नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 284 to 292
श्लोक ( Shlok ) 284
उपसर्ग व्यधान्मन्त्री तवात्रातपयोगिनाम् । निवार्यतामसावाशु त्वयेत्याह महीपतिम् ॥ २८४ ॥
मुनिराज विष्णुकुमारने राजा पद्मरथसे कहा कि तुम्हारे मन्त्रीने आतप योग धारण करनेवाले मुनियोंके लिए उपसर्ग कर रक्खा है उसे तुम शीघ्र ही दूर करो ।। २८४ ॥
The royal monk Vishnukumar said to King Padmaratha, “Your minister has inflicted a severe affliction upon the ascetics who are practicing the austerity of enduring the sun’s heat (Atapana Yoga). Remove it immediately.” || 284 ||
श्लोक ( Shlok ) 285 – 286
प्रतिपन्नं मया तस्मै राज्यं सप्तदिनावधि । न निवारयितुं शक्यः सत्यभेदभयादसौ ॥ २८५ ॥ततो भवद्भिरेवार्य निवार्यो दुर्जनोऽधुना । न विदन्ति खलाः स्वैरा युक्तायुक्तविचेष्टितम् ॥ २८६ ॥
उत्तरमें राजाने कहा कि मैं उसके लिए सात दिनका राज्य देना स्वीकृत कर चुका हूं अतः सत्यव्रतके खण्डित होनेके भयसे मैं उसे नहीं रोक सकता। हे पूज्य ! इस दुष्टका इस समय आप ही निवारण कीजिए। स्वच्छन्द रहनेवाले दुष्ट जन योग्य और अयोग्य चेष्टाओंको अच्छे-बुरे कार्योंको नहीं जानते हैं ।॥ २८५-२८६ ॥
In response, the King said, “I have already agreed to grant him the kingdom for seven days; therefore, out of fear of breaking my vow of truthfulness, I cannot stop him. O Revered One! Only you can restrain this wicked man at this time. Wicked people who act completely unchecked do not understand what are proper or improper actions, nor can they distinguish between good and bad deeds.” || 285-286 ||
श्लोक ( Shlok ) 287
इत्यवोचदसौ चैतदवगम्य मुनीश्वरः । प्रतिषिध्यामि पापिष्ठमहमेबाशु नश्वरम् ॥ २८७ ॥
राजा पद्मरथने ऐसा उत्तर दिया, उसे सुनकर मुनिराजने कहा कि तो मैं ही शीघ्र नष्ट होनेवाले इस पापीको मना करता हूं ।। २८७ ॥
King Padmaratha gave such a reply, and upon hearing it, the royal monk said, “Then I myself shall restrain this sinner, who is bound to be destroyed very soon.” || 287 ||
श्लोक ( Shlok ) 288 – 292
इति वामनरूपेण ब्राह्मणाकारमागतः । सम्प्राप्य बलिनोऽभ्यर्ण स्वस्तिवादपुरम्सरम् ॥ २८८ ॥ महाभागाहमर्थी त्वां दातृमुख्यमुपागमम् । देयं त्वयेत्यवादीत्सोप्यभीष्टं प्रतिपन्नवान् ॥ २८९ ॥अभाषत द्विजो राजन् देयं मे विक्रमैस्त्रिभिः । प्रमितं क्षेत्रमित्यल्पं किमेतदभियाचितम् ॥ २९० ॥गृहाणेति बली पाणिजलसेकसमन्वितम् । “अदितास्मै मुनिश्चाप्त विक्रियद्धि निजक्रमम् ॥ २९१ ॥ न्यधादेकं प्रसार्योच्चैर्मानुषोत्तरमूर्धनि । द्वितीयमपि देवाद्रिचूलिकायां स्फुरद्युतिः ॥ २९२ ॥
इतना कहकर वे महामुनि वामन (बोंने) ब्राह्मणका रूप रखकर वलिके पास पहुँचे और आशीर्वाद देते हुए बोले कि हे महाभाग ! आज तू दाताओंमें मुख्य है इसलिए मैं तेरे पास आया हूं तू मुझे भी कुछ दे । उत्तरमें वलिने इष्ट वस्तु देना स्वीकृत कर लिया । तदनन्तर ब्राह्मण वेषधारी विष्णुकुमार मुनिने कहा कि हे राजन्, मैं अपने पैरसे तीन पैर पृथिवी चाहता हूं यही तू मुझे दे दे। ब्राह्मणकी बात सुनकर वलिने कहा कि ‘यह तो बहुत थोड़ा क्षेत्र है इतना ही क्यों माँगा ? ले लो’, इतना कहकर उसने ब्राह्मणके हाथमें जलधारा छोड़कर तीन पैर पृथिवी दे दी। फिर क्या था ? मुनिराजने विक्रियाऋद्धिसे फैला कर एक पैर तो मानुषोत्तर पर्वतकी ऊँची शिखर पर रक्खा और देदीप्यमान कान्तिका धारक दूसरा पैर सुमेरु पर्वतकी चूलिका पर रक्खा ।। २८८-२९२ ।।
Saying this, the great monk assumed the form of a Vamana (dwarf) Brahmin, approached Bali, and blessing him, said, “O noble one! Today you are the foremost among givers, which is why I have come to you; grant me something as well.” In response, Bali agreed to give him whatever he desired. Thereafter, the monk Vishnukumar, disguised as a Brahmin, said, “O King, I desire only as much land as can be measured by three steps of my feet; grant me just this much.”
Hearing the Brahmin’s words, Bali said, “This is a very small piece of land; why did you ask for so little? Take it.” Saying this, he poured water into the Brahmin’s hand as a ritual gesture and granted him the three steps of land. What happened next? The royal monk, expanding his body through his supernatural power of transformation (Vikriya Riddhi), placed his first step on the high peak of Mount Manusottara and his second step, radiating a brilliant luster, on the summit of Mount Sumeru. || 288-292 ||
श्लोक 293 से 301
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