आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
श्लोक 242 से 251 वर्ण और कर्म व्यवस्था
भगवान ने क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण बनाए। विवाह और दंड व्यवस्था स्थापित की।
English translation of Ādi purāṇa parv 16 – Shlok 242 to 251
श्लोक ( Shlok ) 242
कृत्वादितः प्रजासर्ग तद्वृत्तिनियमं पुनः । स्वधर्मानतिवृत्यैव नियच्छन्नन्वशात् प्रजाः ॥ २४२॥
भगवान् ने सबसे पहले प्रजा की सृष्टि (विभाग आदि) की, फिर उसकी आजीविका के नियम बनाये और फिर वह अपनी-अपनी मर्यादा का उल्लंघन न कर सकें इस प्रकार के नियम बनाये । इस तरह वे प्रजा का शासन करने लगे ।।242।।
“Bhagwan first organized the divisions of society, then established rules for livelihood, and finally set regulations to ensure that people did not overstep their respective boundaries. In this way, He began to govern and guide His subjects.”
श्लोक ( Shlok ) 243
स्वदोभ्यां यारयन् शस्त्रं क्षत्रियानसृजद् विभुः । क्षतत्राणे नियुक्ता हि क्षत्रियाः शस्त्रपाणयः ॥२४३॥
उस समय भगवान् ने अपनी दोनों भुजाओं में शस्त्र धारण कर क्षत्रियों की सृष्टि की थी, अर्थात् उन्हें शस्त्रविद्या का उपदेश दिया था, सो ठीक ही है, क्योंकि जो हाथों में हथियार लेकर सबल शत्रुओं के प्रहार से निर्बलों की रक्षा करते हैं वे ही क्षत्रिय कहलाते हैं ।।243।।
“At that time, Bhagwan wielded weapons in both hands and created the Kshatriya class, meaning He imparted the knowledge of weaponry to them. This was appropriate because those who bear arms and protect the weak from the attacks of powerful enemies are truly called Kshatriyas.”
श्लोक ( Shlok ) 244
ऊरुभ्यां दर्शयन् यात्रामस्राक्षीद वणिजः प्रभुः । जलस्थलादियात्राभिस्तद् वृतिर्वार्त्तयाँ यतः ॥२४४॥
तदनंतर भगवान् ने अपने ऊरुओं से यात्रा दिखलाकर अर्थात् परदेश जाना सिखलाकर वैश्यों की रचना की सो ठीक ही है, क्योंकि जल स्थल आदि प्रदेशों में यात्रा कर व्यापार करना ही उनकी मुख्य आजीविका है ।।244।।
“After that, Bhagwan demonstrated the act of traveling by moving His thighs, thereby creating the Vaishya class. This was appropriate because their primary livelihood involves traveling across land and water for trade and commerce.”
श्लोक ( Shlok ) 245
न्यग्वृत्तिनियतां शूद्रां पद् भ्यामेवासृजत् सुधीः । वर्णोत्तमेषु शुश्रूषा तदू वृत्तिर्नैकधा स्मृता ॥२४५॥
हमेशा नीच (दैन्य) वृत्ति में तत्पर रहने वाले शूद्रों की रचना बुद्धिमान् वृषभदेव ने पैरों से ही की थी क्योंकि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन उत्तम वर्णों की सेवा-शुश्रूषा आदि करना ही उनकी अनेक प्रकार की आजीविका है ।।245।।
“Bhagwan Rishabhdev, with His divine wisdom, created the Shudra class from His feet, as they are always engaged in humble and service-oriented duties. Their primary means of livelihood is to serve and assist the Brahmins, Kshatriyas, and Vaishyas in various ways.”
श्लोक ( Shlok ) 246
मुखतोऽध्यापयन् शास्त्रं भरतः “स्त्रक्ष्यति द्विजान् । अधीत्यध्यापने दानं प्रतिच्छेज्येति तत्क्रियाः ॥२४६॥
इस प्रकार तीन वर्णों की सृष्टि तो स्वयं भगवान् वृषभदेव ने की थी, उनके बाद भगवान् वृषभदेव के बड़े पुत्र महाराज भरत सुख से शास्त्रों का अध्ययन कराते हुए ब्राह्मणों की रचना करेंगे, स्वयं पढ़ना, दूसरों को पढ़ाना, दान लेना तथा पूजा यज्ञ आदि करना उनके कार्य होंगे ।।246।।
“In this way, Bhagwan Rishabhdev Himself created the three varnas (Kshatriya, Vaishya, and Shudra). After Him, His eldest son, Maharaj Bharat, would establish the Brahmin class, ensuring that they peacefully engage in the study and teaching of scriptures. Their duties would include learning and imparting knowledge, accepting donations, and performing rituals, worship, and yajnas.”
श्लोक ( Shlok ) 247
“शूद्रा शूद्रेण वोढव्या नान्या तां स्वां च नैगमः ।”वहेत् स्वां ते च राजन्यः स्वां द्विजन्मा क्वचिच्च ताः ॥२४७॥
वर्णों की व्यवस्था तब तक सुरक्षित नहीं रह सकती जब तक कि विवाह संबंधी व्यवस्था न की जाये, इसलिए भगवान् वृषभदेव ने विवाह व्यवस्था इस प्रकार बनायी थी कि शूद्र शूद्रकन्या के साथ ही विवाह करे, वह ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की कन्या के साथ विवाह नहीं कर सकता । वैश्य वैश्यकन्या तथा शूद्रकन्या के साथ विवाह करे, क्षत्रिय क्षत्रियकन्या, वैश्यकन्या और शूद्रकन्या के साथ विवाह करे, तथा ब्राह्मण ब्राह्मणकन्या के साथ ही विवाह करे, परंतु कभी किसी देश में वह क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्याओं के साथ भी विवाह कर सकता है ।।247।।
“The varna system cannot remain secure without a structured marriage system. Therefore, Bhagwan Rishabhdev established the following marriage rules:
A Shudra should marry only a Shudra woman and cannot marry a Brahmin, Kshatriya, or Vaishya woman.
A Vaishya may marry a Vaishya woman or a Shudra woman.
A Kshatriya may marry a Kshatriya woman, a Vaishya woman, or a Shudra woman.
A Brahmin should ideally marry only a Brahmin woman, but in certain regions, he may also marry Kshatriya, Vaishya, or Shudra women.”
श्लोक ( Shlok ) 248
स्वामिमां वृत्तिमुत्क्रम्य यस्त्वन्यां वृत्तिमाचरेत् । स पार्थिवैर्निंयन्तव्वयो वर्णसंकीर्णिरन्यथा ॥२४८॥
उस समय भगवान् ने यह भी नियम प्रचलित किया था कि जो कोई अपने वर्ण की निश्चित आजीविका छोड़कर दूसरे वर्ण की आजीविका करेगा वह राजा के द्वारा दंडित किया जायेगा क्योंकि ऐसा न करने से वर्णसंकीर्णता हो जायेगी अर्थात् सब वर्ण एक हो जायेंगे―उनका विभाग नहीं हो सकेगा ।।248।।
“At that time, Bhagwan also established a strict rule that anyone who abandoned their designated livelihood and took up the occupation of another varna would be punished by the king. This was necessary to prevent the mixing of varnas, as without such regulation, all varnas would merge into one, and their distinct roles would cease to exist.”
श्लोक ( Shlok ) 249
कृप्यादिकर्मषट्कं च स्रष्टा प्रागेव सृष्टवान् । कर्मभूमिरियं तस्मात् तदासीत्तदूव्यवस्थया ॥२४९॥
भगवान् आदिनाथ ने विवाह आदि की व्यवस्था करने के पहले ही असि, मषि, कृषि, सेवा, शिल्प और वाणिज्य इन छह कर्मों की व्यवस्था कर दी थी । इसलिए उक्त छह कर्मों की व्यवस्था होने से यह कर्मभूमि कहलाने लगी थी ।।249।।
“Before establishing the marriage system, Bhagwan Adinath had already organized the six primary occupations: Asi (weaponry/service), Masi (writing/scholarship), Krishi (agriculture), Seva (service), Shilpa (craftsmanship), and Vanijya (trade and commerce). Due to the establishment of these six professions, this land came to be known as Karmabhumi (the land of action and duty).”
श्लोक ( Shlok ) 250
स्रष्टेति ताः प्रजाः सृष्ट्वा तद्योगक्षेमसाधनम् । प्रायुङ्क्त युक्तितो दण्डं हामाधि क्कारलक्षणम् ॥२५०॥
इस प्रकार ब्रह्मा-आदिनाथ ने प्रजा का विभाग कर उनके योग (नवीन वस्तु की प्राप्ति) और क्षेम (प्राप्त हुई वस्तु की रक्षा) की व्यवस्था के लिए युक्तिपूर्वक हा, मा और धिक्कार इन तीन दंडों की व्यवस्था की थी ।।250।।
“In this way, Brahma-Adinath divided the people into different roles and, for the proper management of their prosperity (Yoga – acquiring new things) and security (Kshema – protecting acquired things), wisely established a system of three types of punishment:
- Ha (Approval) – Rewarding or encouraging good deeds.
- Ma (Prohibition) – Restricting or forbidding improper actions.
- Dhikkar (Condemnation) – Punishing or reprimanding wrongdoing.”
श्लोक ( Shlok ) 251
दुष्टानां निग्रहः शिष्टप्रतिपालनमित्ययम् । न पुरासीत्क्रमो यस्मात् प्रजाः सर्वा निरागसः ॥२५१॥
दुष्ट पुरुषों का निग्रह करना अर्थात् उन्हें दंड देना और सज्जन पुरुषों का पालन करना यह क्रम कर्मभूमि से पहले अर्थात् भोगभूमि में नहीं था क्योंकि उस समय पुरुष निरपराध होते थे―किसी प्रकार का अपराध नहीं करते थे ।।251।।
“In Bhogabhumi (the land of enjoyment), there was no need for punishment or law enforcement because people were inherently innocent and committed no crimes. However, in Karmabhumi (the land of action and duty), it became necessary to punish the wicked and protect the virtuous—a system that did not exist before.”
श्लोक 252 से 261
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 224
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 208 | श्लोक 209 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241