आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 141 कल्पवृक्षों का नाश और प्रजा की व्यथा
कल्पवृक्षों के नष्ट होने से प्रजा व्याकुल हुई और भगवान से आजीविका के उपाय माँगे। प्रजा ने भूख, शीत, वर्षा आदि से रक्षा की याचना की।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
रसवीर्य विपाकैस्तैः प्रहीणाः पादपा यदा । तदातङ्का दिबाधाभिः प्रजा व्याकुलतां गताः ॥१३२॥
जब कल्पवृक्ष रस, वीर्य और विपाक आदि से रहित हो गये तब वहां की प्रजा रोग आदि अनेक बाधाओं से व्याकुलता को प्राप्त होने लगी ।।132।।
“When the Kalpavriksha (wish-fulfilling trees) lost their essence, potency, and nourishing effects, the people there began to suffer from diseases and various other afflictions.”
श्लोक ( Shlok ) 133
‘तत्प्रहाणान्मनोवृत्तिं दधाना व्याकुलीकृताम् । नाभिराजमुपासेदुः प्रजा जीवितकाम्यया ।।१३३॥
कल्पवृक्षों के रस, वीर्य आदि के नष्ट होने से व्याकुल मनोवृत्ति को धारण करती हुई प्रजा जीवित रहने की इच्छा से महाराज नाभिराज के समीप गयी ।।133।।
“Distressed by the loss of the essence and vitality of the Kalpavriksha, the anxious people, seeking a way to survive, approached Maharaja Nabhiraja.”
श्लोक ( Shlok ) 134
नाभिराजाज्ञया स्रष्टु स्ततोऽन्तिकमुपाययुः । प्रजाः प्रणतमूर्द्धानो जीवितोपायलिप्सया ॥१३४॥
तदनंतर नाभिराज की आज्ञा से प्रजा भगवान् वृषभनाथ के समीप गयी और अपने जीवित रहने के उपाय प्राप्त करने की इच्छा से उन्हें मस्तक झुकाकर नमस्कार करने लगी ।।134।।
“Thereafter, by the command of King Nabhiraja, the people approached Lord Rishabhanatha. Wishing to find a means for their survival, they bowed their heads in reverence and offered their salutations to him.”
श्लोक ( Shlok ) 135
अथ विज्ञापयामासुरित्युपेत्य सनातनम्। प्रजाः प्रजातसंत्रासाः शरण्यं शरणाश्रिताः ॥१३५॥
अथानंतर अन्नादि के नष्ट होने से जिसे अनेक प्रकार के भय उत्पन्न हो रहे हैं और जो सबको शरण देने वाले भगवान् की शरण को प्राप्त हुई है ऐसी प्रजा सनातन-भगवान के समीप जाकर इस प्रकार निवेदन करने लगी कि ।।135।।
“Then, as food and other essentials perished, causing various fears to arise, the people—who had taken refuge in the ever-compassionate Lord—approached Lord Rishabhadeva and humbly submitted their plea as follows:”
श्लोक ( Shlok ) 136
वाञ्छन्त्यो जीविकां देव त्वां वयं शरणं श्रिताः । तन्नस्नायस्व लोकेश तदुपाय प्रदर्शनात् ॥१३६॥
हे देव, हम लोग जीविका प्राप्त करने की इच्छा से आपकी शरण में आये हुए हैं इसलिए हे तीन लोक के स्वामी, आप उसके उपाय दिखलाकर हम लोग की रक्षा कीजिए ।।136।।
“O Lord, we have come to your refuge in search of a means of livelihood. Therefore, O Master of the Three Worlds, please show us the way and protect us.”
श्लोक ( Shlok ) 137
विभो समूल “मुत्सन्नाः पितृकल्पा महाङ् घ्रिपाः। फलन्त्यकृष्टपच्यानि सस्यान्यपि च नाधुना ॥१३७॥
हे विभो, जो कल्पवृक्ष हमारे पिता के समान थे―पिता के समान ही हम लोगों की रक्षा करते थे वे सब मूलसहित नष्ट हो गये हैं और जो धान्य बिना बोये ही उत्पन्न होते थे वे भी अब नहीं फलते हैं ।।137।
“O Lord, the Kalpavrikshas, which nurtured and protected us like a father, have been completely uprooted and destroyed. Likewise, the grains that once grew naturally without cultivation no longer bear fruit.”
श्लोक ( Shlok ) 138
क्षुत्पिपासादिबाधाश्च दुन्वन्त्यस्मान्समुत्थिताः । न क्षमाः क्षणमप्येकं प्राणितुं प्रोज्झिताशनाः ॥१३८॥
हे देव, बढ़ती हुई भूख प्यास आदि की बाधाएं हम लोगों को दु:खी कर रही है । अन्न-पानी से रहित हुए हम लोग अब एक क्षण भी जीवित रहने के लिए समर्थ नहीं हैं ।।138।।
“O Lord, the increasing pangs of hunger and thirst are tormenting us. Deprived of food and water, we are no longer able to survive even for a moment.”
श्लोक ( Shlok ) 139
शीतातपमहावातप्रत्रर्षोपप्लवश्च नः । निराश्रयान्दुनोत्यद्य ब्रूहि नस्तत्प्रतिक्रियाम् ॥१३९॥
हे देव, शीत, आतप, महावायु और वर्षा आदि का उपद्रव आश्रयरहित हम लोगों को दु:खी कर रहा है इसलिए आज इन सबके दूर करने के उपाय कहिए ।।139।।
“O Lord, the cold, heat, strong winds, and heavy rains are troubling us, as we have no proper shelter. Therefore, please show us a way to overcome these hardships.”
श्लोक ( Shlok ) 140
त्वां देवमादिकर्तारं कल्पांघ्रिप मिवोन्नतम् । समाश्रिताः कथंभीतेः पदं स्याम वयं विभोः ॥१४०॥
हे विभो, आप इस युग के आदि कर्ता हैं और कल्पवृक्ष के समान उन्नत हैं, आपके आश्रित हुए हम लोग भय के स्थान कैसे हो सकते हैं ? ।।140।।
“O Lord, you are the prime creator of this era and stand lofty like the Kalpavriksha. Having taken refuge in you, how can we still remain in a state of fear and distress?”
श्लोक ( Shlok ) 141
ततोऽस्माकं यथाथ स्याज्जीविका निरुपद्रवा । तथोपदेष्टुमुद्योगं कुरु देव प्रसीद नः ॥१४१
इसलिए हे देव, जिस प्रकार हम लोगों की आजीविका निरुपद्रव हो जाये, आज उसी प्रकार उपदेश देने का प्रयत्न कीजिए और हम लोगों पर प्रसन्न हूजिए ।।141।।
“Therefore, O Lord, kindly instruct us in a way that ensures our livelihood remains free from hardships. Please bestow your grace upon us and guide us accordingly.”
श्लोक 142 से 151
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आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131