आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61
श्लोक 62 से 71 विवाह प्रस्ताव
नाभिराज ने कहा कि आप आदिपुरुष हैं, अतः लोग आपका अनुगमन करेंगे। किसी इष्ट कन्या से विवाह करें, ताकि प्रजा की संतति नष्ट न हो। इससे धर्म बढ़ेगा, अतः विवाहरूपी धर्म स्वीकार करें। इसे गृहस्थ धर्म मानें, क्योंकि संतान रक्षा आवश्यक है। यदि आप मुझे गुरु मानते हैं, तो मेरे वचनों का उल्लंघन न करें। यह कहकर नाभिराज चुप हुए, और भगवान ने हँसकर ओम कहकर विवाह स्वीकार किया। उनकी स्वीकृति पिता की चतुराई, प्रजा उपकार की इच्छा, या कर्म नियोग थी। नाभिराज ने हर्ष से विवाह उत्सव किया। उन्होंने इंद्र की अनुमति से सुशील, सुंदर, सती कन्याओं की याचना की। कच्छ-महाकच्छ की बहनें, यशस्वी और सुनंदा, शांत और यौवनवती थीं, जिनसे भगवान का विवाह हुआ। देवों ने उत्सव मनाए।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
ततः कलत्रमत्रेष्टं परिणेतुं मनः कुरु । प्रजासन्ततिरेवं हि नोच्छेत्स्यति विदांवर ॥६२॥
इसलिए है ज्ञानियों में श्रेष्ठ, आप इस संसार में किसी इष्ट कन्या के साथ विवाह करने के लिए मन कीजिए क्योंकि ऐसा करने से प्रजा की संतति का उच्छेद नहीं होगा ।।62।।
“Therefore, you are the best among the wise. Decide to marry a suitable maiden in this world, for by doing so, the lineage of the people will not be destroyed.” ( 62)
श्लोक ( Shlok ) 63
प्रजासन्तत्यविच्छेदे तनुते धर्मसन्ततिः । मनुष्व मानवं धर्म ततो देवेममच्युत ॥६३॥
प्रजा की संतति का उच्छेद नहीं होने पर धर्म की संतति बढ़ती रहेगी इसलिए हे देव, मनुष्यों के इस अविनाशीक विवाहरूपी धर्म को अवश्य ही स्वीकार कीजिए ।।63।।
“When the lineage of the people is not destroyed, the progeny of Dharma will continue to grow. Therefore, O Deva, you must certainly accept this eternal marital Dharma of humans.” ( 63)
श्लोक ( Shlok ) 64
देवेमं गृहिणां धर्म त्रिद्धि दारपरिग्रहम् । सन्तानरक्षणे यत्नः कार्यों हि गृहमेधिनाम् ॥ ६४॥
दे देव, आप इस विवाह कार्य को गृहस्थों का एक धर्म समझिए क्योंकि गृहस्थों को संतान की रक्षा में प्रयत्न अवश्य ही करना चाहिए ।।64।।
“O Deva, consider this act of marriage as a duty of householders, for householders must certainly strive to protect their progeny.” ( 64)
श्लोक ( Shlok ) 65
त्वया गुरुर्मंतोऽयं चेत् जनः केनापि हेतुना । वचो नोल्लङ्घयमेवास्य नेष्टं हि गुरुलङ्घनम् ॥६५॥
। यदि आप मुझे किसी भी तरह गुरु मानते हैं तो आपको मेरे वचनों का किसी भी कारण से उल्लंघन नहीं करना चाहिए क्योंकि गुरुओं के वचनों का उल्लंघन करना इष्ट नहीं है ।।65।।
“If you consider me your guru in any way, then you must not disobey my words for any reason, as it is not desirable to go against the words of a guru.” ( 65)
श्लोक ( Shlok ) 66
इत्युदीर्य गिरं धीरो व्यरंसीन्नामिपार्थिवः । देवस्तु सस्मितं तस्य वचः प्रत्यैच्छदोमिति ॥ ६६॥
इस प्रकार वचन कहकर धीर-वीर महाराज नाभिराज चुप हो रहे और भगवान् ने हँसते हुए ओम कहकर उनके वचन स्वीकार कर लिये अर्थात् विवाह कराना स्वीकृत कर लिया ।।66।।
“Having spoken thus, the wise and valiant King Nabhiraj fell silent, and Lord (Bhagavan) accepted his words with a smile, saying ‘Om,’ thereby consenting to the marriage.” ( 66)
श्लोक ( Shlok ) 67
किमेतत्पितृदाक्षिण्यं किं प्रजानुग्रहेषिता । “नियोगः कोऽपि वा तादृग् येनैच्छत्तादृशं वशी ॥ ६७॥
इंद्रियों को वश में करने वाले भगवान ने जो विवाह कराने की स्वीकृति दी थी वह क्या उनके पिता की चतुराई थी, अथवा प्रजा का उपकार करने की इच्छा थी अथवा वैसा कोई कर्मों का नियोग ही था ।।67।।
“Was the consent given by the self-controlled Lord for marriage due to His father’s wisdom, His desire to benefit the people, or was it merely the decree of destiny?” (67)
श्लोक ( Shlok ) 68
ततोऽस्यानुमतिं ज्ञात्वा विशङ्गो नाभिभूपतिः । महविवाहकल्याणमकरोत्परया मुदा ॥६८॥
तदनंतर भगवान की अनुमति जानकर नाभिराज ने निःशंक होकर बड़े हर्ष के साथ विवाह का बड़ा भारी उत्सव किया ।।68।।
“Thereafter, knowing the Lord’s consent, King Nabhiraj, free from doubt, joyfully organized a grand and magnificent wedding celebration.” ( 68)
श्लोक ( Shlok ) 69
सुरेन्द्रानुमतात् कन्ये सुशीले चारुलक्षणे । सत्यौ सुरुचिराकारे वरयामास नाभिराट् ॥ ६९॥
महाराज नाभिराज ने इंद्र की अनुमति से सुशील, सुंदर लक्षणों वाली, सती और मनोहर आकार वाली ही कन्या की याचना की ।।69।।
“King Nabhiraj, with Indra’s permission, sought a virtuous maiden who possessed noble qualities, was chaste, and had a charming appearance.” ( 69)
श्लोक ( Shlok ) 70
तन्व्यौ कच्छमहाकच्छजाभ्यौं सौम्ये पतिंवरे । ‘यशस्वती सुनन्दाख्ये स एवं पर्यणीनयत् ॥ ७०
वे दोनों कन्याएँ कच्छ महाकच्छ की बहनें थीं, बड़ी ही शांत और यौवनवती थीं; यशस्वी और सुनंदा उनका नाम था । उन्हीं दोनों कन्याओं के साथ नाभिराज ने भगवान् का विवाह कर दिया ।।70।।
“Both maidens were the sisters of Kachchh and Mahakachchh, possessing great serenity and youthful beauty. Their names were Yashasvi and Sunanda. King Nabhiraj solemnized the Lord’s marriage with them.” ( 70)
श्लोक ( Shlok ) 71
पुरुः पुरुगुणो देवः परिणेतेति संभ्रमात् । परं कल्याणमातेनुः सुराः प्रीतिपरायणाः ॥७१॥
श्रेष्ठ गुणों को धारण करने वाले भगवान् वृषभदेव विवाह कर रहे हैं इस हर्ष से देवों ने प्रसन्न होकर अनेक उत्तम-उत्तम उत्सव किये थे ।।71।
“Filled with joy at the marriage of Lord Rishabhadeva, who possessed supreme virtues, the gods rejoiced and held many grand and auspicious celebrations.” (71)
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61