आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 |
क 245 से 261 विहार का भव्य दृश्य
उनके विहार के समय करोड़ों देव इधर-उधर चले। इंद्रों के मुकुटों से मणि झलकते थे, और जय-जय शब्द गूँजता था। चार निकाय के देव महासागर जैसे क्षुब्ध थे। वे अर्धमागधी में उपदेश देते हैं और वृक्षों को फूलों से भर देते हैं। सुगंधित वायु बहती है, और पृथ्वी दर्पण-सी चमकती है। एक योजन तक भूमि स्वच्छ रहती है, और कमलों पर उनके चरण पड़ते हैं। धर्मचक्र, अष्ट मंगल, और ध्वजाएँ आकाश को व्याप्त करती हैं। दुंदुभि और भेरियों का शब्द कर्मशत्रुओं को तर्जना देता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 245 to 261
श्लोक ( Shlok ) 245
ततो भगवदुद्योगसमये समुपेयुषि । प्रचेलुः प्रचलन्मौलिकोटयः सुरकोटयः ॥२४५॥
तदनंतर भगवान् के विहार का समय आने पर जिनके मुकुटों के अग्रभाग हिल रहे हैं ऐसे करोड़ों देव लोग इधर-उधर चलने लगे ।।245।।
After that, when it was time for Lord’s recreation, millions of gods, whose crowns were swaying, started moving here and there. ||245||
श्लोक ( Shlok ) 246
तदा संभ्रान्तनाकीन्द्रतिरीटोच्चलिता ध्रुवम् । जगन्नीराजयामासुः मणयो दिग्जये विभोः ॥२४६॥
भगवान् के उस दिग्विजय के समय घबराये हुए इंद्रों के मुकुटों से विचलित हुए मणि ऐसे जान पड़ते थे मानो जगत् की आरती ही कर रहे हों ।।246।।
During the Lord’s conquest of all directions, the jewels on the crowns of the frightened Indras appeared to be trembling, as if they were performing aarti (worship) of the universe. ||246||
श्लोक ( Shlok ) 247
जयत्युच्चैर्गिंरो देवाः प्रोर्णुवाना नसोऽङ्गणम् । दिशां मुखानि तेजोभिर्द्योतयन्तः प्रतस्थिरे ।।२४७।।
उस समय जय-जय इस प्रकार जोर-जोर से शब्द करते हुए, आकाशरूपी आंगन को व्याप्त करते हुए और अपने तेज से दिशाओं के मुख को प्रकाशित करते हुए देव लोग चल रहे थे ।।247।।
At that time, the gods were moving, loudly chanting “Victory! Victory!”, filling the courtyard-like sky and illuminating the faces of all directions with their radiance. ||247||
श्लोक ( Shlok ) 248
जिनोद्योगमहावात्या क्षुभिता देवनायकाः । चतुर्निकायाश्चत्वारो महाब्धय इवाभवन् ।।२४८।।
उस समय इंद्रोंसहित चारों निकाय के देव जिनेंद्र भगवान् के विहाररूपी महावायु से क्षोभ को प्राप्त हुए चार महासागर के समान जान पड़ते थे ।।248।।
At that time, the gods of all four divisions along with the Indras appeared like the four great oceans agitated by the mighty wind of Lord Jina’s movement. ||248||
श्लोक ( Shlok ) 249
प्रतस्थे भगवानित्थमनुयातः सुरासुरैः । अनिच्छा पूर्विकां वृत्तिमास्कन्दन् भानुमानिव ।।२४९।।
इस प्रकार सुर और असुरों से सहित भगवान् ने सूर्य के समान इच्छा रहित वृत्ति को धारण कर प्रस्थान किया ।।249।।
In this way, accompanied by gods and demons, the Lord embarked on His journey, adopting a desireless disposition like the sun. ||249||
श्लोक ( Shlok ) 250 – 257
अर्धमागधिकाकार भाषापरिण ताखिलः । त्रि जगज्जनतामैत्रीसंपादितगुणाद्भुतः ॥२५०॥
स्वसंनिधानसं फुल्लफलिताङ्कुरितद्रुमः । आदर्शमण्डलाकारपरि वर्तितभूतलः ॥२५१॥
सुगन्धिशिशिरानुच्चै रनुयायिसमीरणः । अकस्माज्जनतानन्दसंपादिपरमोदयः ॥२५२॥
मरुत्कुमार संमृष्टयोजनान्तररम्यभूः । स्तनितामरसंसिक्तगन्धाम्बुविरजोवनिः ॥ २५३॥
मृदुस्पर्शसुखाम्भोजविन्यस्तपदपङ्कजः । शालिव्रीह्यादिसंपन्नवसुधासूचितागमः ॥२५४॥
शरत्सरोवरस्पर्धिव्योमोदाहृत संनिधिः । ककुवन्तरवैमल्यसंदर्शितसमागमः ॥२५५॥
द्युस त्परस्पराह्वानध्वानरुद्धहरिन्मुखः । सहस्रारस्फुरद्धर्म चक्ररत्नपुरःसरः ॥२५६॥
पुरस्कृताष्टमाङ्गल्य ध्वजमालात ताम्बरः । सुरासुरानुयातोऽभूद् विजिहीर्पुस्तदा विभुः ॥२५७॥
जिन्होंने अर्धमागधी भाषा में जगत् के समस्त जीवों को कल्याण का उपदेश दिया था, जो तीनों जगत् के लोगों में मित्रता कराने रूप गुणों से सबको आश्चर्य में डालते हैं, जिन्होंने अपनी समीपता से वृक्षों को फूल फल और अंकुरों से व्याप्त कर दिया है, जिन्होंने पृथिवीमंडल को दर्पण के आकार में परिवर्तित कर दिया है, जिनके साथ सुगंधित शीतल तथा मंद-मंद वायु चल रही है, जो अपने उत्कृष्ट वैभव से अकस्मात् ही जन-समुदाय को आनंद पहुँचा रहे हैं, जिनके (विहार काल में) ठहरने के स्थान से एक योजन तक की भूमि को पवनकुमार जाति के देव झाड़-बुहारकर अत्यंत सुंदर रखते हैं, जिनके विहारयोग्य भूमि को मेघकुमार जाति के देव सुगंधित जल की वर्षा कर धूलिरहित कर देते हैं, जो कोमल स्पर्श से सुख देने के लिए कमलों पर अपने चरण-कमल रखते हैं, शालि व्रीहि आदि से संपन्न अवस्था को प्राप्त हुई पृथ्वी जिनके आगमन की सूचना देती है, शरद्ऋतु के सरोवर के साथ स्पर्धा करने वाला आकाश जिनके समीप आने की सूचना दे रहा है, दिशाओं के अंतराल की निर्मलता से जिनके समागम की सूचना प्राप्त हो रही है, देवों के परस्पर एक दूसरे को बुलाने के लिए प्रयुक्त हुए शब्दों से जिन्होंने दिशाओं के मुख व्याप्त कर दिये हैं, जिनके आगे हजार अरवाला दैदीप्यमान धर्मचक्र चल रहा है, जिनके आगे-आगे चलते हुए अष्ट मंगलद्रव्य तथा आगे-आगे फहराती हुई ध्वजाओं के समूह से आकाश व्याप्त हो रहा है और जिनके पीछे अनेक सुर तथा असुर चल रहे हैं, ऐसे विहार करने के इच्छुक भगवान् उस समय बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहे थे ।।250-257।।
The Lord, who had imparted teachings of welfare to all living beings in the world through the Ardhamagadhi language, amazed everyone with His virtues that foster friendship among the beings of all three worlds. By His presence, trees became adorned with flowers, fruits, and sprouts, and the earth transformed into a mirror-like surface.
Gentle, fragrant, and cool breezes accompanied Him, delighting the masses with His magnificent splendor. The Vanara gods kept the land where He rested—up to a distance of one yojana—immaculately clean by sweeping and tidying it. The Meghakumara gods showered fragrant water to make the path dust-free and suitable for His journey.
He placed His lotus-like feet upon lotus flowers, which offered a soft and comforting touch. The earth, rich with crops like rice and barley, announced His arrival. The sky, competing with the clarity of a serene autumn lake, heralded His presence. The purity of the directions conveyed the news of His approach. The words of gods calling out to one another filled the air, spreading His glory in all directions.
Ahead of Him rolled the brilliant Dharma Chakra with a thousand spokes. The sky was filled with auspicious objects and fluttering flags, and many gods and demons followed behind Him.
The Lord, desiring to proceed on His journey, appeared immensely radiant and splendid. ||250–257||
श्लोक ( Shlok ) 258
तदा मधुरगम्भीरो जजृम्भे दुन्दुभिध्वनिः । नमः समन्तादापूर्य क्षुभ्यदब्धि स्वनोपमः ॥२५८॥
उस समय क्षुब्ध होते हुए समुद्र की गर्जना के समान आकाश को चारों ओर से व्याप्त कर दुंदुभि बाजों का मधुर तथा गंभीर शब्द हो रहा था ।।258।।
At that time, a sweet and deep sound of drums echoed all around, filling the sky from all directions, like the roar of a turbulent ocean. ||258||
श्लोक ( Shlok ) 259
ववृषुः सुमनोवृष्टिमापूरितन भोङ्गणम् । सुरा भव्यद्विरेफाणां सौमनस्य विधायिनीम् ॥२५९॥
देव लोग भव्य जीवरूपी भ्रमरों को आनंद करने वाली तथा आकाशरूपी आँगन को पूर्ण भरती हुई पुष्पों की वर्षा कर रहे थे ।।259।।
The gods were showering flowers that filled the courtyard-like sky completely, delighting the noble soul-like bees. ||259||
श्लोक ( Shlok ) 260
समन्ततः स्फुरन्ति स्म “पालिकेतनकोटयः । आह्वातुमिव भव्योघानेतैतेति मरुद्धताः ॥२६०॥
जिनके वस्त्र वायु से हिल रहे हैं ऐसी करोड़ों ध्वजाएं चारों ओर फहरा रही थीं और वे ऐसी जान पड़ती थीं मानो इधर आओ इधर आओ इस प्रकार भव्य जीवों के समूह को बुला ही रही हों ।।260।।
Millions of flags, their fabrics fluttering in the wind, were waving all around, appearing as if they were calling out to noble beings, saying, “Come here, come here.” ||260||
श्लोक ( Shlok ) 261
तर्जयन्निव कर्मारीनूर्जस्वी रुद्धदिङ्मुखः । ढंकार एष ढक्कानामभूत्प्रतिपदं विभोः ॥२६१॥
भगवान के विहारकाल में पद-पद पर समस्त दिशाओं को व्याप्त करने वाला और ऊँचा जो भेरियों का शब्द हो रहा था वह ऐसा जान पड़ता था मानो कर्मरूपी शत्रुओं की तर्जना ही कर रहा हो―उन्हें धौंस ही दिखला रहा हो ।।261।।
During the Lord’s journey, the loud and far-reaching sound of drums resounding in all directions seemed as if it was intimidating and mocking the enemies in the form of karmas. ||261||
श्लोक 262 से 271
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 |श्लोक 232 से 244 |