आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81
श्लोक 82 से 91 धृति, मोद, प्रियोद्भव, और नामकर्म क्रियाएं ( गर्भान्वय तिरेपन क्रियाएं 4 से 8)
सातवें माह में धृति क्रिया की जाती है, जिसमें गर्भवृद्धि के लिए उत्तम गृहस्थ पिछले विधियों के अनुसार कार्य करते हैं। नौवें माह में मोद क्रिया होती है, जिसमें गर्भिणी के शरीर पर मंत्रपूर्वक बीजाक्षर लिखे जाते हैं, मंगलमय आभूषण और रक्षासूत्र बांधे जाते हैं। प्रसूति के बाद प्रियोद्भव (जातकर्म) क्रिया होती है, जिसमें जिनेंद्र स्मरण के साथ विधियां की जाती हैं। जन्म के बारहवें दिन नामकर्म क्रिया में अर्हंत और ऋषियों की पूजा, द्विजों का सत्कार, और वंशवृद्धि के लिए शुभ नाम रखा जाता है। घटपत्र विधि से जिनेंद्र के 1008 नामों में से एक नाम चुना जाता है। इसके बाद बहिर्यान क्रिया में शुभ दिन तुरही आदि के साथ बालक को प्रसूतिगृह से बाहर लाया जाता है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 38- Shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
धृतिस्तु सप्तमे मासि कार्या तद्वत्क्रियादरैः । गृहमेधिभिरव्यग्रमनोभिर्गर्भवृद्धये ॥८२॥इति धृतिः
जिनका आदर किया गया है और जिनका चित्त व्याकुल नहीं है ऐसे गृहस्थोंको गर्भकी वृद्धिके लिये गर्भसे सातवें महीने में पिछली क्रियाओंके समान ही धृति नामकी क्रिया करनी चाहिये ॥८२॥ यह चौथी धृति नामकी क्रिया है ।
Householders who are honored and whose minds are undisturbed Should, for the healthy growth of the womb, perform in the seventh month of pregnancy The rite known as Dhṛti (Steadfastness), in the same manner as the preceding ceremonies.82.Thus is completed the fourth rite, known as Dhṛti Kriyā (the Rite of Steadfastness).
श्लोक ( Shlok ) 83
नवमे मास्यतोऽभ्यणें मोदो नाम क्रियाविधिः । तद्वदेवादृतैः कार्यो गर्भपुष्टयै द्विजोत्तमैः ॥८३॥
तदनन्तर नौवें महीनेके निकट रहनेपर मोद नामकी क्रिया की जाती है यह क्रिया भी पिछली क्रियाओंके समान आदरयुक्त उत्तम द्विजोंके द्वारा गर्भकी पुष्टिके लिये की जाती है ।॥८३॥
Thereafter, as the ninth month approaches, the rite called Moda (Joy) is performed;This rite, too, is conducted by venerable and noble Brahmins, with due reverence,For the nourishment and strengthening of the fetus.83
श्लोक ( Shlok ) 84
तत्रेष्टो गात्रिकाबन्धो मङगल्यं च प्रसाधनम् । रक्षासूत्रविधानं च गर्भिण्या द्विजसत्तमैः ॥८४॥इति मोदः ।
इस क्रिया में उत्तम द्विजोंको गर्भिणीके शरीरपर गात्रिकाबन्ध करना चाहिये अर्थात् मंत्रपूर्वक बीजाक्षर लिखना चाहिये, मङ्गलमय आभूषणादि पहिनाना चाहिये और रक्षाके लिये कंकणसूत्र आदि बांधनेकी विधि करनी चाहिये ।।८४।। यह पांचवीं मोदक्रिया है।
In this rite, the noble Brahmins should bind the Gātrikā upon the body of the pregnant woman—That is, inscribe seed syllables (bījākṣaras) with mantras,Adorn her with auspicious ornaments,And perform the ritual of tying protective bands such as bangles and sacred threads.84.Thus is completed the fifth rite, known as Moda Kriyā (the Rite of Joy).
श्लोक ( Shlok ) 85
प्रियोद्भवः प्रसूतायां जातकर्मविधिः स्मृतः । जिनजातकमाध्याय प्रवर्त्यो यो यथाविधि ॥८५॥
तदनन्तर प्रसूति होनेपर प्रियोद्भव नामकी क्रिया की जाती है, इसका दूसरा नाम जातकर्म विधि भी है। यह क्रिया जिनेन्द्र भगवान्का स्मरण कर विधिपूर्वक करनी चाहिये ।।८५।।
Thereafter, upon childbirth, the rite called Priyodbhava is performed Also known as the Jātakarma ceremony.This sacred rite should be conducted with due reverence,In remembrance of the Jineśvara, and in accordance with the prescribed procedure.85
श्लोक ( Shlok ) 86
(अवान्तरविशेषोऽत्र क्रियामन्त्रादिलक्षणः । भूयान् समस्त्यसौ ज्ञेयो मूलोपासकसूत्रतः ॥८६॥इति प्रियोद्भवः ।
इस क्रिया में क्रिया मंत्र आदि अवान्तर विशेष कार्य बहुत भारी हैं इसलिये इसका पूर्ण ज्ञान मूलभूत उपासकाध्ययनाङ्गसे प्राप्त करना चाहिये ॥८६॥ यह छठवीं प्रियोद्भव क्रिया है।
This rite involves intricate actions, including special mantras and subsidiary ceremonies, of considerable complexity.Therefore, thorough knowledge of it should be obtained from the fundamental study of the Upāsaka-adhyayana section.86.Thus is completed the sixth rite, known as Priyodbhava Kriyā (the Rite of Birth).
श्लोक ( Shlok ) 87
द्वादशाहात् परं नामकर्म जन्मदिनान्मतम् । अनुकूले सुतस्यास्य पित्रोरपि सुखावहे ॥८७॥
जन्मदिनसे बारह दिन के बाद, जो दिन माता पिता और देनेवाला हो उस दिन नामकर्मकी क्रिया की जाती अपने वैभवके अनुसार अर्हन्तदेव और ऋषियोंकी पूजा पुत्र के अनुकूल हो, सुख है ।।८७।।
On the twelfth day after birth—an auspicious day for the mother, father, and benefactor—The Nāmakarma (Naming) rite is performed.According to one’s means and grandeur,Worship of the Arhant Lord and the sages is offered,Ensuring the child’s well-being and happiness.87
श्लोक ( Shlok ) 88
यथाविभवमत्रेष्टं देवर्षिद्विजपूजनम् । शस्तं च नामधेयं तत् स्थाप्यमन्वयवृद्धिकृत् ॥८८॥
इस क्रियामें जिनेन्द्रदेवकी पूजा करनी चाहिये, द्विजोंका भी यथायोग्य सत्कार करना चाहिये तथा जो वंशकी वृद्धि करनेवाला हो ऐसा कोई उत्तम नाम बालकका रखना चाहिये ।।८८॥
In this ceremony, worship of the Jineśvara must be duly performed,And the Brahmins should be graciously honored according to one’s means;The child should be bestowed with a noble name—
One that will surely augment and uphold the family lineage.88
श्लोक ( Shlok ) 89
“अष्टोत्तरसहस्राद् वा जिननामकदम्बकान् । घटपत्रविधानेन ग्राह्यमन्यतमं शुभम् ॥८९ll इति नामकर्म ।
Alternatively, one should select an auspicious name through the Ghaṭapatra method, employing the sacred group of 1,008 names of the Jineśvara.
These 1,008 names are written—each on a separate piece of paper—using golden or pomegranate-inked pens scented with the eight sacred fragrances (aṣṭagandha).The papers are then rolled into pellets (golī).One set of 1,000 blank pellets is also prepared similarly, each marked with the word Nāma (Name).These pellets are placed separately in two pots, covered with yellow cloth and adorned with coconut and other sacred items.A young girl or child, pure and innocent, is asked to draw one pellet from each pot.The name corresponding to the pellet drawn alongside the one marked Nāma is then bestowed upon the child.This rite is known as the Ghaṭapatra Vidhi (The Pot-Pellet Method).89.Thus is completed the seventh rite, known as Nāmakarma Kriyā (the Naming Ceremony).
श्लोक ( Shlok ) 90
बहिर्यानं ततो ‘द्वित्रैः मासैस्त्रिचतुरैरुतः । यथानुकूलमिष्टेऽह्नि कार्य तूर्यादिमंङगलैः ॥९०॥
तदनन्तर दो-तीन अथवा तीन-चार माहके बाद किसी शुभ दिन तुरही आदि मांगलिक बाजोंके साथ साथ अपनी अनुकूलताके अनुसार बहिर्यान क्रिया करनी चाहिये ॥९०॥
Thereafter, after two or three, or three or four months,On an auspicious day, accompanied by festive sounds of trumpets and other celebratory instruments,One should perform the Bahiryāna Kriyā (the Rite of Public Presentation)According to one’s own preference and circumstance.90
श्लोक ( Shlok ) 91
ततः प्रभृत्यभीष्टं हि शिशोः प्रसववेश्मनः । बहिः प्रणयनं मात्रा धात्र्युत्सङ्गगतस्य वा ॥९१॥
जिस दिन यह क्रिया की जावे उसी दिनसे माता अथवा धायकी गोदमें बैठे हुए बालकका प्रसूतिगृहसे बाहर ले जाना शास्त्रसम्मत है ।।९१॥
From the very day this rite is performed,It is prescribed by scripture that the child, seated in the lap of the mother or nurse,May be taken out from the confines of the maternity chamber.91
श्लोक 92 से 101
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212
आदिपुराण पर्व 37 – भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 201 | श्लोक 202 से 205
आदिपुराण पर्व 38 – द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 71 | श्लोक 72 से 81
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