भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण चतुर्दशं पर्व Ādi purāṇa Parv 14 by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 14 में भगवान का अलंकरण, अयोध्या वापसी, और उत्सव शामिल हैं।
This Parv 14 narrates the events following Lord Rishabhdev’s consecration (abhishek) on Mount Meru, including his adornment, the return to Ayodhya, and the celebrations that ensue.
श्लोक 12 से 21 आभूषणों से शोभा
बाजूबंद-कड़ों से भुजाएँ कल्पवृक्ष शाखा सा। करधनी अंकुर सा, चरण गोमुख मणियों से सरस्वती सेवा सा। भगवान लक्ष्मी पुंज, सौंदर्य समूह, काव्य सा शोभित। इंद्र की गोद में अलंकृत भगवान देख इंद्राणी आश्चर्यचकित। इंद्र सहस्राक्ष बन रूप देखा। देव-असुरों ने शिखामणि सा दर्शन किया।
श्लोक 22 से 31 इंद्र की स्तुति (भाग 1)
इंद्र ने स्तुति की: भगवान परमानंददायक, कमल प्रबोधक सूर्य। मिथ्याज्ञान से उद्धारक, वचन से अंधकार नाशक। आदि देव, गुरु, विधाता, नायक। चंद्रमा सा पवित्र, वचन से नीरोगी। कोश नष्ट कर तीर्थंकर पद प्राप्त, कूटस्थ में गुण वृद्धि।
श्लोक 32 से 41 इंद्र की स्तुति (भाग 2)
अभिषेक से संसार, मेरु, क्षीरसागर पवित्र। जलकण यश समूह। स्वाभाविक सुगंध-कांति, भक्ति से पूजा। मेरु से सूर्य सा तेजस्वी। ब्रह्म-विष्णु-महेश स्वरूप। संस्कार से दैदीप्यमान। प्रत्यक्ष परं ज्योति, पुराणपुरुष। आत्मा-गुणों से नमस्कार योग्य।
श्लोक 42 से 51 इंद्र की स्तुति (भाग 3)
पृथ्वी सा क्षमाशील, जल सा आनंददायक, वायु सा मोह नाशक, अग्नि सा कर्म जलाने वाला, आकाश सा व्यापक, याजक सा होमकर्ता, चंद्र सा निर्वाणदायक, सूर्य सा प्रकाशक—आठ मूर्ति धारी। महाबल आदि दश अवतारों से विष्णु स्वरूप। भक्ति ही फल।
श्लोक 52 से 61 अयोध्या प्रस्थान
इंद्र ने अयोध्या चलने का विचार किया। मार्ग में उत्सव, दुंदुभि, जय-शब्द, ऐरावत पर भगवान। आकाश उल्लंघन कर अयोध्या पहुँचे। गोपुर-पताकाओं से स्वर्ग सा। मणिमयी भूमि कुमुद सरसी सा। पताकाएँ स्वर्ग बुलातीं। महल विमानों सा, चंद्रकांत मणि से मेघ सा।
श्लोक 62 से 71 अयोध्या का वर्णन
शिखरों से ज्योतिश्चक्र छिपा, मेघ आश्रित। सुवर्ण परकोटा मेरु शोभा सा। परिखा समुद्र सा, शुद्ध खानि भूमि। उपवन कल्पवृक्ष सा। सरयू किनारे सारस-हंस। दुर्लंघ्य अयोध्या, सेनाओं से घिरी।
श्लोक 72 से 81 नाभिराज-मरुदेवी से भेंट
इंद्र ने भगवान को नाभिराज घर में सिंहासन पर रखा। नाभिराज रोमांचित, मरुदेवी प्रबोधित हो पुत्र देखीं। भगवान तेज पुंज सा, माता पूर्व दिशा सा। इंद्र ने माता-पिता की पूजा की, स्तुति: पुण्यशाली, महाभाग्यशाली, उदयाचल-पूर्व दिशा।
श्लोक 82 से 91 जन्मोत्सव
इंद्र ने भगवान सौंप कथा सुनाई। माता-पिता हर्षित, पुरवासियों संग उत्सव। पताकाएँ स्वर्ग बुलातीं। अयोध्या स्वर्ग सा, नगरवासी देव-अप्सरा सा। धूप-संगीत से दिशाएँ भरीं। गलियाँ रत्न चूर्ण से अलंकृत, नगर नृत्य करता सा।
श्लोक 92 से 102 उत्सव और इंद्र का नृत्य
पुरवासी गीत-नृत्य में व्यस्त। कोई दीन-निर्धन नहीं। मेरु सा उत्सव अयोध्या में। इंद्र ने नृत्य शुरू किया, गंधर्वों ने संगीत। नाट्यशास्त्र अनुसार नृत्य, महात्माओं के देखने योग्य। बाजे, पृथ्वी रंगभूमि, इंद्र नर्तक, भगवान आराध्य, पुरुषार्थ सिद्धि फल।
श्लोक 103 से 111 इंद्र का नृत्य प्रारंभ
इंद्र ने त्रिवर्ग सिद्ध करने हेतु गर्भावतार और जन्माभिषेक नाटक किए। दशावतार वृत्तांत पर नाटक शुरू। मंगलाचरण, पूर्वरंग, पुष्पांजलि संग तांडव नृत्य। नांदी मंगल, मंगल वस्त्राभूषण से शोभित। वैशाख-आसन में मरुत संग लोकस्कंध सा। पुष्पांजलि से नाट्यरस बाँटा, कल्पवृक्ष सा शोभित।
श्लोक 112 से 121 तांडव नृत्य की शोभा
इंद्र की नेत्र प्रभा से रंगभूमि आच्छादित। ताल संग पृथ्वी नापता सा। देवों ने पुष्पवर्षा की। पुष्कर बाजे, वीणा-मुरली मधुर शब्द। स्वर-शैली में एकता। किन्नरियाँ कोमल गान। वंशी मनोहर शब्द, करण-अंगहार संग विविध नृत्य।
श्लोक 122 से 131 नृत्य का प्रभाव
हजार भुजाओं से नृत्य, पृथ्वी हिली, कुलपर्वत चंचल, समुद्र लहराया। भुजाएँ कल्पवृक्ष सा, रत्न किरणों से बिजली सा आकाश। तारे मोती सा, मेघ आँसू सा। फिरकी से मणि अलातचक्र सा। पृथ्वी-समुद्र क्षुभित, दिशाएँ प्रक्षालित। इंद्रजाल सा चंचल नृत्य।
श्लोक 132 से 141 देवियों का नृत्य
अप्सराएँ भुजाओं पर लीलापूर्वक नृत्य। वर्द्धमान लय, तांडव, अभिनय। बिजली-इंद्र रूप में प्रवेश-निष्क्रमण। कल्पलता सा शोभित। फिरकी से सेहरा चक्र सा। हजार नेत्रों से कमल तालाब सा, देवियाँ कमलिनी सा। हास्य से अमृत कमल सा, लक्ष्मी-वीरलक्ष्मी सा।
श्लोक 142 से 151 नृत्य की सूक्ष्मता
देवियाँ अंगुलियों पर सूचीनाट्य, नाभि संग फिरकी। कटाक्ष फैलातीं। नाट्यरस शरीर में स्फुरित—कपोल, पाँव, हाथ, मुख, नेत्र, अंगराग, नाभि, कटि, मेखला। इंद्र की चेष्टाएँ पात्रों में बँटीं, आत्मा प्रविष्ट सा। भुजाओं पर यंत्र पुतली सा, इंद्रजाल-बाजीगर सा।
श्लोक 152 से 161 नृत्य का समापन
देव-देवियाँ भुजाओं पर प्रदक्षिणा संग नृत्य, इंद्र सूत्रधार सा। तांडव-लास्य रस मिश्रण, प्रेम उत्पन्न। गंधर्व बाजों संग आनंद नृत्य समाप्त। नृत्य उद्यान सा—झाँझ ताल, बाँसुरी शब्द, अप्सराएँ, शृंगार रस। नाभिराज-मरुदेवी आश्चर्यचकित, प्रशंसित।
श्लोक 162 से 171 वृषभदेव नामकरण और बाल्यावस्था
वृषभदेव नाम धर्म-अमृत वर्षा, गर्भ स्वप्न हेतु। पुरुदेव नाम से इंद्र पुरुहूत। देवकुमार-देवियाँ सेवा हेतु नियुक्त। भगवान शैशव में हँसते, चलते, माता-पिता हर्षित। चंद्रमा सा आनंददायक, हास्य चाँदनी सा, सरस्वती गीत सा।
श्लोक 172 से 181 कौमार अवस्था
रत्न धूलि में क्रीड़ा, चंद्रमा सा शोभित। कौमार में सुंदर शरीर, गुण वृद्धि। मनोहर बोली, अवलोकन, मुस्कान से प्रीति। मति-श्रुत-अवधि ज्ञान से विद्या-लोक स्थिति जानी। शिक्षा बिना कुशल, सरस्वती स्वामी, लोक गुरु।
श्लोक 182 से 191 विद्या और गुण
पुराण-कवि-वक्ता, क्षायिक सम्यग्दर्शन से मल मुक्त। शास्त्रज्ञान से शांत परिणाम, हितकारी चेष्टाएँ। गुण वृद्धि से हर्ष। लिपि, गणित, संगीत अभ्यास। छंद, अलंकार, चित्र मनन। व्याकरण, काव्य, वाद चर्चा।
श्लोक 192 से 201 क्रीड़ा और विनोद
गीत-नृत्य-वादित्र गोष्ठी। मयूर रूप में देवों को नृत्य, तोते को श्लोक, हंस को मृणाल। हाथी, मुर्ग, मल्ल, क्रौंच रूप में क्रीड़ा। दंड क्रीड़ा, यश स्तुति सुनी। रत्न चित्रावलि देखी।
श्लोक 202 से 209 प्रजा सत्कार और जलक्रीड़ा
प्रजा का मधुर सत्कार। बावड़ियों, सरयू में जलक्रीड़ा। मेघकुमार धारागृह से सेवा। नंदन वन में वनक्रीड़ा, पवनकुमार धूलि मुक्त करते। देवकुमारों संग सुखपूर्वक क्रीड़ा।
श्लोक 210 से 213 भगवान की महिमा
भगवान तीनों लोकों में पूज्य हैं और गुणों की खान हैं।इंद्र उन्हें पुष्प और वस्त्रों का भोग अर्पित करते हैं।उनके चरण सभी द्वारा पूजित हैं, और वे बाल्यावस्था में भी वृद्धों जैसे कार्य करते हैं।उनके वचनों की किरणें आनंद प्रदान करती हैं, और उनकी कीर्ति चाँदनी के समान है।वे नक्षत्रों के साथ चंद्रमा के समान वृद्धि को प्राप्त करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 1 to 11
इंद्राणी द्वारा भगवान का अलंकरण
अभिषेक की विधि समाप्त होने के बाद इंद्राणी देवी ने हर्ष के साथ जगद्गुरु भगवान वृषभदेव को आभूषण पहनाने का प्रयत्न किया। जिनका अभिषेक हो चुका था, ऐसे पवित्र शरीर वाले भगवान वृषभदेव के शरीर पर लगे जलकणों को इंद्राणी ने स्वच्छ और निर्मल वस्त्र से पोंछा। भगवान के मुख पर उनके कटाक्षों की सफेद छाया पड़ रही थी, जिसे इंद्राणी जलकण समझकर बार-बार पोंछ रही थी। उसने तीनों लोकों को सुगंधित करने वाले गाढ़े सुगंधित द्रव्यों से भगवान के शरीर पर विलेपन किया। यद्यपि वे द्रव्य उत्कृष्ट सुगंध से युक्त थे, फिर भी भगवान की स्वाभाविक और दूर तक फैलने वाली सुगंध ने उन्हें तिरस्कृत कर दिया। इंद्राणी ने बड़े आदर से भगवान के ललाट पर तिलक लगाया, किंतु जगत के तिलक-स्वरूप भगवान क्या उस तिलक से शोभायमान हुए? उसने भगवान के मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला से बना मुकुट पहनाया, जिससे वे कीर्ति से अलंकृत से शोभायमान हो रहे थे। यद्यपि भगवान स्वयं जगत के चूड़ामणि और सज्जनों में मुख्य थे, फिर भी इंद्राणी ने भक्ति से उनके मस्तक पर चूड़ामणि रत्न रखा। भगवान के सघन बरौनियों वाले नेत्र बिना अंजन के ही श्यामवर्ण थे, परंतु इंद्राणी ने नियोग समझकर उनके नेत्रों में अंजन का संस्कार किया। उनके दोनों कान बिना छेद के ही छिद्रयुक्त थे, जिनमें इंद्राणी ने मणिमय कुंडल पहनाए, जिससे वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सूर्य और चंद्रमा उनकी कांति देखने आए हों। मोक्ष-लक्ष्मी के हार जैसे सुंदर मणियों के हार से त्रिलोकीनाथ भगवान वृषभदेव के कंठ की शोभा बहुत बढ़ गई थी।
श्लोक ( Shlok ) 1
अथाभिषेकनिर्वृत्तौ शच्ची देवी जगद्गुरोः । प्रसाधनविधौ यत्नमकरोत् कृतकौतुका ॥१॥
अथानंतर, जब अभिषेक की विधि समाप्त हो चुकी तब इंद्राणी देवी ने हर्ष के साथ जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव को अलंकार पहनाने का प्रयत्न किया ।।1।।
“Thereafter, when the ritual of the consecration was completed, Indrani Devi, with great joy, attempted to adorn the Universal Teacher, Lord Rishabhadev, with ornaments.”
श्लोक ( Shlok ) 2
तस्याभिषिक्तमात्रस्य दधतः पावनीं तनुम् । सुाङ्गलग्नान्ममाजम्भिः कणान् स्वच्छामलांशुकैः ॥२॥
जिनका अभिषेक किया जा चुका है ऐसे पवित्र शरीर धारण करने वाले भगवान् वृषभदेव के शरीर में लगे हुए जलकणों को इंद्राणी ने स्वच्छ एवं निर्मल वस्त्र से पोछा ।।2।।
“Indrani gently wiped the water droplets from the sacred body of Lord Rishabhadev, who had been consecrated, using a clean and pure cloth.”
श्लोक ( Shlok ) 3
“स्वासन्नापाङ्गसंक्रान्तसितच्छायं विभोर्मुखम् । प्रमृष्टमपि सामार्जीद भूयो जलकण्यास्थया ॥३॥
भगवान् के मुख पर, अपने निकटवर्ती कटाक्षों की जो सफेद छाया पड़ रही थी उसे इंद्राणी जलकण समझती थी । अत: पोंछे हुए मुख को भी वह बार-बार पोंछ रही थी ।।3।।
“Indrani mistook the white reflection of her nearby glances on the Lord’s face for water droplets. Therefore, she kept wiping His already dried face again and again.”
श्लोक ( Shlok ) 4
गन्धैः सुगन्धिभिः सान्द्रैरिन्द्राणी गात्रमीशितुः । अन्वलिम्पत लिम्पद्भिरिवामोरैस्त्रिविष्टपम् ॥४॥
अपनी सुगंधि से स्वर्ग अथवा तीनों लोकों को लिप्त करने वाले अतिशय सुगंधित गाढ़े सुगंध द्रव्यों से उसने भगवान् के शरीर पर विलेपन किया था ।।4।।
“With extremely fragrant and dense aromatic substances, whose fragrance pervaded heaven and the three worlds, she anointed the body of the Lord.”
श्लोक ( Shlok ) 5
गन्धेनामोदिना भर्तुः शरीरसहजन्मना । गरदास्ते न्यक्कृता एव सौगन्ध्येनापि संश्रिताः ॥५॥
यद्यपि वे सुगंध द्रव्य उत्कृष्ट सुगंधि से सहित थे तथापि भगवान् के शरीर की स्वाभाविक तथा दूर-दूर तक फैलने वाली सुगंध ने उन्हें तिरस्कृत कर दिया था ।।5।।
“Although those fragrant substances were of exceptional aroma, they were overshadowed by the Lord’s natural fragrance, which spread far and wide.”
श्लोक ( Shlok ) 6
तिलकं च ललाटेऽस्य शची चक्रे किलादरात्। जगतां तिलकस्तेन किमलंक्रियते विभुः ॥६॥
इंद्राणी ने बड़े आदर से भगवान् के ललाट पर तिलक लगाया परंतु जगत् के तिलक-स्वरूप भगवान् क्या उस तिलक से शोभायमान हुए थे ? ।।6।।
“Although those fragrant substances were of exceptional aroma, they were overshadowed by the Lord’s natural fragrance, which spread far and wide.”
श्लोक ( Shlok ) 7
मन्दारमालयोत्तंस मिन्द्राणी विदधे विभोः । तयालंकृतमूर्द्धासौ कीर्त्येव व्यरुचद् भृशम् ॥७॥
इंद्राणी ने भगवान् के मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला से बना हुआ मुकुट धारण किया था । उन मालाओं से अलंकृत मस्तक होकर भगवान् ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो कीर्ति से ही अलंकृत किये गये हों ।।7।।
“Indrani adorned the Lord’s head with a crown made of garlands of Kalpavriksha flowers. With this adornment, the Lord’s head shone brilliantly, as if it were decorated with glory itself.”
श्लोक ( Shlok ) 8
जगच्चूडामणेरस्य मूर्ध्नि चूडामणि न्यधात् । सतां मूर्धाभिषिक्तस्य पौलोमी भक्तिनिर्भरा ॥८॥
यद्यपि भगवान् स्वयं जगत् के चूड़ामणि थे और सज्जनों में सबसे मुख्य थे तथापि इंद्राणी ने भक्ति से निर्भर होकर उनके मस्तक पर चूड़ामणि रत्न रखा था ।।8।।
“Although the Lord Himself was the crest jewel of the universe and the foremost among the virtuous, Indrani, filled with devotion, placed a Chudamani gem upon His head.”
श्लोक ( Shlok ) 9
“अनञ्जितासिते भर्त्तुलौंचने सान्द्रपक्ष्मणी । पुनरञ्जनसंस्कारमाचार इति लम्भिते ॥९॥
यद्यपि भगवान् के सघन बरौनी वाले दोनों नेत्र अंजन लगाये बिना ही श्यामवर्ण थे तथापि इंद्राणी ने नियोग मात्र समझकर उनके नेत्रों में अंजन का संस्कार किया था ।।9।।
“Although the Lord’s eyes, adorned with thick eyelashes, were naturally dark without any application of collyrium, Indrani, merely as a ritual, applied collyrium to them.”
श्लोक ( Shlok ) 10
कर्णावविन्द्धसच्छिद्रो कुण्डलाभ्यां विरेजतुः । कान्तिदीप्ती मुखे द्रष्टुमिन्द्वर्काभ्यामिवाश्रितौ ॥१०॥
भगवान् के दोनों कान बिना वेधन किये ही छिद्रसहित थे, इंद्राणी ने उनमें मणिमय कुंडल पहनाये थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो भगवान् के मुख की कांति और दीप्ति को देखने के लिए सूर्य और चंद्रमा ही उनके पास पहुँचे हों ।।10।।
“The Lord’s ears were naturally perforated without any piercing, and Indrani adorned them with jeweled earrings. They appeared as if the Sun and the Moon had drawn near to witness the radiance and brilliance of His face.”
श्लोक ( Shlok ) 11
हारिणा मणिहारेण कण्ठशोभा महत्यभूत् । मुक्तिश्रीकण्ठिकादाम चारुणा त्रिजगत्पतेः ॥११॥
मोक्ष-लक्ष्मी के गले के हार के समान अतिशय सुंदर और मनोहर मणियों के हार से त्रिलोकीनाथ भगवान् वृषभदेव के कंठ की शोभा बहुत भारी हो गयी थी ।।11।।
“The beauty of Lord Rishabhadev’s neck was greatly enhanced by an exceedingly magnificent and charming necklace of radiant gems, akin to the garland adorning the goddess of liberation.”
श्लोक 12 से 21
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216