भरत के शस्त्र
भरत के पास वज्रकाण्ड धनुष, अमोघ बाण, वज्रतुण्डा शक्ति, सिंहाटक भाला, लोहवाहिनी छुरी, मनोवेग कणप, और सौनन्दक तलवार हैं, जो युद्ध में अजेय हैं। भूतमुख खेट और सुदर्शन चक्र शत्रुओं को परास्त करते हैं। चण्डवेग दण्ड और वज्र-चर्म उनकी सेना को जल-उपद्रव से बचाते हैं। ये शस्त्र उनकी विजयलक्ष्मी को सुदृढ़ करते हैं।
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 37 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
अमोघपातास्तस्यासन् नामोघाख्या महेषवः । “यरसाध्यजये चक्री कृतश्लाघो रणाङ्गणे ॥ १६२॥
जो कभी व्यर्थ नहीं पड़ते ऐसे उसके अमोघ नामके बड़े बड़े बाण थे। इन बाणोंके द्वारा ही चक्रवर्ती जिसमें विजय पाना असाध्य हो ऐसे युद्धस्थलमें प्रशंसा प्राप्त करता था ।॥ १६२॥
He wielded mighty arrows named Amogha,which never missed their mark nor fell in vain.By these very shafts, the Emperor earned renown
on battlefields where victory seemed impossible to attain.162
श्लोक ( Shlok ) 163
प्रचण्डा वजूतुण्डाख्या शक्तिरस्यारिखण्डिनी । बभूव वनिर्माणाश्लाध्या वज्रिजयेऽपि या ॥१६३॥
राजा भरतके शत्रुओंको खण्डित करनेवाली वज्रतुण्डा नामकी शक्ति थी, जो कि वज्र की बनी हुई थी और इन्द्रको भी जीतने में प्रशंसनीय थी ॥१६३।।
King Bharata wielded the formidable power named Vajratuṇḍa,crafted of thunderbolt’s might—a force renowned even for having overcome Indra himself.163
श्लोक ( Shlok ) 164
कुन्तः सिंहाटको नाम यः सिंहनखराङ्कुरैः । स्पर्धते स्म निशाताग्रो मणिदण्डाग्रमण्डनः ॥१६४॥
जिसकी नोक बहुत तेज थी, जो मणियोंके बने हुए डंडेके अग्रभागपर सुशोभित हो रहा था और जो सिंहके नाखूनों के साथ स्पर्धा करता था ऐसा उनका सिंहाटक नामका भाला था ।।१६४।।
He bore the spear called Siṁhāṭaka,whose tip was exceedingly sharp,adorned upon the jeweled shaft’s forefront,and rivaled the might of a lion’s claws.164
श्लोक ( Shlok ) 165
तस्यासि पुत्रिका दीप्रा रत्नानद्धस्फुरत्सरुः । लोहवाहिन्यभून्नाम्ना जयश्रीदर्पणायिता ॥१६५।।
जो अत्यन्त देदीप्यमान थी, जिसकी रत्नोंसे जड़ी हुई मूठ बहुत ही चमक रही थी, और जो विजयलक्ष्मी के दर्पणके समान जान पड़ती थी ऐसी लोहवाहिनी नामकी उनकी छुरी थी ।।१६५।।
He possessed the dagger named Lohavāhinī,brilliantly radiant,its jeweled hilt gleaming with resplendent light—a blade that shone like the mirror of Victory’s goddess herself.165
श्लोक ( Shlok ) 166
कणपोऽस्य मनोवेगो जयश्रीप्रणयावहः । द्विषत्कूलकुलक्ष्मा ध्रदलने योऽशनीयितः ॥ १६६॥
मनोवेग नामका एक कणप (अस्त्रविशेष) था जो कि विजयलक्ष्मी-पर प्रेम करनेवाला था और शत्रुओंके वंशरूपी कुलाचलोंको खण्डित करनेके लिये वज्र के समान था ।।१६६।।
There was the mighty missile named Manovega,devoted to Victory’s goddess,like a thunderbolt forged to shatter the lineage-like hordes of his enemies.166
श्लोक ( Shlok ) 167
सौनन्दकाळ्यमस्याभूदसिरत्नं स्फुरद् द्युति । यस्मिन् करतलारूढे दोलारूढमिवाखिलम् ॥१६७।।
भरत के सौनन्दक नामकी श्रेष्ठ तलवार थी जिसकी कान्ति अत्यन्त देदीप्यमान हो रही थी और जिसे हाथमें लेते ही यह समस्त जगत् झूला में बैठे हुए के समान कांप उठता था ॥१६७।।
Bharata wielded the supreme sword named Saunandaka,whose brilliance blazed with dazzling light—and the moment it was raised in his hand,the whole world trembled, as though swaying in a cradle.167
श्लोक ( Shlok ) 168
प्राहुर्भुतमुखं खेटं विभोर्भूतमुखाङ्कितम् । स्फुरताऽऽजीमुखे येन द्विषां मृत्युमुखायितम् ॥१६८॥
उनके भूतोंके मुखोंसे चिह्नित भूतमुख नामका खेट (अस्त्रविशेष) था, जो कि युद्धके प्रारम्भमें चमकता हुआ शत्रुओंके लिये मृत्यके मुखके समान जान पड़ता था ।।१६८।।
He bore the weapon named Bhūtamukha,marked with the visages of spirits—which, flashing at the onset of battle,appeared to his foes as the very face of death. 168
श्लोक ( Shlok ) 169
चक्ररत्नमभूज्जिष्णोर्दिक्चक्राक्रमणक्षमम् । नाम्ना सुदर्शनं दीप्रं यदुर्दर्शमरातिभिः ॥१६९॥
उन विजयी चक्रवर्तीक सुदर्शन नामका चक्र था, जो कि समस्त दिशाओंपर आक्रमण करनेमें समर्थ था, देदीप्यमान था और जो शत्रुओंके द्वारा देखा भी नहीं जा सकता था ।।१६९।।
The victorious Emperor bore the Sudarśana discus,radiant and resplendent,capable of assailing all directions—yet so swift and luminous that it could not even be perceived by the eyes of his foes.169
श्लोक ( Shlok ) 170
प्रचण्डश्चण्डवेगाख्यो दण्डोऽभूच्चक्रिणः पृथुः । स यस्य विनियोगोऽभूद् बिलकण्टकशोधने ॥१७०॥
जिसका नियोग गुफाके कांटे वगैरह शोधनेमें था ऐसा चण्डवेग नामका बहुत भारी प्रचण्ड (भयंकर) दण्ड उस चक्रवर्ती के था ।।१७०।।
The Emperor possessed the formidable mace named Caṇḍavega,a mighty and fearsome weapon,tasked with clearing thorns and obstructions from mountain caves—a symbol of irresistible force and unyielding power.170
श्लोक ( Shlok ) 171
नाम्ना वजूमयं दिव्यं चर्मरत्नमभूद् विभोः । तद् बलं यद्वलाधानान्निस्तीर्ण जलविप्लवात् ।।१७१॥
भरतेश्वर महाराजके वज्रमय चर्मरत्न था, वह चर्मरत्न, कि जिसके बलसे उनकी सेना जलके उपद्रवसे पार हुई थी -बची थी ।।१७१।।
King Bharateshvara possessed an adamantine cuirass,a jewel of armor unmatched—by whose power his army was preserved,safely delivered from the perils of raging floods.171
श्लोक 172 से 181
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249
आदिपुराण पर्व 36 – बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
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