आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 राजकुमारों की शारीरिक शोभा
भगवान ऋषभदेव के पुत्रों की शारीरिक सुंदरता और आभूषणों का वर्णन। उनके कान, नेत्र, भौंहें, ललाट, ओठ, कंठ आदि अंगों की शोभा को काव्यात्मक रूप से प्रस्तुत किया गया। वे आभूषणों से सुशोभित थे, जैसे फूलों से वन।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
तन्मुखामोदमाघ्रातुमायान्ती भ्रमरावली सर्वाङ्गीणं तदामोदमन्वभूत् क्षणमाकुला ॥३२॥
उन राजकुमारों के मुख की सुगंध सूँघने के लिए जो भ्रमरों की पंक्ति आती थी वह क्षण-भर के लिए व्याकुल होकर उनके समस्त शरीर में व्याप्त हुई सुगंधि का अनुभव करने लगती थी । भावार्थ―उनके समस्त शरीर से सुगंधि आ रही थी इसलिए मैं पहले किस जगह की सुगंधि ग्रहण करूँ इस विचार से भ्रमर क्षण भर के लिए व्याकुल हो जाते थे ।।32।।
The swarm of bees that approached to inhale the fragrance of the princes’ faces became momentarily restless, as they were overwhelmed by the divine aroma emanating from their entire bodies.
(Explanation)—Since their entire bodies exuded fragrance, the bees became confused for a moment, wondering from where to begin savoring the delightful scent. ||32||
श्लोक ( Shlok ) 33
रत्नकुण्डलयुग्मेन मकराङ्केण भूषितम्। कर्णद्वयं बभौ तेषां मदनेनेव चिह्नितम् ॥३३॥
उन राजकुमारों के दोनों कान मकर के चिह्न से चिह्नित रत्नमयी कुंडलों से अलंकृत थे इसलिए ऐसे जान पड़ते थे मानो कामदेव ने उन पर अपना चिह्न ही लगा दिया हो ।।33।।
The ears of those princes were adorned with jewel-studded earrings marked with the emblem of makara (a mythical sea creature). Because of this, they appeared as if Kāmadeva himself had placed his divine seal upon them. ||33||
श्लोक ( Shlok ) 34
नेत्रोत्पलद्वयं तेषामिपूकृत्य मनोभवः । भ्रूलताचापयष्टिभ्यां स्त्री सृष्टिं वशमानयत् ॥३४॥
कामदेव ने उनके नेत्ररूपी कमलों को बाण बनाकर और उनकी भौंहरूपी लताओं को धनुष की लकड़ी बनाकर समस्त स्त्रियों को अपने वश में कर लिया था ।।34।।
Kāmadeva had transformed their lotus-like eyes into arrows and their vine-like eyebrows into the bow, using them to completely captivate the hearts of all women. ||34||
श्लोक ( Shlok ) 35
वपुर्दींप्तं मुखं कान्तं मधुरो नेत्रविभ्रमः। कर्णावभ्यर्ण विश्राम्तनेत्रोत्पलवतं सितौ ॥ ३५॥
उनका शरीर दैदीप्यमान था, मुख सुंदर था, नेत्रों का विलास मधुर था और कान समीप में विश्राम करने वाले नेत्ररूपी कमलों से सुशोभित थे ।।35।।
Their bodies were radiant, their faces charming, their eyes exuded a sweet allure, and their ears were beautifully adorned by their lotus-like eyes resting nearby. ||35||
श्लोक ( Shlok ) 36
भ्रुवौ सविभ्रमे शस्तं ललाटं नासिकाञ्चिता । कपोलावुपमातीता वपोदितशशिश्रियो ॥३६॥
उनकी भौंहें विलास से सहित थीं, ललाट प्रशंसनीय था, नासिका सुशोभित थी और उपमारहित कपोल चंद्रमा की शोभा को भी तिरस्कृत करने वाले थे ।।36।।
Their eyebrows were adorned with charm, their forehead was praiseworthy, their nose was elegant, and their incomparable cheeks outshone even the beauty of the moon. ||36||
श्लोक ( Shlok ) 37
रक्तो रागरसेनेव पाटलो दशनच्छदः । स्वरो सृदङ्गनिर्घोषगम्भीरः श्रुतिपेशलः ॥३७॥
उनके ओठ कुछ-कुछ लाल वर्ण के थे मानो अनुराग के रस से ही लाल वर्ण के हो गये हो और स्वर मृदंग के शब्द के समान गंभीर तथा कानों को प्रिय था ।।37।।
Their lips had a slight reddish hue, as if they had been colored by the very essence of love. Their voices were deep and resonant, like the sound of a mṛdaṅga drum, and were immensely pleasing to the ears. ||37||
श्लोक ( Shlok ) 38
“सूत्रमार्गमनुप्रोतैः जगच्चेतोऽभिनन्दिभिः। कण्ठयैरिवाक्षरैः शुद्धेः कण्ठो मुक्ताफलेर्वृतः ॥३८॥
उनके कंठ जिन मोतियों से घिरे हुए थे वे ठीक कंठ से उच्चारण होने योग्य अक्षरों के समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार अक्षर सूत्रमार्ग अर्थात्, मूल ग्रंथ के अनुसार गुंफित होते हैं उसी प्रकार वे मोती भी सूत्रमार्ग अर्थात् धागा में पिरोये हुए थे, अक्षर जिस प्रकार जगत् के जीवों के चित्त को आनंद देने वाले होते हैं उसी प्रकार वे मोती भी उनके चित्त को आनंद देने वाले थे, अक्षर जिस प्रकार कंठ स्थान से उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार मोती भी कंठ स्थान में पड़े हुए थे, और अक्षर जिस प्रकार शुद्ध अर्थात् निर्दोष होते हैं उसी प्रकार वे मोती भी शुद्ध अर्थात् निर्दोष थे ।।38।।
The pearls adorning their necks seemed akin to the very syllables meant for vocal expression.
- Just as letters are strung together according to the sutra-mārga (the traditional order of scriptures), the pearls were neatly threaded on a string.
- Just as syllables bring joy to the hearts of beings, so too did these pearls delight the mind.
- Just as letters originate from the throat, the pearls gracefully rested upon it.
- And just as syllables are pure and flawless, so too were these pearls, immaculate and radiant.
||38||
श्लोक ( Shlok ) 39
वक्षो लक्ष्म्या परिष्वक्तमंसौ च विजयश्रिया। व्यायामकर्कशो बाहू पीनावाजानुलम्बिनौ ॥३९॥
उनका वक्षस्थल लक्ष्मी से आलिंगित था, कंधे विजयलक्ष्मी से आलिंगित थे और घुटनों तक लंबी भुजाएँ व्यायाम से कठोर थीं ।।39।।
Their chest was embraced by Goddess Lakṣmī, their shoulders were adorned with the glory of victory (Vijaya Lakṣmī), and their long arms, extending down to their knees, were hardened by rigorous exercise. ||39||
श्लोक ( Shlok ) 40
नाभिः शोभानिधानोर्वी चावीं निर्वापणी दृशाम् । तनुमध्यं जगन्मध्य निर्विशेषमशेषतः ४०॥
उनकी नाभि शोभा के खजाने की भूमि थी, सुंदर थी और नेत्रों को संतोष देने वाली थी । इसी प्रकार उनका मध्यभाग अर्थात कटिप्रदेश भी ठीक जगत् के मध्यभाग के समान था ।।40।।
Their navel was like the very abode of beauty, exquisitely charming and pleasing to the eyes. Likewise, their waist was perfectly proportioned, resembling the central axis of the universe itself. ||40||
श्लोक ( Shlok ) 41
लसद्वसनमामुक्त रशनं जधनं धनम् । कायमानमिवानङ्गनृपतेः कृतनिर्वृति ॥४१॥
जिन पर वस्त्र शोभायमान हो रहा है और करधनी लटक रही है ऐसे उनके स्थूल नितंब ऐसे जान पड़ते थे मानो कामदेवरूपी राजा के सुख देने वाले कपड़े के बने हुए तंबू ही हों ।।41।।
Their broad hips, adorned with elegant garments and a gracefully hanging girdle, appeared as if they were luxurious tents made of fine fabric, set up for the pleasure of Kāmadeva, the god of love. ||41||
श्लोक 42 से 51
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