भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |
श्लोक 62 से 71 जीवन चक्र
वहाँ आर्य जन्म लेते हैं। सात दिन शय्या पर, फिर घुटनों पर चलते, तीसरे सप्ताह बोलते, सातवें में भोग भोगते हैं। गर्भ सुखद, माता-पिता की मृत्यु जन्म के साथ होती। छींक-जँभाई से मृत्यु होती है।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
वनानि नित्यपुष्पाणि नलिन्यो नित्यपङ्कजाः। यत्र नित्यसुखा देशा रत्नपांसुभिराचिताः ॥६२।।
जहां के वन सदा फूलों से युक्त रहते हैं, कमलिनियों में सदा कमल लगे रहते हैं, और रत्न की धूलि से व्याप्त हुए देश सदा सुख से रहते हैं ।।62।।
A place where the forests are always adorned with flowers, the lotus ponds are always filled with blooming lotuses, and the land covered with the dust of precious gems remains ever blissful.
श्लोक ( Shlok ) 63
यत्रोत्पन्नवतां दिव्यमङ्गुल्याहारमुद्रसम्। वदन्त्युतानशय्यायामासप्ताहव्यतिक्रमात् ।।६३।।
जहाँ उत्पन्न हुए आर्य लोग प्रथम सात दिन तक अपनी शय्या पर चित्त पड़े रहते हैं । उस समय आचार्यों ने हाथ का रसीला अंगूठा चूसना ही उनका दिव्य आहार बतलाया है ।।63।।
Where the Aryan people are born, they lie on their backs for the first seven days. During that time, the learned teachers have deemed sucking the juicy thumb of the hand as their divine nourishment.
श्लोक ( Shlok ) 64
ततो देशान्तरं तेषामामनन्ति मनीषिणः । दम्पतीनां महीरङ्गरिङ्गिणां दिनसप्तकम् ॥६४।।
तत्पश्चात् विद्वानों का मत है कि वे दोनों दंपत्ति द्वितीय सप्ताह में पृथ्वीरूपी रंगभूमि में घुटनों के बल चलते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने लगते हैं ।।64।।
Thereafter, scholars believe that in the second week, those little ones, like a pair of divine beings, begin crawling on their knees across the earthly stage, moving from one place to another.
श्लोक ( Shlok ) 65
सप्ताहेन परेणाथ प्रोत्थाय कलभाषिणः । स्खलद्गति सहेलं च संचरन्ति महीतले ।॥६५॥
तदनंतर तीसरे सप्ताह में वे खड़े होकर अस्पष्ट किंतु मीठी-मीठी बातें कहने लगते हैं और गिरते-पड़ते खेलते हुए जमीन पर चलने लगते हैं ।।65।।
Thereafter, in the third week, they stand up and begin to speak indistinct yet sweet words. Stumbling and tottering, they start walking and playing on the ground.
श्लोक ( Shlok ) 66
ततः स्थिरपदन्यासैर्वर् जन्ति दिनसप्तकम् । कलाज्ञानेन सप्ताहं निर्विशन्ति गुणैश्च ते ॥६६।।
फिर चौथे सप्ताह में अपने पैर स्थिरता से रखते हुए चलने लगते हैं तथा पाँचवें सप्ताह में अनेक कलाओं और गुणों से सहित हो जाते हैं ।।66।।
Then, in the fourth week, they begin walking with steady steps, and by the fifth week, they become adorned with various skills and virtues.
श्लोक ( Shlok ) 67
परेण सप्तरात्रेण सम्पूर्णनवयौवनाः । लसदंशुकसद्भूषा जायन्ते भोगभागिनः ।॥६७॥
छठे सप्ताह में पूर्ण जवान हो जाते हैं और सातवें सप्ताह में अच्छे-अच्छे वस्त्राभूषण धारण कर भोग भोगने वाले हो जाते हैं ।।67।।
In the sixth week, they become fully grown adults, and in the seventh week, they adorn themselves with fine clothes and ornaments, ready to indulge in worldly pleasures.
श्लोक ( Shlok ) 68
नवमासं स्थिता गर्भे रत्न गर्भगृहोपमे । यत्र दम्पतितामेत्य जायन्ते दानिनो नराः ॥६८॥
पूर्वभव में दान देने वाले मनुष्य ही वहाँ उत्पन्न होते हैं । वे उत्पन्न होने के पहले नौ माह तक गर्भ में इस प्रकार रहते हैं जिस प्रकार कि कोई रत्नों के महल में रहता है । उन्हें गर्भ में कुछ भी दुःख नहीं होता । और स्त्री-पुरुष साथ-साथ ही पैदा होते हैं । वे दोनों स्त्री―पुरुष दंपतिपने को प्राप्त होकर ही रहते हैं ।।68।।
Only those humans who were charitable in their past lives are born there. Before birth, they reside in the womb for nine months as if dwelling in a palace of precious gems, experiencing no discomfort. Men and women are born together, and they remain as united couples from birth itself.
श्लोक ( Shlok ) 69
यदा दम्पतिसंभूति र्जनयित्रोः परासुता । तदैव तत्र पुत्रादिसंकल्पो यन्न देहिनाम् ॥ ६९।।
चूँकि वहाँ जिस समय दंपति का जन्म होता है उसी समय उनके, माता-पिता का देहांत हो जाता है इसलिए वहाँ के जीवों में पुत्र आदि का संकल्प नहीं होता ।।69।।
Since, at the time of the couple’s birth, their parents pass away, the beings there do not develop the concept of having offspring like sons or daughters.
श्लोक ( Shlok ) 70
श्रुत जृम्मितमात्रेण यत्राहुमृतिमङ्गिनाम् । स्वमावमार्दश्राद् यान्ति दिवमेव यदुद्धवाः ॥७०॥
जहाँ केवल छींक और जँभाई लेने मात्र से ही प्राणियों की मृत्यु हो जाती है अर्थात् अंत समय में माता को छींक और पुरुष को जँभाई आती है । जहाँ उत्पन्न होने वाले जीव स्वभाव से कोमल परिणामी होने के कारण स्वर्ग को ही जाते हैं ।।70।।
Where merely sneezing for women or yawning for men leads to the end of life. The beings born there, due to their inherently gentle and virtuous nature, naturally ascend to heaven after death.
श्लोक ( Shlok ) 71
देहोच्छायं नृणां यत्र नाना लक्षण सुन्दरम् । धनुषां षट्सहस्राणि विवृण्वन्त्याप्तसूक्तयः ॥७१।।
जहाँ उत्पन्न होने वाले लोगों का शरीर अनेक लक्षणों से सुशोभित तथा छह हजार धनुष ऊँचा होता है ऐसा आप्तप्रणित आगम स्पष्ट वर्णन करते हैं ।।71।।
The authoritative scriptures clearly describe that the bodies of the beings born there are adorned with numerous auspicious marks and reach a height of six thousand bows.
श्लोक 72 से 81
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 |