आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 मरुदेवी का परिचय
नाभिराज की रानी मरुदेवी इंद्राणी समान थी। उसकी कांति चंद्रमा, शरीर कृश, ओठ बिंबफल, चरण लक्षणयुक्त थे। वह नाट्य-संगीत शास्त्र का आधार, सौंदर्य से अन्य स्त्रियों को पराजित करने वाली थी। उसके चरण कमल समान, हंसिनी गति से श्रेष्ठ थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 12 to 21
श्लोक ( Shlok ) 12
तस्यासीन्मरुदेवीति देवी देवीव सा शची । रूपलावण्यकान्तिश्रीमतिद्युतिविभूतिभिः ॥१२॥
उन नाभिराज के मरुदेवी नाम की रानी थी जो कि अपने रूप, सौंदर्य, कांति, शोभा, बुद्धि, द्युति और विभूति आदि गुणों से इंद्राणी देवी के समान थी ।।12।।
Nābhirāja had a queen named Marudevī, who, with her beauty, grace, brilliance, charm, wisdom, radiance, and divine qualities, was like Indrāṇī, the queen of Indra. ॥12॥
श्लोक ( Shlok ) 13
सा कलेबैन्दवी कान्त्या जनतानन्ददायिनी । स्वर्गस्त्रीरूपसर्वस्वमुच्चित्येव विनिर्मिता ॥१३॥
वह अपनी कांति से चंद्रमा की कला के समान सब लोगों को आनंद देने वाली थी और ऐसी मालूम होती थी मानो स्वर्ग की स्त्रियों के रूप का सार इकट्ठा करके ही बनायी गयी हो ।।13।।
She was like the moon’s radiance, bringing joy to everyone with her beauty, and it seemed as if she had been created by gathering the essence of the forms of all the celestial women from heaven. ॥13॥
श्लोक ( Shlok ) 14
तन्वङ्गी पक्वबिम्बोष्ठी सुभ्रूश्चारुपयोधरा । मनोभुवा जगज्जेतुं सा पताकेव दर्शिता ॥१४॥
उसका शरीर कृश था, ओठ पके हुए बिंबफल के समान थे, भौंहें अच्छी थीं और स्तन भी मनोहर थे । उन सबसे वह ऐसी जान पड़ती थी मानो कामदेव ने जगत् को जीतने के लिए पताका ही दिखायी हो ।।14।।
Her body was slender, her lips were like ripe bimba fruits, her eyebrows were well-shaped, and her breasts were graceful. With all these features, she appeared as though Kamadeva, the god of love, had displayed his flag to conquer the world. ॥14॥
श्लोक ( Shlok ) 15
तद्रू पसौष्ठवं तस्था हावं भावं च विभ्रमम् । भावयित्वा कृती कोऽपि नाट्यशास्त्रं व्यधाद् ध्रुवम् ।।१५।।
ऐसा मालूम होता है कि किसी चतुर विद्वान् ने उसके रूप की सुंदरता, उसके हाव, भाव और विलास का अच्छी तरह विचार करके ही नाट्यशास्त्र की रचना की हो । भावार्थ―नाट्यशास्त्र में जिन हाव, भाव और विलास का वर्णन किया गया है वह मानो मरुदेवी के हाव, भाव और विलास को देखकर ही किया गया है ।।15।।
It seems as if a clever scholar, after carefully observing her beauty, gestures, expressions, and elegance, composed the Nāṭyaśāstra (the science of dramatic art).
Meaning: The gestures, expressions, and elegance described in the Nāṭyaśāstra seem to have been inspired by the gestures, expressions, and grace of Marudevī. ॥15॥
श्लोक ( Shlok ) 16
नूनं तस्याः कलालापे भावयन् स्वरमण्डलम् । प्रणीतगीतशास्त्रार्थो जनो जगति सम्मतः ॥१६॥
मालूम होता है कि संगीतशास्त्र की रचना करने वाले विद्वान् ने मरुदेवी की मधुर वाणी में ही संगीत के निषाद, ऋषभ, गांधार आदि समस्त स्वरों का विचार कर लिया था । इसीलिए तो वह जगत् में प्रसिद्ध हुआ है ।।16।।
It seems that the scholar who composed the Śāstra of music (Sangeetśāstra) must have considered the notes like Niṣādha, Rṣabha, Gāndhāra, and all other musical tones within the sweet voice of Marudevī. That is why this music theory became famous in the world. ॥16॥
श्लोक ( Shlok ) 17
रूपसर्वस्वहरणं कृत्वान्यस्त्रीजनस्य सा । वैरूप्यं कुर्वती व्यक्तं किंराज्ञां वृत्तिमन्वयात् ॥१७॥
उस मरुदेवी ने अन्य स्त्रियों के सौंदर्यरूपी सर्वस्व धन का अपहरण कर उन्हें दरिद्र बना दिया था, इसलिए स्पष्ट ही मालूम होता था कि उसने किसी दुष्ट राजा की प्रवृत्ति का अनुसरण किया था क्योंकि दुष्ट राजा भी तो प्रजा का धन अपहरण कर उसे दरिद्र बना देता है ।।17।।
The Marudevi had stolen the wealth in the form of beauty from other women, making them impoverished. Therefore, it was clear that she had followed the ways of a wicked king, as a wicked king also robs the wealth of the people, leaving them destitute. (17)
श्लोक ( Shlok ) 18
सा दधेऽधिपदद्वन्द्वं लक्षणानि विचक्षणा । प्रणिन्युर्लक्षणं स्त्रीणां यैरुदाहरणीकृतैः ॥१८॥
वह चतुर मरुदेवी अपने दोनों चरणों में अनेक सामुद्रिक लक्षण धारण किये हुए थी । मालूम होता है कि उन लक्षणों को ही उदाहरण मानकर कवियों ने अन्य स्त्रियों के लक्षणों का निरूपण किया है ।।18।।
The clever Marudevi bore many oceanic marks on both her feet. It seems that the poets have used those very marks as examples to describe the traits of other women. ( 18)
श्लोक ( Shlok ) 19
मृद्वङ्गुलिदले तस्याः ‘पदाब्जे श्रियमूहतुः” । नखदीधितिसन्तानलसत्केसरशोभिनो ॥१९॥
उसके दोनों ही चरण कोमल अँगुलियोंरूपी दलों से सहित थे और नखों की किरणरूपी दैदीप्यमान केशर से सुशोभित थे इसलिए कमल के समान जान पड़ते थे और दोनों ही साक्षात् लक्ष्मी (शोभा) को धारण कर रहे थे ।।19।।
Both of her feet were adorned with soft fingers resembling petals, and the nails gleamed like rays of light, shining brightly like saffron. Therefore, they appeared like lotus flowers, and both feet seemed to carry the very essence of Lakshmi (beauty and prosperity). ( 19)
श्लोक ( Shlok ) 20
जित्वा रक्ताब्जमेतस्याः क्रमौ संप्राप्तनिवृती । नखांशुमञ्जरीव्याजात् स्मितमातेनतुर्ध्रु वम् ॥२०॥
मालूम होता है कि मरुदेवी के चरणों ने लाल कमलों को जीत लिया इसीलिए तो वे संतुष्ट होकर नखों की किरणरूपी मंजरी के छल से कुछ-कुछ हँस रहे थे ।।20।।
It seems that the feet of Marudevi had conquered the red lotuses, which is why they were contentedly smiling, with the rays of her nails resembling the playful movement of buds. (20)
श्लोक ( Shlok ) 21
नखैः कुरबकच्छायां क्रमौ जित्वाप्यनिर्वृतौ । विजिग्याते “गतेनास्या हंसीनां गतिविभ्रमम् ॥२१॥
उसके दोनों चरण नखों के द्वारा कुरबक जाति के वृक्षों को जीतकर भी संतुष्ट नहीं हुए थे इसीलिए उन्होंने अपनी गति से हंसिनी की गति के विलास को भी जीत लिया था ।।21।।
Both of her feet, having conquered the trees of the Kurabak species with their nails, were still not satisfied. Therefore, they also surpassed the graceful movement of the swan, conquering its elegance as well. (21)
श्लोक 22 से 31
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11