नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 32 to 43
श्लोक ( Shlok ) 32 – 35
जित्वा चिन्तागतिर्वेगात्तां पश्चादिति चाब्रवीत् । सम्भावय कनीयांसं मम त्वं रत्नमालया ॥३२॥श्रुततद्वचना साह नाहं जितवतोऽपरैः । मालामिमां क्षिपामीति स तामित्यब्रवीत् पुनः ॥३३॥गतियुद्धं त्वया पूर्वमनुजाभ्यां कृतं मम । अभिलाषात्ततस्त्या त्वं मया तद्वचनश्रुतेः ॥३४॥निर्विण्णा सा निवृत्चायिकाभ्यासेऽगात्तपः परम् । तद्वीक्ष्य बहवस्तत्र निर्विद्य तपसि स्थिताः ॥३५॥
तत्पश्चात् चिन्तागति उसे अपने वेगसे जीतकर कहने लगा कि तू रत्नोंकी मालासे मेरे छोटे भाईको स्वीकार कर । चिन्तागतिके वचन सुनकर प्रीतिमतीने कहा कि जिसने मुझे जीता है उसके सिवाय दूसरेके गलेमें मैं यह माला नहीं डालूँगी। इसके उत्तर में चिन्तागतिने कहा कि चूँकि तूने पहले उन्हें प्राप्त करनेके इच्छासे ही मेरे छोटे भाइयोंके साथ गतियुद्ध किया था अतः तू मेरे लिए त्याज्य है। चिन्तागतिके यह वचन सुनते ही वह संसारसे विरक्त हो गई और और उसने विवृत्ता नामकी आर्यिकाके पास जाकर उत्कृष्ट तप धारण कर लिया। यह देख वहाँ बहुतसे लोगोंने विरक्त होकर दीक्षा धारण कर ली ॥ ३२-३५ ॥
“Thereafter, Chintagati, having defeated her with his superior speed, said to her, ‘Accept my younger brother by placing this garland of jewels around his neck.’
Upon hearing Chintagati’s words, Pritimati replied, ‘I will not place this garland around anyone else’s neck except the one who has actually defeated me.’
In response to this, Chintagati said, ‘Since you previously engaged in the contest of speed with my younger brothers with the sole desire of attaining them, you are now unacceptable to me.’
The moment she heard these words from Chintagati, she became detached from the worldly life. She went to an Aryika (Jain female ascetic) named Vivritta and took up supreme, rigorous penance. Seeing this, many other people there also became detached from worldly attachments and initiated themselves into monastic life.” [32-35]
श्लोक ( Shlok ) 36 – 37
अनुजाभ्यां समं चिन्तागतिश्चालोक्य साहसम् । कन्याया जातसंवेगो गुरुं दमवराभिधम् ॥३६॥सम्प्राप्य संयमं प्राप्य शुद्धयष्टकमधिष्ठितः । प्रान्ते सामानिकस्तुर्य कल्पेऽजायत सानुजः ॥ ३७ ॥
कन्याका यह साहस देख जिसे वैराग्य उत्पन्न हो गया है ऐसे चिन्तागतिने भी अपने दोनों छोटे भाइयोंके साथ दमवर नामक गुरुके पास जाकर संयम धारण कर लिया और आठों शुद्धियोंको पाकर तीनों भाई चौथे स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए ॥ ३६-३७ ।।
“Witnessing this courage of the maiden, Chintagati—who had also developed a deep sense of worldly detachment—went along with both of his younger brothers to a Guru named Damavar and embraced self-restraint (sanyam). Attaining all the eight purities, the three brothers were later reborn as Samanika category celestial beings in the fourth heaven.” [36-37]
श्लोक ( Shlok ) 38 – 40
तत्र भोगान्यहून् भुक्त्वा सप्तान्धिपरमायुषा । वतस्तावनुजौ जम्बूद्वीपपूर्वविदेहगे ॥ ३८ ॥विषये पुष्कलावत्यां विजयार्दोत्तरे तटे । राजा गगनचन्द्राख्यः पुरे गगनवल्लभे ॥ ३९ ॥सुतो गगनसुन्दर्या तस्यामितमतिस्ततः । आवाममिततेजाश्च जातौ विद्यात्रयान्वितौ ॥ ४० ॥
वहाँ सात सागरकी उत्कृष्ट आयु पर्यन्त अनेक भोगोंका अनुभव कर च्युत हुए और दोनों छोटे भाइयोंके जीव जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्र सम्बन्धी पुष्कला देशमें जो विजयार्ध पर्वत है उसकी उत्तर श्रेणीमें गगनवल्लभ नगरके राजा गगनचन्द्र और उनकी रानी गगनसुन्दरीके हम दोनों अमितमति तथा अमिततेज नामके पुत्र उत्पन्न हुए हैं। हम दोनों ही तीनों प्रकारकी विद्याओं से युक्त थे ॥ ३८-४० ॥
“Having experienced numerous celestial pleasures there for a maximum lifespan of seven Sagara (an immense cosmic time unit), they departed from that heaven. The souls of the two younger brothers were then reborn in the Jambudvipa continent, within the Pushkala country belonging to the East Videha region. There, on the northern range of the Vijayardha mountain, in the city of Gaganavallabha, we were born as the sons of King Gaganachandra and Queen Gaganasundari, named Amitamati and Amitateja. Both of us were endowed with all three types of extraordinary knowledge (vidyas).” [38-40]
श्लोक ( Shlok ) 41 – 43
अन्येधुः पुण्डरीकिण्यामावाभ्यां जन्मपूर्वजम् । आवयोः परिपृष्टेन जन्मत्रितयवृत्तकम् ॥ ४१ ॥सर्व स्वयंप्रभाख्येन तीर्थनाथेन भाषितम् । ततोऽस्मदग्रजः क्वाद्येत्यावयोरनुयोजने ॥ ४२ ॥भूमौ सिंहपुरे जातो राजते सोऽषराजित- । नान्ना राज्यं समासाद्य स्वयमित्यर्हतोदितम् ॥ ४३ ॥
किसी दूसरे दिन हम दोनों पुण्डरीकिणी नगरी गये। वहाँ श्री स्वयंप्रभ तीर्थ-करसे हम दोनोंने अपने पिछले तीन जन्मोंका वृत्तान्त पूछा। तब स्वयंप्रभ भगवान् ने सब वृत्तान्त ज्योंका त्यों कहा । तदनन्तर हम दोनोंने पूछा कि हमारा बड़ा भाई इस समय कहाँ उत्पन्न हुआ है ? इसके उत्तरमें भगवान् ने कहा कि वह सिंहपुर नगर में उत्पन्न हुआ है, अपराजित उसका नाम है, और स्वयं राज्य करता हुआ शोभायमान है ॥ ४१-४३ ॥
“On another day, both of us went to the city of Pundarikini. There, we asked the Tirthankara, Lord Swayamprabha, about the account of our previous three births. Then, Lord Swayamprabha narrated the entire account exactly as it had occurred.
Thereafter, both of us asked, ‘Where is our eldest brother born at this time?’ In response to this, the Lord replied, ‘He is born in the city of Singhapur, his name is Aparajit, and he looks magnificent ruling his kingdom himself.'” [41-43]
श्लोक 44 से 52
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