राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 1 to 16
श्लोक ( Shlok ) 1 – 2
पुराहितः पुनश्चासौ तत्कथां श्रोतुमर्हसि । इति सम्बोध्य भूपालं ततो वक्तुं प्रचक्रमे ॥ १ ॥क्रमेण श्रव्यशब्दार्थसारवाणिर्भवावलीम् । दशास्यस्य दशाशास्यप्रकाशिस्वयशः श्रियः ॥ २ ॥
तदनन्तर जिसके शब्द और अर्थ सुनने योग्य हैं तथा वाणी सारपूर्ण है ऐसा पुरोहित, ‘महाराज आप यह कथा श्रवण करनेके योग्य हैं’ इस प्रकार महाराज दशरथको सम्बोधित कर अपने यशरूपी लक्ष्मीसे दशों दिशाओंके मुखको प्रकाशित करनेवाले रावणके भवान्तर कहने लगा ॥१-२।।
“Thereafter, the priest—whose words and their meanings were worthy of being heard, and whose speech was full of substance—addressed Maharaja Dasharatha, saying, ‘O Maharaja, you are worthy of listening to this tale,’ and began to narrate the story of the previous births of Ravana, who had illuminated the faces of the ten directions with the Lakshmi (goddess/wealth) of his fame.”1 – 2
श्लोक ( Shlok ) 3
अथास्ति नाकलोकाभो धातकीखण्डपूर्वभाग । भारते भूगुणैर्युक्तो देशः सारसमुच्चयः ॥ ३ ॥
उसने कहा कि धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व भरतक्षेत्रमें स्वर्गलोकके समान आभावाला एवं पृथिवीके गुणोंसे युक्त सारसमुच्चय नामका देश है ॥ ३ ॥
“He said that in the eastern part of the Bharatakshetra (region of Bharat) within the Dhatakikhanda island, there is a country named Sarasamuccaya, which possesses the qualities of the Earth and radiates a splendor equal to the heavenly realm.”3
श्लोक ( Shlok ) 4 – 9
तस्मिन्नागपुरे ख्यातो नरदेवो महीपतिः । स कदाचिदनन्ताख्यगणेशात्कृतवन्दनः ॥ ४ ॥ श्रुतधर्मकथो जातनिर्वेदो ज्येष्ठसूनवे । प्रदाय भोगदेवाय राज्यमापन्नसंयमः ॥ ५ ॥चरंस्तपः समुत्कृष्टं दृष्ट्वा विद्याधराधिपम् । सद्यश्चपलवेगाख्यं निदानमकरोदधीः ॥ ६ ॥प्रान्ते संन्यस्य सौधर्मकल्पेऽभूदमृताशनः । अथास्मिन्भारते क्षेत्रे विजयार्द्धमहाचले ॥ ७ ॥ खगेशो दक्षिणश्रेण्यां मेघकूटपुराधिपः । विनम्यन्वयसम्भूतः सहस्त्रग्रीवखेचरः ॥ ८ ॥क्रुधात्मभ्रातृपुत्रोरुबलेनोत्सादितस्ततः । गत्वा लङ्कापुरं त्रिंशत्सहस्त्राब्दान्यपालयत् ॥ ९ ॥
उसके नागपुर नगरमें नरदेव नामका राजा राज्य करता था। वह किसी एक दिन अनन्त नामक गणधरके पास गया, उन्हें वन्दना कर उसने उनसे धर्म-कथा सुनी और विरक्त होकर भोगदेव नामक बड़े पुत्रके लिए राज्य दे दिया तथा संयम्, धारण कर उत्कृष्ट तपञ्चरण किया। तपश्चरण करते समय उस मूर्खने कदाचित् चपलवेग नामक विद्याधरोंके राजाको देखकर शीघ्र ही निदान कर लिया। जब आयुका अन्त आया तब संन्यास धारण कर सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ । अथानन्तर-इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें जो विजयार्ध नामका महान् पर्वत है उसकी दक्षिण श्रेणीमें मेघकूट नामका नगर है। उसमें राजा विनमिके वंशमें उत्पन्न हुआ सहस्रग्रीव नामका विद्याधर राज्य करता था। उसके भाईका पुत्र बहुत बलवान् था इसलिए उसने क्रोधित होकर सहस्त्रग्रीवको बाहर निकाल दिया था। वह सहस्त्रग्रीव वहाँ से निकल कर लङ्का नगरी गया और वहाँ तीस हजार वर्ष तक राज्य करता रहा ॥ ४-९ ॥
“In its city of Nagapura, a king named Naradeva used to rule. One day, he went to a Ganadhara (chief disciple of a Tirthankara) named Ananta. After bowing to him, he listened to a discourse on Dharma, became detached from worldly pleasures, and handed over the kingdom to his eldest son named Bhogadeva. He then initiated himself into asceticism and practiced supreme penances.
While performing these austerities, that foolish king, upon seeing the king of Vidyadharas named Capalavega, hastily made a Nidana (a binding desire or vow for future worldly reward). When the end of his lifespan arrived, he accepted the vow of Sannyasa (holy death/Sallekhana) and was reborn as a celestial being (Deva) in the Saudharma heaven.
Thereafter—in the southern range of the great Vijayardha mountain, which is located in the Bharatakshetra of this very Jambudvipa, there is a city named Meghakuta. In that city ruled a Vidyadhara named Sahasragriva, born in the lineage of King Vinami. Because Sahasragriva’s nephew was exceedingly powerful, he became enraged and expelled Sahasragriva from the kingdom. Leaving that place, Sahasragriva went to the city of Lanka and ruled there for thirty thousand years.”4 – 9
श्लोक ( Shlok ) 10 – 16
तस्य पुत्रः शतग्रीवस्तत्षडंशोनवत्सरान् । पाति स्म तत्सुतः पञ्चाशीवोप्यन्वपालयत् ॥१०॥वत्सराणां सहस्त्राणि विंशतिं तस्य चात्मजः । पुलस्त्यस्त्रिक ‘मेर्वेकवर्षायुस्तस्य वल्लभा ॥ ११ ॥मेघश्रीरनयोः सूनुः स देवोऽभूद्दशाननः । चतुर्दशसहस्त्राब्दपरमायुर्महीतलम् ॥ १२॥पालयन्नन्यदा कान्तासहायः क्रीडितुं वनम् । गत्वा लङ्केश्वरः खेचराचलस्थालकेशितुः ॥ १३ ॥सुप्ताममितवेगस्य विद्यासाधनतत्पराम् । लोलो मणिमतिं वीक्ष्य काममोहवशीकृतः ॥ १४ ॥तां दुरात्माऽऽत्मसात्कतु तद्विद्यासिद्धिमभ्यहन्’ । सापि द्वादशवर्षोपवासक्लेशकृशीकृता ॥ १५ ॥तत्सिद्धिविन्नहेतुत्वात् कुपित्वा खेचरेशिने । पुत्रिकास्यैव भूत्वेमं वध्यासमिति दुर्मतिम् ॥ १६॥
उसके पुत्रका नाम शतग्रीव था। सहस्त्रग्रीवके बाद उसने वहाँ पच्चीस हजार वर्ष तक राज्य किया था। उसका पुत्र पञ्चाशतग्रीव था उसने भी शतग्रीवके बाद बीस हजार वर्ष तक पृथिवीका पालन किया था, तदनन्तर पञ्चाशतग्रीवके पुलस्त्य नामका पुत्र हुआ उसने भी पिताके बाद पन्द्रह हजार वर्ष तक राज्य किया। उसकी स्त्रीका नाम मेघश्री था। उन दोनोंके वह देव रावण नामका पुत्र हुआ। चौदह हजार वर्षकी उसकी उत्कृष्ट आयु थी, पिताके बाद वह भी पृथिवीका पालन करने लगा। एक दिन लङ्काका ईश्वर रावण अपनी स्त्रीके साथ क्रीड़ा करनेके लिए किसी वनमें गया था। वहाँ विजयार्ध पर्वतके स्थालक नगरके राजा अमितवेगकी पुत्री मणि-मती विद्या सिद्ध करनेमें तत्पर थी उसे देखकर चञ्चल रावण काम और मोहके वश हो गया । उस कन्याको अपने आधीन करनेके लिए उस दुष्टने मणिमतीकी विद्या हरण कर ली। वह कन्या उस विद्याकी सिद्धिके लिए बारह वर्षसे उपवासका क्लेश उठाती अत्यन्त दुर्बल हो गई थी। विद्याकी सिद्धिमें विघ्न्न होता देख वह विद्याधरोंके राजा पर बहुत कुपित हुई। कुपित होकर उसने निदान किया कि मैं इस राजाकी पुत्री होकर इस दुर्बुद्धिका वध अवश्य करूँगी ।। १०-१६ ॥
“His son’s name was Satagriva. After Sahasragriva, he ruled there for twenty-five thousand years. His son was Pancasatagriva, who also protected the Earth for twenty thousand years after Satagriva. Thereafter, Pancasatagriva had a son named Pulastya, who also ruled for fifteen thousand years after his father. His wife’s name was Meghasri.
To them, that celestial being was reborn as a son named Ravana. His maximum lifespan was fourteen thousand years, and after his father, he too began to rule the Earth. One day, Ravana, the lord of Lanka, went to a forest to enjoy sport with his wife. There, Manimati, the daughter of King Amitavega of the city of Sthalaka on the Vijayardha mountain, was deeply engrossed in performing austerities to master a mystical science (vidya). Upon seeing her, the fickle-minded Ravana fell under the sway of lust and infatuation.
To bring that maiden under his control, the wicked king disrupted and stole Manimati’s ritual of mastery. That maiden had become extremely frail, enduring the hardships of fasting for twelve years to master that vidya. Seeing this obstacle in the attainment of her powers, she became furious with the king of the Vidyadharas. In her rage, she made a Nidana (a binding vow for a future life): ‘I will surely be born as this king’s daughter and bring about the death of this evil-minded soul!'”10 – 16
श्लोक 17 से 30
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426 | श्लोक 427 से 443 | श्लोक 444 से 461 | श्लोक 462 से 471
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