आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 बाहुबली का केवलज्ञान
विद्याधरियां बाहुबली के शरीर की लताएं हटाती हैं। शुक्लध्यान से उनकी तप-शक्ति बढ़ती है। एक वर्ष के उपवास के अंत में भरत उनकी पूजा करते हैं, जिससे बाहुबली को केवलज्ञान प्राप्त होता है। भरत का हृदय शल्य-मुक्त होता है। भरत केवलज्ञान से पहले अपराध-क्षमा और बाद में ज्ञान-उत्सव के लिए पूजा करते हैं। दोनों भाइयों का प्रेम और धर्म-निष्ठा उनकी पूजा को उत्कृष्ट बनाती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
महिम्नाऽस्य तपोवीर्य जनितेनालघीयसा । मुहुरासनकम्पोऽभून्नतमूर्ध्ना सुधा शिनाम् ॥१८२॥
तपकी शक्तिसे उत्पन्न हुए मुनिराज के बड़े भारी माहात्म्यसे जिनके मस्तक झुके हुए हैं ऐसे देवोंके आसन भी बार बार कम्पायमान होने लगते थे ॥१८२॥
Even the thrones of the gods would tremble again and again,Before those whose heads were bowed low in reverence—To the great sages, born of the power of austerity,Resplendent in their boundless majesty.182
श्लोक ( Shlok ) 183
विद्याधर्यः कदाचिच्च क्रीडाहेतोरुपागताः । वल्लीरुद्वेष्टयामासु र्मुनेः सर्वाङ्गसंगिनीः ॥१८३॥
कभी-कभी क्रीड़ाके हेतुसे आयी हुई विद्याधरियाँ उनके सर्व शरीर-पर-लगी हुई लताओको हटा जाती थी ॥१८३॥
At times, celestial nymphs of the Vidyādhara realm,Come for the sport of playful delight,Would gently part the creeping vinesClinging to the ascetic’s entire form.183
श्लोक ( Shlok ) 184
इत्युपारूढं सद्ध्यानवलोद्भूततपोबलः । स लेश्याशुद्धिमास्कन्दन् शुक्लध्यानोन्मुखोऽभवत् ॥१८४॥
इस प्रकार धारण किये हुए समीचीनधर्म-ध्यानके बलसे जिनके तपकी शक्ति उत्पन्न हुई है ऐसे वे मुनि लेश्याकी विशुद्धिको प्राप्त होते हुए शुक्लध्यानके सम्मुख हुए ॥१८४॥
Thus, through the strength of their rightly embraced vows and steadfast meditation,Their austerities gave rise to a mighty spiritual power.Attaining the purity of leśyā,Those noble sages stood on the very threshold of śukla-dhyāna — the supreme contemplation.184
श्लोक ( Shlok ) 185
वत्सरानशनस्यान्ते भरतेशेन पूजितः । स भेजे परमज्योतिः केवलाख्यं यदक्षरम् ॥१८५॥
एक वर्षका उपवास समाप्त होनेपर भरतेश्वरने आकर जिनकी पूजा की है ऐसे महामुनि बाहुबली कभी नष्ट नही होनेवाली केवलज्ञानरूपी उत्कृष्ट ज्योतिको प्राप्त हुए। भावार्थ दीक्षा लेते समय बाहुबली ने एक वर्षका उपवास किया था। जिस दिन उनका वह उपवास पूर्ण हुआ उसी दिन भरतने आकर उनकी पूजा की और पूजा करते ही उन्हे अविनाशी उत्कृष्ट केवलज्ञान प्राप्त हो गया ।।१८५।।
When the noble sage Bāhubali,He who had undertaken a year-long fast at the moment of his renunciation,Completed that sacred austerity
Bharata, the sovereign of all Bharata-varṣa, came forth and worshipped him.And in that very instant, Bāhubali attained the supreme, imperishable lightOf Kevalajñāna — the perfect, infinite knowledge that knows no decay.
Bhāvārtha:
When Bāhubali accepted initiation into monkhood, he undertook a year-long fast. On the very day that this austere vow came to its completion, King Bharata arrived and worshipped him. At that precise moment, Bāhubali attained the imperishable and exalted state of Kevalajñāna — the infinite, all-encompassing knowledge that marks the summit of spiritual realization.185
श्लोक ( Shlok ) 186
संक्लिष्टोभरताधीशः सोऽस्मत्त इति यत्किल । हृद्यस्य हार्द तेनासीत् तत्पूजाऽपेक्षि केवलम् ।।१८६
वह भरतेश्वर ‘मुझसे संक्लेशको प्राप्त हुआ है अर्थात् मेरे निमित्तसे उसे दुख पहुँचा है यह विचार बाहुबली के हृदयमे विद्यमान रहता था, इसलिए केवलज्ञानने भरतकी पूजाकी अपेक्षा की थी। भावार्थ भरतके पूजा करते ही बाहुबली का हृदयं शल्यरहित हो गया और उसी समय उन्हें केवलज्ञान भी प्राप्त हो गया ॥१८६।।
A thought lingered ever in Bāhubali’s heart:“That noble Bharata has suffered on my account—He has borne sorrow because of me.”
Thus, even the supreme Kevalajñāna awaited the moment When Bharata would come and pay him homage.
Bhāvārtha:
A subtle feeling remained in Bāhubali’s heart—that Bharata, his elder brother, had endured distress because of him. This inner unease, like a thorn in the soul, stood as a final obstacle. Therefore, Kevalajñāna, the supreme omniscience, held itself in abeyance until Bharata came and offered his worship. The very moment Bharata performed the act of reverence, Bāhubali’s heart was freed of its final affliction, and he immediately attained the indestructible state of Kevalajñāna. 186
श्लोक ( Shlok ) 187
केवलार्कोदयात् प्राक्च पश्चाच्च विधिवद् व्यधात् । सपर्या भरताधीशो योगिनोऽस्य प्रसन्नधीः ॥१८७॥
प्रसन्न है बुद्धि जिसकी ऐसे सम्राट् भरतने केवलज्ञानरूपी सूर्यके उदय होनेके पहले और पीछे दोनों ही समय विधिपूर्वक उन मुनिराजकी पूजा की थी ॥१८७॥
Endowed with a serene and enlightened mind,Emperor Bharata, with due rite and reverence,Worshipped that great sage both before and after—The rise of the radiant sun of Kevalajñāna,The supreme light of perfect knowledge.187
श्लोक ( Shlok ) 188
‘स्वागःप्रमार्जनार्थेज्या “प्राक्तनी भरतेशेनः । पाश्चात्त्याऽन्त्यायताऽपीज्या केवलोत्पत्तिमन्वभूत् ॥१८८॥
भरतेश्वरने केवलज्ञान उत्पन्न होनेके पहले जो पूजा की थी वह अपना अपराध नष्ट करनेके लिए की थी और केवलज्ञान होनेके बाद जो बड़ी भारी पूजा की थी वह केवलज्ञानकी उत्पत्ति-का अनुभव करनेके लिए की थी ॥१८८॥
The worship that Emperor Bharata offeredBefore the dawn of Kevalajñāna Was to absolve himself of the offence he had caused.
And the grand veneration he performed thereafter Was born of the sublime experience Of witnessing the rise of that perfect, all-knowing light.188
श्लोक ( Shlok ) 189
या कृता भरतेशेन महेज्या स्वानुजन्मनः । प्राप्तकेवलबोधस्य को हि तद्वर्णने क्षमः ॥१८९॥
जिन्हे केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे अपने छोटे भाई बाहुबलीकी भरतेश्वरने जो बड़ी भारी पूजा की थी उसका वर्णन करनेमें कौन समर्थ हो सकता है ? ॥१८९।।
Who can truly be worthy of describing That magnificent worship performed by Emperor Bharata—Offered unto his younger brother, Bāhubali,In whom the light of Kevalajñāna had arisen?189
श्लोक ( Shlok ) 190 –191
स्वजन्मानुगमो ऽस्त्येको धर्मरागस्तथाऽपरः । जन्मान्तरानुवन्धश्च प्रेमबन्धो ऽतिनिर्भ रः ॥१९०॥इत्येकशोऽप्यमी भक्तिप्रकर्षस्य प्रयोजकाः। तेषां नु सर्वसामग्री कां न पुष्णाति सत्क्रियाम् ॥१९१॥
प्रथम तो बाहुबली भरतके छोटे भाई थे, दूसरे भरतको धर्मका प्रेम बहुत था, तीसरे उन दोनोंका अन्य अनेक जन्मोसे सम्बन्ध था, और चौथे उन दोनोंमे बड़ा भारी प्रेम था इस प्रकार इन चारोंमे से एक-एक ‘भी भक्तिकी अधिकताको बढानेवाले है, यदि यह सब सामग्री एक साथ मिल जाये तो वह कौन-सी उत्तम क्रियाको पुष्ट नहीं कर सकती अर्थात् उससे कौन-सा अच्छा कार्य नही हो सकता ? ॥१९०-१९१॥
First, Bāhubali was the younger brother of Bharata;Second, Bharata bore deep devotion to righteousness;Third, countless past lives had woven a bond between them;And fourth, a profound and abiding love united their hearts.Each of these, alone, is enough to deepen the spirit of devotion—But when all four converge in a single moment,What noble deed could they not strengthen?What act of highest virtue would lie beyond their power?190 –191
श्लोक 192 से 201
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
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