आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |
श्लोक 62 से 71 भगवान की महिमा और प्रेरणा
भगवान स्वयं प्रबुद्ध हैं, उन्हें प्रबोधन की जरूरत नहीं। वे सूर्य की तरह स्वयं प्रकाशित हैं। लौकांतिक देवों ने तप की प्रार्थना की और स्वर्ग लौटे।
English translation of Ādi purāṇa parv 17 – Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
स्वयं प्रबुद्धसन्मार्गस्त्वं न बोध्योऽस्मदादिभिः । किन्त्वास्माको नियोगोऽयं मुखरीकुरुतेऽद्य नः ॥६२॥
हे देव, आपने सन्मार्ग का स्वरूप स्वयं जान लिया है इसलिए हमारे-जैसे देवों के द्वारा आप प्रबोध कराने के योग्य नहीं हैं तथापि हम लोगों का यह नियोग ही आज हम लोगों को वाचालित कर रहा है ।।62।।
“O Lord, You have realized the true nature of the righteous path on Your own; thus, You do not need to be enlightened by deities like us. Nevertheless, it is our divine duty that compels us to speak today.”
श्लोक ( Shlok ) 63
जगत्प्रबोधनोद्योगे न स्वमन्यैर्नियुज्यसे । भुवनोद्योतने किन्नु केनाप्युत्थाप्यर्तेऽशुमान् ॥६३॥
हे नाथ, समस्त जगत् को प्रबोध कराने का उद्योग करने के लिए आपको कोई अन्य प्रेरणा नहीं कर सकता सों ठीक ही है क्योंकि समस्त जगत् को प्रकाशित करने के लिए क्या सूर्य को कोई अन्य उकसाता है? अर्थात् नही । भावार्थ―जिस प्रकार सूर्य समस्त जगत् को प्रकाशित करने के लिए स्वयं तत्पर रहता है उसी प्रकार समस्त जगत् को प्रबुद्ध करने के लिए आप स्वयं तत्पर रहते हैं ।।63।।
“O Lord, no one can inspire You to take up the task of enlightening the entire world, and rightly so—for does anyone need to urge the sun to illuminate the universe? Certainly not.
Meaning: Just as the sun is naturally inclined to shine and brighten the world, You are inherently devoted to awakening and enlightening all beings.”
श्लोक ( Shlok ) 64
अथवा बोधितोऽप्यस्मान् बोधयस्यपुनर्भव । बोधितोऽपि यथा दीपो भुवनस्योपकारकः ॥६४॥
अथवा हे जन्म-मरणरहित जिनेंद्र, आप हमारे द्वारा प्रबोधित होकर भी हम लोगों को उसी प्रकार प्रबोधित करेंगे जिस प्रकार जलाया हुआ दीपक संसार का उपकारक होता है अर्थात् सबको प्रकाशित करता है ।।64।।
“Or, O deathless Jinendra, even if You are awakened by us, You will, in turn, enlighten us all—just like a kindled lamp that, once lit, benefits the world by spreading its light to everyone.”
श्लोक ( Shlok ) 65
सद्योजातस्त्वमाद्येऽभूः कल्याणे वामतामतः । प्राप्तो ऽनन्तरकल्याणे धत्से “सम्प्रत्यघोरताम् ॥६५॥
हे भगवन्, आप प्रथम गर्भकल्याणक में सद्योजात अर्थात् शीघ्र ही अवतार लेने वाले कहलाये, द्वितीय―जन्मकल्याणक में वामता अर्थात् सुंदरता को प्राप्त हुए और अब उसके अनंतर तृतीय―तपकल्याणक में अघोरता अर्थात् सौम्यता को धारण कर रहे हैं ।।65।।
“O Lord, during Your first divine event, the Garbha Kalyanak, You were known as Sadyoyata, meaning one who takes form swiftly. During the second event, the Janma Kalyanak, You attained Vamata, signifying supreme beauty. Now, in this third event, the Tapa Kalyanak, You embody Aghorata, representing serenity and gentleness.”
श्लोक ( Shlok ) 66
भुवनस्योपकाराय कुरूद्योगं स्वमीशितः । त्वां नवाब्द मिवासेव्य प्रीयन्तां भव्यचातकाः ॥६६॥
हे स्वामिन्, आप संसार के उपकार के लिए उद्योग कीजिए, ये भव्यजीव रूपी चातक नवीन मेघ के समान आपकी सेवा कर संतुष्ट हों ।।66।।
“O Lord, please strive for the welfare of the world, so that these noble souls, like thirsty Chataka birds, may find satisfaction in serving You, just as they rejoice in the arrival of fresh rain clouds.”
श्लोक ( Shlok ) 67
तव धर्मामृतं स्रष्टुमेष कालः सनातनः । धर्मसृष्टिमतो देव विधातुं धातरर्हसि ॥६७॥
हे देव, अनादि प्रवाह से चला आया यह काल अब आपके धर्मरूपी अमृत उत्पन्न करने के योग्य हुआ है इसलिए हे विधाता, धर्म की सृष्टि कीजिए―अपने सदुपदेश से समीचीन धर्म का प्रचार कीजिए ।।67।।
“O Lord, the eternal flow of time has now become ripe for the manifestation of the nectar of righteousness through You. Therefore, O Divine One, create the realm of Dharma—spread the true path of righteousness through Your noble teachings.”
श्लोक ( Shlok ) 68
जय त्वमीश कर्मारीन् जय मोहमहासुरम् । परीषहभटान् दृप्तान् विजयस्व तपोबलात् ॥६८॥
हे ईश, आप अपने तपोबल से कर्मरूपी शत्रुओं को जीतिए, मोहरूपी महाअसुर को जीतिए और परीषहरूपी अहंकारी योद्धाओं को भी जीतिए ।।68।।
“O Lord, with the power of Your penance, conquer the enemies in the form of karma, vanquish the great demon of delusion, and overcome the proud warriors in the form of hardships.”
श्लोक ( Shlok ) 69
उत्तिष्ठतां भवान् मुक्तौ भुक्तैर्भोगैरलंतराम् । न स्वादान्तरमेषु स्याद् भूयोऽप्यनुभवेऽङ्गिनाम् ॥६९॥
हे देव, अब आप मोक्ष के लिए उठिए―उद्योग कीजिए, अनेक बार भोगे हुए इन भोगों को रहने दीजिए―छोड़िए क्योंकि जीवों के बार-बार भोगने पर भी इन भोगों के स्वाद में कुछ भी अंतर नहीं आता―नूतनता नहीं आती ।।69।।
“O Lord, now rise and strive for liberation. Abandon these worldly pleasures that have been experienced countless times, for no matter how often beings indulge in them, their taste never changes—there is no novelty in them.”
श्लोक ( Shlok ) 70
इति लौकान्तिकैर्देवैः स्तुवानैरुपनाथितः । परिनिष्क्रमणे बुद्धिमधाद् धाता द्रढीयसीम् ॥७०॥
इस प्रकार स्तुति करते हुए लौकांतिक देवों ने तपश्चरण करने के लिए जिनसे प्रार्थना की है ऐसे ब्रह्मा―भगवान् वृषभदेव ने तपश्चरण करने में दीक्षा धारण करने में अपनी दृढ़ बुद्धि लगायी ।।70।।
“Thus, while being praised in this manner by the Laukantika deities, Lord Rishabhadeva—revered as Brahma—firmly resolved to undertake asceticism and initiated Himself into the path of penance.”
श्लोक ( Shlok ) 71
तावतैव नियोगेन कृतार्थास्ते दिवं ययुः । हंसा इव नभोवीथीं द्योतयन्तोऽङ्गदीप्तिभिः ॥७१॥
वे लौकांतिक देव अपने इतने ही नियोग से कृतार्थ होकर हंस की तरह शरीर की कांति से आकाशमार्ग को प्रकाशित करते हुए स्वर्ग को चले गये ।।71।।
“Having fulfilled their divine duty, the Laukantika deities, like radiant swans, illuminated the sky with their brilliance as they ascended back to heaven.”
श्लोक 72 से 81
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 275
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |