आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 92 चौदह रत्न और सुभद्रा का परिचय
भरत के पास जीव और अजीव भेद से चौदह रत्न हैं। चक्र, छत्र, दण्ड, असि, मणि, चर्म, और काकिणी अजीव रत्न हैं, जबकि सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, सिलावट, और पुरोहित सजीव रत्न हैं। ये रत्न अयोध्या और विजयार्ध शैल पर उत्पन्न हुए। ये निधियां और रत्न भरत के हृदय को बलिष्ठ बनाते हैं। सुभद्रा नामक उनकी स्त्री-रत्न, विद्याधर वंश की, शिरीष-फूल-सी कोमल, चम्पा-कली-सी कान्तिमान, और कामोत्तेजक है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 82 to 92
श्लोक ( Shlok ) 82
सर्वरत्नान्महा नीलनीलस्थूलो पलादयः । प्रादुः सन्ति ” मणिच्छायारचितेन्द्रायुधत्विषः ॥८२॥
जिसके मणियोंकी कान्तिसे इन्द्रधनुषकी शोभा प्रकट हो रही है ऐसी सर्वरत्न नामकी निधिसे महानील, नील तथा पद्मराग आदि अनेक तरहके रत्न प्रकट होते थे ।।८२।।
From the treasure known as Sarvaratna, whose gems gleamed with the brilliance of the rainbow, emerged countless jewels—great sapphires, deep blue lapis lazuli, radiant rubies, and many other precious stones of exquisite beauty.82
श्लोक ( Shlok ) 83
रत्नानि द्वितयान्यस्य जीवाजीवविभागतः । क्ष्मात्राणैश्वर्यसम्भोगसाधनानि चतुर्दश ॥८३॥
इनके सिवाय भरत महाराजके जीव और अजीवके भेदसे दो विभागोंमें बंटे हुए चौदह रत्न भी थे जो कि पृथिवीकी रक्षा और ऐश्वर्य के उपभोग करनेके साधन थे ।।८३।।
Besides these, King Bharata possessed fourteen precious gems, divided into two groups—living and non-living—serving as instruments for the protection of the realm and the enjoyment of its splendid wealth.83
श्लोक ( Shlok ) 84
चक्रातपत्रदण्डासिमणयश्चर्म काकिणी । चमूगृहपतीभाश्वयोषित्तक्षपुरोधसः ॥८४॥
चक्र, छत्र, दण्ड, असि, मणि, चर्म और काकिणी ये सात अजीव रत्न थे और सेनापति, गृहपति, हाथी, घोड़ा, स्त्री, सिलावट और पुरोहित ये सात सजीव रत्न थे ।।८४।।
The seven non-living gems were the discus, the umbrella, the staff, the sword, the jewel, the hide, and the kettle-drum;
While the seven living gems comprised the commander, the householder, the elephant, the horse, the woman, the craftsman, and the priest.84
श्लोक ( Shlok ) 85
‘चक्रासिदण्डरत्नानि सच्छत्राण्यायुधालयात । जातानि मणिचर्माभ्यां काकिणी श्रीगृहोदरे ॥८५॥
चक्र, दण्ड, असि और छत्र ये चार रत्न आयुधशाला में उत्पन्न हुए थे तथा मणि, चर्म और काकिणी ये तीन रत्न श्रीगृहमें प्रकट हुए थे ॥८५।।
The four gems—the discus, staff, sword, and umbrella—originated within the armory,
While the three—the jewel, hide, and kettle-drum—manifested within the royal household.85
श्लोक ( Shlok ) 86
स्त्रीरत्नगजवाजीनां प्रभवो रौष्यशैलतः । रत्नान्यन्यानि साकेताज्जज्ञिरे निधिभिः समम् ॥८६॥
स्त्री, हाथी और घोड़ाकी उत्पत्ति विजयार्ध शैलपर हुई थी तथा अन्य रत्न निधियोंके साथ साथ अयोध्या में ही उत्पन्न हुए थे ॥८६॥
The woman, elephant, and horse were born upon the victorious mountain’s crest,While the remaining gems, along with their treasures, came forth within Ayodhya itself.86
श्लोक ( Shlok ) 87
निधीनां सह रत्नानां गुणान् को नाम वर्णयेत् । “यैराजितभूर्जस्वि हृदयं चक्रवर्तिनः ॥८७॥
जिनके द्वारा सेवन किया हुआ चक्रवर्तीका हृदय अतिशय बलिष्ठ हो रहा था उन निधियों और रत्नोंका वर्णन कौन कर सकता है ? ॥८७॥
Who can truly describe those treasures and gems, by whose grace the Chakravartin’s heart grew exceedingly strong and resolute?87
श्लोक ( Shlok ) 88
भेजे षट्ऋतुजानिष्टान् भोगान् पञ्चेन्द्रियोचितान् । स्त्रीरत्नसार ‘थिस्तद्धि निधानं सुखसम्पदाम् ॥८८॥
वह चक्रवर्ती स्त्रीरत्नके साथ साथ छहों ऋतुओंमें उत्पन्न होनेवाले पञ्चेन्द्रियोंके योग्य भोगोंका उपभोग करता था सो ठीक ही है क्योंकि स्त्री ही समस्त सुख सम्पदाओंका भण्डार है ।॥८८॥
That Chakravartin, alongside the jewel of womanhood, partook of pleasures worthy of the six senses born in all six seasons—truly, for woman is the very treasury of all bliss and abundance.88
श्लोक ( Shlok ) 89
कान्तारत्नमभूत्तस्य सुभद्रेत्यनुपद्रुतम्। ‘भद्रिकाऽसौ प्रकृत्येव” जात्या विद्याधरान्वया ॥८९॥
महाराज भरतके रोगादि उपद्रवोंसे रहित सुभद्रा नामकी स्त्रीरत्न थी, वह सुभद्रा स्वभावसे ही भद्रा अर्थात् कल्याणरूप थी और जातिसे विद्याधरोंके वंशकी थी ।॥८९॥
King Bharata’s jewel among women was Subhadrā, ever free from afflictions and ailments. By nature, she was auspicious and virtuous, and by birth, she belonged to the noble lineage of the Vidyādharas.89
श्लोक ( Shlok ) 90 – 92
शिरीषसुकुमाराङ्गी चम्पकच्छदसच्छविः । बकुलामोदनिःश्वासा पाटला पाटलाधराः ।॥९०॥प्रबुद्धपद्मसौम्यास्या नीलोत्पलदलेक्षणा । सुभू रलिकुलानीलमृदुकुञ्चितमूर्द्धजा ॥९१॥ तनूदरी वरारोहा “वामोरूर्निविडस्तनी । मृदुबाहूलता साऽभून्मदनाग्ने रिवारणिः ॥९२॥
उसके समस्त अंग शिरीषके फूलके समान कोमल थे, कान्ति चम्पाकी कलीके समान थी, श्वासोच्छ्वास बकौली (मौलश्री) के फूलके समान सुगन्धित था, अधर गुलाब के फूलके समान कुछ कुछ लाल थे, मुख प्रफुल्लित कमलके समान सुन्दर था, नेत्र नील कमलके दलके समान थे, भौंहें अच्छी थीं, केश भ्रमरोंके समूहके समान काले, कोमल और कुछ कुछ टेढ़े थे, उदर कृश था, नितम्ब सुन्दर थे, जाँघें मनोहर थीं, स्तन कठोर थे और भुजा-रूपी लताएँ कोमल थीं, इस प्रकार वह सुभद्रा कामरूपी अग्निको उत्पन्न करने के लिये अरणिके समान थी । भावार्थ-जिस प्रकार अरणि नामकी लकड़ीसे अग्नि उत्पन्न होती है उसी प्रकार उस सुभद्रासे दर्शकों के मनमें कामाग्नि उत्पन्न हो उठती थी ॥९०-९२॥
All her limbs were as soft as the blossoms of the śirīṣa tree;
Her radiance resembled the tender bud of the campakā flower.
Her breath bore the fragrance of the bakulā bloom,Her lips were tinged with the gentle red of roses.Her face, like a blooming lotus, shone with serene beauty,Her eyes mirrored the deep blue petals of the water-lily.Her brows were finely shaped, her hair dark as clustered bees—Soft, slightly wavy, and gracefully curled.Her waist was slender, her hips shapely, her thighs graceful,Her breasts were firm, and her vine-like arms tender to the touch.Such was Subhadrā—like the sacred araṇi wood that kindles fire—She awakened in onlookers the flame of desire,Just as the fire of Kāma arises from the subtle friction of beauty.90 – 92
श्लोक 93 से 101
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
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