आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 विद्या और गुण
पुराण-कवि-वक्ता, क्षायिक सम्यग्दर्शन से मल मुक्त। शास्त्रज्ञान से शांत परिणाम, हितकारी चेष्टाएँ। गुण वृद्धि से हर्ष। लिपि, गणित, संगीत अभ्यास। छंद, अलंकार, चित्र मनन। व्याकरण, काव्य, वाद चर्चा।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
पुराणः स कविर्वाग्मी गमकश्चेति नोच्यते । कोष्टबुद्धयादयो बोधा येन तस्य निसर्गजाः ॥१८२॥
वे भगवान् पुराण थे अर्थात् प्राचीन इतिहास के जानकार थे, कवि थे, उत्तम वक्ता थे, गमक (टीका आदि के द्वारा पदार्थ को स्पष्ट करने वाले) थे और सबको प्रिय थे क्योंकि कोष्ठबुद्धि आदि अनेक विद्या उन्हें स्वभाव से ही प्राप्त हो गयी थीं ।।182।।
“The Lord was well-versed in ancient history (Purana), a great poet, an excellent orator, and a master of interpretation (Gamaka), endearing Himself to all. He naturally possessed many branches of knowledge, such as Koṣṭha-buddhi (profound analytical wisdom) and others.”
श्लोक ( Shlok ) 183
क्षायिकं दर्शनं तस्य चेतोऽमलमपाहरत् । वाग्मलं च निसर्गेण प्रसृतास्य सरस्वती ॥१८३॥
उनके क्षायिक सम्यग्दर्शन ने उनके चित्त के समस्त मल को दूर कर दिया था और स्वभाव से ही विस्तार को प्राप्त हुई सरस्वती ने उनके वचन संबंधी समस्त दोषों का अपहरण कर लिया था ।।183।।
“Their perfect, unwavering right vision (Kṣāyika Samyagdarśana) had eradicated all impurities from their mind, and the naturally abundant wisdom of Saraswati had removed all flaws from their speech.”
श्लोक ( Shlok ) 184
श्रुतं निसर्गतोऽस्यासीत् प्रसूतः प्रशमः श्रुतात् । ततो जगद्धितास्यासीत् चेष्टा सापालयत् प्रजाः। १८४।
उन भगवान् के स्वभाव से ही शास्त्रज्ञान था, उस शास्त्रज्ञान से उनके परिणाम बहुत ही शांत रहते थे । परिणामों के शांत रहने से उनकी चेष्टाएँ जगत् का हित करने वाली होती थीं और जगत्-हितकारी चेष्टाओं से वे प्रजा का पालन करते थे ।।184।।
“The Lord possessed innate scriptural knowledge, which kept His mind extremely tranquil. Due to this serenity, His actions were always benevolent toward the world, and through such world-benefiting deeds, He nurtured and guided His people.”
श्लोक ( Shlok ) 185
यथा यथास्य वर्द्धन्ते गुणांशा वपुषा समम् । तथा तथास्य जनता बन्धुता चागमन्मुदम् ॥१८५॥
ज्यों-ज्यों शरीर के साथ-साथ उनके गुण बढ़ते जाते थे त्यों-त्यों समस्त जनसमूह और उनके परिवार के लोग हर्ष को प्राप्त होते जाते थे ।।185।।
“As His virtues grew alongside His body, the entire community and His family experienced increasing joy and happiness.”
श्लोक ( Shlok ) 186
स पित्रोः परमानन्दं बन्धुतायाश्व निर्वृतिम् । जगञ्जनस्त्र संप्रीतिं वर्द्धयन् समवर्द्धत ॥१८६॥
इस प्रकार वे भगवान् माता-पिता के परम आनंद को, बंधुओं के सुख को और जगत् के समस्त जीवों की परम प्रीति को बढ़ाते हुए वृद्धि को प्राप्त हो रहे थे ।।186।।
“Thus, the Lord continued to grow while enhancing the supreme joy of His parents, the happiness of His relatives, and the deep affection of all living beings in the world.”
श्लोक ( Shlok ) 187
परमायुरथास्याभूत् चरमं बिभ्रतो वपुः । संपूर्णा पूर्वलक्षाणामशीतिश्चतुरुत्तरा ॥१८७॥
चरम शरीर को धारण करने वाले भगवान की संपूर्ण आयु चौरासी लाख पूर्व की थी ।।187।।
“The Lord, who had assumed His final body, had a total lifespan of 8.4 million years.”
श्लोक ( Shlok ) 188
दीर्घदर्शी सुदीर्घायुर्दीर्घबाहुश्च दीर्घदृक् । स दीर्घसूत्रों लोकानामभजत् सूत्रधारताम् ॥ १८८॥
वे भगवान् दीर्घदर्शी थे, दीर्घ आयु के धारक थे, दीर्घ भुजाओं से युक्त थे, दीर्घ नेत्र धारण करने वाले थे और दीर्घ सूत्र अर्थात् दृढ़ विचार के साथ कार्य करने वाले थे इसलिए तीनों ही लोको की सूत्रधारता―गुरुत्व को प्राप्त हुए थे ।।188।।
“The Lord was far-sighted, possessed a long lifespan, had long arms, wide eyes, and acted with deep and steadfast contemplation. Therefore, He attained the supreme role of being the guiding force—the master—of all three worlds.”
श्लोक ( Shlok ) 189
कदाचिल्लि पिसंख्यान गन्धर्वादिकलागमम् । स्वभ्यस्तपूर्वमभ्यस्यन् स्वयमभ्यासयत् परान् ॥ १८९॥
भगवान् वृषभदेव कभी तो, जिनका पूर्वभव में अच्छी तरह अम्यास किया है ऐसे लिपि विद्या, गणित विद्या तथा संगीत आदि कलाशास्त्रों का स्वयं अभ्यास करते थे और कभी दूसरों को कराते थे ।।189।।
“Lord Vrishabhadeva sometimes practiced various disciplines Himself—such as scriptural writing, mathematics, and music—which He had mastered in His past lives, and at other times, He guided others in their practice.”
श्लोक ( Shlok ) 190
‘छन्दोऽवचित्यलङ्कारप्र स्तारादिविवेचनैः । कदाचिद् भावयन् गोष्ठीश्चित्राद्यैश्च कलागमैः ॥१९०॥
कभी छंदशास्त्र, कभी अलंकार शास्त्र, कभी प्रस्तार नष्ट उद्दिष्ट संख्या आदि का विवेचन और कभी चित्र खींचना आदि कला शास्त्रों का मनन करते थे ।।190।।
“At times, He studied prosody, sometimes delved into the science of ornaments (figures of speech), sometimes analyzed combinatorics, permutations, and numerical calculations, and at other times, He reflected upon the arts such as painting and drawing.”
श्लोक ( Shlok ) 191
कदाचित् पद गोष्ठीभिः काम्यगोष्ठीभिरन्यदा । “वावदूकैः समं कैश्वित् जल्पगोष्ठीभिरेकदा ॥१९१॥
कभी वैयाकरणों के साथ व्याकरण संबंधी चर्चा करते थे, कभी कवियों के साथ काव्य विषय की चर्चा करते थे और कभी अधिक बोलने वाले वादियों के साथ वाद करते थे ।।191।।
“Sometimes, He engaged in discussions on grammar with grammarians, at times conversed about poetry with poets, and occasionally debated with eloquent and argumentative scholars.”
श्लोक 192 से 201
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181