भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 163 to 173
श्लोक ( Shlok ) 163
ततः कृतार्थतां तस्या समर्थयितुकामया । प्रोचे पण्डितया वाचं श्रीमत्यवसरोचितम् ॥१६३॥
तत्पश्चात् श्रीमती इच्छानुसार वर प्राप्त होने से कृतार्थ हो जायेगी इस बात का समर्थन करने के लिए पंडिता श्रीमती से उस अवसर के योग्य वचन कहने लगी ।।163।।
Thereafter, to affirm that Shrimati would be fulfilled by obtaining the desired groom, Pandita began speaking words appropriate for the occasion to Shrimati. ( 163)
श्लोक ( Shlok ) 164
दिष्ट्या कल्याणि कल्याणान्यचिरात् त्वमवाप्नुहि । प्रतीहि प्राणनाथेन प्रत्यासन्नं समागमम् ॥१६४॥
कि हे कल्याणि, दैवयोग से अब तू शीघ्र ही अनेक कल्याण प्राप्त कर । तू विश्वास रख कि अब तेरा प्राणनाथ के साथ समागम शीघ्र ही होगा ।।164।।
“O blessed one, by divine fortune, you will soon attain numerous blessings. Have faith, for your union with your beloved will happen very soon.” ( 164)
श्लोक ( Shlok ) 165
मागमस्त्वमनाश्वासं सजोषं गतवानिति । मया सुनिपुणं तस्य भावस्त्वय्युपलक्षितः ॥ १६५॥
वह राजकुमार वहाँ से चुपचाप चला गया इसलिए अविश्वास मत कर, क्योंकि उस समय भी उसका चित्त तुझमें ही लगा हुआ था । इस बात का मैंने अच्छी तरह निश्चय कर लिया है ।।165।।
“Do not doubt just because the prince left silently, for even at that moment, his heart was solely focused on you. I have confirmed this with certainty.” ( 165)
श्लोक ( Shlok ) 166 – 167
चिरं विलम्बितो द्वारि वीक्षते मां मुहुर्मुहुः । व्रजन्नपि सुगे मार्गे स्खलत्येव पदे पदे ॥ १६६॥
स्मयते जुम्भते किंचित् स्मरत्याराद् विळीकते । श्वसित्युष्णं च दीर्घ व पटुरस्मिन् स्मरज्वरः ॥१६७॥
वह जाते समय दरवाजे पर बहुत देर तक विलंब करता रहा, बार-बार मुझे देखता था और सुखपूर्वक गमन करने योग्य उत्तम मार्ग में चलता हुआ भी पद-पद पर स्खलित हो जाता था । वह हंसता था, जँभाई लेता था, कुछ स्मरण करता था, दूर तक देखता था और उष्ण तथा लंबी साँस छोड़ता था । इन सब चिह्नों से जान पड़ता था कि उसमें कामज्वर बढ़ रहा है ।।166-167।।
As he was leaving, he delayed at the door for a long time, repeatedly looking at me. Even while walking along a pleasant and smooth path, he stumbled at every step. He laughed, yawned, seemed to recall something, gazed into the distance, and exhaled long and deep breaths. All these signs indicated that he was suffering from the fever of desire. ( 166-167)
श्लोक ( Shlok ) 168
तमेव बहुमन्येते पितरौ ते नरोत्तमम् । नृपेन्द्रोभागिनेयत्वाद् भ्रात्रीयत्वाच्च देव्यसौं ॥१६८॥
वह वज्रजंघ राजा वज्रदंत का भानजा है और लक्ष्मीमती देवी के भाई का पुत्र (भतीजा) है । इसलिए तेरे माता-पिता भी उसे श्रेष्ठ वर समझते हैं ।।168।
He, Vajrajangha, is the nephew of King Vajradanta and the son (nephew) of Goddess Lakshmimati’s brother. Therefore, your parents also consider him a worthy groom. ( 168)
श्लोक ( Shlok ) 169
छक्ष्मीवान् कुलजौ दक्षः स्वरूपोऽभिमतः सताम् । इत्यनेको गुणग्रामः तस्मिन्नस्ति वरोचितः ॥ १६९॥
इसके सिवाय वह लक्ष्मीमान् है, उच्चकुल में उत्पन्न हुआ है, चतुर है, सुंदर है और सज्जनों का मान्य है । इस प्रकार उसमें वर के योग्य अनेक गुण विद्यमान हैं ।।169।।
In addition, he is prosperous, born in a noble family, intelligent, handsome, and respected by good people. Thus, he possesses many qualities that make him a suitable groom. ( 169)
श्लोक ( Shlok ) 170
सपत्नी श्रीसरस्वस्योर्भूत्वा त्वं तदुरोगृहे । चिरं निवस कल्याणि कल्याणशतभागिनी ॥१७०॥
हे कल्याणि, तू लक्ष्मी और सरस्वती की सपत्नी (सौत) होकर सैकडों सुखों का अनुभव करती हुई चिरकाल तक उसके हृदयरूपी घर में निवास कर ।।170।।
“O blessed one, may you, as a co-wife of Lakshmi and Saraswati, experience countless joys and dwell for a long time in his heart, which is like a home.” ( 170)
श्लोक ( Shlok ) 171- 173
सामान्येनोपमानं ते लक्ष्मोनव सरस्वती । यतोऽपूर्वेत्र लक्ष्मीस्त्वमन्यैव च सरस्वती ॥ १७१॥
भिदेलिमदले शश्त्रस्संकोचिनि रोजुषि । सा श्रीरश्री रिवोद्भूमा कुशेशयकुटीरकं ॥ १७२॥
सरस्वती च सोच्छिष्टे चलजिह्वा वे । लब्धजन्मा तयोः कत्यः * तवैवाभिजनः शुचिः ॥173॥
यदि सामान्य (गुणों की बराबरी) की अपेक्षा विचार किया जाये तो लक्ष्मी और सरस्वती दोनों ही तेरी उपमा को नहीं पा सकतीं, क्योंकि तू अनोखी लक्ष्मी है और अनोखी ही सरस्वती है । जिसके पत्ते फटे हुए हैं, जो सदा संकुचित (संकीर्ण) होता रहता है और जो परागरूपी धूलि से सहित है ऐसे कमलरूपी झोपड़ी में जिस लक्ष्मी का जन्म हुआ है उसे लक्ष्मी नहीं कह सकते यह तो अलक्ष्मी है―दरिद्रा है । भला, तुम्हें उसकी उपमा कैसे दी जा सकती है ? इसी प्रकार उच्छिष्ट तथा चंचल जिह्वा के अग्रभागरूपी पल्लव पर जिसका जन्म हुआ है वह सरस्वती भी नीच कुल में उत्पन्न होने के कारण तेरी उपमा को प्राप्त नहीं हो सकती । क्योंकि तेरा कुल अतिशय शुद्ध है―उत्तम कुल में ही तू उत्पन्न हुई है ।।171-173।।
When considered in comparison to ordinary qualities, neither Lakshmi nor Saraswati can be compared to you, for you are a unique form of Lakshmi and a unique form of Saraswati. The Lakshmi born in a lotus-like hut with torn petals, which is always constricted and covered in the dust of the outside world, cannot truly be called Lakshmi; she is Alakshmi—poverty-stricken. How can you be compared to such a one? Similarly, the Saraswati born on the tip of a restless and impure tongue cannot be compared to you, for you are born of an exceedingly pure lineage—born into the best of families. ( 171-173)
श्लोक 174 से 181
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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