Summary of Uttar Puran Parv 56 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 56 (श्लोक 1–96) : संक्षिप्त सारांश
इस पर्व में शीतलनाथ भगवान् के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और मोक्ष का वर्णन किया गया है। प्रारम्भ में राजा पद्मगुल्म का परिचय दिया गया है, जो अत्यन्त प्रतापी, नीतिज्ञ और धर्मपूर्वक राज्य करने वाले राजा थे। वसन्त ऋतु और विषय-भोगों में आसक्त होने के बाद उन्होंने संसार की नश्वरता का विचार किया और वैराग्य धारण कर राज्य त्यागकर मुनि दीक्षा ग्रहण की। तप और आराधना के प्रभाव से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया तथा मृत्यु के बाद आरण स्वर्ग में इन्द्र हुए।
इसके पश्चात् वे भरत क्षेत्र में राजा दृढ़रथ की रानी सुनन्दा के गर्भ में अवतीर्ण हुए। शुभ स्वप्नों और देवों की पूजा के मध्य भगवान् शीतलनाथ का जन्म हुआ। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक कर उन्हें “शीतलनाथ” नाम दिया। युवावस्था में उन्होंने आदर्श रूप से राज्य संचालन किया, किन्तु संसार की अनित्यता का अनुभव होने पर वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य त्यागकर दीक्षा ली, कठोर तप किया और अंततः केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके विशाल धर्मसंघ में असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे।
भगवान् शीतलनाथ ने अनेक जीवों को सम्यक्त्व और धर्ममार्ग का उपदेश दिया तथा अन्त में सम्मेदशिखर पर मोक्ष प्राप्त किया। उनके मोक्ष के पश्चात् कालदोष से धर्म की शुद्ध परम्परा क्षीण होने लगी। राजा मेघरथ की सभा में दान के स्वरूप पर चर्चा हुई, जहाँ मंत्री सत्यकीर्ति ने शास्त्रदान, अभयदान और आहारदान को श्रेष्ठ बताया तथा शास्त्रदान को सर्वोपरि सिद्ध किया। परन्तु मुण्डशालायन नामक ब्राह्मण ने लौकिक दानों का समर्थन कर राजा को भ्रमित किया। परिणामस्वरूप कुपात्र दान और मिथ्या परम्पराओं का प्रचार होने लगा। इस प्रकार पर्व में धर्म की महिमा, वैराग्य, मोक्षमार्ग और कालान्तर में धर्म के पतन का मार्मिक वर्णन किया गया है।
श्लोक 1 से 11 : राजा पद्मगुल्म का वैभव और वैराग्य की भूमिका
भगवान् शीतलनाथ भगवान् के धर्म को संसार के दुःखों से संतप्त जीवों के लिए चन्द्रमा के समान शीतल और शान्तिदायक बताया गया है। पुष्करवर द्वीप के वत्स देश में सुसीमा नगरी के राजा पद्मगुल्म अत्यन्त बुद्धिमान, पराक्रमी और नीति-कुशल शासक थे। उनका राज्य धर्म, अर्थ और काम से सम्पन्न था तथा वे न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करते थे। वसन्त ऋतु के आगमन के साथ उनका मन विषय-भोगों में आसक्त हुआ और कामदेव के प्रभाव से वे सांसारिक सुखों में रत रहने लगे।
श्लोक 12 से 22 : वैराग्य, दीक्षा और स्वर्गगमन
वसन्त ऋतु के समाप्त होते ही राजा पद्मगुल्म का चित्त विषाद से भर गया। उन्होंने विचार किया कि काम और विषय संसार के दुःखों का कारण हैं। इस विवेक से उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य अपने पुत्र चन्दन को सौंपकर आनन्द मुनिराज के पास दीक्षा ग्रहण की। तप, अध्ययन और त्रिरत्न की आराधना द्वारा उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और समाधिमरण से आरण स्वर्ग में इन्द्र पद प्राप्त किया। वहाँ उन्होंने अत्यन्त दिव्य सुखों का उपभोग करते हुए अपनी आयु पूर्ण की।
श्लोक 23 से 31 : भगवान् शीतलनाथ का गर्भ और जन्म कल्याणक
जब उस इन्द्र की आयु समाप्ति के समीप आई तब वे भरत क्षेत्र के मलय देश के भद्रपुर नगर में राजा दृढ़रथ की रानी सुनन्दा के गर्भ में अवतीर्ण हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और देवों ने प्रथम कल्याणक की पूजा की। माघ कृष्ण द्वादशी के दिन भगवान् शीतलनाथ का जन्म हुआ। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक कर “शीतलनाथ” नाम रखा। उनका शरीर सुवर्ण के समान कान्तिमान, आयु एक लाख पूर्व और शरीर नब्बे धनुष ऊँचा था।
श्लोक 32 से 41 : राज्यपालन और संसार की अनित्यता का बोध
युवावस्था पूर्ण होने पर भगवान् शीतलनाथ ने राज्य संभाला और आदर्श रूप से प्रजा का पालन किया। एक दिन वन-विहार करते समय उन्होंने पाले को शीघ्र नष्ट होते देखा। इससे उन्हें संसार की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि विषय-सुख मिथ्या हैं और राग-द्वेषयुक्त जीव कभी वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता। इस प्रकार उनके भीतर गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ।
श्लोक 42 से 55 : दीक्षा, केवलज्ञान और दिव्य संघ
भगवान् शीतलनाथ ने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और लौकान्तिक देवों की स्तुति के मध्य सहेतुक वन में दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। पुनर्वसु राजा के यहाँ आहार ग्रहण करने के बाद कठोर तप किया और बेल वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने ज्ञान कल्याणक मनाया। उनके विशाल धर्मसंघ में गणधर, पूर्वधारी, अवधिज्ञानी, केवलज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ बड़ी संख्या में सम्मिलित थे।
श्लोक 56 से 61 : मोक्ष और भगवान् की स्तुति
भगवान् शीतलनाथ ने असंख्यात जीवों को सम्यक्त्व प्रदान करते हुए सम्मेदशिखर पर पहुँचकर एक माह तक योगनिरोध किया। आश्विन शुक्ल अष्टमी के दिन उन्होंने एक हजार मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने पंचम कल्याणक सम्पन्न किया। कवि ने उनकी स्तुति करते हुए कहा है कि उनके जन्म से संसार में चन्द्रमा के समान शीतलता और आनन्द फैल गया तथा उन्होंने रति और तृष्णा का नाश किया।
श्लोक 62 से 71 : धर्म का ह्रास और दानों का विवेचन
भगवान् शीतलनाथ के तीर्थ के अन्तकाल में कालदोष से धर्म का ह्रास होने लगा। उसी समय राजा मेघरथ ने सभा में श्रेष्ठ दान के विषय में प्रश्न किया। मंत्री सत्यकीर्ति ने शास्त्रदान, अभयदान और आहारदान को श्रेष्ठ बताया तथा कहा कि शास्त्रदान सबसे महान है क्योंकि वही मोक्षमार्ग का प्रकाशक है। अभयदान प्राणियों को निर्भयता देता है और आहारदान साधुओं की साधना में सहायक होता है।
श्लोक 72 से 81 : शास्त्रदान की महिमा और मिथ्या मत का उदय
मंत्री ने स्पष्ट किया कि शास्त्र के अध्ययन, श्रवण और मनन से शुद्ध बुद्धि उत्पन्न होती है, जिससे जीव मोक्षमार्ग में अग्रसर होता है। इसलिए शास्त्रदान सर्वश्रेष्ठ दान है। परन्तु राजा मेघरथ इस मत से संतुष्ट नहीं हुआ। उसी सभा में उपस्थित मुण्डशालायन नामक ब्राह्मण ने राजाओं के लिए भूमि, सुवर्ण आदि दानों को श्रेष्ठ बताकर मंत्री के मत का विरोध किया।
श्लोक 82 से 91 : कुपात्र दान की निन्दा
मुण्डशालायन ने अपनी रचित पुस्तक द्वारा राजा को भ्रमित किया और राजा ने उसे भूमि तथा सुवर्ण का दान देना आरम्भ कर दिया। तब मंत्री ने समझाया कि दान वही प्रशंसनीय है जो योग्य पात्र को दिया जाए और जिससे अपने तथा दूसरे दोनों का उपकार हो। कुपात्र को दिया गया दान ऊसर भूमि में बोए गए बीज के समान निष्फल होता है। फिर भी राजा ने मंत्री की बात स्वीकार नहीं की और मिथ्या दान-प्रथा को बढ़ावा दिया।
श्लोक 92 से 96 : मिथ्या दानों का प्रचार और पर्व की पूर्णता
राजा मेघरथ ने प्राचीन सत्पथ छोड़कर मुण्डशालायन द्वारा बताए गए नवीन लौकिक दानों को प्रचलित किया। कन्यादान, हस्तिदान, सुवर्णदान, अश्वदान, गोदान, भूमिदान आदि दस प्रकार के दानों का प्रचार हुआ। इस प्रकार शीतलनाथ भगवान् के तीर्थ के अन्तकाल में धर्म की शुद्ध परम्परा क्षीण होती गई। अंत में आचार्य द्वारा रचित शीतलपुराण के छप्पनवें पर्व की पूर्णता का वर्णन किया गया है।
पर्व 57
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