आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 विवाह का आनंद
नाभिराज और परिवार पुत्रवधुओं से संतुष्ट हुए, क्योंकि लौकिक धर्म प्रिय होता है। मरुदेवी विवाह से संतुष्ट हुईं, जैसा पुत्र विवाह में स्त्रियों को प्रेम होता है। जैसे चंद्र कला से समुद्र बेला बढ़ती है, वैसे ही मरुदेवी विवाह संपदा से बढ़ीं। सभी आनंदित हुए, क्योंकि लोग भोग स्वामी को भोगते देख अनुसरण करते हैं। विवाह ने मनुष्यलोक और स्वर्ग में प्रीति विस्तृत की। भगवान की देवियाँ उत्कृष्ट ऊरुओं, जंघाओं और कोमल चरणों से युक्त थीं; उनका कटिभाग नीचा होने पर भी संसार को जीतने वाला था। उनका कृश उदर और रोमराजि कामदेव के मद की धारा सी थी। उनकी नाभि रस की कूपिका या रोमराजि की पाल सी थी। उनके स्तन कमलिनियों से शोभायमान थे, जिन पर चूचुक भौंरे से थे। उनके मुक्ताहार तप के फलस्वरूप कंठ और कुच के सुख को प्राप्त थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
पश्यन्पाणिगृहीत्यौ ते नाभिराजः सनाभिभिः । समं समतुषत् प्रायः लोकधर्मप्रियो जनः ॥७२
महाराज नाभिराज अपने परिवार के लोगों के साथ, दोनों पुत्रवधुओं को देखकर भारी संतुष्ट हुए सो ठीक ही है क्योंकि संसारी जनों को विवाह आदि लौकिक धर्म ही प्रिय होता है ।।72।।
“King Nabhiraj, along with his family, felt great satisfaction upon seeing both daughters-in-law. This is natural, for worldly people find joy in marriage and other social duties.” (72)
श्लोक ( Shlok ) 73
पुरुदेवस्य कल्याणे मरुदेवी तुतोष सा । दारकर्मणि पुत्राणां प्रीत्युत्कर्षो हि योषिताम् ॥७३॥
भगवान् वृषभदेव के विवाहोत्सव में मरुदेवी बहुत ही संतुष्ट हुई थी सो ठीक ही है, पुत्र के विवाहोत्सव में स्त्रियों को अधिक प्रेम होता ही है ।।73।।
“Mother Marudevi was immensely satisfied with the wedding celebration of Lord Rishabhadeva. This is natural, as women have a deep affection for their son’s marriage festivities.” (73)
श्लोक ( Shlok ) 74
“दिष्ट्या स्म वर्द्धते देवी पुत्र कल्याणसंपदा । कलयेन्दोरिवाम्भोधिवेला कल्लोलमालिनी ॥७४॥
जिस प्रकार चंद्रमा की कला से लहरों की माला से भरी हुई समुद्र की बेला बढ़ने लगती है उसी प्रकार भाग्योदय से प्राप्त होने वाली पुत्र की विवाहोत्सवरूप संपदा से मरुदेवी बढ़ने लगी थीं ।।74।।
“Just as the tide of the ocean rises with the phases of the moon, in the same way, Marudevi’s joy and prosperity grew with the auspicious wedding celebration of her son.” (74)
श्लोक ( Shlok ) 75
पुरोर्विवाहकल्याणे प्रीति भेजे जनोऽखिलः । स्वभोगीनतया भोक्तु “र्भोगांल्लोको ऽनुरुध्यते ॥७५
भगवान् के विवाहोत्सव में सभी लोग आनंद को प्राप्त हुए थे सो ठीक ही है । मनुष्य स्वयं ही भोगों की तृष्णा रखते हैं इसलिए वे स्वामी को भोग स्वीकार करते देखकर उन्हीं का अनुसरण करने लगते हैं ।।75।।
“Everyone rejoiced in the wedding celebration of the Lord, which is natural. Humans inherently possess a desire for worldly pleasures, and thus, seeing their master partake in them, they are inclined to follow His example.” (75)
श्लोक ( Shlok ) 76
प्रमोदाय नृलोकस्य न परं स महोत्सवः । स्वर्लोकस्यापि संप्रीतिमतनोदतनीयसीम् ॥७६॥
भगवान् का वह विवाहोत्सव केवल मनुष्यलोक की प्रीति के लिए ही नहीं हुआ था, किंतु उसने स्वर्गलोक में भी भारी प्रीति को विस्तृत किया था ।।76।।
“The wedding celebration of the Lord was not only a source of joy for the human world but also greatly expanded happiness in the heavenly realms.” (76)
श्लोक ( Shlok ) 77
वरोरू चारुजङ्घे ते मृदुपाइपयोरुहे । । सुश्रोणिनाधरेणापि कायेनाजयतां जगत् ॥७७॥
भगवान् वृषभदेव की दोनों महादेवियाँ उत्कृष्ट ऊरुओं, सुंदर जंघाओं और कोमल चरण-कमलों से सहित थीं । यद्यपि उनका सुंदर कटिभाग अधर अर्थात नीचा था (पक्ष में नाभि से नीचे रहने वाला था) तथापि उससे संयुक्त शरीर के द्वारा उन्होंने समस्त संसार को जीत लिया था ।।77।।
“Both of Lord Rishabhadeva’s divine consorts possessed exquisite thighs, beautiful calves, and delicate lotus-like feet. Though their graceful waists were naturally slender and low-set, their enchanting forms captivated and triumphed over the entire world.” ( 77)
श्लोक ( Shlok ) 78
“वरारोहे तनूदयों रोमराजिं तनीयसीम् । अधतां कामगन्धेभमदस्त्रुति “मिवाग्रिमाम् ॥७८॥
वे दोनों ही देवियाँ अत्यंत सुंदर थीं, उनका उदर कृश था और उस कृश उदर पर वे जिस पतली रोम-राजि को धारण कर रही थी वह ऐसी जान पड़ती थी मानो कामदेवरूपी मदोन्मत्त हाथी के मद की अग्रधारा ही हो ।।78।।
“Both divine consorts were exceedingly beautiful, with slender waists. The fine line of hair adorning their delicate midriffs appeared like the front-flowing ichor of the love-god’s intoxicated elephant.” ( 78)
श्लोक ( Shlok ) 79
नाभि कामरसस्यैकक्कूपिकां बिभृतः स्म ते । रोमराजीलता मूलबद्धां पालीमिवाभितः ॥७९॥
वे देवियाँ जिस नाभि को धारण कर रही थी वह ऐसी जान पड़ती थी मानो कामरूपी रस की कूपिका ही हो अथवा रोमराजिरूपी लता के मूल में चारों ओर से बँधी हुई पाल ही हो ।।79।।
“Their navels appeared like a small well filled with the essence of love or like a tightly bound sail at the base of a vine-like line of hair.” ( 79)
श्लोक ( Shlok ) 80
स्तना ब्जकुट्मले दीर्घरोमराज्येकनालके । ते पद्मिन्याविवाधतां नील चूचुकषट्पदे ॥८०॥
जिस प्रकार कमलिनी कमलपुष्प की बोड़ियों को धारण करती है उसी प्रकार वे देवियाँ स्तनरूपी कमल की बोड़ियों को धारण कर रही थीं, कमलिनियों के कमल जिस प्रकार एक नाल से सहित होते हैं उसी प्रकार उनके स्तनरूपी कमल भी रोमराजिरूपी एक नाल से सहित थे और कमलों पर जिस प्रकार भौंरे बैठते हैं उसी प्रकार उनके स्तनरूपी कमलों पर भी चूचुकरूपी भौंरे बैठे हुए थे । इस प्रकार वे दोनों ही देवियाँ ठीक कमलिनियों के समान सुशोभित हो रही थीं ।।80।।
“Just as a lotus plant holds its buds, these divine consorts bore their breast-like lotus buds with grace. Just as lotus flowers are connected by a single stalk, their breast-like lotuses were adorned with a fine line of hair. And just as bees hover over lotuses, their breast-like lotuses were adorned with nipple-like bees. In this way, both divine consorts radiated beauty, resembling blooming lotus plants.” ( 80)
श्लोक ( Shlok ) 81
मुक्ताहारेण तन्नूनं तपस्तेपे स्त्रनामजम् । यतोऽवाप स तत्कण्ठकुचस्पर्शसुखामृतम् ॥८१॥
उनके गले में जो मुक्ताहार अर्थात् मोतियों के हार पड़े हुए थे, मालूम होता है कि उन्होंने अवश्य ही अपने नाम के अनुसार (मुक्त+आहार) आहार-त्याग अर्थात् उपवासरूप तप तपा था और इसीलिए उन मुक्ताहारों ने अपने उक्त तप के फलस्वरूप उन देवियों के कंठ और कुच के स्पर्श से उत्पन्न हुए सुखरूपी अमृत को प्राप्त किया था ।।81।।
“The pearl necklaces adorning their necks seemed to signify that they had indeed lived up to their name (mukta-āhāra—one who renounces food), as if they had undertaken the austerity of fasting. As a result of this symbolic penance, those pearl necklaces attained the nectar of bliss, arising from the touch of the goddesses’ graceful necks and charming bosoms.” ( 81)
श्लोक 82 से 91
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71