विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
सामायिकं समादाय संयमं संयताग्रणीः । “विग्रहे विग्रहीवोयं निर्व्यग्रमकरोत्तपः ॥ १०२ ॥
और सामायिक संयम धारण कर संयमियोंमें अग्रेसर हो गया। उसने निराकुल होकर इतना कठिन तप किया मानो शरीरके साथ विद्वेष ही ठान रक्खा हो ॥ १०२ ॥
He then adopted the Samayika Sanyama (equanimous restraint), becoming a leader among the self-restrained. With a mind free from all agitation, he performed such rigorous penance that it appeared as though he had declared a deep-seated hostility toward his own physical body. [102]
श्लोक ( Shlok ) 103
सद्वृत्तस्तेजसो मूर्तिधुन्वश्नभ्युदितस्तमः । असम्बाधमगादूर्ध्व भास्वानिव बलोऽमलः ॥ १०३ ॥
उस समय बलभद्र ठीक सूर्यके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार सूर्य सदृत्त अर्थात् गोलाकार होता है उसी प्रकार बलभद्र भी सवृत्त सदाचार से युक्त थे, जिस प्रकार सूर्य तेजकी मूर्ति स्वरूप होता है उसी प्रकार बलभद्र भी तेजकी मूर्ति स्वरूप थे, जिस प्रकार सूर्य उदित होते ही अन्धकारको नष्ट कर देता है उसी प्रकार बलभद्रने मुनि होते ही अन्तरङ्ग के अन्धकारको नष्ट कर दिया था, जिस प्रकार सूर्य निर्मल होता है उसी प्रकार बलभद्र भी कर्ममलके नष्ट हो जानेसे निर्मल थे और जिस प्रकार सूर्य बिना किसी रुकावटके ऊपर आकाशमें गमन करता है उसी प्रकार बलभद्र भी बिना किसी रुकावटके ऊपर तीन लोकके अग्रभाग पर जा विराजमान हुए ॥ १०३ ॥
At that time, Balabhadra appeared exactly like the Sun; for just as the sun is perfectly circular (Savritta), so too was Balabhadra endowed with perfect conduct (Sada-vritta). Just as the sun is the very embodiment of brilliance, so was Balabhadra the embodiment of spiritual glory.
Just as the sun destroys darkness upon rising, Balabhadra, upon becoming a monk, destroyed his internal darkness (ignorance). Just as the sun is pure, so was Balabhadra pure due to the destruction of the filth of Karma. And just as the sun travels through the sky without any obstruction, Balabhadra likewise ascended without any hindrance to the very apex of the Three Worlds (the Abode of the Siddhas). [103]
श्लोक ( Shlok ) 104
यूतेन मोहविहितेन विधीः स्वयम्भूः यातो मधुश्च नरकं दुरिती दुरन्तम् ।धर्मादिकं श्रितयमेव कुमार्गवृत्त्या हेतुः श्रितं भवति दुःखपरम्परायाः ॥ १०४ ॥
देखो, मोह वश किये हुए जुआसे मूर्ख स्वयंभू और राजा मधु पापका संचय कर दुखदायी नरकमें पहुँचे सो ठीक ही है क्योंकि धर्म, अर्थ, काम इन तीनका यदि कुमार्ग वृत्तिसे सेवन किया जावे तो यह तीनों ही दुःख-परम्पराके कारण हो जाते हैं ॥ १०४ ॥
Behold, the foolish Svayambhu and King Madhu, driven by the delusion of their actions, accumulated sin and reached the agonizing hells—and rightly so. For if Dharma (virtue), Artha (wealth), and Kama (pleasure) are pursued through unrighteous paths, all three become the cause of a succession of miseries. [104]
श्लोक ( Shlok ) 105
क्रोधादिभिः सुतपसोऽपि भवेन्निदानं तत्स्याद् दुरन्तदुरितोर्जितदुःखहेतुः ।तेनाप मुक्तिपथगोऽप्यपथं सुकेतु-स्त्याज्यं ततः खलसमागमवन्निदानम् ॥ १०५ ॥
कोई उत्तम तपञ्चरण करे और क्रोधादिके वशीभूत हो निदान-बंध कर ले तो उसका वह निदान-बन्ध अतिशय पापसे उत्पन्न दुःखका कारण हो जाता है। देखो, सुकेतु यद्यपि मोक्षमार्गका पथिक था तो भी निदान-बन्धके कारण कुगतिको प्राप्त हुआ अतः दुष्ट मनुष्यकी संगतिके समान निदान-बन्ध दूरसे ही छोड़ने योग्य है ॥ १०५ ॥
If one performs superior penance yet falls under the sway of anger and the like to form a Nidana-bandha (a binding vow for worldly rewards), then that bond becomes a cause of suffering born from excessive sin. See, even though Suketu was a traveler on the path to liberation, he met an unfortunate fate due to Nidana-bandha; therefore, such a bond should be abandoned from afar, just like the company of a wicked person. [105]
श्लोक ( Shlok ) 106
द्युतिविनिहतमित्रो मित्रनन्दी क्षितीशो यमसमितिसमग्रोऽनुत्तराधीश्वरोऽभूत् ।अनुधरणिमितः सन् द्वारवत्यां ‘सुधर्मः परमपदमवापत्साधितात्मस्वरूपः ॥ १०६ ॥
धर्म, पहले अपनी कान्तिसे सूर्यको जीतनेवाला मित्रनन्दी नामका राजा हुआ, फिर महाव्रत और समितियोंसे सम्पन्न होकर अनुत्तरविमानका स्वामी हुआ, वहाँ से चयकर पृथिवीपर द्वारावती नगरीमें सुधर्म बलभद्र हुआ और तदनन्तर आत्म-स्वरूपको सिद्धकर मोक्ष पद-को प्राप्त हुआ ॥ १०६ ॥
Dharma, in a previous birth, was a king named Mitranandi whose radiance surpassed even that of the sun. Later, by excelling in the Mahavratas (great vows) and Samitis (regulations), he became the lord of the Anuttara-vimana (the highest celestial vehicle). After descending from there to Earth, he was born in the city of Dvaravati as Sudharma Balabhadra, and eventually, by realizing the true nature of the self, he attained the state of Moksha (liberation). [106]
श्लोक ( Shlok ) 107
कुणालविषये सुकेतुरधिराडभूद् दुर्मति-स्ततः कृततपाः सुरोऽजनि सुखालये लान्तवे ।कृतान्तसदृशो मधोरनुबभूव चक्रेश्वर-स्ततश्च दुरितोदयाक्षितिमगात्स्वयम्भूरधः ॥ १०७ ॥
स्वयंभू पहले कुणाल देशका मूर्ख राजा सुकेतु हुआ, फिर तपञ्चरण कर सुख के स्थान-स्वरूप लान्तव स्वर्गमें देव हुआ, फिर राजा मधुको नष्ट करनेके लिए यमराजके समान चक्रपति-नारायण हुआ और तदनन्तर पापोदयसे नीचे सातवीं पृथिवीमें गया ॥ १०७ ॥
Svayambhu was first the foolish King Suketu of the Kunala country; then, by performing penance, he became a deity in the Lantava heaven—the very abode of happiness. Subsequently, to destroy King Madhu, he was born as the Chakrapati-Narayana, resembling Yamaraja (the God of Death), and thereafter, due to the ripening of his sins, he descended to the Seventh Earth (the lowest hell). [107]
श्लोक ( Shlok ) 108
जिनस्यास्यैव तीर्थेऽग्यौ गणेशौ मेरुमन्दरौ । तुङ्गौ स्थिरौ सुरैः सेव्यौ वक्ष्यामश्चरितं तयोः ॥ १०८ ॥
अथानन्तर- इन्हीं विमलवाहन तीर्थंकरके तीर्थमें अत्यन्त उन्नत, स्थिर और देवोंके द्वारा सेवनीय मेरु और मन्दर नामके दो गणधर हुए थे इसलिए अब उनका चरित कहते हैं ॥ १०८ ll
Thereafter, during the era of this same Tirthankara Vimalnath, there arose two chief disciples (Ganadharas) named Meru and Mandara, who were exceptionally eminent, steadfast, and revered by the gods. We shall now narrate their life stories. [108]
श्लोक ( Shlok ) 109 – 110
द्वीपेऽपरविदेहेऽस्मिन् सीतोदानद्युदक्तटे । विषये गन्धमालिन्यां वीतशोकपुराधिपः ॥ १०९ ॥वैजयन्तो नृपस्तस्य देव्याः सर्वश्रियः सुतौ । संजयन्तजयन्ताख्यौ राजपुत्रगुणान्वितौ ॥ ११० ॥
जम्बूद्वीपके पश्चिम विदेह क्षेत्रमें सीतोदा नदीके उत्तर तटपर एक गन्धमालिनी नामका देश है उसके वीतशोक नगर में वैजयन्त राजा राज्य करता था। उसकी सर्वश्री नामकी रानी थी और उन दोनोंके संजयन्त तथा जयन्त नामके दो पुत्र थे, ये दोनों ही पुत्र राजपुत्रोंके गुणोंसे सहित थे ॥ १०९-११० ॥
In the West Videha region of Jambudvipa, on the northern bank of the Sitoda River, lies a country named Gandhamalini. In its city, Vitashoka, King Vaijayanta ruled. He had a queen named Sarvashri, and they had two sons named Sanjayanta and Jayanta. Both these princes were endowed with all the noble qualities befitting royalty. [109-110]
श्लोक ( Shlok ) 111
सावन्येद्युरशोकाख्यवने तीर्थकृतोऽन्तिके । धर्म स्वयम्भुवः श्रुत्वा भोगनिर्वेदचोदितौ ॥ १११ ॥
किसी दूसरे दिन अशोक वनमें स्वयंभू नामक तीर्थंकर पधारे। उनके समीप जाकर दोनों भाइयोंने धर्मका स्वरूप सुना और दोनों ही भोगोंसे विरक्त हो गये ॥ १११॥
One day, the Tirthankara named Svayambhu arrived at the Ashoka Grove. Approaching him, both brothers listened to the nature of Dharma (the sacred teachings), and as a result, both became detached from worldly pleasures. [111]
श्लोक 112 से 125
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