आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111
श्लोक 112 से 121 तांडव नृत्य की शोभा
इंद्र की नेत्र प्रभा से रंगभूमि आच्छादित। ताल संग पृथ्वी नापता सा। देवों ने पुष्पवर्षा की। पुष्कर बाजे, वीणा-मुरली मधुर शब्द। स्वर-शैली में एकता। किन्नरियाँ कोमल गान। वंशी मनोहर शब्द, करण-अंगहार संग विविध नृत्य।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
परितः परिवस्तार तारास्य नयनावली । रङ्गमात्मप्रभोत्सपैंः श्रितैर्जवनिकाश्रियम् ॥११२॥
। इंद्र के बड़े-बड़े नेत्रों की पंक्ति जवनि का (परदा) की शोभा धारण करने वाली अपनी फैलती हुई प्रभा से रंगभूमि को चारों ओर से आच्छादित कर रही थी ।।112।।
The row of Indra’s large eyes, with their expanding radiance resembling a curtain of twilight, enveloped the entire stage in a captivating glow. ||112||
श्लोक ( Shlok ) 113
सलयैः पदविन्यासैः परितो रङ्गमण्डलम् । परिक्रामन्नसौ रेजे विमान इव काश्यपीम् ॥११३॥
वह इंद्र ताल के साथ-साथ पैर रखकर रंगभूमि के चारों ओर घूमता हुआ ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो पृथ्वी को नाप ही रहा हो ।।113।।
That Indra, stepping in rhythm with the Tala (beat) and moving around the stage, appeared so magnificent as if he were measuring the entire Earth itself. ||113||
श्लोक ( Shlok ) 114
कृतपुष्पाञ्जलेरस्य ताण्डवारम्मसंभ्रमे । पुष्पवर्ष दिवोऽमुञ्जन् सुरास्तद्भक्तितोषिताः ॥११४॥
जब इंद्र ने पुष्पांजलि क्षेपण कर तांडव नृत्य करना प्रारंभ किया तब उसकी भक्ति से प्रसन्न हुए देवों ने स्वर्ग अथवा आकाश से पुष्पवर्षा की थी ।।114।।
When Indra began performing the Tandava dance after offering Pushpanjali, the gods, delighted by his devotion, showered flowers from heaven or the sky. ||114||
श्लोक ( Shlok ) 115
तदा पुष्करवाद्यानि मन्द्रं दध्वनुरक्रमात् । दिक् तटेषु प्रतिध्यानानातन्वानि कोटिशः ॥११५॥
उस समय दिशाओं के अंतभाग तक प्रतिध्वनि को विस्तृत करते हुए पुष्कर आदि करोड़ों बाजे एक साथ गंभीर शब्दों से बज रहे थे ।।115।।
At that moment, millions of drums like Pushkara and others resounded together with deep, thunderous sounds, extending their echoes to the farthest reaches of the directions. ||115||
श्लोक ( Shlok ) 116
वीणा मधुरमारेणुः ‘कलं वंशा’ ‘विसस्वनुः । गेयाभ्यनुगतान्येषां समं तालैरराणिषुः ११६॥
वीणा भी मनोहर शब्द कर रही थी, मनोहर मुरली भी मधुर शब्दों से बज रही थी और उन बाजों के साथ-ही-साथ ताल से सहित संगीत के शब्द हो रहे थे ।।116।।
The Veena produced enchanting melodies, the delightful Murali (flute) played sweet tunes, and along with these instruments, the harmonious sounds of music, accompanied by rhythm (Tala), resonated beautifully. ||116||
श्लोक ( Shlok ) 117
उपवादकवाद्यानि परिवादकवादितैः । बभूवुः संगतान्येव सांगत्य हि सयोनिषु ॥११७॥
वीणा बजाने वाले मनुष्य जिस स्वर वा शैली से वीणा बजा रहे थे, साथ के अन्य बाजों के बजाने वाले मनुष्य भी अपने-अपने बाजों को उसी स्वर व शैली से मिलाकर बजा रहे थे सो ठीक ही है एक-सी वस्तुओं में मिलाप होना ही चाहिए ।।117।।
The musicians playing the Veena matched their notes and style with those playing other instruments. This was only natural, as harmony should always exist among similar elements. ||117||
श्लोक ( Shlok ) 118
“काकलीकलमामन्द्रतारमूर्च्छंन मुज्जगे। तदोपवीणयन्तीभिः किन्नरीभिरनुल्वणम् ॥११८॥
उस समय वीणा बजाती हुई किन्नर देवियाँ कोमल, मनोहर, कुछ-कुछ गंभीर, उच्च और सूक्ष्मरूप से गा रही थीं ।।118।।
At that time, the Kinnar celestial maidens, while playing the Veena, sang in a soft, melodious, slightly deep, high, and subtle manner. ||118||
श्लोक ( Shlok ) 119
ध्वनद्भिर्मधुरं मौखं संबन्धं प्राप्य शिष्यवत् । कृतं वंशोचितं वंशैः प्रयोगेष्वविवादिभिः ॥११९॥
जिस प्रकार उत्तम शिष्य गुरु का उपदेश पाकर मधुर शब्द करता है और अनुमानादि के प्रयोग में किसी प्रकार का वाद-विवाद नहीं करता हुआ अपने उत्तम वंश (कुल) के योग्य कार्य करता है उसी प्रकार वंशी आदि बांसों के बाजे भी मुख का संबंध पाकर मनोहर शब्द कर रहे थे और नृत्य-संगीत आदि के प्रयोग में किसी प्रकार का विवाद (विरोध) नहीं करते हुए अपने वंश (बाँस) के योग्य कार्य कर रहे थे ।।119।।
Just as an excellent disciple, after receiving the guru’s teachings, speaks sweetly and, without engaging in any debate regarding reasoning and inference, acts in a manner befitting his noble lineage, similarly, the flutes and other bamboo instruments, upon coming into contact with the breath, produced melodious sounds. They harmonized seamlessly with the dance and music, without any discord, performing the duty appropriate to their lineage (bamboo). ||119||
श्लोक ( Shlok ) 120
प्रयुज्य मघवा शुद्धं पूर्वरङ्गमनुक्रमात् । करणैरङ्गहारेश्च चित्रं प्रायुङ्क्त तं पुनः ॥१२०॥
इस प्रकार इंद्र ने पहले तो शुद्ध (कार्यांतर से रहित) पूर्वरंग का प्रयोग किया और फिर करण (हाथों का हिलाना) तथा अंगहार (शरीर का मटकाना) के द्वारा विविधरूप में उसका प्रयोग किया ।।120।।
In this way, Indra first performed the pure Purvarang (introductory ritual) without any additional elements. Then, through various gestures (Karanas – hand movements) and body movements (Angaharas), he skillfully executed it in diverse forms. ||120||
श्लोक ( Shlok ) 121
चित्रेश्व रेचकैः पादकटिकण्ठकराश्रितैः । ननाट ताण्डवं शक्रो दर्शयन् रसमूर्जितम् ॥१२१॥
वह इंद्र पाँव, कमर, काठ और हाथों को अनेक प्रकार से घुमाकर उत्तम रस दिखलाता हुआ तांडव नृत्य कर रहा था ।।121।।
That Indra, gracefully moving his feet, waist, chest, and hands in various ways, performed the Tandava dance, showcasing the finest essence of Rasa (aesthetic expression). ||121||
श्लोक 122 से 131
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आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111