आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |
श्लोक 172 से 181 कौमार अवस्था
रत्न धूलि में क्रीड़ा, चंद्रमा सा शोभित। कौमार में सुंदर शरीर, गुण वृद्धि। मनोहर बोली, अवलोकन, मुस्कान से प्रीति। मति-श्रुत-अवधि ज्ञान से विद्या-लोक स्थिति जानी। शिक्षा बिना कुशल, सरस्वती स्वामी, लोक गुरु।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
रत्नपांसुषु चिक्रीड स समं सुरदारकैः । पित्रोर्मनसि संतोषमान्वँल्ललिताकृति৷৷१७२
सुंदर आकार को धारण करने वाले वे भगवान् माता-पिता के मन में संतोष को बढ़ाते हुए देवबालकों के साथ-साथ रत्नों की धूलि में क्रीड़ा करते थे ।।172।।
“The Lord, possessing a beautiful form, increased the joy of His parents’ hearts as He played alongside celestial children in the dust of precious gems.”
श्लोक ( Shlok ) 173
प्रजानां दधदानन्दं गुणैराह्लादिभिर्निजैः। कीर्तिज्योत्स्नापरीताङ्गः स बभौ बालचन्द्रमाः ॥१७३॥
वे बाल भगवान् चंद्रमा के समान शोभायमान होते थे, क्योंकि जिस प्रकार चंद्रमा अपने आह्लादकारी गुणों से प्रजा को आनंद पहुंचाता है उसी प्रकार वे भी अपने आह्लादकारी गुणों से प्रजा को आनंद पहुँचा रहे थे और चंद्रमा का शरीर जिस प्रकार चाँदनी से व्याप्त रहता है उसी प्रकार उनका शरीर भी कीर्तिरूपी चाँदनी से व्याप्त था ।।173।।
“The child Lord shone like the moon, for just as the moon delights the world with its soothing qualities, He too brought joy to the people with His blissful virtues. And just as the moon’s form is enveloped in its radiant moonlight, His divine body was adorned with the luminous glow of His glory.”
श्लोक ( Shlok ) 174
बालावस्थामतोतस्य तस्याभूद् रुचिरं वपुः । ‘कौमारं देवनाथानामर्चितस्य’ महौजसः ॥१७४॥
जब भगवान् की बाल्यावस्था व्यतीत हुई तब इंद्रों के द्वारा पूज्य और महाप्रतापी भगवान् का कौमार अवस्था का शरीर बहुत ही सुंदर हो गया ।।174।।
“When the Lord’s childhood passed, His youthful body, revered by the Indras and radiating great splendor, became exceedingly beautiful.”
श्लोक ( Shlok ) 175
वपुषो वृद्धिमन्वस्य गुणा ववृधिरे विभोः । शशाङ्कमण्डलस्येव कान्तिदीप्त्यादयोऽन्वहम् ॥ १७५॥
जिस प्रकार चंद्रमंडल की वृद्धि के साथ-साथ ही उसके कांति, दीप्ति आदि अनेक गुण प्रतिदिन बढ़ते जाते हैं उसी प्रकार भगवान् के शरीर की वृद्धि के साथ-साथ ही अनेक गुण प्रतिदिन बढ़ते जाते थे ।।175।।
“Just as the brilliance, radiance, and many other qualities of the moon increase daily with its waxing phase, similarly, as the Lord’s body grew, His numerous virtues also flourished day by day.”
श्लोक ( Shlok ) 176
वपुः कान्तं प्रिया वाणी मधुरं तस्य वीक्षितम् । जगतः प्रीतिमातेनुः सस्मितं च प्रजल्पितम् । १७६।
उस समय उनका मनोहर शरीर, प्यारी बोली, मनोहर अवलोकन और मुसकाते हुए बातचीत करना यह सब संसार की प्रीति को विस्तृत कर रहे थे ।।176।।
“At that time, His enchanting form, sweet speech, captivating gaze, and smiling conversations all served to expand the world’s love and affection.”
श्लोक ( Shlok ) 177
कलाश्च सकलास्तस्य वृद्धौ वृद्धिमुपाययुः । इन्दोरिव जगच्चेतो नन्दनस्य जगत्पतेः ॥१७७॥
जिस प्रकार जगत् के मन को हर्षित करने वाले चंद्रमा की वृद्धि होने पर उसकी समस्त कलाएँ बढ़ने लगती हैं उसी प्रकार समस्त जीवों के हृदय को आनंद देने वाले जगत् पति भगवान् के शरीर की वृद्धि होने पर उनकी समस्त कलाएँ बढ़ने लगी थी ।।177।।
“Just as all the phases of the moon begin to expand as it waxes, delighting the world, similarly, as the body of the Lord, the master of the universe, grew, all His divine qualities and arts flourished, bringing joy to all beings.”
श्लोक ( Shlok ) 178
मतिश्रुवे सहोत्पन्ने ज्ञानं चावधिसंज्ञकम् । ततोऽबोधि स निश्शेषा विद्या लोकस्थितीरपि ॥१७८॥
मति, श्रुत और अवधि ये तीनों ही ज्ञान भगवान के साथ-साथ ही उत्पन्न हुए थे इसलिए उन्होंने समस्त विद्याओं और लोक की स्थिति को अच्छी तरह जान लिया था ।।178।।
“Intellect (Mati), scriptural knowledge (Shruta), and clairvoyance (Avadhi) were all innate to the Lord from birth; therefore, He possessed complete knowledge of all sciences and the nature of the world.”
श्लोक ( Shlok ) 179
विश्वविद्येश्वरस्यास्य विद्याः परिणताः स्वयम् । ननु जन्मान्तराभ्यासः ‘स्मृति पुष्णाति पुष्कलाम् ।१७९।
वे भगवान् समस्त विद्याओं के ईश्वर थे इसलिए उन्हें समस्त विद्याएं अपने-आप ही प्राप्त हो गयी थीं सो ठीक ही है क्योंकि जंमांतर का अभ्यास स्मरण-शक्ति को अत्यंत पुष्ट रखता है ।।179।।
The Lord was the master of all sciences; thus, He naturally attained complete knowledge. This is indeed fitting, for the practice of past births greatly strengthens the power of memory.”
श्लोक ( Shlok ) 180
कलासु कौशलं श्लाघ्यं विश्वविद्यासु पाटवम् । क्रियासु कर्मठत्वं च स भेजे शिक्षया बिना ॥१८०॥
वे भगवान् शिक्षा के बिना ही समस्त कलाओं में प्रशंसनीय कुशलता को, समस्त विद्याओं में प्रशंसनीय चतुराई को और समस्त क्रियाओं में प्रशंसनीय कर्मठता (कार्य करने की सामर्थ्य) को प्राप्त हो गये थे ।।180।।
“The Lord, without any formal education, attained remarkable expertise in all arts, exceptional wisdom in all sciences, and admirable diligence in all actions.”
श्लोक ( Shlok ) 181
“वाङ्मयं सकलं तस्य प्रत्यक्षं वाक्प्रभोरभूत् । “येन विश्वस्य लोकस्य वाचस्पत्यादभुद् गुरुः ।।१८१॥
वे भगवान् सरस्वती के एकमात्र स्वामी थे इसलिए उन्हें समस्त वाङ्मय (शास्त्र) प्रत्यक्ष हो गये थे और इसलिए वे समस्त लोक के गुरु हो गये थे ।।181।।
“The Lord was the sole master of Goddess Saraswati; hence, all scriptures became directly known to Him, making Him the supreme teacher of the entire world.”
श्लोक 182 से 191
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |