राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 152 to 163
श्लोक ( Shlok ) 152
बभूव स्थविरा रूपपरावर्तनविद्यया । सीताविलाससन्दर्शसम्भूतश्रीडयेव सा ॥ १५२ ॥
रूप-परावर्तन विद्यासे वह बुढ़िया बन गई उससे ऐसी जान पड़ती थी मानो सीताका विलास देखनेसे उत्पन्न हुई लज्जाके कारण ही उसने अपना रूप परिवर्तित कर लिया हो ।। १५२ ॥
“By utilizing the magical art of form-transformation (Rupa-paravartana Vidya), she turned herself into an old woman. She appeared as though she had altered her form out of sheer modesty and shame, brought on by witnessing the private, intimate pastimes of Sita.” (152)
श्लोक ( Shlok ) 153
तद्पं वर्णयन्तीत्थं सकौतुकममन्वत । स्वबुद्धिकौशलादेतत्कृतं रूपं न वेधसा ॥ १५३ ॥
कवि लोग उसके रूपका ऐसा वर्णन करते थे, और कौतुक सहित ऐसा मानते थे कि विधाताने इसका रूप अपनी बुद्धिकी कुशलतासे नहीं बनाया है अपितु अनायास ही बन गया है। यदि ऐसा न होता तो वह इसके समान ही दूसरा रूप क्यों नहीं बनाता ? ॥ १५३ ॥
“Poets would describe her beauty in such a way, believing with great curiosity that the Creator did not fashion her form through the mere skill of His intellect, but rather, it came into being spontaneously and effortlessly. For if it were not so, why has He never been able to create another form equal to hers?” (153)
श्लोक ( Shlok ) 154 – 155
यादृच्छिकं न चेदन्यत्किमकारीति नेदृशम् । शेषदेव्यो जराजीर्णा तां दृष्ट्वा यौवनोद्धताः ॥ १५४ ॥का त्वं वद कुतस्त्या वेत्यवोचन्हासपूर्वकम् । उद्यानपालकस्याहं मातात्रैवेति सा पुनः ॥ १५५ ॥
सीताको छोड़ अन्य रानियाँ यौवनसे उद्धत हो, वृद्धावस्थाके कारण अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण दिखनेवाली उस बुढ़ियाको देख हँसी करती हुईबोलीं कि बतला तो सही तू कौन है ? और कहाँ से आई है ? इसके उत्तर में बुढ़िया कहने लगी कि मैं इस बगीचाकी रक्षा करनेवालेकी माता हूँ और यहीं पर रहती हूँ ।। १५४-१५५ ।।
“Except for Sita, the other queens—proud and arrogant in their youth—grew amused upon seeing the old woman, who appeared thoroughly worn-out and decrepit due to advanced age. Laughing at her, they said, ‘Tell us truly, who are you? And where have you come from?’ In response to this, the old woman began to say, ‘I am the mother of the caretaker of this garden, and I live right here.'” (154-155)
श्लोक ( Shlok ) 156 – 159
तासां चित्तपरीक्षार्थमिमां वाचमुदाहरत् । युष्मदपुण्यभागिन्यो मान्याः सन्त्यन्ययोषितः ॥ १५६ ॥यस्मादाभ्यां कुमाराभ्यां सह भोगपरायणाः । युष्माभिः ‘प्राक्कृतं किं वा पुण्यं तन्मम कथ्यताम् ॥ १५७॥तत्करिष्यामि येनास्य राज्ञी भूत्वा महीपतेः । इमं विरक्तमन्यासु विधास्यामीति तद्वचः ॥ १५८ ॥श्रुत्वा ताश्चित्तमेतस्यास्तरुणं स्मरविह्वलम् । वपुरेव जराग्रस्तमित्यर्ल सहसाऽहसन् ॥ १५९ ॥
तदनन्तर उनके चित्तकी परीक्षा करनेके लिए वह फिर कहने लगी कि हे माननीयो ! आप लोगोंके सिवाय जो अन्य स्त्रियाँ हैं वे अपुण्यभागिनी हैं, आप लोग ही पुण्यशालिनी हैं क्योंकि इन कुमारोंके साथ आप लोग भोग भोगनेमें सदा तत्पर रहती हैं। आप लोगोंने पूर्वभवमें कौन-सा पुण्य कर्म किया था, वह मुझसे कहिये। मैं भी उसे करूँगी, जिससे इस राजाकी रानी होकर इसे अन्य रानियोंसे विरक्त कर दूंगी। इस प्रकार उसके वचन सुन सब रानियाँ यह कहती हुई हँसने लगीं कि इसका शरीर ही बुढ़ापासे ग्रस्त हुआ है चित्त तो जवान है और काम से विह्वल है ।। १५६-१५९ ।।
“Thereafter, in order to test their hearts, she spoke again, saying, ‘O honorable ladies! Except for you all, all other women are truly unfortunate; you alone are highly virtuous and blessed, for you are ever-devoted to enjoying pleasures with these young princes. Tell me, what meritorious deeds (Punya) did you perform in your past life (Purvabhava)? I, too, shall perform them, so that I may become the queen of this king and turn his heart away from his other wives.’ Hearing her words, all the queens began to laugh, saying, ‘Only her body has been seized by old age, but her mind is still youthful and overwhelmed with passion!'” (156-159)
श्लोक ( Shlok ) 160 – 163
मा हासः कुलसौरूप्यकलागुणयुजामिह । समप्रेम फलप्राप्तेः किमन्यज्जन्मनः फलम् ॥ १६० ॥वदतेति वदन्तीं तां पुनर्भो जन्मनः फलम् । तवेदमेव चेदस्मद्विभुना विधिना वयम् ॥ १६१ ॥त्वामद्य योजयिष्यामः परिमुक्तविचारणम् । महादेवी भवेत्यासां हासवाणशरव्यताम् ॥ १६२ ॥उपयान्तीमिमां वीक्ष्य कारुण्याज्जनकात्मजा । किमित्याकांक्षसि स्त्रीत्वं त्वं हितानवबोधिनी ॥ १६३ ॥
इसके उत्तरमें बुढ़िया बोली कि आप लोग कुल, उत्तम रूप तथा कला आदि गुणोंसे युक्त हैं अतः आपको हँसी करना उचित नहीं है। आप सबको एक समान प्रेम रूपी फलकी प्राप्ति हुई है इससे बढ़कर जन्मका दूसरा फल क्या हो सकता है ? आप लोग ही कहें। इस प्रकार कहती हुई बुढ़ियासे वे फिर कहने लगीं कि यदि तेरे जन्मका यही फल है तो हम तुझे अपने-अपने पतिके साथ विधिपूर्वक मिला देंगी । तू बिना किसी विचारके इनकी पट्टरानी हो जाना। इस प्रकार उन स्त्रियोंकी हँसी रूपी वाणोंका निशाना बनती हुई बुढ़ियाको देख सीता दयासे कहने लगी कि तू स्त्रीपना क्यों चाहती है ? जान पड़ता है तू अपना हित भी नहीं समझती ॥ १६०-१६३ ॥
“In response to this, the old woman said, ‘You all are endowed with noble lineage, exquisite beauty, and exceptional artistic skills; therefore, it is not proper for you to mock me. You all have equally attained the fruit of mutual love; what greater fulfillment of a human birth could there be than this? You tell me.’ To the old woman speaking in this manner, the queens said again, ‘If this is the ultimate goal of your life, then we shall formally and duly unite you with our respective husbands. Without a second thought, you can become their chief queen (Pattrani).’ Seeing the old woman thus becoming the target of those women’s arrows of mockery, Sita spoke out of compassion, ‘Why do you desire to remain caught up in womanly passion? It appears that you do not even understand your own true welfare.'” (160-163)
श्लोक 164 से 174
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63