आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32
श्लोक 33 से 41 इंद्राणी का हर्ष
इंद्राणी ने स्पर्श से तीन लोक ऐश्वर्य माना। बार-बार मुख देखा, सूँघा, नेत्र प्रफुल्लित। सूर्य सा जिनबालक लेकर शोभित। दिक्कुमारियाँ अष्ट मंगलद्रव्य लिए चलीं। भगवान की दीप्ति से दीपक मंद। इंद्राणी ने इंद्र को सौंपा। इंद्र ने स्तुति की: तीन लोक ज्योति, गुरु, स्वामी।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 33 to 41
श्लोक ( Shlok ) 33
तद्गात्रस्पर्शमासाद्य सुदुर्लभमसौ तदा । मेने त्रिभुवनैश्वर्य स्वसात्कृतभिवाखिलम् ॥३३॥
उस समय अत्यंत दुर्लभ भगवान् के शरीर का स्पर्श पाकर इंद्राणी ने ऐसा माना था मानो मैंने तीनों लोकों का समस्त ऐश्वर्य ही अपने अधीन कर लिया हो ।।33।।
“At that moment, upon touching the extremely rare body of the Lord, Indrani felt as if she had gained control over all the wealth of the three worlds.”
श्लोक ( Shlok ) 34
मुहुस्तन्मुखमालोक्य स्पृष्ट्वाघ्राय च तद्वपुः । परां प्रीतिमसौ भेजे हर्षविस्फारितेक्षणा ॥३४॥
वह इंद्राणी बार-बार उनका मुख देखती थी, बार-बार उनके शरीर का स्पर्श करती थी और बार-बार उनके शरीर को सूँघती थी जिससे उसके नेत्र हर्ष से प्रफुल्लित हो गये थे और वह उत्कृष्ट प्रीति को प्राप्त हुई थी ।।34।।
“Indrani repeatedly gazed at His face, touched His body, and inhaled His fragrance, causing her eyes to bloom with joy and filling her with supreme affection.”
श्लोक ( Shlok ) 35
ततः कुमारमादाय व्रजन्ती सा बभौ भृशम् । द्योरिवार्कमभिव्याप्तनभसं भासुरांशुभिः ॥३५॥
तदनंतर जिनबालक को लेकर जाती हुई वह इंद्राणी ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो अपनी दैदीप्यमान किरणों से आकाश को व्याप्त करनेवाले सूर्य को लेकर जाता हुआ आकाश ही सुशोभित हो रहा है ।।35।।
“Afterward, as Indrani carried the Jina child, she appeared so radiant, as if the sky itself, filled with the blazing rays of the sun, was glowing while carrying the sun across the heavens.”
श्लोक ( Shlok ) 36
तदा मङ्गलधारिण्यो दिक्कुमार्यः पुरो ययुः । त्रिजगन्मङ्गलस्यास्य समृद्धय इवोच्छिखाः ॥३६॥
उस समय तीनों लोकों में मंगल करने वाले भगवान् के आगे-आगे अष्ट मंगलद्रव्य धारण करने वाली दिक्कुमारी देवियाँ चल रही थीं और ऐसी जान पड़ती थीं मानो इकट्ठी हुई भगवान् की उत्तम ऋद्धियाँ ही हों ।।36।।
“At that time, the Dikkumari goddesses, who bear the eight auspicious substances, were walking ahead of the Lord, bringing welfare to the three worlds. It seemed as though the gathered supreme powers of the Lord were manifesting before them.”
श्लोक ( Shlok ) 37
छत्रं ध्वजं सकलशं चामरं सुप्रतिष्ठकम् । भृङ्गारं दर्पणं तालमित्याहुर्मङ्गलाष्टकम् ॥३७।।
छत्र, ध्वजा, कलश, चमर, सुप्रतिष्ठक (मोंदरा-ठोना), झारी, दर्पण और ताड़का पंखा ये आठ मंगलद्रव्य कहलाते हैं ।।37।।
“The eight auspicious substances are called the umbrella, flag, pitcher, chamara (fan made of tail hairs), supratishthaka (ritual instrument), jhadi (broom), mirror, and the palm-leaf fan (Tārkā).”
श्लोक ( Shlok ) 38
स तदा मङ्गलानां च मङ्गलत्वं परं वहन् । स्वदीप्त्या दीपिकालोकान् अरुण तरुणांशुमान् ॥३८॥
उस समय मंगलों में भी मंगलपने को प्राप्त कराने वाले और तरुण सूर्य के समान शोभायमान भगवान् अपनी दीप्ति से दीपकों के प्रकाश को रोक रहे थे । भावार्थ―-भगवान् के शरीर की दीप्ति के सामने दीपकों का प्रकाश नहीं फैल रहा था ।।38।।
“At that time, the Lord, radiant like the young sun, was preventing the light of the lamps from spreading with His own brilliance. The meaning is that the light of the lamps could not spread in the presence of the divine radiance of the Lord’s body.”
श्लोक ( Shlok ) 39
ततः करतले देबी देवराजस्य तं न्यधात् । बालार्कमौदये सानौ प्राचीव प्रस्फुरन्मणो ॥३९॥
तत्पश्चात् जिस प्रकार पूर्व दिशा प्रकाशमान मणियों से सुशोभित उदयाचल के शिखर पर बाल सूर्य को विराजमान कर देती हैं उसी प्रकार इंद्राणी ने जिनबालक को इंद्र की हथेली पर विराजमान कर दिया ।।39।।
“Afterward, just as the eastern horizon adorns the peak of the rising mountain with radiant jewels and places the young sun there, in the same way, Indrani placed the Jina child on Indra’s palm.”
श्लोक ( Shlok ) 40
गोर्वाणेन्द्रस्तमिन्द्राण्याः करादादाय सादरम् । व्यलोकयत् स तद्रूपं संप्रीतिस्फारितेक्षणः ॥४०॥
इंद्र आदरसहित इंद्राणी के हाथ से भगवान् को लेकर हर्ष से नेत्रों को प्रफुल्लित करता हुआ उनका सुंदर रूप देखने लगा ।।40।।
“Indra, with great reverence, took the Lord from Indrani’s hands and, filled with joy, began to gaze at His beautiful form, which illuminated his eyes with delight.”
श्लोक ( Shlok ) 41
स्वं देव जगतां ज्योतिस्त्वं देव जगतां गुरुः । त्वं देव जगतां धाता त्वं देव जगतां पतिः ॥४१॥
तथा नीचे लिखे अनुसार उनकी स्तुति करने लगा―हे देव, आप तीनों जगत् की ज्योति हैं; हे देव, आप तीनों जगत् के गुरु हैं; हे देव, आप तीनों जगत् के विधाता हैं और हे देव, आप तीनों जगत् के स्वामी हैं ।।41।।
“And he began to praise Him as follows: ‘O Lord, You are the light of the three worlds; O Lord, You are the teacher of the three worlds; O Lord, You are the creator of the three worlds; and O Lord, You are the master of the three worlds.'”
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32