ganga,
Bright and fragrant as sweet milk,
I place it in a noble vessel, singing praises,
And worship the tender Pravacana-Vātsalya Bhāvanā.
Mantra:
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै जलम् निर्वपामीति स्वाहा।
Verse 2 – Offering of Sandal (चंदन अर्पण)
Transliteration:
Candan vāvan pāvana kārī,
Ghasihoṁ nīra ḍāra hitadhārī।
Kañcana-jhārī dhara mana lāī,
Pūjoṁ pravacana-vatsala bhāī॥
English Meaning:
Sandal paste, cooling and purifying,
I prepare it with water and devotion.
Placing it in a golden vessel with focused mind,
I worship the tender Pravacana-Vātsalya Bhāvanā.
Mantra:
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै चंदनम् निर्वपामीति स्वाहा।
Verse 3 – Offering of Rice/Grains (अक्षत अर्पण)
Transliteration:
Akṣata ujjvala bīna anūpā,
Nakha-śikha juta muktā-phaḷa rūpā।
Bhale pātra meṁ dhara kara lāī,
Pūjoṁ pravacana-vatsala bhāī॥
English Meaning:
I offer shining unbroken grains,
Perfect from tip to root, like pearls in form.
Placing them in a noble vessel with reverence,
I worship the tender Pravacana-Vātsalya Bhāvanā.
Mantra:
ॐ ह्रीं श्री प्रवचनवात्सल्यभावनायै अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा।
समुच्चय जयमाला Samucchaya Jayamala
1. दर्शनविशुद्धि भावना पूजा | प्रत्येकार्घ्य | जयमाला | 2. विनय सम्पन्नता भावना पूजा | 3. शीलव्रतेष्वनतिचार भावना पूजा | 4. अभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग भावना पूजा | 5. संवेग भावना पूजा | 6. त्याग भावना पूजा | 7. तपो भावना पूजा | 8. साधुसमाधि भावना पूजा | 9. वैयावृत्य भावना पूजा | 10. अर्हद्भक्ति भावना पूजा | 11. आचार्यभक्ति भावना पूजा | 12. बहुश्रुतभक्ति भावना पूजा | 13 प्रवचनभक्ति भावना पूजा | 14. षट् आवश्यक भावना पूजा | 15. मार्गप्रभावना भावना पूजा | 16 प्रवचनवात्सल्य भावना पूजा | समुच्चय जयमाला
