आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-इसलिए समझो कि कर्मों से बँधा हुआ प्राणी कर्मों का संचय किया करता है। जब ऐसा है तब –
परोपकृतिमुत्सृज्य, स्वोपकारपरो भव उपकुर्वन्परस्याज्ञो, दृश्यमानस्य लोकवत् ॥32॥
अन्वयार्थ – (परोपकृतिं) परोपकार को (उत्सृज्य) छोड़कर (स्वोपकारपरः) अपने उपकार करने में तत्पर (भव) हो, (दृश्यमानस्य) दिखाई देने वाले (लोकवत्) इस जगत् की तरह (अज्ञः) अज्ञानी जीव (परस्य) पर का (उपकुर्वन्) उपकार करता हुआ पाया जाता है।
पद्यानुवाद
पर को उपकारों का अब ना, पात्र बनाओ भूल कभी,
निज पर ही उपकार करो अब, पात्र रहा अनुकूल यही।
करते दिखते सदा परस्पर, लौकिक जन उपकार यथा,
करते दिखते अज्ञ निरन्तर, पर पर ही उपकार तथा ॥३२॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 32
विवेचना
कल आपके समक्ष यह विषय रखा गया था कि कर्म, कर्म का हित चाहता है और जीव, जीव का हित चाहता है। साथ में यह भी कहा गया था कि “अपनी अपनी उपकारक वस्तु को कौन नहीं चाहता अर्थात् सभी चाहते हैं। उसी बात को स्पष्ट करते हुए इस कारिका में आत्महित करने की प्रेरणा दी जा रही है। आचार्य कहते हैं कि आज तक संसारी प्राणी, अविद्या, अज्ञान और मोह के वशीभूत होकर शरीरादिक परद्रव्य को अपना मानकर उस पर खूब उपकार करता आया है। शरीरादिक के पोषण व संरक्षण करने में अपना समय देना ही शरीर का उपकार है। इसी को पात्र बनाकर आज तक उपकार किया है। अब गुरु उपदेश देते हैं कि इस अविद्या, अज्ञता को छोड़ो और निज को पात्र बनाकर निजात्मा का उपकार करने का प्रयास करो।
दुनिया के लोग जब तक मोहवश दूसरे को दूसरे रूप में नहीं जानते, बल्कि मोहवश पर पदार्थों को अपना मानते हैं तभी तक उन पर उपकार करते हैं। ज्यों ही ज्ञानवश अपने को अपना और दूसरे को दूसरा जानने लग जाते हैं, त्यों ही दूसरों का उपकार छोड़कर अपने आत्म-तत्त्व का उपकार करने में तत्पर हो जाते हैं। यह ज्ञानी की पहचान है, अतः अज्ञता छोड़ो और विज्ञता को स्वीकार करो। जो हमेशा दूसरे का अर्थात् शरीरादिक पर पदार्थों का उपकार करता रहता है वह उसकी अज्ञता है।
प्रश्न उठता है कि विज्ञता क्या है? इसके समाधान में यही कहा जा सकता है कि भेदविज्ञान के बल पर स्व अर्थात् आत्मा को आत्म स्वरूप से और शरीरादिक पुद्गल को पुद्गल स्वरूप में जानना ही विज्ञता है। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि वास्तविक वस्तु स्थिति को जानना ही विज्ञता है और वास्तविकता को नहीं समझना ही अज्ञता है।
आचार्यों ने भी कल्याणकारी यही देशना देते हुए भव्यों को सम्बोधित किया है कि-
आदहिदं कादव्वं जदि सक्कदि परहिदं च कादव्वं । आदहिद परहिदादो आदहिदं सुटठु कादव्वं ॥
(उद्धृत भगवती आराधना टीका पृ०२५८)
तात्पर्य यह है कि पहले आत्महित करना चाहिए, यदि शक्ति हो, सामर्थ्य हो तो परहित भी करना चाहिए, लेकिन आत्महित और परहित इन दोनों में से आत्महित को अच्छी तरह कर लेना चाहिए।
बुद्धिमान् पुरुष मुख्य रूप से अपना हित पहले करते हैं क्योंकि वे समझते हैं कि आत्महित किए बिना शक्ति होने पर भी पर हित नहीं किया जा सकता। लेकिन अज्ञानी अपना हित छोड़कर शक्ति, सामर्थ्य नहीं होने पर भी दूसरे के हित में हमेशा तत्पर रहता है। सभी संसारी प्राणी, सामाजिक प्राणी समाज में, परिवार में रहते हुए इस बात से अनुभूत भी हो चुके हैं कि दुनिया में सबका कितना भी उपकार करो फिर भी कोई कृतज्ञता ज्ञापित नहीं करते। उपकार को उपकार स्वरूप स्वीकार नहीं करते। समय आने पर सब धोखा देते हैं। उपकारी को भी अपकारी सिद्ध करने में लगे रहते हैं फिर भी इस अज्ञ प्राणी को यह बात अपनी ही अविद्या और मोह के कारण समझ में नहीं आती। पुराणों में भी अनेक उदाहरण पढ़ने को मिलते हैं। वर्तमान में भी दिन-प्रतिदिन अपने ही लोगों के बीच, जो वास्तव में अपने नहीं हैं, लेकिन मोहवश अपना मान लिया है जैसे कि माता- पिता अपने बेटों का, अपनी सन्तान कब अपने ही माता-पिता को अपकारी कहकर उनसे मुख मोड़ ले, इसका कोई भरोसा नहीं। वृद्धावस्था में भी उनसे विमुख होकर रहते हैं या उनको विमुख कर देते हैं। इस संसार की बड़ी विचित्र स्थिति है। इस विचित्रता को जो समझ लेते हैं और आत्महित में संलग्न हो जाते हैं वास्तव में वे ही धन्य हैं।
अतः तत्त्व के वास्तविक स्वरूप को समझने का प्रयास करो, क्योंकि काल थोड़ा है हम सभी दुर्बुद्धि वाले हैं इसलिए ऐसा कुछ थोड़ा-सा सीख लो जिससे जन्म-जरा-मरण की संतति समाप्त हो जाये।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 32
इष्टोपदेश गाथा 32- द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – ( परोपकृतिं) पर के उपकार करने को (उत्सृज्य) त्याग करके (स्वोपकार परः) अपने उपकार करने में तत्पर (भव) हो जा (दृश्यमानस्य) दिखाई देने वाले (लोकवत्) इस जगत् की तरह (अज्ञः) अज्ञानी जीव (परस्य) पर का (उपकुर्वन्) उपकार करता हुआ पाया जाता है।
भावार्थ – बुद्धिमान् पुरुष मुख्य रूप से अपना हित करता है, अज्ञानी अपना उपकार करना छोड़कर अन्य का उपकार करने में लगा रहता है, संसारी जीव जड़ शरीर के तथा पुत्र, स्त्री, मित्र आदि अन्य जड़ चेतन पदार्थों के पालन पोषण, सेवा चाकरी में अपना सारा जीवन बिता देता है, वह अपनी आत्मा का कुछ भी भला नहीं करता। इसी कारण वह जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा हुआ दुःख भोगता रहता है। सारे संसारी जीव इसी तरह अपना अपकार (अकल्याण, अहित) कर रहे हैं, इसलिए आचार्य उपदेश देते हैं कि भाई, शरीर, कुटुम्ब, परिवार आदि अन्य पदार्थों की सेवा-उपकार करना छोड़ दे, तू अपना उपकार (कल्याण) कर यानि शरीर को हष्ट-पुष्ट बनाना छोड़ दे, अपनी आत्मा को हष्ट-पुष्ट बनाने के लिए सम्यक्त्व धारण कर, व्रत, तप, त्याग, संयम का आचरण कर, जिससे तेरा दुःखमय संसार भ्रमण सदा के लिए छूट जावे।
उत्थानिका – यहाँ पर शिष्य कहता है कि किस उपाय से स्व और पर में विशेषता (भेद) जानी जाती है और उसके जानने वाले का क्या होगा ? किस फल की प्राप्ति होगी? आचार्य कहते हैं – गाथा 33
स्वाध्याय गाथा सं 31 to 33
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