आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 |
श्लोक 12 से 21 आभूषणों से शोभा
बाजूबंद-कड़ों से भुजाएँ कल्पवृक्ष शाखा सा। करधनी अंकुर सा, चरण गोमुख मणियों से सरस्वती सेवा सा। भगवान लक्ष्मी पुंज, सौंदर्य समूह, काव्य सा शोभित। इंद्र की गोद में अलंकृत भगवान देख इंद्राणी आश्चर्यचकित। इंद्र सहस्राक्ष बन रूप देखा। देव-असुरों ने शिखामणि सा दर्शन किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
याह्वोयुगं च केधूरकटकाङ्गत्रभूषितम् । तस्य कस्यानिपस्येव विटपद्वयमात्रमौ ॥१२॥
बाजूबंद, कड़ा, अनंत (अणत) आदि से शोभायमान उनकी दोनों भुजाएँ ऐसी मालूम होती थीं मानो कल्पवृक्ष की दो शाखाएँ ही हों ।।12।।
Their both arms, adorned with armlets, bangles, and ananta (sacred ornaments), appeared as if they were two branches of the celestial Kalpavriksha (wish-fulfilling tree). ॥12॥
श्लोक ( Shlok ) 13
रेजे मथिमयं दाम’ किङ्किणीभिर्विराजितम् । कटीतटेऽस्य कल्पाग प्रारोहश्रियमुद्वहत् ॥१३॥
भगवान के कटिप्रदेश में छोटी-छोटी घंटियों (बोरों) से सुशोभित मणिमयी करधनी ऐसी शोभायमान हो रही थी मानो कल्पवृक्ष के अंकुर ही हों ।।13।।
The jeweled waistband adorning the Lord’s waist, decorated with small tinkling bells, appeared as if they were the sprouts of the celestial Kalpavriksha. ॥13॥
श्लोक ( Shlok ) 14
पादौ गोमुखनिर्भासै र्मंणिभिस्तस्य रेजतुः । वाचालितौ सरस्वत्या कृतसेवाविवादरात ॥१४॥
गोमुख के आकार के चमकीले मणियों से शब्दायमान उनके दोनों चरण ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो सरस्वती देवी ही आदरसहित उनकी सेवा कर रही हो ।।14।।
Their both feet, resounding with the tinkling of bright jewel-adorned anklets shaped like the mouth of a cow (Gomukh), appeared as if Goddess Saraswati herself was reverently serving them. ॥14॥
श्लोक ( Shlok ) 15
लक्ष्म्याः पुञ्ज इवोद्भुतो धाम्नां राशिरिवोच्छिखः । भाग्यानामिव संपात स्तदाभादू भूषितो विभुः॥१५॥
उस समय अनेक आभूषणों से शोभायमान भगवान् ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी का पुंज ही प्रकट हुआ हो, ऊँची शिखा वाली रत्नों की राशि ही हो अथवा भोग्य वस्तुओं का समूह ही हो ।।15।।
At that time, the Lord, adorned with numerous ornaments, appeared as if He were the very embodiment of Goddess Lakshmi, a towering peak of radiant jewels, or a collection of all delightful enjoyments. ॥15॥
श्लोक ( Shlok ) 16
सौन्दर्यस्येव संदोहः सौभाग्यस्येव संनिधिः । गुणानामिव संवासः सालंकारो विभुर्बभो॥१६॥
अथवा अलंकारसहित भगवान् ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो सौंदर्य का समूह ही हो, सौभाग्य का खजाना ही हो अथवा गुणों का निवासस्थान ही हो ।।16।।
Or, adorned with ornaments, the Lord appeared as if He were the very embodiment of beauty, a treasure of fortune, or the abode of all virtues. ॥16॥
श्लोक ( Shlok ) 17
निसर्गरुचिरं भर्तुर्वपुर्भ्रेजे सभूषणम् । सालंकारं कवेः काव्यमिव सुश्लिष्टबन्धनम् ॥१७॥
स्वभाव से सुंदर तथा संगठित भगवान् का शरीर अलंकारों से युक्त होने पर ऐसा शोभायमान होने लगा था मानो उपमा, रूपक आदि अलंकारों से युक्त तथा सुंदर रचना से सहित किसी कवि का काव्य ही हो ।।17।।
The naturally beautiful and well-proportioned body of the Lord, adorned with ornaments, shone magnificently, as if it were a poet’s masterpiece—embellished with similes, metaphors, and exquisite composition. ॥17॥
श्लोक ( Shlok ) 18
प्रत्यङ्गमित्ति विन्यस्तैः पौलोम्या मणिभूषणैः । स रेजे कल्पशाखोव साखोल्लासिविभूषणः ॥१८॥
इस प्रकार इंद्राणी के द्वारा प्रत्येक अंग में धारण किये हुए मणिमय आभूषणों से वे भगवान् उस कल्पवृक्ष के समान शोभायमान हो रहे थे जिसकी प्रत्येक शाखा पर आभूषण सुशोभित हो रहे हैं ।।18।।
Thus, adorned with jeweled ornaments on each of His limbs by Indrani, the Lord appeared as resplendent as a celestial Kalpavriksha, whose every branch is beautifully decorated with dazzling jewels. ॥18॥
श्लोक ( Shlok ) 19
इति प्रसाध्य तं देवमिन्द्रोत्संगगतं शची । स्वयं विस्मयमायासीत् पश्यन्ती रूपसंपदम् ॥१९॥
। इस तरह इंद्राणी ने इंद्र की गोदी में बैठे हुए भगवान् को अनेक वस्त्राभूषणों से अलंकृत कर जब उनकी रूप-संपदा देखी तब वह स्वयं भारी आश्चर्य को प्राप्त हुई ।।19।।
Thus, after adorning the Lord, who was seated in Indra’s lap, with various garments and ornaments, Indrani beheld His divine beauty and was filled with immense wonder. ॥19॥
श्लोक ( Shlok ) 20
संक्रन्दनोऽपि तद्रूपशोभां द्रष्टुं तदातनीम् । सहस्राक्षोऽभवन्नूनं स्पृहयालुरतृप्तिकः ॥२०॥
इंद्र ने भी भगवान् के उस समय की रूपसंबंधी शोभा देखनी चाही, परंतु दो नेत्रों से देखकर संतुष्ट नहीं हुआ इसीलिए मालूम होता है कि वह द्व᳭यक्ष से सहस्राक्ष (हजारों नेत्रों वाला) हो गया था―उसने विक्रिया शक्ति से हजार नेत्र बनाकर भगवान् का रूप देखा था ।।20।।
Indra, too, wished to behold the divine beauty of the Lord at that moment. However, he was not satisfied with just two eyes. It seemed as if he had become Sahasraksha (the thousand-eyed one) from being Divyaksha (the two-eyed one)—manifesting a thousand eyes through his mystical power to fully witness the Lord’s radiant form. ॥20॥
श्लोक ( Shlok ) 21
तदा निमेषविमुखै र्लौंचनैस्तं सुरासुराः । ददृशुर्गिरिराजस्य शिखामणिमिव क्षणम् ॥२१॥
उस समय देव और असुरों ने अपने टिमकाररहित नेत्रों से क्षण-भर के लिए मेरु पर्वत के शिखामणि के समान सुशोभित होने वाले भगवान् को देखा ।।21।।
At that moment, both the gods and the demons beheld the Lord, who shone like the crest jewel of Mount Meru, with their unblinking eyes, even if only for a brief moment. ॥21॥
श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 |