भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261
श्लोक 262 से 271 पुण्य और धर्म की महिमा
लोगों ने कहा कि धर्म, तप, दान, और पूजा से यह फल मिला। अरहंत पूजा संपदा देती है। वज्रजंघ ने अगले दिन दीपक जलाकर महापूत चैत्यालय में पूजा की।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 262 to 271
श्लोक ( Shlok ) 262
उपोषितं किमेताभ्यां किं वा तप्तं तपो महत् । किं नु दत्तं किमिष्टं वा कीदृग वाचरितं व्रतम् ॥२६२॥
पूर्व जन्म में इन दोनों ने न जाने कौन-सा उपवास किया था, कौन-सा भारी तप तपा था, कौन-सा दान दिया था, कौन-सी पूजा की थी अथवा कौन-सा व्रत पालन किया था ।।262।।
In their previous lives, who knows what kind of fasting they observed, what great penance they performed, what charitable deeds they accomplished, what worship they offered, or what vows they followed. ||262||
श्लोक ( Shlok ) 263
अहो धर्मस्य माहात्म्यमहो सत्साधनं तपः । अहो दत्तिर्महोदर्का दयावली फलत्यो ॥ २६३॥
अहो, धर्म का बड़ा माहात्म्य है, तपश्चरण से उत्तम सामग्री प्राप्त होती है, दान देने से बड़े-बड़े फल प्राप्त होते हैं और दयारूपी बेल पर उत्तम-उत्तम फल फलते हैं ।।263।।
Ah! The greatness of righteousness is immense. Through penance, one attains the finest treasures, through charity, one reaps grand rewards, and compassion bears the best of fruits like a flourishing vine. ||263||
श्लोक ( Shlok ) 264
नूनमाभ्यां कृता पूजा महतामर्हतां पराम् [रा] । पूज्यपूजानुसंधत्ते ननु संपत्परम्पराम् ॥२६४॥
अवश्य ही इन दोनों ने पूर्वजन्म में महापूजा अर्हंत देव की उत्कृष्ट पूजा की होगी क्योंकि पूज्य पुरुषों की पूजा अवश्य ही संपदा की परंपरा प्राप्त कराती रहती है ।।264।।
Surely, these two must have performed a grand worship of the revered Arihant gods in their previous birth, for the worship of venerable beings always brings forth a legacy of prosperity. ||264||
श्लोक ( Shlok ) 265
अतः कल्याणभागित्वं धन दिंविपुलं सुखम् । वाञ्छद्भिरहंतां मार्गे मतिः कार्या महाफले ॥२६५॥
इसलिए जो पुरुष अनेक कल्याण, धन-ऋद्धि तथा विपुल सुख चाहते हैं उन्हें स्वर्ग आदि महाफल देनेवाले श्री अरहंत देव के कहे हुए मार्ग में ही अपनी बुद्धि लगानी चाहिए ।।265।।
Therefore, those who seek immense welfare, wealth, prosperity, and abundant happiness should dedicate their intellect to the path prescribed by the revered Arihant gods, which grants great rewards such as heaven. ||265||
श्लोक ( Shlok ) 266
इत्यादिजनसंजल्पैःसंश्लाघ्यौ दम्पती तदा । सुखासीनी प्रशय्यायां बन्धुभिः परिवारितौ ॥२६६॥
इस प्रकार दर्शक लोगों के वार्तालाप से प्रशंसनीय वे दोनों वर-वधू अपने इष्ट बंधुओं से परिवारित हो सभा-मंडप में सुख से बैठे थे ।।266।।
In this manner, praised by the conversations of the spectators, the bride and groom, surrounded by their beloved relatives, sat comfortably in the assembly hall. ||266||
श्लोक ( Shlok ) 267
“दीनै दैन्यं समुत्सृष्टं कार्पण्यं कृपणे जेहे। अनाथैश्च सनाथत्वं भेजे तस्मिन् महोत्सवे ॥ २६७ ॥
उस विवाहोत्सव में दरिद्र लोगों ने अपनी दरिद्रता छोड़ दी थी, कृपण लोगों ने अपनी कृपणता छोड़ दी थी और अनाथ लोग सनाथता को प्राप्त हो गये थे ।।267।।
In that grand wedding celebration, the poor abandoned their poverty, the miserly gave up their miserliness, and the destitute found a sense of belonging. ||267||
श्लोक ( Shlok ) 268
बन्धवो मानिताः सर्वे दानमानाभिजल्पनैः । भृत्याश्च तर्पिता मर्त्रा चक्रिणास्मिन् महोत्सवे ॥२६८॥
चक्रवर्ती ने इस महोत्सव में दान, मान, संभाषण आदि के द्वारा अपने समस्त बंधुओं का सम्मान किया था तथा दासी दास आदि भृत्यों को भी संतुष्ट किया था ।।268।।
The Chakravarti honored all his relatives during this grand celebration through gifts, respect, and cordial conversations. Even the servants and attendants were well satisfied. ||268||
श्लोक ( Shlok ) 269
गृहे गृहे पूरे महांस्तोषः केतुबन्धो गृहे गृहे । गृहे गृहे ‘बरालापो वधूशंसा गृहे गृहे ॥ २६९॥
उस समय घर-घर बड़ा संतोष हुआ था, घर-घर पताकाएँ फहरायी गयी थीं, घर-घर वर के विषय में बात हो रही थी और घर-घर वधू की प्रशंसा हो रही थी ।।269।।
At that time, every household was filled with immense satisfaction. Flags fluttered from every home, conversations revolved around the groom, and praises for the bride echoed everywhere. ||269||
श्लोक ( Shlok ) 270
दिने दिने महांस्तोषो धर्मभक्तिर्दिने दिने । दिने दिने महेद्धद्धर्यापूज्यते स्म वधूवरम् ॥२७०॥
उस समय प्रत्येक दिन बड़ा संतोष होता था, प्रत्येक दिन धर्म में भक्ति होती थी और प्रत्येक दिन इंद्र जैसी विभूति से वधू-वर का सत्कार किया जाता था ।।270।।
During that time, each day brought immense satisfaction, devotion to righteousness flourished daily, and the bride and groom were honored with splendor akin to that of Lord Indra. ||270||
श्लोक ( Shlok ) 271
अथापरेद्युरुद्यावमु द्योतयितुमुद्यमी । प्रदोषे दीपिकोद्योतैः महापूतं ययौ वरः ॥२७१॥
तत्पश्चात् दूसरे दिन अपना धार्मिक उत्साह प्रकट करने के लिए उद्युक्त हुआ वज्रजंघ सायंकाल के समय अनेक दीपकों का प्रकाश कर महापूत चैत्यालय को गया ।।271।।
The next day, eager to express his religious zeal, Vajrajangha illuminated numerous lamps and went to the grand Chaityalaya in the evening. ||271||
श्लोक 272 से 281
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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