श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31
English translation of Uttar Puran parv 57- shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
ऐरावतगजस्कन्धमारोप्यामरसेनया । सहलीलः स सम्प्राप्य महामेरुं महौजसम् ॥ ३२ ॥
सौधर्मेन्द्र जिन-बालकको ऐरावत हाथीके कन्धे पर विराजमान कर देवोंकी सेनाके साथ लीला-पूर्वक महा-तेजस्वी महामेरु पर्वत पर पहुँचा ॥ ३२ ॥
“Indra (Saudharmendra) seated the infant Jina upon the shoulder of the Airavata elephant and, accompanied by the celestial army, gracefully reached the grand and radiant Mount Meru.”32
श्लोक ( Shlok ) 33
पञ्चमावारपारात्तक्षीरवारिघटोत्करैः । अभिषिच्य विभूष्येशं श्रेयानित्यवदन्मुदा ॥ ३३ ॥
वहाँ उसने पञ्चम क्षीरसमुद्रसे लाये हुए क्षीर रूप जलके कलशोंके समूहसे भगवान्का अभिषेक किया, आभूषण पहिनाये और बड़े हर्षके साथ उनका श्रेयांस यह नाम रक्खा ॥ ३३ ॥
“There, using a multitude of pitchers filled with milk-like water brought from the fifth ocean (the Milk Ocean), he performed the ritual bath (Abhisheka) of the Lord. He adorned Him with ornaments and, with great joy, gave Him the name Shreyans.”33
श्लोक ( Shlok ) 34
ततः पुरं समानीय मातुरङ्गे निधाय तम् । सुराधीशः सुरैः सार्द्धं प्रमुद्यार” सुरालये ॥ ३४ ॥
इन्द्र मेरु पर्वतसे लौटकर नगरमें आया और जिन-बालकको माताकी गोदमें रख, देवोंके साथ उत्सव मनाता हुआ स्वर्ग चला गया ॥ ३४ ॥
“Returning from Mount Meru, Indra arrived at the city, placed the infant Jina back into the mother’s lap, and after celebrating the festivities with the gods, returned to heaven.”34
श्लोक ( Shlok ) 35
गुणैः सार्द्धमवर्द्धन्त तदास्यावयवाः शुभाः । क्रमात्कान्ति प्रपुष्यन्तो बालचन्द्रस्य वांशुभिः ॥ ३५ ॥
जिस प्रकार किरणोंके द्वारा क्रम-क्रमसे कान्तिको पुष्ट करनेवाले बाल-चन्द्रमाके अवयव बढ़ते रहते हैं उसी प्रकार गुणोंके साथ-साथ उस समय भगवान्के शरीरावयव बढ़ते रहते थे ॥ ३५ ॥
“Just as the phases of the crescent moon gradually increase, strengthening its radiance through its rays, so too did the limbs of the Lord’s body grow day by day, along with the blossoming of His divine virtues.”35
श्लोक ( Shlok ) 36 – 39
स खत्रयर्तुपक्षर्तुषड्वत्सरशताब्धिभिः । ऊनसागरकोट्यन्ते पल्यार्दै धर्मसन्ततौ ॥ ३६ ॥व्युच्छिन्नायां तदभ्यन्तरायुः श्रेयः समुद्भवः । पञ्चशून्ययुगाष्टाब्दजीवितः कनकप्रभः ॥ ३७ ॥चापाशीतिसमुत्सेधो बलोजस्तेजसां निधिः । एकविंशतिलक्षाब्दकौमार सुखसागरः ॥ ३८ ॥प्राप्य राज्यं सुरैः पूज्यं सर्वलोकनमस्कृतः । तर्पयँश्चन्द्रवत्सर्वान् दर्पितान् भानुवत्तपन् ॥ ३९ ॥
शीतलनाथ भगवान्के मोक्ष जानेके बाद जब सौ सागर और छयासठ लाख छब्बीस हजार वर्ष कम एक सागर प्रमाण अन्तराल बीत गया तथा आधे पल्य तक धर्मकी परम्परा टूटी रही तब भगवान् श्रेयांसनाथका जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी । उनकी कुल आयु चौरासी लाख वर्षकी थी। शरीर सुवर्णके समान कान्तिवाला था, ऊँचाई अस्सी धनुष की थी, तथा स्वयं बल, ओज और तेजके भंडार थे। जब उनकी कुमारावस्थाके इक्कीस लाख वर्ष बीत चुके तब सुखके सागर स्वरूप भगवान्ने देवोंके द्वारा पूजनीय राज्य प्राप्त किया। उस समय सब लोग उन्हें नमस्कार करते थे, वे चन्द्रमाके समान सबको संतृप्त करते थे और अहंकारी मनुष्योंको सूर्यके समान संतापित करते थे ॥ ३६-३९॥
“After Lord Sheetalnatha attained salvation (Moksha), an interval of one Sagara (ocean-measured time) minus sixty-six lakh, twenty-six thousand, and one hundred years had passed; during this time, for half a Palya, the lineage of the true religion remained broken. It was then that Lord Shreyansunatha was born. His lifespan was included within this interval.
His total lifespan was eighty-four lakh years. His body possessed a luster like pure gold, and he stood eighty Dhanusha (bow-lengths) tall, being a reservoir of strength, vitality, and brilliance in his own right.
When twenty-one lakh years of his youth had passed, the Lord—an ocean of bliss—attained the kingdom, which was worshipped even by the gods. At that time, all people bowed before him; he provided soothing contentment to all like the moon, yet like the sun, he scorched those who were filled with ego.”36 – 39
श्लोक ( Shlok ) 40
तेजोमहामणिर्वाद्धिर्गाम्भीर्य मलयोद्भवः । शैत्यं धर्म इव श्रेयः सुखं स्वस्याकरोच्चिरम् ॥ ४० ॥
उन भगवान्ने महामणिके समान अपने आपको तेजस्वी बनाया था, समुद्रके समान गम्भीर किया था, चन्द्रमाके समान शीतल बनाया था और धर्मके समान चिरकाल तक कल्याणकारी श्रुत-स्वरूप बनाया था ।॥ ४० ॥
“Like a Great Jewel, the Lord made Himself radiant with brilliance; like the vast ocean, He made Himself profound and deep; like the moon, He made Himself cooling and serene; and like the True Religion (Dharma), He made His very being a source of eternal well-being in the form of sacred wisdom (Shruta).”40
श्लोक ( Shlok ) 41
प्राग्जन्मसुकृतायेन कृतायां सर्वसम्पदि । बुद्धिपौरुषयोर्व्याप्तिस्तस्याभूद्धर्मकामयोः ॥ ४१ ॥
पूर्व जन्ममें अच्छी तरह किये हुए पुण्य-कर्म से उन्हें सर्व प्रकारकी सम्पदाएँ तो स्वयं प्राप्त हो गई थीं अतः उनकी बुद्धि और पौरुषकी व्याप्ति सिर्फ धर्म और काममें ही रहती थी। भावार्थ – उन्हें अर्थकी चिन्ता नहीं करनी पड़ती थी ॥ ४१ ॥
“Because of the meritorious deeds (Punya) performed diligently in his previous births, all forms of wealth and prosperity came to him naturally. Consequently, the reach of his intellect and prowess was devoted solely to Dharma (righteousness) and Kama (aesthetic and worldly pleasures).
Purport: He never had to worry about Artha (the pursuit of wealth or material means).”41
श्लोक 42 से 52
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