आदिपुराण चतुर्दशं पर्व सारांश
भगवान् वृषभदेव के जन्माभिषेक और उनके अलंकरण से लेकर उनकी बाल्यावस्था तक के घटनाक्रम का सुंदर वर्णन करता है।
Summary of Ādi purāṇa Parv 14 by Acharya Jinasena
जब भगवान् वृषभदेव का अभिषेक समाप्त हुआ, तो इंद्राणी ने हर्ष के साथ उन्हें अलंकारों से सजाने का प्रयास किया। उन्होंने भगवान् के पवित्र शरीर पर लगे जलकणों को स्वच्छ वस्त्र से पोंछा, उनके मुख की शोभा को जलकण समझकर बार-बार पोंछा, और सुगंधित द्रव्यों से उनके शरीर का विलेपन किया। हालाँकि, भगवान् की स्वाभाविक सुगंध ने कृत्रिम सुगंध को भी तिरस्कृत कर दिया। इंद्राणी ने भगवान् के ललाट पर तिलक, मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों का मुकुट, चूड़ामणि रत्न, नेत्रों में अंजन, कानों में मणिमय कुंडल, गले में मणियों का हार, भुजाओं में बाजूबंद, कटि में मणिमयी करधनी, और चरणों में गोमुखाकार मणियों से अलंकरण किया। इससे भगवान् सौंदर्य, कीर्ति, और गुणों के समूह-स्वरूप शोभायमान हुए, मानो कल्पवृक्ष या काव्य का अलंकार हों। इंद्र की गोद में बैठे भगवान् को देखकर इंद्राणी आश्चर्यचकित हुई, और इंद्र ने उनकी रूप-शोभा को सहस्र नेत्रों से निहारा।
देवों और असुरों ने भगवान् की इस अलौकिक शोभा को देखा और इंद्र आदि उनकी स्तुति में तत्पर हुए। स्तुति में भगवान् को परम आनंद का स्रोत, मिथ्याज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाला, धर्मरूपी हाथ देने वाला, जगत् के आदि गुरु, स्वामी, पिता, रक्षक, और नायक बताया गया। उन्हें सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि रूपों में देखकर उनकी महिमा गाई गई। भगवान् के अभिषेक से मेरु पर्वत, क्षीरसागर, और समस्त लोक पवित्र हुए। उनकी तेजस्विता को सूर्य के उदय के समान माना गया।
इसके पश्चात्, इंद्र ने भगवान् को ऐरावत पर बिठाकर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया। अयोध्या नगरी मणिमयी भूमि, ऊँचे गोपुरों, फहराती पताकाओं, और रत्नों की शोभा से स्वर्ग-तुल्य शोभायमान थी। वहाँ पहुँचकर इंद्र ने भगवान् को नाभिराय के महल में सिंहासन पर विराजमान किया। माता मरुदेवी और पिता नाभिराय ने अपने पुत्र की शोभा देखकर हर्ष और आश्चर्य का अनुभव किया। इंद्र ने माता-पिता की स्तुति की, उन्हें पुण्यशाली और जगद्गुरु के जनक बताया। फिर भगवान् को उनके हाथों सौंपकर जन्माभिषेक की कथा सुनाई। नगरवासियों ने उत्सव मनाया, और इंद्र ने आनंद नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें तांडव और लास्य नृत्य के साथ भगवान् के दशावतारों का वर्णन किया।
नाटक के बाद, इंद्र ने भगवान् की सेवा के लिए देव-देवियों को नियुक्त किया और स्वर्ग लौट गए। भगवान् वृषभदेव बाल्यावस्था में मंद हास्य और क्रीड़ा से माता-पिता को आनंदित करते रहे। उनकी शोभा चंद्रमा-तुल्य थी, और उनकी वाणी सरस्वती के समान प्रतीत होती थी। वे देवकुमारों के साथ रत्नमयी भूमि पर क्रीड़ा करते हुए वृद्धि को प्राप्त हुए।
भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन
श्लोक 1 से 11 इंद्राणी द्वारा भगवान का अलंकरण
अभिषेक की विधि समाप्त होने के बाद इंद्राणी देवी ने हर्ष के साथ जगद्गुरु भगवान वृषभदेव को आभूषण पहनाने का प्रयत्न किया। जिनका अभिषेक हो चुका था, ऐसे पवित्र शरीर वाले भगवान वृषभदेव के शरीर पर लगे जलकणों को इंद्राणी ने स्वच्छ और निर्मल वस्त्र से पोंछा। भगवान के मुख पर उनके कटाक्षों की सफेद छाया पड़ रही थी, जिसे इंद्राणी जलकण समझकर बार-बार पोंछ रही थी। उसने तीनों लोकों को सुगंधित करने वाले गाढ़े सुगंधित द्रव्यों से भगवान के शरीर पर विलेपन किया। यद्यपि वे द्रव्य उत्कृष्ट सुगंध से युक्त थे, फिर भी भगवान की स्वाभाविक और दूर तक फैलने वाली सुगंध ने उन्हें तिरस्कृत कर दिया। इंद्राणी ने बड़े आदर से भगवान के ललाट पर तिलक लगाया, किंतु जगत के तिलक-स्वरूप भगवान क्या उस तिलक से शोभायमान हुए? उसने भगवान के मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला से बना मुकुट पहनाया, जिससे वे कीर्ति से अलंकृत से शोभायमान हो रहे थे। यद्यपि भगवान स्वयं जगत के चूड़ामणि और सज्जनों में मुख्य थे, फिर भी इंद्राणी ने भक्ति से उनके मस्तक पर चूड़ामणि रत्न रखा। भगवान के सघन बरौनियों वाले नेत्र बिना अंजन के ही श्यामवर्ण थे, परंतु इंद्राणी ने नियोग समझकर उनके नेत्रों में अंजन का संस्कार किया। उनके दोनों कान बिना छेद के ही छिद्रयुक्त थे, जिनमें इंद्राणी ने मणिमय कुंडल पहनाए, जिससे वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सूर्य और चंद्रमा उनकी कांति देखने आए हों। मोक्ष-लक्ष्मी के हार जैसे सुंदर मणियों के हार से त्रिलोकीनाथ भगवान वृषभदेव के कंठ की शोभा बहुत बढ़ गई थी।
श्लोक 12 से 21 आभूषणों से शोभा
बाजूबंद, कड़े और अनंत आदि से शोभायमान भगवान की दोनों भुजाएँ ऐसी प्रतीत होती थीं मानो कल्पवृक्ष की दो शाखाएँ हों। उनके कटिप्रदेश में छोटी घंटियों से सुशोभित मणिमयी करधनी ऐसी शोभायमान थी मानो कल्पवृक्ष के अंकुर हों। गोमुख आकार के चमकीले मणियों से शब्दायमान उनके दोनों चरण ऐसे शोभायमान थे मानो सरस्वती देवी उनकी सेवा कर रही हो। उस समय अनेक आभूषणों से शोभायमान भगवान ऐसे लगते थे मानो लक्ष्मी का पुंज, ऊँची शिखा वाली रत्नों की राशि, या भोग्य वस्तुओं का समूह प्रकट हुआ हो। वे अलंकारों से युक्त ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो सौंदर्य का समूह, सौभाग्य का खजाना, या गुणों का निवासस्थान हों। उनका स्वाभाविक सुंदर और संगठित शरीर अलंकारों से ऐसा शोभायमान था मानो उपमा-रूपक आदि अलंकारों से युक्त कवि का काव्य हो। इंद्राणी द्वारा उनके प्रत्येक अंग में पहनाए गए मणिमय आभूषणों से वे ऐसे शोभायमान थे मानो प्रत्येक शाखा पर आभूषणों से सुशोभित कल्पवृक्ष हों। इंद्र की गोद में बैठे भगवान को इंद्राणी ने अनेक वस्त्राभूषणों से अलंकृत किया और उनकी रूप-संपदा देखकर स्वयं आश्चर्यचकित हो गई। इंद्र ने भी उनकी रूप-शोभा देखी, पर दो नेत्रों से संतुष्ट न होने के कारण विक्रिया से सहस्राक्ष बनकर उन्हें देखा। उस समय देव और असुरों ने अपने निर्मल नेत्रों से क्षणभर के लिए मेरु के शिखामणि जैसे शोभायमान भगवान को देखा।
श्लोक 22 से 31 इंद्र की स्तुति (भाग 1)
तदनंतर इंद्र आदि श्रेष्ठ देव भगवान की स्तुति करने के लिए तत्पर हुए, जो तीर्थंकर पुरुष के प्रभाव के अनुरूप ही था। इंद्र ने कहा कि हे देव, आप हमें परम आनंद देने के लिए उदित हुए हैं, क्योंकि सूर्य के बिना कमल कभी प्रबोधित नहीं होते। हे देव, आप मिथ्याज्ञानरूपी अंधकूप में पड़े जीवों के उद्धार के लिए धर्मरूपी हाथ का सहारा देने वाले हैं। हे देव, जैसे सूर्य की किरणें अंधकार को नष्ट करती हैं, वैसे ही आपके वचनरूपी किरणों ने हमारे हृदय का अंधकार नष्ट कर दिया है। हे देव, आप देवों के आदि देव, तीनों जगत के आदि गुरु, विधाता और धर्म के नायक हैं। हे देव, आप ही जगत के स्वामी, पिता, रक्षक और नायक हैं। हे देव, जैसे धवल चंद्रमा अपनी चाँदनी से लोक को धवल करता है, वैसे ही आप अपने उत्कृष्ट गुणों से संसार को पवित्र करते हैं। हे नाथ, संसाररूपी रोग से दुःखी प्राणी आपके वचनरूपी अमृत औषधि से नीरोग होकर कल्याण प्राप्त करेंगे। हे भगवान, आपने संपूर्ण कोश नष्ट कर तीर्थंकर पद प्राप्त किया है, इसलिए आप पवित्र, दूसरों को पवित्र करने वाले और अविनाशी ज्योतिःस्वरूप हैं। हे नाथ, यद्यपि आप कूटस्थ हैं, फिर भी हमें कूटस्थ नहीं लगते, क्योंकि आपके ध्यान से होने वाले गुण निरंतर बढ़ते हैं।
श्लोक 32 से 41 इंद्र की स्तुति (भाग 2)
हे देव, आप बिना स्नान के ही पवित्र हैं, फिर भी मेरु पर आपका अभिषेक इस मलिन जगत को पवित्र करने के लिए हुआ। हे देव, आपके जन्माभिषेक से हम ही नहीं, बल्कि मेरु पर्वत, क्षीरसागर और उनके वन-जल भी पवित्र हो गए। हे देव, आपके अभिषेक के जलकण सभी दिशाओं में ऐसे शोभायमान थे मानो आपके यश का घनीभूत समूह हों। हे देव, आप बिना लेप के सुगंधित और बिना आभूषण के कांतिवान हैं, फिर भी हमने भक्ति से सुगंधित द्रव्यों और आभूषणों से आपकी पूजा की। हे भगवान, आप तेजस्वी हैं और सबसे अधिक तेज के साथ प्रकट हुए हैं, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है मानो मेरु के गर्भ से सूर्य उदित हुआ हो। हे देव, स्वर्गावतरण में आप ‘सद्योजात’, ‘अच्युत’ और सुंदरता में ‘वामदेव’ हैं, अर्थात् आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। जैसे शुद्ध खानि का मणि संस्कार से दैदीप्यमान होता है, वैसे ही आप जन्माभिषेक से दैदीप्यमान हो रहे हैं। हे नाथ, ब्रह्माद्वैतवादी कहते हैं कि परं ज्योति को कोई साक्षात नहीं देख सकता, पर आप प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हैं। हे देव, योगिराज आपको पुराणपुरुष, पुरु, कवि और पुराण मानते हैं। हे भगवान, आपकी आत्मा पवित्र, गुण प्रसिद्ध, और जन्म-मरण भय नष्ट करने वाले हैं, इसलिए आपको नमस्कार है।
श्लोक 42 से 51इंद्र की स्तुति (भाग 3)
हे नाथ, आप पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप जल के समान आनंददायक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप वायु के समान परिग्रहरहित और मोह नाशक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप अग्नि के समान कर्म जलाने वाले और तेजस्वी हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप आकाश के समान व्यापक और निर्विकार हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप याजक के समान कर्म का होम करते हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप चंद्रमा के समान निर्वाणदायक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप सूर्य के समान केवलज्ञान से प्रकाशक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। इस प्रकार आप आठ मूर्तियों—पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, याजक, चंद्र और सूर्य—को धारण करने वाले हैं। हे नाथ, आप महाबल, ललितांग, वज्रजंघ, आर्य, श्रीधर, सुविधि, अच्युतेंद्र, वज्रनाभि, सर्वार्थसिद्धि और दशावतारचरम हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आपकी स्तुति से हमारी भक्ति आप में ही रहे, यही हमारा फल है।
श्लोक 52 से 61 अयोध्या प्रस्थान
इंद्रों ने परम आनंद से भगवान ऋषभदेव की स्तुति की और उत्सव के साथ अयोध्या चलने का विचार किया। मेरु से अयोध्या तक मार्ग में उत्सव हुआ, दुंदुभि बजी, जय-शब्द गूंजे, और इंद्र ने भगवान को ऐरावत पर बिठाया। देव कोलाहल, गीत, नृत्य और जय-शब्दों के साथ आकाश को लाँघकर अयोध्या पहुँचे। वहाँ के गोपुर-पताकाएँ ऐसी शोभायमान थीं मानो स्वर्ग को बुला रही हों। अयोध्या की मणिमयी भूमि रात में तारों के प्रतिबिंब से कुमुद सरसी सी लगती थी। हिलती पताकाएँ स्वर्ग को बुलाती सी प्रतीत होती थीं। मणिमय महल विमानों की शोभा छीनते से लगते थे। चंद्रकांत मणियों से मेघ सा जल झरता था।
श्लोक 62 से 71 अयोध्या का वर्णन
अयोध्या के शिखरों में इंद्रनील मणियों से ज्योतिश्चक्र छिप जाता था। ऊँचे शिखर शरद मेघों का आश्रय थे। सुवर्ण परकोटा मेरु की शोभा का उपहास करता सा लगता था। परिखा समुद्र की लीला धारण करती थी। वृषभदेव की जन्मभूमि होने से यह शुद्ध खानि भूमि थी और महारत्न उत्पन्न करती थी। उपवन कल्पवृक्षों की शोभा तिरस्कृत करते थे। सरयू के किनारे सारस सोते और हंस शब्द करते थे। अयोध्या दुर्लंघ्य और योद्धाओं से भरी थी। देव सेनाएँ उसे घेरकर ऐसी शोभायमान थीं मानो तीनों लोक आए हों।
श्लोक 72 से 81 नाभिराज-मरुदेवी से भेंट
इंद्र ने भगवान को नाभिराज के घर में सिंहासन पर बिठाया। नाभिराज रोमांचित और प्रफुल्लित नेत्रों से उन्हें देखते थे। मरुदेवी निद्रा त्यागकर हर्षित हो भगवान को देखने लगीं। वे अपने पुत्र को तेज पुंज सा देख रही थीं और पूर्व दिशा सी शोभायमान थीं। माता-पिता प्रसन्न होकर इंद्र को देखने लगे। इंद्र ने उनकी आभूषण, माला और वस्त्रों से पूजा की। उसने उनकी स्तुति की कि आप पुण्यशाली, धन्य, महाभाग्यशाली, कल्याण प्राप्त करने वाले और उदयाचल-पर्व दिशा हैं।
श्लोक 82 से 91 जन्मोत्सव
इंद्र ने माता-पिता की स्तुति कर भगवान उन्हें सौंपे और जन्माभिषेक कथा कही। कथा सुनकर माता-पिता हर्ष और आश्चर्य की सीमा पर पहुँचे। उन्होंने पुरवासियों के साथ जन्मोत्सव मनाया। पताकाओं से अयोध्या स्वर्ग को बुलाती सी लगती थी। नगरी स्वर्गपुरी, पुरवासी देव और स्त्रियाँ अप्सराएँ सी प्रतीत होती थीं। धूप, सुगंध चूर्ण और संगीत से दिशाएँ भर गई थीं। गलियाँ रत्न चूर्ण से अलंकृत थीं। हिलती पताकाएँ नृत्य करती सी लगती थीं।
श्लोक 92 से 102 उत्सव और इंद्र का नृत्य
पुरवासी गीत, नृत्य और मंगल कार्यों में व्यस्त थे। नगरी में कोई दीन-निर्धन नहीं था। उत्सव मेरु सा आनंदित था। इंद्र ने आनंद देखकर नृत्य शुरू किया। गंधर्वों ने संगीत प्रारंभ किया। नाट्यशास्त्र के अनुसार यह नृत्य महात्माओं के देखने योग्य था। बाजे बजे, पृथ्वी रंगभूमि, इंद्र नर्तक, नाभिराज दर्शक, भगवान आराध्य और पुरुषार्थ सिद्धि फल था।
श्लोक 103 से 111 इंद्र का नृत्य प्रारंभ
उस समय इंद्र ने पहले त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) रूपी फल को सिद्ध करने वाला गर्भावतार संबंधी नाटक प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने जन्माभिषेक संबंधी नाटक शुरू किया। फिर इंद्र ने भगवान के महाबल आदि दशावतारों के वृत्तांत पर आधारित अनेक रूप दिखाने वाले अन्य नाटकों को प्रारंभ किया। इन नाटकों का प्रयोग करते समय इंद्र ने सबसे पहले पापों का नाश करने के लिए मंगलाचरण किया और सावधानीपूर्वक पूर्वरंग शुरू किया। पूर्वरंग के दौरान उन्होंने पुष्पांजलि अर्पित करते हुए तांडव नृत्य प्रारंभ किया। तांडव नृत्य की शुरुआत में इंद्र ने नांदी मंगल प्रस्तुत किया और इसके बाद रंगभूमि में प्रवेश किया। उस समय नाट्यशास्त्र को जानने वाला और मंगलमय वस्त्राभूषणों से सुशोभित इंद्र बहुत शोभायमान हो रहा था। रंगभूमि में अवतरित होने पर वह वैशाख-आसन में खड़ा हुआ, अर्थात् पैर फैलाकर दोनों हाथ कमर पर रखे हुए था, और चारों ओर से मरुत् (देवों) से घिरा हुआ ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वातवलयों से घिरा लोकस्कंध हो। रंगभूमि के मध्य में पुष्पांजलि बिखेरते हुए इंद्र ऐसा लग रहा था मानो अपने द्वारा अनुभव किए गए नाट्यरस को दूसरों के लिए बाँट रहा हो। वह उत्तम वस्त्राभूषणों और नेत्रों के समूह से शोभायमान था, जिससे वह पुष्पों और आभूषणों से युक्त कल्पवृक्ष के समान सुशोभित हो रहा था। उसकी पुष्पांजलि, जिसके पीछे मदोन्मत्त भौंरे दौड़ रहे थे, ऐसी शोभायमान थी मानो आकाश को चित्र-विचित्र करने वाला इंद्र के नेत्रों का समूह हो।
श्लोक 112 से 121 तांडव नृत्य की शोभा
इंद्र के बड़े-बड़े नेत्रों की पंक्ति अपनी फैलती प्रभा से, जो जवनि (परदा) की शोभा धारण किए हुए थी, रंगभूमि को चारों ओर से आच्छादित कर रही थी। वह ताल के साथ पैर रखकर रंगभूमि के चारों ओर घूमते हुए ऐसा शोभायमान था मानो पृथ्वी को नाप रहा हो। जब इंद्र ने पुष्पांजलि अर्पित कर तांडव नृत्य शुरू किया, तब उसकी भक्ति से प्रसन्न देवों ने स्वर्ग से पुष्पवर्षा की। उस समय दिशाओं के अंत तक प्रतिध्वनि को विस्तृत करते हुए पुष्कर आदि करोड़ों बाजे गंभीर शब्दों के साथ एक साथ बज रहे थे। वीणा मनोहर शब्द कर रही थी, मुरली मधुर शब्दों से बज रही थी, और इन बाजों के साथ तालबद्ध संगीत के शब्द गूंज रहे थे। वीणा बजाने वाले जिस स्वर और शैली में वीणा बजा रहे थे, उसी स्वर और शैली में अन्य बाजों के वादक अपने-अपने बाजे मिलाकर बजा रहे थे, जो उचित ही था क्योंकि एकसमान वस्तुओं में मिलाप होना चाहिए। उस समय किन्नर देवियाँ वीणा बजाते हुए कोमल, मनोहर, गंभीर, उच्च और सूक्ष्म स्वरों में गा रही थीं। जैसे उत्तम शिष्य गुरु के उपदेश से मधुर शब्द करता है और अपने कुल के योग्य कार्य बिना विवाद के करता है, वैसे ही वंशी आदि बांस के बाजे मुख के संबंध से मनोहर शब्द कर रहे थे और नृत्य-संगीत में बिना विरोध के अपने वंश (बांस) के योग्य कार्य कर रहे थे। इंद्र ने पहले शुद्ध पूर्वरंग का प्रयोग किया, फिर करण (हाथ हिलाना) और अंगहार (शरीर मटकाना) के माध्यम से उसका विविध रूपों में प्रदर्शन किया। वह पाँव, कमर, काठ और हाथों को अनेक प्रकार से घुमाकर उत्तम रस प्रस्तुत करते हुए तांडव नृत्य कर रहा था।
श्लोक 122 से 131 नृत्य का प्रभाव
जब इंद्र ने विक्रिया से हजार भुजाएँ बनाकर नृत्य किया, तब उसके पैरों के रखने से पृथ्वी हिलने लगी थी मानो फट रही हो। कुलपर्वत तृणों की राशि की तरह चंचल हो उठे थे, और समुद्र आनंद से शब्द करता हुआ लहराने लगा था। उसकी चंचल भुजाएँ अत्यंत मनोहर थीं, और वह ऊँचा शरीर, चंचल वस्त्रों और आभूषणों से युक्त ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हिलती शाखाओं वाला, ऊँचा और वस्त्र-आभूषणों से सुशोभित कल्पवृक्ष नृत्य कर रहा हो। उसके हिलते मुकुट के रत्नों की किरणों से आकाश ऐसा व्याप्त था मानो हजारों बिजलियों से भरा हो। नृत्य के दौरान उसकी भुजाओं के विक्षेप से तारे चारों ओर बिखर रहे थे और फिरकी से टूटे हार के मोतियों जैसे प्रतीत हो रहे थे। उसकी भुजाओं के उल्लास से टकराते मेघ पानी की बूँदें छोड़ रहे थे, जो शोक से आँसू बहाते से लग रहे थे। फिरकी लेते समय उसके मुकुट की मणियों की पंक्तियाँ वेग से अलातचक्र की तरह भ्रमण करने लगती थीं। उसके नृत्य के होम से पृथ्वी और समुद्र क्षुभित हो उठे थे, और उछलते जलकण दिशाओं की भित्तियों को प्रक्षालित कर रहे थे। वह नृत्य करते हुए क्षणभर में एक, अनेक, सर्वव्यापी, छोटा, पास, दूर, आकाश में या जमीन पर दिखाई देता था, और अपनी विक्रिया से ऐसा नृत्य प्रस्तुत करता था मानो इंद्रजाल का खेल दिखा रहा हो।
श्लोक 132 से 141 देवियों का नृत्य
इंद्र की भुजारूपी शाखाओं पर मंद-मंद हँसती हुई अप्सराएँ लीलापूर्वक भौंरों जैसी लताएँ चलातीं, शरीर हिलातीं और सुंदरता से पैर उठाकर नृत्य कर रही थीं। कुछ देवनर्तकियाँ वर्द्धमान लय के साथ, कुछ तांडव नृत्य के साथ, और कुछ अनेक अभिनय दिखाते हुए नृत्य कर रही थीं। कुछ देवियाँ बिजली या इंद्र का रूप धारण कर नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रवेश और निष्क्रमण प्रदर्शित कर रही थीं। इंद्र की भुजाओं पर नृत्य करती ये देवियाँ ऐसी शोभायमान थीं मानो कल्पवृक्ष की शाखाओं पर फैली कल्पलताएँ हों। जब श्रीमान् इंद्र इनके साथ फिरकी लगाता था, तो उसका मुकुट का सेहरा हिल जाता था और ऐसा शोभायमान होता था मानो चक्र घूम रहा हो। हजार आँखों वाला इंद्र फूले कमलों से सुशोभित तालाब सा लगता था, और उसकी भुजाओं पर नृत्य करती देवियाँ मंद हँसी के साथ कमलिनियों सी प्रतीत होती थीं। इनके मुख मंद हास्य की किरणों से ऐसे शोभायमान थे मानो अमृत प्रवाह में डूबे कमल हों। कुछ देवियाँ कुलाचलों सी शोभायमान इंद्र की भुजाओं पर नृत्य कर रही थीं और लक्ष्मी या वीर-लक्ष्मी सी लगती थीं।
श्लोक 142 से 151 नृत्य की सूक्ष्मता
कुछ देवियाँ इंद्र की अंगुलियों पर चरण-पल्लव रखकर लीलापूर्वक सूचीनाट्य (सुई की नोक पर नृत्य) कर रही थीं। कुछ सुंदर पर्वों वाली उसकी अंगुलियों के अग्रभाग पर नाभि रखकर बाँस की लकड़ी पर फिरकी लगाती सी प्रतीत होती थीं। ये देवियाँ उसकी प्रत्येक भुजा पर नृत्य करतीं और नेत्रों के कटाक्ष फैलाती हुई यत्नपूर्वक संचार कर रही थीं। उत्सव को बढ़ाने वाला नाट्यरस उनके शरीर में ऐसा बढ़ रहा था मानो कटाक्षों में प्रकट, कपोलों में स्फुरित, पाँवों में फैलता, हाथों में विलसित, मुख पर हँसता, नेत्रों में विकसित, अंगराग में लाल, नाभि में निमग्न, कटि पर चलता और मेखलाओं पर स्खलित हो रहा हो। इंद्र के प्रत्येक अंग की चेष्टाएँ सभी पात्रों में दिखती थीं, मानो उसने अपनी चेष्टाएँ बाँट दी हों। उसके नृत्य के रस, भाव, अनुभाव और चेष्टाएँ सभी पात्रों में समान थे, मानो उसने अपनी आत्मा उनमें प्रविष्ट कर दी हो। वह भुजदंडों पर देवनर्तकियों को नचाता हुआ ऐसा शोभायमान था मानो यंत्र की पटियों पर पुतलियाँ नचाने वाला यांत्रिक हो। वह उन्हें कभी आकाश में, कभी सामने, कभी अदृश्य करता था, और इंद्रजाल के खिलाड़ी सा प्रतीत होता था।
श्लोक 152 से 161 नृत्य का समापन
इंद्र एक ओर की भुजाओं पर तरुण देवों को और दूसरी ओर तरुण देवियों को नृत्य करा रहा था, और स्वयं अपनी भुजारूपी शाखाओं पर अद्भुत विक्रिया से नृत्य कर रहा था। उसकी भुजा-रंगभूमि में देव और देवांगनाएँ प्रदक्षिणा देती हुई नृत्य कर रही थीं, जिससे वह नाट्यशास्त्र के सूत्रधार सा लगता था। एक ओर दीप्त और उद्धत रस से भरा तांडव नृत्य हो रहा था, तो दूसरी ओर सुकुमार प्रयोगों से लास्य नृत्य हो रहा था। भिन्न-भिन्न रसों वाले इस आश्चर्यकारी नृत्य से इंद्र ने सभा में प्रेम उत्पन्न किया। गंधर्वों द्वारा बजाए गए बाजों के साथ उसने आनंद नृत्य को सजधज के साथ समाप्त किया। वह नृत्य उद्यान सा प्रतीत होता था, जिसमें झाँझों का ताल कांस-ताल वृक्ष सा, बाँसुरियों का शब्द ऊँचे बाँस सा, देवनर्तकियाँ जल सरोवर सा और शृंगार रस जल सा था। नाभिराज और मरुदेवी इस नृत्य को देखकर चकित हुए और इंद्र की प्रशंसा प्राप्त की। इंद्रों ने भगवान को वृषभदेव नाम दिया, क्योंकि वे धर्मरूपी अमृत की वर्षा करते हैं, श्रेष्ठ धर्म से शोभायमान हैं, और मरुदेवी ने गर्भ में वृषभ देखा था।
श्लोक 162 से 171 वृषभदेव नामकरण और बाल्यावस्था
इंद्र ने भगवान को पहले ‘पुरुदेव’ नाम से पुकारा, जिससे उसका पुरुहूत नाम सार्थक हुआ। फिर वे भगवान की सेवा के लिए समान अवस्था, रूप और वेष वाले देवकुमारों को नियुक्त कर अपने स्वर्ग लौट गए। इंद्र ने भगवान को स्नान, वस्त्राभूषण, दूध पिलाने, संस्कार और क्रीड़ा के लिए देवियों को धाय बनाया। भगवान वृषभदेव शैशव में कभी मंद-मंद हँसते और कभी मणिमयी भूमि पर चलते हुए माता-पिता का हर्ष बढ़ाते थे। उनकी बाल्यावस्था चंद्रमा की तरह जगत को आनंद देती, नेत्रों को प्रिय और कलाओं से उज्ज्वल थी। उनके मुख पर मंद हास्य निर्मल चाँदनी सा प्रकट होता था, जो माता-पिता के संतोष समुद्र को बढ़ाता था। उनका मंद हास्य सरस्वती का प्रथम राग, लक्ष्मी की शोभा और कीर्ति लता का विकास सा प्रतीत होता था। उनके मुखकमल से अस्पष्ट वाणी निकलती थी, मानो सरस्वती स्वयं उनकी नकल कर रही हो। इंद्रनील भूमि पर धीरे-धीरे चलते हुए वे पृथ्वी को लाल कमल उपहार देते से शोभायमान थे।
श्लोक 172 से 181 कौमार अवस्था
सुंदर आकार वाले भगवान माता-पिता के संतोष को बढ़ाते हुए देवबालकों के साथ रत्न धूलि में क्रीड़ा करते थे। वे चंद्रमा सा शोभायमान थे, अपने आह्लादकारी गुणों से प्रजा को आनंद देते थे, और कीर्तिरूपी चाँदनी से व्याप्त थे। उनकी बाल्यावस्था समाप्त होने पर इंद्रों द्वारा पूज्य और महाप्रतापी भगवान का कौमार शरीर अति सुंदर हो गया। जैसे चंद्रमा की वृद्धि से कांति-दीप्ति बढ़ती है, वैसे ही उनके शरीर की वृद्धि के साथ गुण बढ़ते थे। उनका मनोहर शरीर, प्यारी बोली, सुंदर अवलोकन और मुस्काते संभाषण संसार की प्रीति बढ़ाते थे। जैसे चंद्रमा की वृद्धि से उसकी कलाएँ बढ़ती हैं, वैसे ही जगत्पति भगवान की वृद्धि से उनकी कलाएँ बढ़ने लगीं। मति, श्रुत और अवधि ज्ञान उनके साथ उत्पन्न हुए, जिससे उन्होंने समस्त विद्याएँ और लोक स्थिति को जान लिया। वे समस्त विद्याओं के ईश्वर थे, इसलिए उन्हें विद्याएँ स्वतः प्राप्त हो गईं, क्योंकि जन्मांतर का अभ्यास स्मृति को पुष्ट करता है। शिक्षा के बिना ही वे कलाओं में कुशल, विद्याओं में चतुर और कार्यों में कर्मठ हो गए। वे सरस्वती के स्वामी थे, जिससे समस्त शास्त्र उन्हें प्रत्यक्ष हुए और वे लोक गुरु बन गए।
श्लोक 182 से 191 विद्या और गुण
भगवान पुराण (प्राचीन इतिहास के जानकार), कवि, उत्तम वक्ता, गमक और सबके प्रिय थे, क्योंकि कोष्ठबुद्धि आदि विद्याएँ उन्हें स्वभाव से प्राप्त थीं। उनके क्षायिक सम्यग्दर्शन ने चित्त के मल दूर किए, और स्वाभाविक सरस्वती ने उनके वचन दोष हर लिए। उनके शास्त्रज्ञान से परिणाम शांत रहते थे, जिससे उनकी चेष्टाएँ जगत हितकारी होती थीं और वे प्रजा का पालन करते थे। जैसे-जैसे उनके गुण बढ़ते थे, वैसे-वैसे जनसमूह और परिवार हर्षित होते थे। वे माता-पिता का आनंद, बंधुओं का सुख और जीवों की प्रीति बढ़ाते हुए वृद्धि पा रहे थे। उनकी आयु चौरासी लाख पूर्व की थी। वे दीर्घदर्शी, दीर्घायु, दीर्घ भुजाओं, दीर्घ नेत्रों और दृढ़ विचारों वाले थे, जिससे वे तीनों लोकों के सूत्रधार बने। वे लिपि, गणित, संगीत आदि का अभ्यास स्वयं करते और दूसरों को कराते थे। वे छंदशास्त्र, अलंकार, प्रस्तार और चित्रकला का मनन करते थे। वे वैयाकरणों से व्याकरण, कवियों से काव्य और वादियों से वाद चर्चा करते थे।
श्लोक 192 से 201 क्रीड़ा और विनोद
भगवान गीत, नृत्य, वादित्र और वीणा गोष्ठियों में समय व्यतीत करते थे। वे मयूर रूप में देवकिंकरों को ताल देकर नृत्य कराते थे। वे तोते के रूप में देवकुमारों को मधुर श्लोक पढ़ाते थे। वे हंस रूप में गद्गद बोली करते हुए हंसरूपी देवों को मृणाल देकर सम्मानित करते थे। वे हाथी शावकों के रूप में देवों के साथ क्रीड़ा करते थे। वे मुर्ग रूप में प्रतिबिंबों से युद्ध करने वाले देवों को देखते और प्रोत्साहित करते थे। वे मल्ल रूप में नृत्य करते देवों को प्रेरित करते थे। वे क्रौंच-सारस रूप में कर्णप्रिय शब्द सुनते थे। वे माला-चंदन धारी देव बालकों को दंड क्रीड़ा में नचाते थे। वे देवों की स्तुति में अपने निर्मल यश को सुनते थे।
श्लोक 202 से 209 प्रजा सत्कार और जलक्रीड़ा
भगवान घर के आंगन में देवियों द्वारा बनाई रत्नचूर्ण चित्रावली को आनंद से देखते थे। वे दर्शन हेतु आई प्रजा का मधुर, स्नेहयुक्त अवलोकन और हास्य-सहित संभाषण से सत्कार करते थे। वे बावड़ियों में देवकुमारों के साथ जलक्रीड़ा करते थे। वे सरयू नदी के जल में हंस शब्दों के साथ लकड़ी के यंत्रों से क्रीड़ा करते थे। जलक्रीड़ा में मेघकुमार धारागृह बनकर उनकी सेवा करते थे। वे नंदन वन में देवों के साथ वनक्रीड़ा करते थे। वनक्रीड़ा में पवनकुमार पृथ्वी को धूलिरहित करते और वृक्ष हिलाते थे। इस तरह वे देवकुमारों के साथ समयानुसार क्रीड़ा और विनोद करते हुए सुखपूर्वक रहते थे।
श्लोक 210 से 213 भगवान की महिमा
तीन लोकों के अधिपति इंद्रादि देवों द्वारा पूज्य भगवान वृषभदेव आश्रय योग्य थे और गुणरूपी मणियों की खान थे। वे नाभिराज के घर में देवकुमारों के साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करते रहे। पुण्यकर्म के उदय से वे प्रतिदिन इंद्र द्वारा भेजे गए पुष्प, वस्त्र और आभूषणों का भोग प्रसन्नता से ग्रहण करते थे। उनके चरण मनुष्य, सुर और असुरों द्वारा पूजित थे। वे बाल्य में वृद्धों जैसे कार्य करते थे। उनकी लीला, आहार, विलास और वेष चतुर और उत्कृष्ट थे। वे वचन किरणों से आनंद विस्तृत करते थे और कीर्ति चाँदनी से शोभायमान थे। वे नक्षत्रों जैसे देवकुमारों के साथ चंद्रमा सा वृद्धि पाते थे।
पर्व 15
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द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
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