आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 बुढ़ापे और शरीर की नश्वरता
बाहुबली बुढ़ापे को अनिष्ट स्त्री-सी बताते हैं, जो जबरन आलिंगन करती है। भोगों में लिप्त व्यक्ति हित-अहित नहीं समझता, और वृद्धावस्था मृत्यु-सी है। बुढ़ापा शीतज्वर-सा शरीर को कंपित और पतनशील बनाता है। जरा और मदिरा शरीर, बुद्धि, और वचनों को शिथिल करते हैं। आयु काल-रूपी हाथी द्वारा उखाड़ दी जाती है, और शरीर रोगों से नष्ट हो जाता है। बाहुबली भरत के मोह को दुखद मानते हैं, जो नश्वर राज्य को स्थायी समझते हैं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 36 – Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
सरितो विषमावर्तभीषणा ग्राहसङ्कुलाः । ‘तितीर्षन्ति बताविष्टा विषमैर्विषयग्रहैः ॥ ८२॥
कितने दुःखकी बात है कि विषयरूपी विषम ग्रहोंसे जकड़े हुए कितने ही लोग, ऊंची-नीची भंवरों से भयंकर और मगरमच्छोंसे भरी हुई नदियोंको भी पार करना चाहते हैं ।।८२।।
How grievous it is that so many, ensnared by the baleful planets of sense-desire, strive to cross treacherous rivers—churned with whirlpools and teeming with deadly crocodiles—driven by their craving for pleasure. ||82||
श्लोक ( Shlok ) 83
आरोहन्ति दुरारोहान् गिरीनप्यभियोऽङ्गिनः । रसायनरसज्ञान बलवादविमोहिताः ॥८३॥
रसायन तथा रस आदिके ज्ञानका उपदेश देनेवाले धूर्तोंक द्वारा मोहित होकर उद्योग करने-वाले कितने ही पुरुष कठिनाईसे चढ़ने योग्य पर्वतोंपर भी चढ़ जाते हैं ।।८३।।
Deluded by the words of cunning men who profess knowledge of elixirs and alchemical secrets, countless seekers, driven by desire, ascend even the most arduous and perilous mountains. ||83||
श्लोक ( Shlok ) 84
अनिष्टवनितेवेयमालिङ्गति बलाज्जरा । कुर्वती पलितव्याजाद् रभसेन कचग्रहम् ॥८४।।
यह जरा सफेद बालोंक बहानेसे वेगपूर्वक केशोंको पकड़ती हुई अनिष्ट स्त्रीके समान जबर्दस्ती आलिंगन करती है ।।८४।।
Old age, like a wicked woman, seizes the hair with forceful embrace—under the pretense of whitening it—grasping swiftly and without warning. ||84||
श्लोक ( Shlok ) 85
भोगेष्वत्युत्सुकः प्रायो न च वेद हिताहितम् । भुक्तस्य जरसा जन्तोर्मृतस्य च किमन्तरम् ।।८५।।
जो प्राणी भोगोंमें अत्यन्त उत्कण्ठित हो रहा है वह हित और अहितको नहीं जानता तथा जिसे वृद्धावस्थाने घेर लिया है उसमें और मरे हुएमें क्या अन्तर है ? अर्थात् बेकार होनेसे वृद्ध मनुष्य भी मरे हुएके समान है ।॥ ८५॥
The creature consumed by longing for pleasures knows not what is wholesome or unwholesome; and when old age has overtaken him, what difference remains between him and the dead?—for in his helplessness, the aged man is as one already departed. ||85||
श्लोक ( Shlok ) 86
“प्रसह्य पातयन् भूमौ गात्रेषु कृतवेपथुः। जरापातो नृणां कष्टो ज्वरः शीत इवोद्भवन् ॥८६॥
यह बुढापा मनुष्यको शीतज्वरके समान अनेक कष्ट देनेवाला है क्योंकि जिस प्रकार शीतज्वर उत्पन्न होते ही जबर्दस्ती जमीन- पर पटक देता है उसी प्रकार बुढापा भी जबर्दस्ती जमीनपर पटक देता है और जिस प्रकार शीतज्वर शरीरमें कम्पन पैदा कर देता है उसी प्रकार बुढापा भी शरीरमें कम्पन पैदा कर देता है ।।८६।।
Old age afflicts man with torments akin to a chilling fever; for just as that fever casts one down upon the ground with force, so too does old age strike and hurl him low. And as fever sets the body trembling, even so does age bring forth a ceaseless trembling in every limb. ||86||
श्लोक ( Shlok ) 87
अगसादं मतिभ्रेषं वाचामस्फुटतामपि। जरा सुरा च निर्विष्टा घटयत्याशु देहिनाम ।।८७।
शरीरमें प्रविष्ट हुई तथा उपभोगमें आई हुई जरा और मदिरा दोनों ही लोगों-के शरीरको शिथिल कर देती हैं, उनकी बुद्धि भ्रष्ट कर देती हैं और वचनोंमें अस्पष्टता ला देती हैं ॥८७॥
Both old age, having entered the body, and wine, once consumed, alike bring weakness to the limbs, cloud the intellect, and render speech faltering and unclear. ||87||
श्लोक ( Shlok ) 88
कालव्यालगजेनेदमायुरालानकं बलात् । चाल्यते यद्वलाधानं जीवितालम्बनं नृणाम् ॥८८॥
जिसके बलका सहारा मनुष्यों के जीवनका आलम्बन है ऐसा यह आयुरूपी खंभा कालरूपी दुष्ट हाथी के द्वारा जबर्दस्ती उखाड़ दिया जाता है ।॥८८॥
That pillar of life—strength—upon which rests the very support of human existence, is forcibly uprooted by the wicked elephant of Time, relentless and unyielding. ||88||
श्लोक ( Shlok ) 89
शरीरबलमेतच्च गजकर्णवदस्थिरम् । रोगा रचू पहतं चेदं “जरद्देहकुटीरकम् ॥८९॥
यह शरीरका बल हाथी के कानके समान चंचल है और यह जीर्ण-शीर्ण शरीररूपी झोंपड़ा रोगरूपी चूहोंके द्वारा नष्ट किया हुआ है ॥८९॥
The strength of the body is as fickle as the flapping of an elephant’s ear, and this frail hut of the body, worn and withered, is gnawed away by the rats of disease. ||89||
श्लोक ( Shlok ) 90
इत्यशाश्वतमप्येतद् राज्यादि भरतेश्वरः । शाश्वतं मन्यते कष्टं मोहोपहतचेतनः ॥९०॥
इस प्रकार यह राज्यादि सब विनश्वर है फिर भी मोह के उदयसे जिसकी चेतना नष्ट हो गई है ऐसा भरत इन्हें नित्य मानता है यह कितने दुःखकी बात है ? ॥९०।।
Thus are kingdoms and all such glories perishable—yet alas, how tragic it is that Bharata, his awareness eclipsed by delusion, deems them eternal! ||90||
श्लोक ( Shlok ) 91
चिरमाकलयन्नेवमग्रजस्यानुदात्तताम् । व्याजहारैनमुद्दिश्य गिरः प्रयरुषाक्षराः ॥९१॥
इस प्रकार बड़े भाईकी नीचताका चिरकाल तक विचार करते हुए बाहुबली-ने भरतको उद्देश्य कर नीचे लिखे अनुसार कठोर अक्षरोंवाली वाणी कही ।।९१॥
Thus reflecting long upon the baseness of his elder brother, Bahubali addressed Bharata with words stern and unyielding, spoken in the following manner. ||91||
श्लोक 92 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
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