नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 145 to 153
श्लोक ( Shlok ) 145
अथातोऽन्धकवृष्टिश्च श्रुत्वा मुकलयन्करौ । स्वपूर्वभवसम्बन्धमपृच्छज्जिनपुङ्गवम् ॥ १४५ ॥
तदनन्तर राजा अन्धकवृष्टिने यह सब सुननेके बाद हाथ जोड़कर उन्हीं सुप्रतिष्ठ जिनेन्द्रसे अपने पूर्व भवका सम्बन्ध पूछा ॥ १४५ ॥
“Thereafter, having heard all this, King Andhakavrishni folded his hands and asked the very same venerable Jinendra about the connection to his past life.”145
श्लोक ( Shlok ) 146
वीतरागोऽपि ‘सोऽप्याह तत्पृष्टं शिष्टगीर्गुणः । निर्निमित्तहिताख्यानं नाम तेषु निसर्गजम् ॥ १४६ ॥
शिष्ट वचन बोलना ही जिनकी वाणीका विशेष गुण है ऐसे वीतराग सुप्रतिष्ठ भगवान् कहने लगे सो ठीक ही है क्योंकि बिना किसी निमित्तके हितकी बात कहना उन जैसोंका स्वाभाविक गुण है ॥ १४६ ।।
“The detached, passionless Lord Supratishtha—whose speech is distinguished by the special quality of speaking only cultured, gentle words—began to speak. And it is only fitting, because speaking beneficial words without expecting any reason or reward is the natural characteristic of beings like him.”146
श्लोक ( Shlok ) 147 – 152
द्वीपेऽत्रैव विनीतायां नरेन्द्रोऽनन्तवीर्यवाक् । सुरेन्द्रदत्तस्तत्रैव वैश्यो वैश्रवणोपमः ॥ १४७ ॥दशभिनित्य पूजायामष्टम्यां द्विगुणैस्ततः । चतुर्गुणैरमावस्यायां पर्वण्यष्टभिर्गुणैः ॥ १४८ ॥दीनारैरर्हतां पूजां करोति विहितव्ययैः । सहितः पात्रदानेन सशीलः सोपवासकः ॥ १४९ ॥धर्मशील इति ख्यातिं स समापापपापकः । गन्तु ं वारिपथं वांच्छन्नन्येद्यर्वणिजां वरः ॥ १५० ॥द्वादशाब्दैः समावर्ज्य धनमागन्तुकः परम् । जिनपूजाव्ययायार्थ द्वादशाब्दनिबन्धनम् ॥ १५१ ॥मित्रस्य रुद्रदशस्य ब्राह्मणस्य करे न्यधात् । अनेन जिनपूजादिं कुर्वहं वा त्वमित्यसौ ॥ १५२ ॥
वे कहने लगे कि इसी जम्बूद्वीपकी अयोध्या नगरीमें अनन्तवीर्य नामका राजा रहता था । उसी नगरीमें कुबेरके समान सुरेन्द्रदत्त नामका सेठ रहता था। वह सेठ प्रतिदिन दश दीनारोंसे, अष्टमीको सोलह दीनारोंसे, अमावसको चालीस दीनारोंसे और चतुर्दशीको अस्सी दीनारों से अर्हन्त भगवान्की पूजा करता था। वह इस तरह खर्च करता था, पात्र दान देता था, शील पालन करता था और उपवास करता था। इन्हीं सब कारणोंमे पापरहित उस सेठने ‘धर्मशील’ इस तरहकी प्रसिद्धि प्राप्त की थी। किसी एक दिन उस सेठने जलमार्गसे जाकर धन कमानेकी इच्छा की। उसने बारह वर्ष तक लौट आनेका विचार किया था इसलिए बारह वर्ष तक भगवान्की पूजा करनेके लिए जितना धन आवश्यक था उतना धन उसने अपने मित्र रुद्रदत्त ब्राह्मणके हाथमें सौंप दिया और कह दिया कि इससे तुम जिनपूजा आदि कार्य करते रहना क्योंकि आप मेरे ही समान हैं ।॥१४७-१५२।।
“He began to say—In the Ayodhya city of this very Jambudvipa, there lived a king named Anantavirya. In the same city, there lived a merchant named Surendradatta, who was as wealthy as Kubera (the god of wealth). That merchant used to worship Lord Arhant daily with ten dinars, on the eighth day (Ashtami) with sixteen dinars, on the new moon day (Amavasya) with forty dinars, and on the fourteenth day (Chaturdashi) with eighty dinars. He would spend money in this manner, give alms to worthy recipients, maintain righteous conduct, and observe fasts. Due to all these virtues, that sinless merchant earned the renown of being ‘Dharmashila’ (the righteous-natured one).
One day, that merchant desired to travel by sea to earn wealth. Since he intended to return after twelve years, he handed over as much wealth as was necessary to worship the Lord for twelve years into the hands of his friend, Rudradatta the Brahmin. He instructed him, ‘Keep performing the Jina-worship and other religious duties with this, for you are just like me.’ “147 – 152
श्लोक ( Shlok ) 153
तस्मिन् गते स विप्रोऽपि स्त्रीद्युतव्यसनादिभिः । धनं कतिपयैरेव दिनैर्व्ययमनीनयत् ॥ १५३ ॥
सेठके चले जाने पर रुद्रदत्त ब्राह्मणने वह समस्त धन परस्त्रीसेवन तथा जुआ आदि व्यसनोंके द्वारा कुछ ही दिनों में खर्च कर डाला ॥ १५३ ।।
“After the merchant’s departure, the Brahmin Rudradatta squandered all that wealth within a few days on vices like gambling and chasing after other men’s wives.”153
श्लोक 154 से 164
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नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144
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