श्लोक 1 से 11 जिनेंद्र का केवलज्ञान और संसार का आनंद
जिनेंद्र भगवान ने घातिया कर्मों पर विजय प्राप्त की। संसार में शांति छा गई। केवलज्ञान से तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न हुआ। देवों के घंटे, सिंहनाद, और नगाड़े गूंजे। भवनवासी देवों को दर्शन का आह्वान हुआ। इंद्रों के आसन कंपायमान हुए। देवों के हाथी नृत्य करने लगे। कल्पवृक्ष फूल बरसाते सुशोभित हुए। दिशाएँ प्रसन्न हुईं। केवलज्ञानरूपी चंद्रमा ने संसार को आनंदित किया। अवधिज्ञानी इंद्र ने इसे जाना।
श्लोक 12 से 21 इंद्र का प्रस्थान
इंद्र आनंद से नतमस्तक होकर भगवान को नमस्कार करता उठा। उसने इंद्राणी को केवलज्ञान का समाचार बताया। नगाड़ों की सूचना पर वह देवों के साथ पूजा के लिए निकला। बलाहकदेव ने रत्नमय विमान बनाया। नागदत्त ने ऐरावत हाथी बनाया। सौधर्मेंद्र उस पर सवार हुआ। किल्विषिक और अन्य देव अपनी सवारियों पर पीछे चले। अप्सराएँ नृत्य करती गईं।
श्लोक 22 से 31 देवों के भेद
इंद्र ऐश्वर्यशाली होते हैं। सामानिक इंद्र के समान गुणी होते हैं। त्रायस्त्रिंश सभा में तैंतीस होते हैं। पारिषद मित्र के समान होते हैं। आत्मरक्ष अंगरक्षक होते हैं। लोकपाल स्वर्ग की रक्षा करते हैं। अनीक सात प्रकार की सेना होते हैं। प्रकीर्णक नगरवासी और आभियोग्य नौकर होते हैं। किल्विषिक पापकर्मी होते हैं। व्यंतर और ज्योतिषी कुछ भेदों से रहित होते हैं।
श्लोक 32 से 41 ऐरावत हाथी का वर्णन
ऐरावत का शरीर विशाल और बलवान था। उसके अनेक मुख, दाँत, और सूँडें थीं। वह शक्तिशाली और शूरवीर था। उसकी सूँड लंबी और चिकनी थी। उसका वक्ष चौड़ा और कान मनोहर थे। नख अर्धचंद्राकार थे। वह पर्वत के समान ऊँचा था। उसका शब्द गंभीर और सुगंधित था। वह सात प्रतिष्ठाओं से युक्त था। भ्रमर उसकी सेवा करते थे।
श्लोक 42 से 51 ऐरावत की शोभा
ऐरावत का तालू लाल था। उसके कानों से मृदंग-सा शब्द होता था। वह मदजल और सूँड से पर्वत-सा लगता था। दाँत चंद्रमा जैसे थे। वह सरोवर और कल्पवृक्ष की शोभा धारण करता था। सोने की साँकल और माला से सुशोभित था। वह घंटाओं से पूजा की घोषणा करता था। उसका शरीर जंबूद्वीप-सा और सफेदी कैलाश-सी थी।
श्लोक 52 से 61 इंद्र और अप्सराओं का वैभव
ऐरावत पर इंद्र सुशोभित था। इसके बत्तीस मुखों पर सरोवर और अप्सराएँ नृत्य करती थीं। नृत्य हास्य और शृंगार से भरा था। किन्नरियाँ विजयगीत गाती थीं। बत्तीस इंद्रों की सेनाएँ फैलीं। चमर हंसों-से लगते थे। आकाश आभूषणों से चित्रित था।
श्लोक 62 से 71 आकाश की शोभा
आकाश मणियों की कांति से व्याप्त था। वह संध्या, समुद्र, और मोतियों से सुशोभित था। देवांगनाएँ कल्पलताओं-सी लगती थीं। उनके मुख सरोवर-से थे। भ्रमर कामदेव की डोरी-से थे। देवों का आगमन समुद्र-सा था। वह ज्योतिषी सृष्टि-सा प्रतीत होता था।
श्लोक 72 से 81 देवों का आगमन और समवसरण
आकाश चित्रपट और वर्षा की शोभा धारण करता था। स्वर्ग शून्य हो गया। देवों से जगत दूसरा स्वर्ग-सा लगा। देवों ने समवसरण देखा। यह बारह योजन का और इंद्रनीलमय था। यह दर्पण-सा सुशोभित था। इंद्र ने इसकी रचना की। इसकी शोभा भव्य जीवों को प्रसन्न करती है।
श्लोक 82 से 91 धूलीसाल का वर्णन
समवसरण के बाहर रत्नों का धूलीसाल था। यह इंद्रधनुष-सा लगता था। यह काला, पीला, और लाल था। हरित मणियों से कमलिनी-सा था। चंद्रकांत और अन्य मणियों से चित्रित था। यह काम-क्रोध को चूर्ण करने वाला था। सुवर्ण धूलि से अग्नि-सा था। चार तोरणद्वार इससे सुशोभित थे।
श्लोक 92 से 102 मानस्तंभ की शोभा
धूलीसाल के भीतर चार मानस्तंभ थे। ये गोपुरद्वारों से घिरी पीठिका पर थे। अभिषेक जल से पवित्र थे। ये आकाश को स्पर्श करते थे। घंटाओं और ध्वजाओं से युक्त थे। इनके मूल में जिन प्रतिमाएँ थीं। मिथ्यादृष्टि का मान नष्ट करते थे। इंद्रध्वज कहलाते थे।
श्लोक 103 से 111 बावड़ियों की शोभा
मानस्तंभों के पास कमलयुक्त बावड़ियाँ थीं। ये भव्य जीवों की शुद्धता-सी लगती थीं। नीले-सफेद कमलों से ढकी थीं। चार-चार बावड़ियाँ दिशाओं में थीं। मणियों की सीढ़ियाँ और स्फटिक किनारे वाली थीं। ये भगवान के गुण गाती और नृत्य करती प्रतीत होती थीं। आगे परिखा कमलों से घिरी थी।
श्लोक 112 से 121 परिखा और लतावन
परिखा स्वच्छ जल से भरी थी। यह आकाशगंगा-सी सेवा करती लगती थी। इसमें तारों का प्रतिबिंब था। पक्षियों की माला करधनी-सी लगती थी। लहरें नृत्य करती थीं। मछलियाँ कटाक्षों का अभ्यास करती प्रतीत होती थीं। लतावन फूलों और लताओं से सुशोभित था। लताएँ हास्य और नील वस्त्र धारण करती थीं।
श्लोक 122 से 131 लतावन का वैभव
आकाश केसर से सुगंधित था। भ्रमर फूलों पर गूंजते थे। वायु लताओं को हिलाता था। क्रीड़ा पर्वत और लतागृह संतोष देते थे। चंद्रकांत शिलाएँ विश्राम के लिए थीं। सुवर्णमय कोट निषध पर्वत-सा था। यह इंद्रधनुषों से चित्रित था। मोती और मूँगे इसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 132 से 141 कोट की शोभा
कोट विभिन्न रंगों से वर्षा-सा लगता था। इसमें जानवरों और लताओं के आकार थे। यह चमकता और सिंहनाद करता था। चार चाँदी के गोपुरद्वार आकाश को स्पर्श करते थे। ये निर्मल और लाल किरणों से युक्त थे।
श्लोक 142 से 151 गोपुरद्वार और नाट्यशालाएँ
गोपुरद्वारों पर देव गीत गाते थे। इनमें मंगलद्रव्य और तोरण थे। निधियाँ भगवान के प्रभाव को दर्शाती थीं। दो-दो नाट्यशालाएँ थीं। ये तीन खंडों वाली और मोक्ष मार्ग बताती थीं। सुवर्ण खंभों और स्फटिक दीवारों से बनी थीं। देवांगनाएँ नृत्य करती थीं।
श्लोक 152 से 161 नाट्यशालाओं का संगीत
नाट्यशालाओं में वीणा और मृदंग बजते थे। ये सफेद बादलों-सी थीं। किन्नर संगीत से चित्त आकर्षित होता था। धूपघटों से सुगंध फैलती थी। धुआँ मेघों-सा लगता था। भ्रमर सुगंध सूँघते थे। मृदंग और पुष्पवर्षा से वर्षाकाल प्रतीत होता था।
श्लोक 162 से 171 वनों का वर्णन
चार वन वीथियाँ नंदन-सी थीं। अशोक, सप्तपर्ण, चंपक, और आम के वृक्ष फूलों से हँसते थे। ये अर्घ लेकर खड़े थे। शाखाएँ नृत्य करती थीं। वृक्ष राजाओं-से सुखद थे। भ्रमर गुणगान करते थे। फूलों की भेंट होती थी। कोयलें इंद्रों को बुलाती थीं।
श्लोक 172 से 181 वनों की रमणीयता
वन प्रकाश से दिन-रात रहित थे। सूर्य किरणें संकोच करती थीं। बावड़ियाँ पीली थीं। तालाब, पर्वत, और महल थे। वन स्त्रियों-से मनोहर और सुखद थे। अशोक वन लाल फूलों से प्रेम वमन करता था। सप्तपर्ण सात स्थानों को दिखाता था।
श्लोक 182 से 191 चैत्यवृक्षों की महिमा
चंपक वन दीपांग-सा था। आम्र वन स्तुति करता था। अशोक वृक्ष पीठिका पर था। तीन कोटों से घिरा था। यह शोकरहित करता था। नीले पत्ते और लाल फूलों से युक्त था। भ्रमर कामदेव की तर्जना करते थे। यह प्रभावशाली था।
श्लोक 192 से 201 चैत्यवृक्ष का वैभव
चैत्यवृक्ष घंटों से घोषणा करता था। ध्वजाएँ पाप पोंछती थीं। तीन छत्र ऐश्वर्य दिखाते थे। चार प्रतिमाएँ थीं। देव पूजा करते थे। ये निर्मल थीं। अन्य वनों में भी चैत्यवृक्ष थे। ये इंद्र पूजित और शोभायमान थे।
श्लोक 202 से 211 वृक्ष और वनवेदिका
वृक्ष राजाओं-से फल, तेज, और पत्तों से युक्त थे। ये प्रेम और प्रसन्नता प्रकट करते थे। भगवान का केवलज्ञान अनुपम था। वनों के अंत में सुवर्णमयी वनवेदिका थी। यह भव्य बुद्धि-सी ऊँची और सुरक्षित थी। गोपुरद्वारों में घंटे और मालाएँ थीं। ध्वजाएँ महावीथी को अलंकृत करती थीं।
श्लोक 212 से 221 ध्वजाओं का वर्णन
ध्वजाओं के खंभे राजाओं-से ऊँचे थे। इनकी चौड़ाई 88 अंगुल और अंतर 25 धनुष था। ये तीर्थंकर की ऊँचाई से बारह गुने थे। ध्वजाओं में दस चिह्न थे। एक दिशा में 108 ध्वजाएँ थीं। ये वायु से हिलकर पूजा का आह्वान करती थीं। मालाएँ सौमनस्य दिखाती थीं।
श्लोक 222 से 231 ध्वजाओं की शोभा
वस्त्र ध्वजाएँ लहरों-सी थीं। मयूर साँप की काँचली निगलते थे। कमल आकाश में खिलते थे। भ्रमर कमलों पर भ्रमित होते थे। हंस द्रव्यलेश्या दिखाते थे। गरुड़ आकाश उल्लंघन करते थे। सिंह हाथियों को जीतना चाहते थे।
श्लोक 232 से 241 ध्वज और दूसरा कोट
बैल विजयपताका धारण करते थे। हाथी पर्वत-से थे। चक्र सूर्य से स्पर्धा करते थे। ध्वजाएँ आकाश साफ करती थीं। ये तीनों लोकों का स्वामित्व दिखाती थीं। दूसरा चाँदी का कोट था। इसके गोपुरद्वार हास्य-से थे। निधियाँ कुबेर को लज्जित करती थीं।
श्लोक 242 से 251 कल्पवृक्ष वन
दूसरे कोट में नाट्यशालाएँ और धूपघट थे। कल्पवृक्ष वन रत्नों से दैदीप्यमान था। ये राजाओं-से ऊँचे और फलयुक्त थे। ये देवकुरु-से लगते थे। फल आभूषण-से थे। देव वहाँ क्रीड़ा करते थे। सिद्धार्थ वृक्ष सूर्य-से थे।
श्लोक 252 से 261 वन और मकान
कल्पवृक्ष वनों में बावड़ियाँ और सभागृह थे। वनवेदिका चार गोपुरद्वारों से घिरी थी। आगे सुवर्ण खंभों वाले मकान थे। ये चंद्रकांत दीवारों से चित्रित थे। देव संगीत और नृत्य से आराधना करते थे।
श्लोक 262 से 271 स्तूप और तीसरा कोट
महावीथियों में नौ-नौ स्तूप थे। ये मेरु-से ऊँचे थे। सिद्ध प्रतिमाएँ चित्रित थीं। छत्र और पताकाएँ थीं। भव्य लोग पूजा करते थे। तीसरा स्फटिक कोट आकाश-सा था। यह भव्य जीव-सा विशुद्ध था।
श्लोक 272 से 281 श्रीमंडप
तीसरे कोट के गोपुरद्वार मंगलद्रव्यों से युक्त थे। व्यंतर और अन्य देव द्वारपाल थे। सोलह दीवालें सभाओं को विभाजित करती थीं। श्रीमंडप रत्नों से बना था। यह तीनों लोकों को स्थान देता था।
श्लोक 282 से 291 श्रीमंडप की शोभा
श्रीमंडप में फूल तारों-से लगते थे। मालाएँ कभी मुरझाती नहीं थीं। भ्रमर गुंजार से प्रकट होते थे। हंस शब्दों से पहचाने जाते थे। दीवालों में प्रतिबिंब चित्र-से थे। पहली वैडूर्य पीठिका थी।
श्लोक 292 से 301 पीठों का वर्णन
प्रथम पीठिका पर सोलह सीढ़ियाँ थीं। धर्मचक्र सूर्य-से थे। दूसरा सुवर्ण पीठ था। इसमें आठ ध्वजाएँ थीं। तीसरा रत्नमय पीठ सुमेरु-सा था। भ्रमर सुवर्ण-से लगते थे।
श्लोक 302 से 311 पीठ और समवसरण
तीसरा पीठ सुमेरु-सा लोक को नीचा करता था। भगवान इसमें सिद्ध-से विराजते थे। समवसरण का विस्तार एक-एक योजन था। महावीथियाँ एक कोश चौड़ी थीं। पीठों की ऊँचाई आठ, चार, और चार धनुष थी।
श्लोक 312 से 316 गौतम का उपदेश
गौतम ने समवसरण का वर्णन किया। श्रेणिक का मुख प्रफुल्लित हुआ। सभा में प्रीति बढ़ी। इंद्र प्रसन्न हुआ। समवसरण जयवंत रही।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ घातिजये जिष्णोरनुष्णीकृतविष्टपे । त्रिलोक्यामभवत् क्षोभः कैवल्योत्पत्तिवात्यया ॥१॥
अथानंतर जब जिनेंद्र भगवान् ने घातिया कर्मों पर विजय प्राप्त की तब समस्त संसार का संताप नष्ट हो गया―सारे संसार में शांति छा गयी और केवलज्ञान की उत्पत्तिरूप वायु के समूह से तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न हो गया ।।1।।
Thereafter, when Lord Jinendra conquered the destructive karmas, all the suffering of the world was eliminated—peace spread across the entire universe, and the emergence of omniscience stirred all three worlds like a powerful gust of wind. ||1||
श्लोक ( Shlok ) 2
तदा प्रक्षुभिताम्भोधि वेलाध्वानानुकारिणी । घण्टा मुखरयामास जगत् कल्पामरेशिनाम् ॥२॥
उस समय क्षोभ को प्राप्त हुए समुद्र की लहरों के शब्द का अनुकरण करता हुआ कल्पवासी देवों का घंटा समस्त संसार को वाचालित कर रहा था ।।2।।
At that time, the bell of the Kalpavāsi deities, echoing the sound of the ocean waves disturbed by the turmoil, resonated throughout the entire universe. ||2||
श्लोक ( Shlok ) 3
ज्योतिर्लोके महान्सिहप्रणादोऽभूत् समुत्थितः । येनाशु विमदी भावैमवापन्सुरवारणाः ॥ ३॥
ज्योतिषी देवों के लोक में बड़ा भारी सिंहनाद हो रहा था जिससे देवताओं के हाथी भी मदरहित अवस्था को प्राप्त हो गये थे ।।3।।
In the realm of the Jyotishi deities, a great lion’s roar was resounding, causing even the elephants of the gods to lose their state of intoxication. ||3||
श्लोक ( Shlok ) 4
दध्वान ध्वनदम्भोद ध्वनितानि तिरोदधन् । वैयन्तरेषु गेहेषु महानानकनिःस्वनः ॥४॥
व्यंतर देवों के घरों में नगाड़ों के ऐसे जोरदार शब्द हो रहे थे जो कि गरजते हुए मेघों के शब्दों को भी तिरस्कृत कर रहे थे ।।4।।
In the homes of the Vyantara deities, the powerful sound of drums was echoing so loudly that it even overshadowed the roar of thunderous clouds. ||4||
श्लोक ( Shlok ) 5
शंखः शं खचरैः सार्द्ध यूयमेत जिघृक्षवः। इतीव घोषयन्नुच्चैः फणीन्द्रभवनेऽध्वनत् ॥५॥
‘भो भवनवासी देवों, तुम भी आकाश में चलने वाले कल्पवासी देवों के साथ-साथ भगवान् के दर्शन से उत्पन्न हुए सुख अथवा शांति को ग्रहण करने के लिए आओ’ इस प्रकार जोर-जोर से घोषणा करता हुआ शंख भवनवासी देवों के भवनों में अपने आप शब्द करने लगा था ।।5।।
“O Bhavanavāsi deities, you too come and join the Kalpavāsi deities who move through the sky, to experience the bliss and peace arising from the divine sight of the Lord!”—proclaiming this loudly, a conch began to sound on its own in the homes of the Bhavanavāsi deities. ||5||
श्लोक ( Shlok ) 6
विष्टराण्यमरेशानामशनैः प्रचकम्पिरे । अक्षमाणीव तद्गर्य सोढुं जिनजयोत्सवे ॥ ६॥
उसी समय समस्त इंद्रों के आसन भी शीघ्र ही कंपायमान हो गये थे मानो जिनेंद्रदेव को घातिया कर्मों के जीत लेने से जो गर्व हुआ था उसे वे सहन करने के लिए असमर्थ होकर ही कंपायमान होने लगे थे ।।6।।
At that very moment, the thrones of all the Indras began to tremble instantly, as if they were unable to withstand the immense glory of Lord Jinendra upon his victory over the destructive karmas. ||6||
श्लोक ( Shlok ) 7
पुष्करैः स्वैरथोत्क्षिप्तपुष्करार्धाः सुरद्विपाः । ननृतुः पर्वतोदग्रा महाहिभिरिवाद्रयः ॥७॥
जिन्होंने अपनी-अपनी रहने अनुभाग से पकड़कर कमलरूपी अर्घ ऊपर को उठाये हैं और जो पर्वतों के समान ऊँचे हैं ऐसे देवों के हाथी नृत्य कर रहे थे तथा वे ऐसे मालूम होते थे मानो बड़े-बड़े सर्पोंसहित पर्वत ही नृत्य कर रहे हों ।।7।।
The elephants of the gods, towering like great mountains, were dancing while holding lotus-shaped offerings aloft with their trunks. They appeared as if massive mountains themselves were dancing, accompanied by giant serpents. ||7||
श्लोक ( Shlok ) 8
पुष्पाञ्जलिमिवातेनुः समन्तात् सुरभूरुहाः । चलच्छाखाकरैदीर्घै र्विंगळ कुसुमोत्करैः ॥८॥
अपनी लंबी-लंबी शाखाओंरूपी हाथों से चारों ओर फूल बरसाते हुए कल्पवृक्ष ऐसे सुशोभित हो रहे थे मानो भगवान् के लिए पुष्पांजलि ही समर्पित कर रहे हों ।।8।।
The Kalpavriksha trees, showering flowers in all directions with their long branch-like arms, appeared resplendent, as if they were offering a floral tribute to the Lord. ||8||
श्लोक ( Shlok ) 9
दिशः प्रसत्तिमासेदुः वभ्राजे व्यभ्रमम्बरम् । विरजीकृतभूलोकः शिशिरो मरुदाववौ ॥९॥
समस्त दिशाएँ प्रसन्नता को प्राप्त हो रही थीं, आकाश मेघों से रहित होकर सुशोभित हो रहा था और जिसने पृथ्वीलोक को धूलिरहित कर दिया है ऐसी ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी ।।9।।
All directions were filled with joy, the sky appeared radiant and cloudless, and a cool, gentle breeze was blowing, making the earthly realm free from dust. ||9||
श्लोक ( Shlok ) 10
इति प्रमोदमातन्वन्नकस्माद् भुवनोदरे । केवलज्ञानपूर्णेन्दुर्जगदब्धिमवीवृधत् ॥१०॥
इस प्रकार संसार के भीतर अकस्मात् आनंद को विस्तृत करता हुआ केवलज्ञानरूपी पूर्ण चंद्रमा संसाररूपी समुद्र को बढ़ा रहा था अर्थात् आनंदित कर रहा था ।।10।।
In this way, the full moon of omniscience suddenly spread joy throughout the world, causing the ocean of existence to swell—meaning, it filled the entire world with bliss. ||10||
श्लोक ( Shlok ) 11
चिह्नैरमीभिरह्नाय सुरेन्द्रोऽबोधि सावधिः । वैभवं भुवनन्यापि नै भवध्वंसिबैभवम् ॥११॥
अवधिज्ञानी इंद्र ने इन सब चिह्नों से संसार में प्राप्त हुए और संसार को नष्ट करने वाले, भगवान वृषभदेव के केवलज्ञानरूपी वैभव को शीघ्र ही जान लिया था ।।11।।
The Indra, endowed with clairvoyant knowledge, quickly recognized through these signs the divine glory of Lord Rishabhadeva’s omniscience, which had manifested in the world and would ultimately lead to its liberation. ||11||
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268