आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122
श्लोक 123 से 131 जल की शोभा
जल बूँदें उछलकर पापरहित सी। दिशाओं में छींटे, कर्णफूल सा। भगवान पर प्रतिबिंबित धारा भाग्यशाली सी। क्षीर जल झरना सा, स्वर्ग को पवित्र करता। भगवान ने जल, संसार को पवित्र किया। सेना क्षीरसागर में डूबी सी।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 123 to 131
श्लोक ( Shlok ) 123
विरेजुरप्छटा दूरमुच्चलन्त्यो नभोऽङ्गणे । जिनाङ्गस्पर्शसंसर्गात् पापान्मुक्ता इवोद् र्ध्वगाः ॥१२३॥
उस समय कितनी ही जल की बूँदें भगवान् के शरीर का स्पर्श कर आकाशरूपी आंगन में दूर तक उछल रही थीं और ऐसी मालूम होती थीं मानो उनके शरीर के स्पर्श से पापरहित होकर ऊपर को ही जा रही हों ।।123।।
At that time, countless drops of water touched the Lord’s body and sprang far into the sky-like courtyard. They seemed as if, having become free from sin by the touch of His body, they were rising upward. ॥123॥
श्लोक ( Shlok ) 124
काश्चनोच्चलिता व्योम्नि विबभुः शीकरच्छटाः । छटामिवामरावासप्राङ्गणेषु तितांसवः ॥१२४॥
आकाश में उछलती हुई कितनी ही पानी की बूंदें ऐसी शोभायमान हो रही थीं मानो देवों के निवासगृह में छींटे ही देना चाहती हों ।।124।।
Countless water droplets, leaping into the sky, appeared so radiant as if they wished to sprinkle the abode of the gods. ॥124॥
श्लोक ( Shlok ) 125
तिर्यग्विसारिणः केचित् स्नानाम्भश्शीकरोत्कराः । कर्णपूरश्रियं तेनुर्दिग्वधूमुखसङ्गिनीम् ॥१२५॥
भगवान् के अभिषेक जल के कितने ही छींटे दिशा-विदिशाओं में तिरछे फैल रहे थे और वे ऐसे मालूम होते थे मानो दिशारूपी स्त्रियों के मुखों पर कर्णफूलों की शोभा ही बढ़ा रहे हों ।।125।।
Countless splashes of the Lord’s consecration water were spreading obliquely in all directions, appearing as if they were enhancing the beauty of the ear ornaments on the faces of the direction-personified maidens. ॥125॥
श्लोक ( Shlok ) 12
निर्मले श्रीपतेरङ्गे पतित्वा प्रतिबिम्बिताः । जलधाराः स्फुरन्ति स्म दिष्टिवृन्द्ध येव संगताः ॥१२६॥
भगवान् के निर्मल शरीर पर पड़कर उसी में प्रतिबिंबित हुई जल की धाराएँ ऐसी शोभायमान हो रही थीं मानो अपने को बड़ा भाग्यशाली मानकर उन्हीं के शरीर के साथ मिल गयी हो ।।126।।
The streams of water, falling on the Lord’s pure body and reflecting within it, appeared so radiant as if, considering themselves most fortunate, they had merged with His divine form. ॥126॥
श्लोक ( Shlok ) 127
गिरेरिव विभोमूर्ध्नि सुरेन्द्राभैर्निपातिताः । विरेजुर्निर्झराकारा धाराः क्षीरार्णवाम्भ साम् ॥ १२७॥
भगवान् के मस्तक पर इंद्रों द्वारा छोड़ी हुई क्षीरसमुद्र के जल की धारा ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो किसी पर्वत के शिखर पर मेघों द्वारा छोड़े हुए सफेद झरने ही पड़ रहे हों ।।127।।
The stream of water from the Milk Ocean, poured by the Indras onto the Lord’s head, appeared resplendent, as if white waterfalls released by clouds were cascading down a mountain peak. ॥127॥
श्लोक ( Shlok ) 128
तोषादिव खमुत्पत्य भूयोऽपि निपतन्त्यधः । जलानि जहसुर्नूनं जडतां स्वां स्वशीकरैः ॥१२८॥
भगवान् के अभिषेक का जल संतुष्ट होकर पहले तो आकाश में उछलता था और फिर नीचे गिर पड़ता था । उस समय जो उसमें जल के बारीक छींटे रहते थे उनसे वह ऐसा मालूम होता था मानो अपनी मूर्खता पर हँस ही रहा हो ।।128।।
The consecration water of the Lord, satisfied, first leaped into the sky and then fell back down. At that moment, the fine droplets within it made it appear as if it were laughing at its own folly. ॥128॥
श्लोक ( Shlok ) 129
स्वर्धुनीशीकरैः, सार्ध स्पर्द्धां कर्तुमिवोर्ध्वगैः । शीकरैर्द्राक्पुनाति स्म “स्वर्धामान्य मृतप्लवः ॥१२९॥
वह क्षीरसागर के जल का प्रवाह आकाशगंगा के जलबिंदुओं के साथ स्पर्धा करने के लिए ही मानो ऊपर जाते हुए अपने जलकणों से स्वर्ग के विमानों को शीघ्र हीं पवित्र कर रहा था ।।129।।
That stream of water from the Milk Ocean, as if competing with the droplets of the celestial Ganga, rose upward, swiftly purifying the heavenly chariots with its sacred droplets. ॥129॥
श्लोक ( Shlok ) 130
पवित्रो भगवान् पूतैरङ्गैस्तदपुना जलम् । तत्पुनर्जगदेवेदम पावीद् व्याप्तदिङ्मुखम् ॥१३०।।
भगवान् स्वयं पवित्र थे, उन्होंने अपने पवित्र अंगों से उस जल को पवित्र कर दिया था और उस जल ने समस्त दिशा में फैलकर इस सारे संसार को पवित्र कर दिया था ।।130।।
The Lord Himself was pure; He sanctified the water with His holy body, and that water, spreading in all directions, purified the entire world. ॥130॥
श्लोक ( Shlok ) 131
तेनाम्भसा सुरेन्द्राणां पृतनाः “प्लाविताः क्षणम् । लक्ष्यन्ते स्म पयोवाद्धौं निमग्नाङ्गय इवाकुलाः ॥१३१॥
उस अभिषेक के जल में डूबी हुई देवों की सेना क्षण-भर के लिए ऐसी दिखाई देती थी मानो क्षीरसमुद्र में डूबकर व्याकुल ही हो रही हो ।।131।।
The army of gods, immersed in the consecration water, for a moment appeared as if they were submerged in the Milk Ocean and overwhelmed with anxiety. ॥131॥
श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122