श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82
अधीत्य सर्वशास्त्राणि विधाय परमं तपः । तत्रैवेन्द्रोऽभवत्कल्पे विमानेऽनुत्तराह्वये ॥ ८२ ॥
समस्त शास्त्रोंका अध्ययन कर तथा उत्कृष्ट तप कर वह उसी प्राणत स्वर्गके अनुत्तर नामक विमानमें इन्द्र हुआ ।॥ ८२ ॥
Having mastered all the scriptures and performed supreme austerities, he was reborn as an Indra in the Anuttara vimāna of that very Prāṇata heaven. ॥ 82 ॥
श्लोक ( Shlok ) 83
ततोऽवतीर्य वर्षेऽस्मिन् पुरीद्वारावतीपतेः । ब्रह्माख्यस्याचलस्तोकः सुभद्रायामभूद्विभुः ॥ ८३ ॥
वहाँ से चय कर इसी भरतक्षेत्रकी द्वारावती नगरीके राजा ब्रह्मके उनकी रानी सुभद्राके अचलस्तोक नामका पुत्र हुआ ॥ ८३ ॥
Descending from that celestial realm and taking rebirth in this very Bharata-kṣetra, he was born in the city of Dvārāvatī as a son named Acalastoka to King Brahma and his queen Subhadrā. ॥ 83 ॥
श्लोक ( Shlok ) 84 – 85
तस्यैवासौ सुषेणाख्योऽप्युषायामात्मजोऽजनि । द्विपृष्ठाख्यस्तनुस्तस्य चापसप्ततिसम्मिता ॥ ८४ ॥द्वासप्ततिसमालक्षाः परमायुर्निरन्तरम् । राजभोगान भुक्तोच्चै रिक्ष्वाकूणां कुलाग्रणीः ॥ ८५ ॥
तथा सुषेणका जीव भी वहाँ से चय कर उसी ब्रह्म राजाकी दूसरी रानी उषाके द्विष्पृष्ठ नामका पुत्र हुआ । उस द्विष्पृष्ठ का शरीर सत्तर धनुष ऊँचा था और आयु बहत्तर लाख वर्षकी थी। इस प्रकार इक्ष्वाकु वंशका अग्रेसर वह द्विष्पृष्ठ, राजाओंके उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करता था ।। ८४-८५ ॥
Likewise, the soul of Suṣeṇa also descended from that celestial realm and was born to that same King Brahma, through his other queen Uṣā, as a son named Dviṣpṛṣṭha. The body of that Dviṣpṛṣṭha was seventy bow-lengths in height, and his lifespan extended to seventy-two lakh years. Thus did Dviṣpṛṣṭha, foremost among the descendants of the Ikṣvāku lineage, enjoy the most exalted royal pleasures. ॥ 84–85 ॥
श्लोक ( Shlok ) 86
कुन्देन्द्रनीलसङ्काशावभातां बलकेशवौ । सङ्गमेन प्रवाहो वा गङ्गायमुनयोरम् ॥ ८६ ॥
कुन्द पुष्प तथा इन्द्रनीलमणिके समान कान्तिवाले वे बलभद्र और नारायण जब परस्परमें मिलते थे तब गङ्गा और यमुनाके प्रवाहके समान जान पड़ते थे ।॥ ८६ ॥
Those Balabhadra and Nārāyaṇa, radiant respectively like the white kunda blossom and the dark-blue sapphire, appeared—whenever they came together—like the conjoined streams of the Gaṅgā and the Yamunā. ॥ 86 ॥
श्लोक ( Shlok ) 87
अविभक्तां महीमेतावभुक्तां पुण्यनायकौ । सरस्वतीं गुरूद्दिष्टां समानश्राविकाविव ॥ ८७ ॥
जिस प्रकार समान दो श्रावक गुरुके द्वारा दी हुई सरस्वतीका बिना विभाग किये ही उपभोग करते हैं उसी प्रकार पुण्यके स्वामी वे दोनों भाई बिना विभाग किये ही पृथिवीका उपभोग करते थे ॥ ८७॥
Just as two devoted disciples alike partake, without division, of the Sarasvatī bestowed by their preceptor, so too did those two brothers—lords of great merit—enjoy the earth jointly and without partition. ॥ 87 ॥
श्लोक ( Shlok ) 88
अविवेकस्तयोरासीदधीताशेषशास्त्रयोः । अपि श्रीकामिनीयोगे स एव किल शस्यते ॥ ८८ ॥
समस्त शास्त्रोंका अध्ययन करनेवाले उन दोनों भाइयोंमें अभेद था-किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था सो ठीक ही है क्योंकि उसी अभेदकी प्रशंसा होती है जो कि लक्ष्मी और स्त्रीका संयोग होनेपर भी बना रहता है ।॥ ८८ ॥
Between those two brothers, who had mastered all the scriptures, there existed perfect unity and not the slightest trace of discord. Indeed, rightly is that concord alone praised which endures even amidst the temptations of wealth and the companionship of women. ॥ 88 ॥
श्लोक ( Shlok ) 89
स्थिरावत्युन्नतौ शुक्लनीलौ भातः स्म भूभृतौ । कैलासाञ्जनसञ्ज्ञौ वा सङ्गत्तौ तौ मनोहरौ ॥ ८९ ॥
वे दोनों स्थिर थे, बहुत ही ऊँचे थे, तथा सफेद और नील रङ्गके थे इसलिए ऐसे अच्छे जान पड़ते थे मानो कैलास और अञ्जनगिरि ही एक जगह आ मिले हों ॥ ८९ ॥
Those two were steadfast, exceedingly lofty in stature, and adorned respectively with fair and dark complexions; thus they appeared as though Mount Kailāsa and Mount Añjanagiri themselves had come together in one place. ॥ 89 ॥
श्लोक ( Shlok ) 90 – 91
इतः स विन्ध्यशक्त्याख्यो घटीयन्त्रसमाश्चिरम् । भ्रान्त्वा संसारवाराशावणीयः पुण्यसाधनः ॥ ९० ॥
इधर राजा विन्ध्यशक्ति, घटी यन्त्रके समान चिरकाल तक संसार-सागरमें भ्रमण करता रहा । अन्तमें जब थोडेसे पुण्यके साधन प्राप्त हुए तब इसी भरतक्षेत्रके भोगवर्धन नगरके राजा श्रीधरके सर्व प्रसिद्ध तारक नामका पुत्र हुआ ।। ९०- ९१ ॥
Meanwhile, King Vindhyaśakti continued to wander through the ocean of saṃsāra for a long time, like the revolving wheel of a water-lifting machine. At length, when he came into possession of a small store of merit, he was born in this very Bharata-kṣetra, in the city of Bhogavardhana, as the widely renowned son named Tāraka of King Śrīdhara. ॥ 90–91 ॥
श्लोक 92 से 101
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