राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 84 to 92
श्लोक ( Shlok ) 84 – 88
इतो लङ्कामधिष्ठाय त्रिखण्डभरतावनेः । अधीश्वरोऽहमेवेति गर्वपर्वतभास्करम् ॥ ८४ ॥सम्भावयन्तमात्मानं रावणं शत्रुरावणम् । निजतेजः प्रतापापहसितोष्णांशुमण्डलम् ॥ ८५ ॥दण्डोपनतसामन्तविनम्रमुकुटाग्रम- । स्फुरन्मणिमयूखाम्बुविकसच्चरणाम्बुजम् ॥ ८६ ॥निजासने समासीनं कीर्यमाणप्रकीर्णकम् । अवतीर्णं धराभागमिव नीलनवाम्बुदम् ॥ ८७ ॥आभाषमाणमाक्षिप्य सभ्रूभङ्ग भयङ्करम् । अनुजैरात्मजैमलैिर्भ टैश्च परिवारितम् ॥ ८८ ॥
इधर रावण, त्रिखण्ड भरतक्षेत्र-का मैं ही स्वामी हूँ इस प्रकार अपने आपको गर्वरूपी पर्वत पर विद्यमान सूर्यके समान समझने लगा । वह शत्रुओंको रुलाता था इसलिए उसका रावण नाम पड़ा था। अपने तेज और प्रतापके द्वारा उसने सूर्य मण्डलको तिरस्कृत कर दिया था। दण्ड लेनेके लिए पास आये हुए सामन्तोंके नम्रीभूत मुकुटोंके अग्रभागमें जो देदीप्यमान मणि लगे हुए थे उनके किरणरूपी जलके भीतर उस रावण के चरणकमल विकसित हो रहे थे। वह अपने सिंहासन पर बैठा हुआ था, उस पर चमर दुराये जा रहे थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवी पर अवतीर्ण हुआ नीलमेघ ही हो । वह भौंह टेढ़ी कर लोगोंसे वार्तालाप कर रहा था जिससे बहुत ही भयङ्कर जान पड़ता था। छोटे भाई, पुत्र, मूलवर्ग तथा बहुतसे योद्धा उसे घेरे हुए थे ॥ ८४-८८ ॥
“Meanwhile, Ravana began to regard himself as the sun perched upon the mountain of pride, thinking, ‘I alone am the lord of the three-part Bharat-kshetra.’ He was named Ravana because he made his enemies weep. Through his brilliance and majesty, he had surpassed the glory of the solar orb.
As the subordinate kings (vassals) approached to pay their tributes, they bowed low; within the ‘water’ of the shimmering rays emanating from the radiant jewels in their crowns, the lotus-feet of Ravana seemed to bloom.
Seated upon his throne with fly-whisks (chamars) being fanned over him, he appeared like a dark blue cloud that had descended upon the earth. He conversed with people with furrowed brows, appearing extremely fearsome. He was surrounded by his younger brothers, sons, kinsmen, and a multitude of warriors.” || 84-88 ||
श्लोक ( Shlok ) 89 – 92
पिङ्गोत्तुङ्गजटाजूट प्रभापिञ्जरिताम्बरः । इन्द्रनीलाक्ष सूत्रोरुवलयालङ्कृताङ्गुलिः ॥ ८९ ॥तीर्थाम्बुसम्भृतोद्भासिपद्मरागकमण्डलुः । सुवर्णसूत्रयज्ञोपवीतप्तनिजाकृतिः ॥ ९० ॥खादेत्य नारदोऽन्येद्युः सोपद्वारं समैक्षत । तदालोक्य चिराद्भद्र दृष्टोऽसीति त्वयास्यताम् ॥ ९१ ॥कौतस्कुतः किमर्थ वा तवागमनमित्यसौ । रावणेनानुयुक्तः सन् कुधीरिदमभाषत ॥ ९२ ॥
ऐसे रावणके पास किसी एक दिन नारदजी आ पहुँचे। वे नारदजी अपनी पीली तथा ऊँची उठी हुई जटाओंके समूहूकी प्रुभासे आकाशको पीतवर्ण कर रहे थे, इन्द्रनीलमणिके बने हुए अक्षसूत्र-जयमालाको उन्होंने अपने हाथमें किसी बड़ी चूड़ीके आकार लपेट रक्खा था जिससे उनकी अङ्गुलियाँ बहुत ही सुशोभित हो रही थीं, तीर्थोदकसे भरा हुआ उनका पद्मराग निर्मित्त कमण्डलु बड़ा भला मालूम होता था और सुवर्ण-सूत्र निर्मित यज्ञोपवीतसे उनका शरीर पवित्र था। आकाशसे उतरते ही नारदजीने द्वारके समीप रावणको देखा। यह देख रावणने नारदसे कहा कि हे भद्र, बहुत दिन बाद दिखे हो, बैठिये, कहाँ से आ रहे हैं ? और आपका आगमन किसलिए हुआ है ? रावणके द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर दुर्बुद्धि नारद यह कहने लगा ॥ ८९-९२ ॥
“One day, Narada Muni arrived in the presence of this mighty Ravana. Narada was coloring the sky yellow with the radiant glow of his high-bound, golden-yellow matted hair. He had wrapped a rosary made of sapphire (indraneel-mani) beads around his hand like a large bangle, which beautifully adorned his fingers.
His water-pot (kamandalu), crafted from ruby (padmarag-mani) and filled with sacred holy water, looked remarkably elegant, and his body was purified by a sacred thread (yajnopaveeta) made of golden wire.
Descending from the heavens, Narada saw Ravana near the gateway. Seeing him, Ravana said to Narada, ‘O gentle one! You are seen after a very long time. Please be seated. Where are you coming from, and what is the purpose of your visit?’ When questioned thus by Ravana, the ill-witted Narada began to speak as follows.” || 89-92 ||
श्लोक 93 से 104
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62