भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 |
श्लोक 72 से 82 जीवतत्त्व का निरूपण
मतिसागर ने प्रहसित और विकसित के तर्क का खंडन किया कि अनुपलब्धि से जीव का अभाव नहीं सिद्ध होता, क्योंकि सूक्ष्म, दूरवर्ती पदार्थ भी उपलब्ध नहीं होते, पर उनका अस्तित्व है। पितामह को न देखने पर भी उनका सद्भाव मानते हैं। जीव शब्द संज्ञावाचक है, अतः जीव का अस्तित्व है। दोनों ने तप कर महाशुक्र स्वर्ग में इंद्र और प्रतींद्र बने, फिर पुंडरीकिणी में महाबल और अतिबल बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 72 to 82
श्लोक ( Shlok ) 72
भवता किं तु दृष्टोऽसौ त्वत्पितुर्यः पितामहः । तथापि सोऽस्ति चेदस्तु जीवस्याप्येवमस्तिता ॥७२॥
इसके सिवाय एक बात हम आपसे पूछते हैं कि आपने अपने पिता के पितामह को देखा है या नहीं ? यदि नहीं देखा है, तो वे थे या नहीं? यदि नहीं थे तो आप कहाँ से उत्पन्न हुए ? और थे, तो जब आपने उन्हें देखा ही नहीं है―आपको उनकी उपलब्धि हुई ही नहीं; तब उसका सद्भाव कैसे माना जा सकता है । यदि उनका सद्भाव मानते हो तो उन्हीं की भाँति जीव का भी सद्भाव मानना चाहिए ।।72।।
“Besides this, we ask you one thing—have you seen your father’s grandfather or not? If not, did they exist or not? If they did not exist, then where did you come from? And if they did exist, but you never saw them—you never encountered them—then how can their existence be considered valid? If you acknowledge their existence, then in the same way, the existence of the soul should also be accepted.” 72
श्लोक ( Shlok ) 73
अभावेऽपि विवन्धृणां जीवस्यानुपलब्धितः । स नास्तीति मृषास्तित्वात् सौम्यस्येह विवन्धृणः ॥७३॥
यदि यह मान भी लिया जाये कि जीव का अभाव है; तो अनुपलब्धि होने से ही उसका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता; क्योंकि ऐसे कितने ही सूक्ष्म पदार्थ हैं जिनका अस्तित्व तो है परंतु उपलब्धि नहीं होती ।।73।।
“Even if it is accepted that the soul does not exist, its non-existence cannot be proven merely because it is not perceivable. There are many subtle substances whose existence is real, yet they remain imperceptible.” 73
श्लोक ( Shlok ) 74
जीवशब्दाभिधेयस्य वचसः प्रत्ययस्य च । यथास्तित्वं तथा बाह्योऽप्यर्थस्तस्यास्तु काऽक्षमा ॥७४॥
जैसे जीव अर्थ को कहने वाले ‘जीव’ शब्द और उसके ज्ञान का जीवज्ञान का सद्भाव माना जाता है, उसी प्रकार उसके वाच्यभूत बाह्य-जीव अर्थ के भी सद्भाव को मानने में क्या हानि है क्योंकि जब जीव पदार्थ ही नहीं होता तो उसके वाचक शब्द कहाँ से आते और उनके सुनने से वैसा ज्ञान भी कैसे होता ? ।।74।।
“Just as the existence of the word ‘soul’ (jiva) and the knowledge conveyed by it is accepted as valid knowledge about the soul, in the same way, what harm is there in accepting the existence of the external soul to which the word refers? For if the soul itself did not exist, then where would the words referring to it come from, and how would knowledge arise upon hearing those words?” 74
श्लोक ( Shlok ) 75 – 76
जीवशब्दोऽयमभ्रान्तं बाह्यमर्थमपेक्षते । संशात्वाल्लौकिक भ्रान्ति मतहेत्वा दिशब्दवत् ॥७५॥
इत्यादियुक्तिभिर्जीवं तत्वं स निरणाीनयत् । तावपि ज्ञानजं गर्वमुज्झित्वानेमतुर्मुनिम् ॥७६॥
जीव शब्द अभ्रांत बाह्य पदार्थ की अपेक्षा रखता है क्योंकि वह संज्ञावाचक शब्द है । जो-जो संज्ञावाचक शब्द होते हैं, वे किसी संज्ञा से अपना संबंध रखते हैं जैसे लौकिक घट आदि शब्द, भ्रांति शब्द, मत शब्द और हेतु आदि शब्द । इत्यादि युक्तियों से मुनिराज ने जीवतत्त्व का निर्णय किया, जिसे सुनकर उन दोनों विद्वानों ने ज्ञान का अहंकार छोड़कर मुनि को नमस्कार किया ।।75-76।।
“The word ‘soul’ (jiva) implies a real external entity because it is a noun. All noun-based words are associated with some entity, just like worldly terms such as ‘pot,’ words denoting illusions, opinions, or causes, and so on. With such reasoning, the sage established the existence of the soul. Hearing this, both scholars abandoned their arrogance of knowledge and bowed to the sage.” 75-76
श्लोक ( Shlok ) 77
गुरोस्तस्यैव पातौ गृहीत्वा परमं तपः । सुदर्शनमथाचाम्लवर्द्धनं चाप्युपोषतुः ॥७७॥
उन दोनों विद्वानों ने उन्हीं मुनि के समीप उत्कृष्ट तप ग्रहण कर सुदर्शन और आचाम्लवर्द्धन व्रतों के उपवास किये ।।77।।
“Both scholars accepted the path of rigorous asceticism near the same sage and undertook fasts following the Sudarshana and Achamla Vardhana vows.” 77
श्लोक ( Shlok ) 78 – 79
निदानं वासुदेवत्वे व्यधाद् विकसितोऽप्यभुत् । कालान्ते तावजायेतां महाशुक्रसुरोत्तमौ ॥७८॥
इन्द्रप्रतीन्द्रपदयोः षोडशाब्ध्युपमस्थिती । तौ तत्र सुखसाभ्दॣतावन्वभूतां सुरश्रियम् ॥
विकसित ने नारायण पद प्राप्त होने का निदान भी किया । आयु के अंत में दोनों शरीर छोड़कर महाशुक्र स्वर्ग में इंद्र और प्रतींद्र पद पर सोलह सागर प्रमाण स्थिति के धारक उत्तम देव हुए । वे वहाँ सुख में तन्मय होकर स्वर्ग-लक्ष्मी का अनुभव करने लगे ।।78-79।।
“Vikasit also attained the path leading to the Narayana position. At the end of their lifespan, both renounced their bodies and were reborn in the Mahashukra heaven as supreme deities, holding the positions of Indra and Pratindra with a lifespan of sixteen ocean-measures (sagaras). Immersed in bliss, they began experiencing the grandeur of celestial pleasures.” 78-79
श्लोक ( Shlok ) 80
स्वामुरन्ते ततश्च्युत्वा घातकीखण्डगोच्चरे । विदेहे पुष्कलावत्यां पश्चिमार्द्धपुरोगते ॥८०॥
विषये पुण्डरीकिण्यां पुर्या राज्ञो धनंजयात् । जयसेनायशस्वत्योः देव्योर्व्यत्यासितक्रमौ ॥८१॥
जज्ञाते तनयौ रामकेशवस्थानभागिनौ । ज्यायान् महाबलोऽन्यश्च ख्यातोऽतिबलसंज्ञया ॥८२॥
अपनी आयु के अंत में दोनों वहाँ से चयकर धातकीखंड द्वीप के पश्चिम भाग संबंधी पूर्वविदेह क्षेत्र में पुष्कलावती देश की पुंडरीकिणी नगरी में राजा धनंजय की जयसेना और यशस्वती रानी के बलभद्र और नारायण का पद धारण करने वाले पुत्र उत्पन्न हुए । अब उत्पत्ति की अपेक्षा दोनों के क्रम में विपर्यय हो गया था । अर्थात् बलभद्र ऊर्ध्वगामी था और नारायण अधोगामी था । बड़े पुत्र का नाम महाबल था और छोटे का नाम अतिबल था (महाबल प्रहसित का जीव था और अतिबल विकसित का जीव था) ।।80-82।।
“At the end of their celestial lifespan, both deities descended from there and were reborn in the western part of Dhātakīkhaṇḍa Dvīpa, in the Pūrvavideha region, within the city of Puṇḍarīkiṇī of the prosperous land of Puṣkalāvatī. They were born as sons to King Dhananjaya and Queen Jayasena and Yashasvati, assuming the positions of Balabhadra and Narayana. However, their roles had reversed—Balabhadra was on an upward spiritual path, while Narayana was on a downward one. The elder son was named Mahabal, and the younger was Atibal (Mahabal was the reincarnation of Prahasit, and Atibal was the reincarnation of Vikasit).”Verses 80-82
श्लोक 83 से 91
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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