आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 |
श्लोक 212 से 216 अंतिम स्तुति
फूल वर्षा भ्रमर खींचती, लक्ष्मी नेत्र सा। देवांगनाएँ नृत्य, इंद्र-धरणेंद्र अभिषेक। वृषभनाथ जयवंत हों। सूर्य उष्णता छोड़े, चंद्र शीतल, तारे क्रीड़ा करते। जलप्रवाह सबकी रक्षा करे।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 212 to 216
श्लोक ( Shlok ) 212
सुरकुजकुसुमानां दृष्टिरापप्तदुच्चै-रमरकरविकीर्णा चिश्वगाकृष्टभृङ्गा ।
जिनजनन सपर्यालोकनार्थ समन्ता-न्नयनततिरिवाविर्भावित्ता स्वर्गलक्ष्म्या ॥२१२॥
उस समय देवों के हाथ से बिखरे हुए कल्पवृक्षों के फूलों की वर्षा बहुत ही ऊँचे से पड़ रही थी, सुगंधि के कारण वह चारों ओर से भ्रमरों को खींच रही थी और ऐसी मालूम होती थी मानो भगवान् के जन्मकल्याणक की पूजा देखने के लिए स्वर्ग की लक्ष्मी ने चारों ओर अपने नेत्रों की पंक्ति ही प्रकट की हो ।।212।।
At that time, a shower of celestial Kalpavriksha flowers, scattered by the hands of the gods, was falling from great heights. Their fragrance attracted swarms of bees from all directions. It seemed as if the divine goddess of heaven had manifested a multitude of her eyes all around just to witness the auspicious birth celebration of the Lord. ||212||
श्लोक ( Shlok ) 213
इत्थं यस्य सुरासुरैः प्रमुदितैर्जन्माभिषेकोत्सव-श्चक्रे शक्रपुरस्सरैः सुरगिरो क्षीरार्णवस्थाम्बुभिः ।
नृस्यन्तीषु सुराङ्गनासु सलयं नानाविधैलस्यिकैः स श्रीमान् वृषभो जगत्त्रयगुरुजींयाज्जिनः पावनः ॥२१३
इस प्रकार जिस समय अनेक देवांगनाएँ तालसहित नाना प्रकार की नृत्यकला के साथ नृत्य कर रही थीं उस समय इंद्रादि देव और धरणेंद्रों ने हर्षित होकर मेरु पर्वतपर क्षीरसागर के जल से जिनके जन्माभिषेक का उत्सव किया था वे परम पवित्र तथा तीनो लोकों के गुरु श्रीवृषभनाथ जिनेंद्र सदा जयवंत हों ।।213।।
Thus, as numerous celestial maidens danced gracefully in rhythm, displaying various forms of dance, Indra and other gods, along with the Dharanendras, joyfully performed the grand consecration of Lord Vrishabhanatha on Mount Meru with the sacred waters of the Ocean of Milk. May the supremely pure Lord Vrishabhanatha, the spiritual guide of the three worlds, always be victorious! ||213||
श्लोक ( Shlok ) 214
जन्मानन्तरमेव यस्य मिलितैर्देवा सुराणां गणैः नानायानविमानपत्तिनिवहब्यारुद्धरोदोऽङ्गणैः ।
क्षीराब्धेः ‘समुपाहृतैः शुचिजलैः कृत्वाभिषेकं विभोः मेरोर्मूर्धनि जातकर्म विदधे सोऽव्यज्जिनो नोऽग्रिमः ॥२१४॥
जन्म होने के अनंतर ही नाना प्रकार के वाहन, विमान और पयादे आदि के द्वारा आकाश को रोककर इकट्ठे हुए देव और असुरों के समूह ने मेरु पर्वत के मस्तक पर लाये हुए क्षीरसागर के पवित्र जल से जिनका अभिषेक कर जन्मोत्सव किया था वे प्रथम जिनेंद्र तुम सबकी रक्षा करें ।।214।।
May the first Jina, Lord Vrishabhanatha, protect you all—He whose birth was celebrated by hosts of gods and asuras, who gathered in the sky with various celestial vehicles, aerial chariots, and foot soldiers, and who was consecrated on the summit of Mount Meru with the sacred waters of the Ocean of Milk. ||214||
श्लोक ( Shlok ) 215
सद्यः संहृत मौष्ण्यमुष्णकिरणैराम्रेडितं शीकरैः शैत्यं शीतकरैरूदूढमुडुभिर्बद्धोडुपैः क्रीडितम् ।
तारौघैस्तरलैस्तरद्भिरधिकं डिण्डीरपिण्डायितं, यस्मिन् मञ्जनसंविधौ स जयताज्जैनो जगत्पावनः ॥२१५॥
जिनके जन्माभिषेक के समय सूर्य ने शीघ्र ही अपनी उष्णता छोड़ दी थी, जल के छींटे बार-बार उछल रहे थे, चंद्रमा ने शीतलता को धारण किया था, नक्षत्रों ने बंधी हुई छोटी-छोटी नौकाओं के समान जहाँ-तहाँ क्रीड़ा की थी, और तैरते हुए चंचल ताराओं के समुद्र ने फेन के पिंड के समान शोभा धारण की थी वे जगत् को पवित्र करने वाले जिनेंद्र भगवान् सदा जयशील हों ।।215।।
May Lord Jina, who sanctifies the universe, always be victorious—He whose birth consecration caused the sun to immediately relinquish its heat, water droplets to scatter repeatedly, the moon to embrace its cool radiance, the stars to play like tiny anchored boats, and the vast ocean of floating, twinkling stars to shimmer like clusters of foam. ||215||
श्लोक ( Shlok ) 216
सानन्दं त्रिदशेश्वरैः सचकितं देवी भिरुत्पुष्करैः सत्रासं सुरवारणैः प्रणिहितैरात्तादरं चारणैः ।
साराङ्ग गगनेचरैः किमिदमित्यालोकितो यः स्फुरन् मेरोमूंद्र्घ्नि स नोऽवताज्जिनविभोर्जन्मोत्सवाम्भःप्लवः ॥२१६॥
मेरु पर्वत के मस्तक पर स्फुरायमान होता हुआ, जिनेंद्र भगवान् के जन्माभिषेक का वह जल-प्रवाह हम सबकी रक्षा करे जिसे कि इंद्रों ने बड़े आनंद से, देवियों ने आश्चर्य से, देवों के हाथियों ने सूंड़ ऊँची उठाकर बड़े भय से, चारण ऋद्धिधारी मुनियों ने एकाग्रचित्त होकर बड़े आदर से और विद्याधरों ने यह क्या है ऐसी शंका करते हुए देखा था ।।216।।
May the sacred stream of water from Lord Jina’s birth consecration on the summit of Mount Meru protect us all—this divine flow, which was witnessed with great joy by the Indras, with awe by the celestial maidens, with raised trunks and reverence by the divine elephants, with deep focus and respect by the Charana-siddha monks, and with curiosity and wonder by the Vidyadharas, questioning what it truly was. ||216||
इत्यार्षे भगवजिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण संग्रहे-भगवज्जन्माभिषेकवर्णनं नाम त्रयोदशं पर्व ॥१३॥
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध श्री भगवज्जिनसेनाचार्यविरचित त्रिषष्टि-लक्षणमहापुराणसंग्रह में भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन करने वाला तेरहवां पर्व समाप्त हुआ ॥13॥
“In the Itihāriṣeya (Traditional) Compilation of the Sixty-Characteristics Great Purāṇa composed by the revered Acharya Bhagavanjinasena – The Thirteenth Parva (Canto) named ‘Description of the Consecration of the Birth of the Lord’.”
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 |