आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 |
श्लोक 103 से 111 इंद्र का नृत्य प्रारंभ
इंद्र ने त्रिवर्ग सिद्ध करने हेतु गर्भावतार और जन्माभिषेक नाटक किए। दशावतार वृत्तांत पर नाटक शुरू। मंगलाचरण, पूर्वरंग, पुष्पांजलि संग तांडव नृत्य। नांदी मंगल, मंगल वस्त्राभूषण से शोभित। वैशाख-आसन में मरुत संग लोकस्कंध सा। पुष्पांजलि से नाट्यरस बाँटा, कल्पवृक्ष सा शोभित।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 103 to 111
श्लोक ( Shlok ) 103
कृत्वा समवतारं तु त्रिवर्गफलसाधनम् । जन्माभिषेकसंबन्धं प्रायुङ्क्तैनं तदा हरिः ॥१०३॥
उस समय इंद्र ने पहले त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) रूप फल को सिद्ध करने वाला गर्भावतार संबंधी नाटक किया और फिर जन्माभिषेक संबंधी नाटक करना प्रारंभ किया ।।103।।
At that time, Indra first enacted the drama related to the incarnation of the womb, which fulfills the threefold fruits (Dharma, Artha, and Kama), and then began the drama related to the birth consecration. ||103||
श्लोक ( Shlok ) 104
तदा प्रयुक्तमन्यच्च रूपकं बहुरूपकम् । दशावतारसंदर्भमधिकृत्य जिनेशिनः ॥ १०४॥
तदनंतर इंद्र ने भगवान् के महाबल आदि दशावतार संबंधी वृत्तांत को लेकर अनेक रूप दिखलाने वाले अन्य अनेक नाटक करना प्रारंभ किये ।।104।।
Thereafter, Indra began performing many other dramas, showcasing various forms based on the narratives of the ten incarnations of the Lord, including Mahabala. ||104||
श्लोक ( Shlok ) 105
तत्प्रयोगविधौ पूर्व पूर्वरङ्ग समङ्गलम् । प्रारेभे मघवाघानां विघाताय समाहितः ॥१०५॥
उन नाटकों का प्रयोग करते समय इंद्र ने सबसे पहले, पापों का नाश करने के लिए मंगलाचरण किया और फिर सावधान होकर पूर्वरंग का प्रारंभ किया ।।105।।
While performing those dramas, Indra first conducted a Mangalacharan (auspicious invocation) to destroy sins and then, with great attentiveness, began the Purvarang (introductory ritual). ||105||
श्लोक ( Shlok ) 106
पूर्वरङ्गप्रसंगेन’ पुष्याञ्जलिपुरस्सरम् । ताण्डवारम्भमेवाग्रे सुरप्राग्रह रोऽग्रहीत् ॥१०६॥
पूर्वरंग प्रारंभ करते समय इंद्र ने पुष्पांजलि क्षेपण करते हुए सबसे पहले तांडव नृत्य प्रारंभ किया ।।106।।
While beginning the Purvarang, Indra first offered a handful of flowers (Pushpanjali) and then commenced the Tandava dance. ||106||
श्लोक ( Shlok ) 107
प्रयोज्य नान्दी मन्तेऽस्या विशन् रङ्ग बभो हरिः । धृतमङ्गलनेपथ्यो नाट्यवेदावतारवित् ॥ १०७॥
तांडव नृत्य के प्रारंभ में उसने नांदी मंगल किया और फिर नांदी मंगल कर चुकने के बाद रंग-भूमि में प्रवेश किया । उस समय नाट्यशास्त्र के अवतार को जानने वाला और मंगलमय वस्त्राभूषण धारण करने वाला वह इंद्र बहुत ही शोभायमान हो रहा था ।।107।।
At the beginning of the Tandava dance, Indra performed the Nandi Mangala (auspicious invocation). After completing the Nandi Mangala, he entered the stage. At that moment, Indra, who understood the incarnation of Natya Shastra and was adorned with auspicious garments and ornaments, appeared extremely radiant. ||107||
श्लोक ( Shlok ) 108
स रङ्गमवतीणोंऽभाद् वैशाखस्थानमास्थितः । लोकस्कन्ध इवोभ्दूतो मरुद्भिरभितो वृतः l१०८॥
जिस समय वह रंग-भूमि में अवतीर्ण हुआ था उस समय वह वैशाख-आसन से खड़ा हुआ था अर्थात् पैर फैलाकर अपने दोनों हाथ कमर पर रखे हुए था और चारों ओर से मरुत् अर्थात् देवों से घिरा हुआ था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो मरुत् अर्थात् वातवलयों से घिरा हुआ लोकस्कंध ही हो ।।108।।
When he descended onto the stage, he stood in the Vaishakha Asana posture, with his legs spread apart and both hands resting on his waist. Surrounded on all sides by the Maruts (divine beings), he appeared as if he were the very embodiment of the cosmic expanse, encircled by whirlwinds. ||108||
श्लोक ( Shlok ) 109
“मध्येरङ्गमसौ रेजे क्षिपन् पुष्पाञ्जलि हरिः । विभजन्निव पीताव शेषनाट्यरसं स्वयम् ॥१०९॥
रंग-भूमि के मध्य में पुष्पांजलि बिखेरता हुआ वह इंद्र ऐसा भला मालूम होता था मानो अपने पान करने से बचे हुए नाट्यरस को दूसरों के लिए बाँट ही रहा हो ।।109।।
In the center of the stage, as Indra scattered Pushpanjali (handfuls of flowers), he appeared as if he were distributing the remnants of the Natya Rasa (dramatic essence) that he himself had not consumed, for others to relish. ||109||
श्लोक ( Shlok ) 110
ललितोद्भटनेपथ्यो लसन्नयनसन्ततिः । स रेजे कल्पशाखीव सप्रसूनः सभूषणः ॥११०॥
वह इंद्र अच्छे-अच्छे वस्त्राभूषणों से शोभायमान था और उत्तम नेत्रों का समूह धारण कर रहा था इसलिए पुष्पों और आभूषणों से सहित किसी कल्पवृक्ष के समान सुशोभित हो रहा था ।।110।।
That Indra, adorned with exquisite garments and ornaments, and possessing a splendid pair of eyes, appeared as radiant as a Kalpavriksha (wish-fulfilling divine tree) decorated with flowers and jewels. ||110||
श्लोक ( Shlok ) 111
पुष्पाञ्जलिः पतन् रेजे मत्तालिभिरनुद्रुतः । नेत्रोध इव वृत्रघ्नः कल्माषितनभोऽङ्गणः ॥ १११॥
जिसके पीछे अनेक मदोन्मत्त भौंरे दौड़ रहे हैं ऐसी वह पड़ती हुई पुष्पांजलि ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो आकाश को चित्र-विचित्र करने वाला इंद्र के नेत्रों का समूह ही हो ।।111।।
The falling Pushpanjali (handfuls of flowers), followed by numerous intoxicated bees, appeared so magnificent as if it were Indra’s very own eyes, embellishing the sky with their enchanting beauty. ||111||
श्लोक 112 से 121
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 |