राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 423 to 435
श्लोक ( Shlok ) 423
रत्नं ममानिवेद्येदं जनकेन समर्पितम् । दर्पाद्दाशरथौ तस्मादाहृतेयं मया रुषा ॥ ४२३॥
कि ‘चूँकि राजा जनकने अहंकार वश मुझे सूचना दिये बिना ही यह सीता रूपी रत्न रामचन्द्रके लिए दिया था इसलिए क्रोधसे मैं इसे ले आया हूं ॥ ४२३ ॥
“Saying, ‘Since King Janaka, out of arrogance, gave this gem-like Sita to Ramachandra without informing me, I have brought her here out of anger.'” [423]
श्लोक ( Shlok ) 424 – 427
मद्योग्य वस्तुस्वीकारादकीर्ते श्वेन्द्भवेन्मम । चक्ररनं च मद्धस्तादाददातु स राघवः ॥ ४२४ ॥ इत्यन्वतोऽञ्जनासूनुरवोचद्दशकन्धरम् । वचः प्रसन्नगम्भीरं तत्तदुक्त्यनुसारि यत् ॥ ४२५॥सीता मया हतेत्येतत्कि वक्षि विदितं जनैः । करे कस्य स्थिता सेति विभो त्वद्धरणक्षणे ॥ ४२६ ॥किमेतेन भवच्छौर्य वदान प्रकटीभवेत् । किं वृथोक्त्या प्रियेणैव राज्ञी मंधु ‘त्वयार्ण्यताम् ॥ ४२७ ॥
मेरे योग्य वस्तु स्वीकार करनेसे यदि मेरी अकीर्ति होती है तो हो। वह रामचन्द्र तो मेरे हाथसे चक्ररत्न भी ग्रहण करना चाहता है’ इस प्रकार रावणने कहा। तदनन्तर अणुमान् रावणके कहे अनुसार उससे प्रसन्न तथा गम्भीर वचन कहने लगा कि सीता मैंने हरी है यह आप क्यों कहते हैं? यह सब जानते है कि जिस समय आपने सीता हरी थी उस समय वह किसके हाथमें थी किसके पास थी ? आप सीताको हर कर नहीं लाये हैं किन्तु चुरा कर लाये हैं। अतः यह कहिये कि इस कार्यसे क्या आपकी शूरवीरता प्रकट होती है ? अथवा इन व्यर्थकी बातोंसे क्या लाभ है। आप मीठे वचनोंसे ही रानी सीताको शीघ्र वापिस कर दीजिये ।। ४२४-४२७ ।।
“‘If accepting an object worthy of me brings me infamy, so be it. That Ramachandra even wishes to take the divine discus (Chakraratna) from my hands,’ Ravana said.
Thereafter, responding to Ravana’s statements, Anuman (Hanuman) began to speak to him in a composed and profound tone, saying: ‘Why do you claim that you abducted Sita? Everyone knows whose care she was under and with whom she was at the time you took her. You did not bring Sita by forcefully abducting her; rather, you brought her by stealing her in secret. Therefore, tell me, does this act truly display your bravery? Or else, what is the use of this pointless talk? You should simply return Queen Sita quickly with sweet words.'” [424-427]
श्लोक ( Shlok ) 428 – 435
इति तद्गुढहासोक्तिवह्नि सन्तापिताशयः । पुष्पकाधिपतिर्दृष्टि ३ विषाहीन्द्र फणामणिम् ॥ ४२८ ॥।आदातुमिच्छतो गन्तुं गतिं रामोऽभिवाञ्छति । दूतस्त्वं ‘तन्न वध्योऽसि याहि याहील्यतर्जयत् ॥४२९ ॥ निर्जित्य सिन्धुरारातिं गर्जितेनोर्जिता क्रुधा । ततः कुम्भनिकुम्भोऽग्रकुम्भकर्णादिभिर्भटैः ॥ ४३० ॥ इन्द्रजित्सेन्द्र चर्मातिकन्यार्कखरदूषणैः । खरेण दुर्मुखाख्येन महामुखखगेशिना ॥ ४३१ ॥ क्रन्द्वैः कुमारैरन्यैश्च तर्ज्यमानोऽनिलात्मजः । गर्जितेन वृथानेन वनिताजनसम्मुखम् ॥ ४३२॥ किं कृत्यमत्र संग्रामे मदीयं शृणुत्तोत्तरम् । इत्यवादीत्तदा नेदमुचितं दुरुदीरितम् ॥ ४३३ ॥ इति तान् वारयन् कुद्धान् नयवेदी विभीषणः । याहि भद्रानिवार्योऽयमकार्यखरदूषणैः ॥ ४३४ ॥ शुभाशुभविपाकानां भाविनां को निवारकः । इत्युवाचाणुमांश्चैत्य जानकीं वर्जिताशमाम् ॥ ४३’५ ॥
इस प्रकार अणुमान् से उत्पन्न हुए तिरस्कार सूचक रूपी अग्निसे जिसका हृदय संतप्त हो रहा है ऐसा पुष्पक विमानका स्वामी रावण कहने लगा कि ‘रामचन्द्र, दृष्टिविष सर्पके फणामणिको ग्रहण करनेकी इच्छा करनेवाले पुरुषकी गतिको प्राप्त करना चाहता है–मरना चाहता है। तू दूत होनेके कारण मारने योग्य नहीं है अतः यहाँ से चला जा, चला जा, इस प्रकार रावणने सिंहको जीतनेवाली अपनी गर्जनासे अणुमान्को ललकारा । तदनन्तर कुम्भ, निकुम्भ एवं क्रूर प्रकृतिवाले कुम्भकर्ण आदि योद्धाओंने इन्द्रजित्, इन्द्रचर्म, अति-कन्यार्क, खरदूषण, खर, दुर्मुख, महामुख आदि विद्याधरोंने और क्रुद्ध हुए अन्य कुमारोंने अणुमान् को बहुत ही ललकारा। तब अणुमान् ने कहा कि स्त्रीजनोंके सामने इस व्यर्थकी गर्जनासे क्या लाभहै ? इससे कौनसा कार्य सिद्ध होता है ? आप लोग मेरा उत्तर संग्राममें ही सुनिये । यह सुन नयोंके जाननेवाले विभीषणने उन क्रुद्ध विद्याधरोंको रोकते हुए कहा कि यह दुर्वचन कहना ठीक नहीं है। विभीषणने अणुमान् से भी कहा कि हे भद्र ! तुम अपने घर जाओ। अकार्य करनेके कारण जिसे आर्य मनुष्योंने छोड़ दिया है ऐसे इस रावणको कोई नहीं रोक सकता – यह किसीकी बात मानने-वाला नहीं है। ठीक ही है आगे आने वाले शुभ-अशुभ कर्मके उदय को भला कौन रोक सकता है ? इस प्रकार विभीषणने कहा तब अणुमान्, जिसने आहार पानी छोड़ रक्खा था ऐसी सीताके पास गया ।॥ ४२८-४३५ ।।
“In this manner, Ravana, the lord of the Pushpaka chariot, whose heart was burning with the blazing fire of humiliation caused by Anuman (Hanuman), said, ‘Ramachandra wishes to meet the same fate as a man who desires to seize the hood-jewel of a venomous serpent whose very glance is deadly—he wishes to seek his own death! Because you are a messenger, you are not fit to be killed; therefore, get out of here, leave at once!’ With this, Ravana challenged Anuman with a roar that could conquer a lion.
Thereafter, warriors like Kumbha, Nikumbha, and the cruel-natured Kumbhakarna, along with Vidyadharas like Indrajit, Indracharma, Ati-kanyarka, Kharadushana, Khara, Durmukha, Mahamukha, and other infuriated princes, vehemently challenged Anuman. Then Anuman said, ‘What is the use of this pointless roaring in front of women? What purpose does it serve? You shall hear my answer only on the battlefield.’
Hearing this, Vibhishana, who understood the principles of diplomacy and conduct, restrained those angry Vidyadharas and said, ‘It is not proper to speak such harsh words.’ Vibhishana then turned to Anuman and said, ‘O gentle one! Go back to your home. No one can restrain this Ravana, who has been abandoned by noble souls for committing an improper deed—he is not one to listen to anyone’s counsel. It is rightly said, who can ever stop the rise of impending good or bad destiny?’ When Vibhishana spoke thus, Anuman went to Sita, who had completely renounced all food and water.” [428-435]
श्लोक 436 से 452
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422
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