आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 भरत का विकास
भरत की मंद मुसकान आदि लीलाएँ माता-पिता को हर्षित करती थीं। उसके गुण उसकी सुंदरता के साथ बढ़ते थे। भगवान ने उसके अन्नप्राशन, चौल, और उपनयन संस्कार किए। भरत ने युवावस्था प्राप्त की। उसका गमन, शरीर, और हास्य पिता सा था। उसकी वाणी, कला, और विद्या भी पिता समान थी। प्रजा ने कहा कि आत्मा ही पुत्र है। वह सज्जनों को मान्य और कामदेव सा था। वह पिता के मन को प्रेम से अधीन करता था। उसका शरीर विजयलक्ष्मी से दैदीप्यमान था।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 162
स्मितैश्च हसितैर्मुग्धैः सर्पणैर्मणिभूमिषु । मन्मनालपित्तैः पित्रोः स संप्रीतिमजीजनत् ॥१६२॥
वह बालक मंद मुसकान, मनोहर हास, मणिमयी भूमि पर चलना और अव्यक्त मधुर भाषण आदि लीलाओं से माता-पिता के परम हर्ष को उत्पन्न करता था ।।162।।
That child, with his gentle smiles, charming laughter, playful steps on the gem-studded floor, and sweet yet indistinct speech, filled his parents with immense joy. ॥162॥
श्लोक ( Shlok ) 163
तस्य वृद्धावभूद् वृद्धिर्गुणानां सहजन्मनाम् । नूनं ते तस्य सोदर्या स्तद् वृद्ध्यनुविधायिनः ॥१६३॥
जैसे-जैसे वह बालक बढ़ता जाता था वैसे-वैसे ही उसके साथ-साथ उत्पन्न हुए―स्वाभाविक गुण भी बढ़ते जाते थे, ऐसा मालूम होता था मानो वे गुण उसकी सुंदरता पर मोहित होने के कारण ही उसके साथ-साथ बढ़ रहे थे ।।163।।
As the child grew, his innate virtues also flourished alongside him. It seemed as if these virtues, enchanted by his beauty, were growing with him out of sheer admiration. ॥163॥
श्लोक ( Shlok ) 164
अन्नप्राशन चौलोपनयनादीननुक्रमात्। क्रियाविधीन् विधानज्ञः स्रष्टैवास्य निसृष्टवान् ॥१६४॥
विधि को जानने वाले भगवान् वृषभदेव ने अनुक्रम से, अपने उस पुत्र के अन्नप्राशन (पहली वार अन्न खिलाना), चौल (मुंडन) और उपनयन (यज्ञोपवीत) आदि संस्कार स्वयं किये थे ।।164।।
Lord Vṛṣabhadeva, the knower of sacred traditions, personally performed the Annaprāśana (first feeding of solid food), Chūḍākaraṇa (mundan or first head shaving), and Upanayana (sacred thread ceremony) for his son in the proper sequence. ॥164॥
श्लोक ( Shlok ) 165
ततः क्रमभुवो बाल्यकौमारान्तर्भुवो भिदाः । सोऽतीत्य यौवनावस्थां प्रापदानन्दिनी दृशाम् ॥ १६५॥
तदनंतर उस भरत ने क्रम-क्रम से होने वाली बालक और कुमार अवस्था के बीच के अनेक भेद व्यतीत कर नेत्रों को आनंद देने वाली युवावस्था प्राप्त की ।।165।।
Thereafter, Bharata gradually passed through the various stages between childhood and adolescence and eventually attained youth, which was delightful to behold. ॥165॥
श्लोक ( Shlok ) 166
तदेव पैतृकं यातं समाक्रान्तत्रिविष्टपम् । तदेवास्य वपुर्दीप्तं तदेव हसितं स्मितम् ॥१६६॥
इस भरत का अपने पिता भगवान् वृषभदेव के समान ही गमन था, उन्हीं के समान तीनों लोको का उल्लंघन करने वाला दैदीप्यमान शरीर था और उन्हीं के समान मंद हास्य था ।।166।।
This Bharata had a gait like that of his father, Lord Vṛṣabhadeva. His radiant form, capable of surpassing the three worlds, and his gentle smile also resembled that of his divine father. ॥166॥
श्लोक ( Shlok ) 167
सैव वाणी कला सैव सा विद्या सैव च द्युतिः। तदेव शीलं विज्ञानं सर्वमस्य तदेव तत् ॥१६७॥
इस भरत की वाणी, कला, विद्या, द्युति, शील और विज्ञान आदि सब कुछ वही थे जो कि उसके पिता भगवान् वृषभदेव के थे ।।167।।
Bharata’s speech, artistry, knowledge, radiance, character, and wisdom—everything was the same as that of his father, Lord Vṛṣabhadeva. ॥167॥
श्लोक ( Shlok ) 168
इति तन्मयतां प्राप्तं पुत्रं दृष्ट्वा तदा प्रजाः। आत्मा वै पुत्रनामासीदध्यगीषत सूनृतम् ॥१६८॥
इस प्रकार पिता के साथ तन्मयता को प्राप्त हुए भरत-पुत्र को देखकर उस समय प्रजा कहा करती थी कि पिता का आत्मा ही पुत्र नाम से कहा जाता है [आत्मा वै पुत्रनामासीद्] यह बात बिल्कुल सच है ।।168।।
Seeing Prince Bharata so completely immersed in the virtues of his father, the people of that time would say, “The son is truly the reflection of the father’s soul” (Ātmā vai putranāmāsīt). This statement seemed absolutely true. ॥168॥
श्लोक ( Shlok ) 169
पित्रा व्याख्यातरूपादिगुणः प्रत्यक्षमन्मथः । स सम्मतः सतामासीत् स्वैर्गुणैराभि गामिकैः ॥१६९॥
स्वयं पिता के द्वारा जिसके रूपादि गुणों की प्रशंसा की गयी है, जो साक्षात् कामदेव के समान है ऐसा वह भरत अपने मनोहर गुणों के द्वारा सज्जन पुरुषों को बहुत ही मान्य हुआ था ।।169।।
Praised by his own father for his beauty and virtues, Bharata, who resembled Kāmadeva himself, became highly esteemed among noble men due to his charming qualities. ॥169॥
श्लोक ( Shlok ) 170
मनोर्मनोऽर्पयन प्रीतौ मनुरेवोद्गतः सुतः। मनो मनोभवाकारः प्रजानामध्युवास सः ॥१७०॥
वह भरत पंद्रहवें मनु भगवान् वृषभनाथ के मन को भी अपने प्रेम के अधीन कर लेता था इसलिए लोग कहा करते थे कि यह सोलहवाँ मनु ही उत्पन्न हुआ है और वह कामदेव के समान सुंदर आकार वाला था इसलिए समस्त प्रजा के मन में निवास किया करता था ।।170।।
Bharata’s love and devotion even won over the heart of the fifteenth Manu, Lord Vṛṣabhanātha. Thus, people would say that he himself was the sixteenth Manu. With a form as beautiful as Kāmadeva, he resided in the hearts of the entire populace. ॥170॥
श्लोक ( Shlok ) 171
जयलक्ष्म्यानपायिन्या वपुस्तरयातिभास्वरम् । पुञ्जीकृत मिवैकत्र क्षात्रं तेजो विदिद्युते ॥१७१॥
उसका शरीर कभी नष्ट नहीं होने वाली विजयलक्ष्मी से सदा दैदीप्यमान रहता था इसलिए ऐसा सुशोभित होता था मानो किसी एक जगह इकट्ठा किया हुआ क्षत्रियों का तेज ही हो ।।171।।
His body always radiated with the eternal glory of victory, making him appear as if he embodied the collected brilliance of all Kshatriyas in one form. ॥171॥
श्लोक 172 से 181
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