आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 सूर्यास्त का प्रतीकात्मक वर्णन
सूर्यास्त के समय सूर्य की किरणें लाल होकर अस्ताचल की शिखर पर वृक्षों की कोपलों-सी दिखती हैं, मानो वह गिरने से बचने के लिए सहारा ले रहा हो। सूर्य पश्चिम दिशा में डूबता है, जैसे पाप के भय से उसे सहारा न मिला हो। वह पाताल में छिप जाता है, मानो बीते दिन को खोजने गया हो। दिशाएं अंधकार से शोकाकुल हो जाती हैं, और कमलिनियां सूर्य के वियोग में मुरझा जाती हैं। सायंकाल का लाल प्रकाश दावानल-सा प्रतीत होता है, जो युद्ध की आगामी उग्रता का प्रतीक है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
अथोरुप्यद्भटानीकनेत्रच्छायार्पितां रुचम् । दधान इव तिग्मांशुगसीदारक्तमण्डलः ।।१५२।।
अथानन्तर सूर्यका मंडल लाल हो गया मानो उसने क्रोधित हुए योद्धाओंकी सेनाके नेत्रोंकी छायाके द्वारा दी हुई लाल कान्ति ही धारण की हो ॥१५२।।
Then, the orb of the sun turned crimson, as though it had assumed the red radiance bestowed by the shadow of the eyes of wrathful warriors’ armies.152.
श्लोक ( Shlok ) 153
क्षणमस्ताचलप्रस्थकाननक्ष्माजपल्लवैः । सदृगालोहितच्छायो ददृशेऽर्काशुसंस्तरः ॥१५३॥
उस समय क्षण भरके लिये सूर्यको किरणोंका समूह अस्ताचल की शिखरपर लगे हुए वनके वृक्षोंकी कोपलोंके समान कुछ कुछ लाल रंगका दिखाई दे रहा था ॥१५३॥
At that moment, for a brief while, the sun’s rays appeared tinged with a faint crimson hue, resembling the tender buds of forest trees clinging to the peaks of the western mountain.153
श्लोक ( Shlok ) 154
करैगिर्यग्रसंलग्नैः भानुरालक्ष्यत क्षणम् । पातभीत्या करालाग्रैः’ करालम्बमिवाश्रयन् ।।१५४।।
उस समय वह सूर्य अस्ताचलकी शिखरपर लगे हुए किरणोंसे क्षणभरके लिये ऐसा जान पड़ता था मानो नीचे गिरनेके भयसे अपने किरणरूपी हाथोंसे किसीके हाथका सहारा ही ले रहा हो ॥ १५४॥
At that moment, the sun, poised upon the summit of the western mountain, seemed for an instant as though, fearing its descent, it were grasping the hand of another with its ray-like arms, seeking support.154
श्लोक ( Shlok ) 155
पतन्त वारुणी सङ्गात् परिलुप्तविभावसुम् । नालम्बत’ बतास्ताद्रिर्भानुं विभ्यैदिवैनसः ॥१५५।।
जो सूर्य वारुणी अर्थात् पश्चिम दिशा (पक्षमें मदिरा) के समागमसे पतित हो रहा है और जिसका कान्तिरूपी धन नष्ट हो गया है ऐसे सूर्यको मानो पापसे डरते हुए ही अस्ताचलने आलम्बन नहीं दिया था । भावार्थ वारुणी शब्दके दो अर्थ होते हैं मदिरा और पश्चिम दिशा । पश्चिम दिशामें पहुँचकर सूर्य प्राकृतिक रूपसे नीचे की ओर ढलने लगता है। यहां कविने इसी प्राकृतिक दृश्यमें श्लेषमूलक उत्प्रेक्षा अलंकार-की पुट देकर उसे और भी सुन्दर बना दिया है। वारुणी अर्थात् मदिराके समागमसे मनुष्य अपवित्र हो जाता है उसका स्पर्श करना भी पाप समझा जाने लगता है, सूर्य भी वारुणी अर्थात् पश्चिम दिशा (पक्षमें मदिरा) के समागमसे मानो अपवित्र हो गया था। उसका स्पर्श करने-से कहीं मैं भी पापी न हो जाऊँ इस भयसे अस्ताचलने उसे सहारा नहीं दिया-गिरते हुए को हस्तालम्बन देकर गिरनेसे नहीं बचाया। सूर्य डूब गया ।। १५५।।
The sun, having come into contact with Vāruṇī—the western direction, or wine—seemed to have fallen from grace, its radiance depleted like wealth squandered. As though fearing the taint of sin, the western mountain offered it no support; it did not extend a hand to steady the fallen, and thus the sun sank.
Note: The word “Vāruṇī” bears a double meaning—both wine and the western direction. The poet skillfully weaves this śleṣa-based poetic conceit, likening the sun’s natural descent in the west to a man fallen into disgrace through intoxication, shunned even by those who might aid him.155
श्लोक ( Shlok ) 156
गतो नु दिनमन्वेष्टुं प्रविष्टो नु रसातलम् । तिरोहितो नु श्रृङ्गाग्रैः रस्ताद्रेनैक्षि भानुमान् ॥१५६॥
उस समय सूर्य दिखाई नहीं देता था सो ऐसा जान पड़ता था मानो बीते हुए दिनको खोजने के लिये गया हो, अथवा पाताललोकमें घुस गया हो अथवा अस्ताचलकी शिखरोंके अग्रभागसे छिप गया हो ।। १५६।।
At that moment, the sun was no longer visible, and it seemed as though it had departed in search of the day now past, or had descended into the netherworld, or perhaps had concealed itself behind the lofty peaks of the western mountain.156
श्लोक ( Shlok ) 157
विघटय्य तमो नंशं करैराक्रम्य भूभृतः । दिनावसाने पर्यास्थदहो रविरनंशुकः ॥१५७॥
जिस प्रकार कोई वीर पुरुष दारिद्रयरूपी अन्धकारको नष्ट कर और अपने कर अर्थात् टैक्स द्वारा भूभृत् अर्थात् राजाओंपर आक्रमण कर दिन अर्थात् भाग्यके अन्तमें अनंशुक अर्थात् बिना वस्त्रके यों ही चला जाता है उसी प्रकार सूर्य रात्रिसम्बन्धी अन्धकारको नष्ट कर तथा कर अर्थात् किरणोंसे भूभृत् अर्थात् पर्वतोंपर आक्रमण कर दिनके अन्तमें अनंशुक अर्थात् किरणोंके बिना यों ही चला गया-अस्त हो गया, यह कितने दुःखकी बात है । ॥ १५७।।
Just as a valiant man, having dispelled the darkness of poverty and assailed kings with his taxes, departs at the end of his fortune bereft of all adornment—so too did the sun, having vanquished the darkness of night and assailed the mountains with its ray-like spears, pass away at day’s end, stripped of its radiant garments. Alas, how sorrowful is this sight! 157
श्लोक ( Shlok ) 158
तिर्यङ्मण्डलगत्येव शश्वद् भानुरयं भ्रमन् । विप्रकर्षाज्जनेर्मूढ़ेरग्राहीव पतन्नधः ॥१५८।।
यह सूर्य तो मेरु पर्वतके चारों ओर गोलाकार तिरछी गतिसे निरन्तर घूमता रहता है तथापि दूर होनेसे दिखाई नहीं देता इसलिये मूर्ख पुरुषोंको नीचे गिरता हुआ सा जान पड़ता है ।। १५८॥
This very sun, though ever moving in a circular and oblique path around Mount Meru, appears to the ignorant to be descending—merely because it is far from sight.158
श्लोक ( Shlok ) 159
व्यसनेऽस्मिन् दिनेशस्य शुचेव परिपीडिताः । विच्छायानि मुखान्यूहुः” स्तमोरुद्धा दिगङ्गनाः ॥१५९॥
सूर्यको इस विपत्तिके समय मानो शोकसे पीड़ित हुई दिशारूपी स्त्रियां अन्धकारसे भर जाने के कारण कान्तिरहित मुख धारण कर रही थीं। भावार्थ-पतिकी विपत्तिके समय जिस प्रकार कुलवती स्त्रियों के मुख शोकसे कान्तिहीन हो जाते हैं उसी प्रकार सूर्यकी विपत्तिके समय दिशारूपो स्त्रियोंके मुख शोकसे कान्तिहीन हो गये थे। अन्धकार छा जानेसे दिशाओंकी शोभा जाती रही थी ॥१५९॥
At this hour of the sun’s misfortune, the directions—like noble women stricken with grief—appeared with lusterless faces, veiled in darkness. Just as the faces of virtuous wives lose their radiance in the sorrow of their husband’s fall, so too did the beauty of the quarters fade as gloom descended.159
श्लोक ( Shlok ) 160
पद्मिन्यो म्लानपद्मास्या द्विरे फकरुणारुतैः । शोचन्त्य इव संवृत्ता वियोगादहिमत्विषः ॥१६०॥
कमलिनियोंके कमलरूपी मुख मुरझा गये थे जिससे वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो सूर्यका वियोग होनेसे भ्रमरोंके करुणाजनक शब्दोंके बहाने रुदन करती हुई शोक ही कर रही हों ।॥ १६०॥
The lotus-maidens, their blossom-like faces withered, seemed as though they mourned the sun’s departure—lamenting in sorrow, weeping through the plaintive hum of the bees that hovered near.160
श्लोक ( Shlok ) 161
सन्ध्यातपततान्यासन् वनान्यस्तमहीभृतः । परीतानीव दावाग्निशिखयातिकरालया ॥१६१।।
सायंकालके लाल लाल प्रकाशसे व्याप्त हुए अस्ताचल के वन ऐसे जान पड़ते थे मानो अत्यन्त भयंकर दावानलकी शिखासे ही घिर गये हों ।। १६१।।
The forests upon the western mountain, bathed in the crimson glow of evening light, appeared as though they were engulfed by the fierce tongues of a raging wildfire.161
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
Download PDF