आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |
श्लोक 112 से 121 मरुदेवी के सोलह स्वप्न (भाग 2)
9) दो मछलियाँ (नेत्र समान), 10) तालाब (सुवर्ण जल), 11) समुद्र (अट्टहास करता), 12) सुवर्ण सिंहासन (मेरु शिखर), 13) स्वर्ग विमान (प्रसूतिगृह), 14) नागेंद्र भवन (स्पर्धायुक्त), 15) रत्न राशि (पृथ्वी खजाना), 16) निर्धूम अग्नि (प्रताप)। अंत में पीला बैल उसके मुख में प्रवेश करता दिखा। वह बाजों से जगी।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112
झषौ सरसि संफुल्ल कुमुदोत्पलपङ्कजे।सापश्यन्नयनायामं दर्शयन्वाविवात्मनः ॥॥११२।।
नौवे स्वप्न में फूले हुए कुमुद और कमलों से शोभायमान तालाब में क्रीड़ा करती हुई दो मछलियाँ देखी । वे मछलियाँ ऐसी मालूम होती थीं मानो अपने (मरुदेवी के) नेत्रों की लंबाई ही दिखला रही हों ।।112।।
In the ninth dream, I saw two fish playing in a pond adorned with fully bloomed water lilies and lotuses. The fish appeared as if they were reflecting the very length of (Marudevi’s) eyes. ||112||
श्लोक ( Shlok ) 113
तरत्सरोज किञ्जल्क पिञ्जरोदकमैक्षत । सुवर्णद्रवसंपूर्णमिव दिव्यं सरोवरम् ।।११३।।
दसवें स्वप्न में उसने एक सुंदर तालाब देखा । उस तालाब का पानी तैरते हुए कमलों की केशर से पीला-पीला हो रहा था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो पिघले हुए सुवर्ण से ही भरा हो ।।113।।
In the tenth dream, she saw a beautiful pond. The water of the pond had turned yellow due to the pollen of floating lotuses, making it appear as if it were filled with molten gold. ||113||
श्लोक ( Shlok ) 114
क्षुभ्यन्तमब्धिमुद्वेलं चलत्कल्लोलकाहलम् । सादर्शच्छीकरै र्मोक्तुमट्टहासमिवोद्यतम् ॥११४॥
ग्यारहवें स्वप्न में उसने क्षुभित हो बेला (तट) को उल्लंघन करता हुआ समुद्र देखा । उस समय उस समुद्र में उठती हुई लहरों से कुछ-कुछ गंभीर शब्द हो रहा था और जल के छोटे-छोटे कण बढ़कर उसके चारों ओर पड़ रहे थे जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वह अट्टाहास ही कर रहा हो ।।114।।
In the eleventh dream, she saw the ocean, disturbed and overflowing its shores. At that time, the rising waves produced a deep, resonant sound, and tiny droplets of water scattered all around, making it seem as if the ocean itself was laughing loudly. ||114||
श्लोक ( Shlok ) 115
सेंहमासनमुतुङ्ग स्फुरन्मणिहिरण्मयम् । सापश्यन्मेरुश्रङ्गस्य वैदग्धीं दधदूर्जिताम् ।।११५।।
बारहवें स्वप्न में उसने एक ऊंचा सिंहासन देखा । वह सिंहासन सुवर्ण का बना हुआ था और उसमें अनेक प्रकार के चमकीले मणि लगे हुए थे जिससे ऐसा मालूम होता था मानो वह मेरु पर्वत के शिखर की उत्कृष्ट शोभा ही धारण कर रहा हो ।।115।।
In the twelfth dream, she saw a high throne. It was made of gold and adorned with various brilliant gems, making it appear as if it carried the supreme splendor of Mount Meru’s peak. ||115||
श्लोक ( Shlok ) 116
नाकालयं व्यलोकिष्ट परार्ध्वमणिभासुरम् । स्वसुनोः प्रसवागारमिव देबैरुपाहृतम् ।।११६।।
तेरहवें स्वप्न में उसने एक स्वर्ग का विमान देखा । वह विमान बहुमूल्य श्रेष्ठ रत्नों से दैदीप्यमान था और ऐसा मालूम होता था मानो देवों के द्वारा उपहार में दिया हुआ, अपने पुत्र का प्रसूतिगृह (उत्पत्तिस्थान) ही हो ।।116।।
In the thirteenth dream, she saw a celestial chariot. It was radiant with precious and exquisite gems, appearing as if it were a divine gift and the very birthplace of her son. ||116||
श्लोक ( Shlok ) 117
फणीन्द्रभवनं भूमिमुभ्दिद्योद्गतमैक्षत । प्राग्दृष्टस्वर्विमानेन स्पर्द्धा कर्तुमिवोद्यतम् ।।११७।।
चौदहवें स्वप्न में उसने पृथिवी को भेदन कर ऊपर आया हुआ नागेंद्र का भवन देखा । वह भवन ऐसा मालूम होता था मानो पहले दिखे हुए स्वर्ग के विमान के साथ स्पर्धा करने के लिए ही उद्यत हुआ हो ।।117।।
In the fourteenth dream, she saw the dwelling of the serpent king emerging from the earth. It appeared as if it had risen to compete with the celestial chariot seen earlier. ||117||
श्लोक ( Shlok ) 118
रत्नानां राशिमुत्सर्पदंशुपल्लविताम्बरम् । सा निदध्यो धरादेव्या निधानमिव दर्शितम् ॥११८
। पंद्रहवें स्वप्न में उसने अपनी उठती हुई किरणों से आकाश को पल्लवित करने वाली रत्नों की राशि देखी । उस रत्नों की राशि को मरुदेवी ने ऐसा समझा था मानो पृथ्वी देवी ने उसे अपना खजाना ही दिखाया हो ।।118।।
In the fifteenth dream, she saw a heap of radiant jewels, whose rising brilliance seemed to illuminate the sky like blossoming rays. Marudevi perceived this treasure as if Mother Earth herself had revealed her hidden wealth. ||118||
श्लोक ( Shlok ) 119
ज्वलभ्दा सुरनिर्धुमवपुषं विषमार्चिषम् । प्रतापमिव पुत्रस्य मूर्तिरूपं न्यचायत ॥ ११९॥
और सोलहवें स्वप्न में उसने जलती हुई प्रकाशमान तथा धूमरहित अग्नि देखी । वह अग्नि ऐसी मालूम होती थी मानो होने वाले पुत्र का मूर्तिधारी प्रताप ही हो ।।119।।
And in the sixteenth dream, she saw a blazing, radiant fire without smoke. That fire appeared as if it were the embodied glory of her soon-to-be-born son. ||119||
श्लोक ( Shlok ) 120
न्यशामयच्च तुङ्गाङ्गं पुङ्गवं रुक्मसच्छविम् । प्रविशन्त स्ववक्त्राब्जं स्वप्नान्ते पीनकन्धरम् ॥१२०
इस प्रकार सोलह स्वप्न देखने के बाद उसने देखा कि सुवर्ण के समान पीली कांति का धारक और ऊँचे कंधों वाला एक ऊँचा बैल हमारे मुख-कमल में प्रवेश कर रहा है ।।120।।
After seeing these sixteen dreams, she saw a tall bull with a golden-yellow radiance and broad shoulders entering her lotus-like mouth. ||120||
श्लोक ( Shlok ) 121
ततः ‘प्रबोधिकैस्तूयैर्ध्वनद्भिः प्रत्यबुद्ध सा । बन्दिनां मङ्गलोद्रीतीः शृण्वतीति सुमङ्गलाः ॥१२१
तदनंतर वह बजते हुए बाजों की ध्वनि से जग गयी और बंदीजनों के नीचे लिखे हुए मंगलकारक मंगल-गीत सुनने लगी ।।121।।
After that, she woke up to the sound of playing musical instruments and began listening to the auspicious songs sung by the court bards. ||121||
श्लोक 122 से 131
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |