आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131
श्लोक 132 से 142 अहमिंद्र की शोभा और पूजा
अहमिंद्र का स्फटिक समान शरीर, मुकुट, आभूषण, मालाएँ, वस्त्र इसे कल्पवृक्ष समान बनाते थे। वह वैक्रियक शरीर से जिन प्रतिमाओं की पूजा करता, तत्त्वचर्चा और सरोवर किनारे विहार करता था। परक्षेत्र में उनकी क्रीड़ा नहीं होती।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 132 to 142
श्लोक ( Shlok ) 132
शुचिस्फटिकनिर्भासिनिर्मलोदारविग्रहः । स बभौ प्रज्वलन्मौलिः पुण्यराशिरिवोच्छिखः ॥१३२॥
जिसका निर्मल और उत्कृष्ट शरीर शुद्ध स्फटिक के समान अत्यंत शोभायमान था तथा जिसके मस्तक पर दैदीप्यमान मुकुट शोभायमान हो रहा था ऐसा वह अहमिंद्र, जिसकी शिखा ऊँची उठी हुई है ऐसी पुण्य की राशि के समान सुशोभित होता था ।।132।।
“His pure and exquisite body shone brilliantly like flawless crystal, and his resplendent crown gleamed upon his head. That Ahmindra, with his elevated crest, radiated magnificence like a towering embodiment of accumulated merit.”
श्लोक ( Shlok ) 133
‘तिरोटाङ्गदकेयूर कुण्डलादिपरिष्कृतः । स्रग्वी सदंशुकः श्रीमान् सोऽधात् कल्पद्रुमश्रियम् ॥१३३॥
वह अहमिंद्र मुकुट, अनंत, बाजूबंद और कुंडल आदि आभूषणों से सुशोभित था, सुंदर मालाएं धारण कर रहा था, उत्तम-उत्तम वस्त्रों से युक्त था और स्वयं शोभा से संपन्न था इसलिए अनेक आभूषण माला और वस्त्र आदि को धारण करने वाले किसी कल्पवृक्ष के समान जान पड़ता था ।।133।।
“That Ahmindra, adorned with a radiant crown, armlets, earrings, and countless other ornaments, wore beautiful garlands and was draped in the finest garments. Possessing an innate splendor, he appeared like a divine wish-fulfilling tree (Kalpavriksha) laden with countless jewels, garlands, and celestial fabrics.”
श्लोक ( Shlok ) 134
अणिमादिगुणैः श्लाघ्यां दधट्वैक्रियिकीं तनुम् । स्वक्षेत्रे विजहारासौ जिनेन्द्रार्चाः समर्चयन् ॥ १३४॥
अणिमा, महिमा आदि गुणों से प्रशंसनीय वैक्रियक शरीर को धारण करने वाला वह अहमिंद्र जिनेंद्रदेव की अकृत्रिम प्रतिमाओं की पूजा करता हुआ अपने ही क्षेत्र में विहार करता था ।।134।।
“That Ahmindra, possessing a divine, spontaneous body (Vaikriyika Sharira) endowed with admirable qualities like Anima and Mahima, roamed within his own domain while worshipping the natural idols of Lord Jina.”
श्लोक ( Shlok ) 135
सङ्कल्पमात्रनिर्वृत्ते र्दिव्यैर्गन्धाक्षतादिभिः । पुण्यानुबन्धिनीं पूजां स जैनीं विधिवद् व्यधात् ॥१३५॥
और इच्छामात्र से प्राप्त हुए मनोहर गंध, अक्षत आदि के द्वारा विधिपूर्वक पुण्य का बंध करने वाली श्री जिनदेव की पूजा करता था ।।135।।
“And with enchanting fragrances, unbroken rice grains, and other offerings obtained merely by his will, he devoutly worshipped the revered Lord Jina in accordance with proper rituals, thus accumulating immense merit.”
श्लोक ( Shlok ) 136
तत्रस्थ एव चाशेषभुवनोदरवर्त्तिनीः । आनर्चार्चा जिनेन्द्राणां सोऽग्रणीः पुण्यकर्मणाम् ॥१३६॥
वह अहमिंद्र पुण्यात्मा जीवों में सबसे प्रधान था इसलिए उसी सर्वार्थसिद्धि विमान में स्थित रहकर ही समस्त लोक के मध्य में वर्तमान जिनप्रतिमाओं की पूजा करता था ।।136।।
“That Ahmindra, being the foremost among meritorious souls, resided in the very same Sarvārthasiddhi celestial abode and worshipped the Jina idols present at the center of the entire universe.”
श्लोक ( Shlok ) 137
जिनार्चास्तुतिवादेषु वाग्वृत्तिं तद्गुणस्मृतौ । स्वं मनस्तन्नतो कार्य पुण्यधीः सन्न्ययोजयत् ॥१३७।।
उस पुण्यात्मा अहमिंद्र ने अपने वचनों की प्रवृत्ति जिनप्रतिमाओं के स्तवन करने में लगायी थी, अपना मन उनके गुण-चिंतवन करने में लगाया था और अपना शरीर उन्हें नमस्कार करने में लगाया था ।।137।।
“That virtuous Ahmindra engaged his speech in praising the Jina idols, focused his mind on contemplating their virtues, and devoted his body to bowing before them in reverence.”
श्लोक ( Shlok ) 138
धर्मगोष्ठीष्वनाहूतमिलितैः स्वसमृद्धिभिः । संभाषणादरोऽस्यासीदहमिन्द्रैः शुभंयुभिः ॥१३८॥
धर्म गोष्ठियों में बिना बुलाये सम्मिलित होने वाले, अपने ही समान ऋद्धियों को धारण करने वाले और शुभ भावों से युक्त अन्य अहमिंद्रों के साथ संभाषण करने में उसे बड़ा आदर होता था ।।138।।
“He took great delight in conversing with other Ahmindras, who possessed similar divine powers and noble sentiments, and who, without invitation, naturally gathered in religious assemblies.”
श्लोक ( Shlok ) 139 –140
क्षालयन्निव दिग्भित्तीः स्मितांशुसलिलप्लवैः । सहाहमिन्त्रैरुन्दश्रीः स चक्रे धर्मसंकथाम् ॥१३९॥
स्त्रावासोपान्तिकोद्यानसरःपुलिनभूमिषु । दिव्यहंसचिरं रेमे विहरन् स यदृच्छया ॥ १४०॥
अतिशय शोभा का धारक वह अहमिंद्र कभी तो अपने मंद हास्य के किरणरूपी जल के पूरों से दिशारूपी दीवालों का प्रक्षालन करता हुआ अहमिंद्रों के साथ तत्त्वचर्चा करता था और कभी अपने निवासस्थान के समीपवर्ती उपवन के सरोवर के किनारे की भूमि में राजहंस पक्षी के समान-अपने इच्छानुसार विहार करता हुआ चिरकाल तक क्रीड़ा करता था ।।139-140।।
“That exceedingly radiant Ahmindra sometimes engaged in profound discussions on spiritual truths with other Ahmindras, while his gentle laughter, like streams of shimmering light, seemed to wash the walls of the directions. At other times, he wandered freely like a royal swan along the banks of the lake in the gardens near his celestial abode, joyfully playing there for long periods.”
श्लोक ( Shlok ) 141 – 142
परक्षेत्रविहारस्तु नाहमिन्द्रेषु विद्यते । शुक्ललेश्यानुभावेन स्वमोगैर्धृतिमापुषाम् ॥१४१॥
स्वस्थाने या च संप्रीतिः निरपायसुखोदये । न सान्यत्र ततोऽन्येषां [नैषां] रिरंसा परभुक्तिषु ॥ १४२॥
अहमिंद्रों का परक्षेत्र में विहार नहीं होता क्योंकि शुक्ललेश्या के प्रभाव से अपने ही भोगों-द्वारा संतोष को प्राप्त होने वाले अहमिंद्रों को अपने निरुपद्रव सुखमय स्थान में जो उत्तम प्रीति होती है वह उन्हें अन्यत्र कहीं नहीं प्राप्त होती । यही कारण है कि उनकी परक्षेत्र में क्रीड़ा करने की इच्छा नहीं होती है ।।141-142।।
“Ahmindras do not wander into other realms because, under the influence of their pure (Shukla) Leshya, they attain complete satisfaction from their own celestial enjoyments. The supreme bliss they experience in their undisturbed and serene abode cannot be found elsewhere. This is why they feel no desire to engage in play beyond their own domain.”
श्लोक 143 से 151
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131