Summary of Uttar Puran Parv 53 by Acharya Gunabhadra
संक्षिप्त सारांश:
उत्तरपुराण के त्रेपन्नवें पर्व में सप्तम तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण का अत्यंत प्रेरक वर्णन किया गया है। पूर्वभव में वे धातकीखण्ड के पूर्व विदेह क्षेत्र के सुकच्छ देश की क्षेमपुर नगरी के राजा नन्दिषेण थे। वे बुद्धिमान, पराक्रमी, धर्मपरायण और लोकहितकारी शासक थे, जिनके राज्य में सुख, समृद्धि और नीति का साम्राज्य था। यद्यपि वे धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थों से सम्पन्न थे, फिर भी उन्होंने संसार के अनादि बन्धन, मोह और कर्मचक्र की पीड़ा को समझकर वैराग्य धारण किया। उन्होंने पुत्र धनपति को राज्य सौंपकर अर्हन्नन्दन मुनि से दीक्षा ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया, सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और संन्यासमरण के पश्चात मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
अहमिन्द्र अवस्था पूर्ण होने पर वे जम्बूद्वीप के भारत क्षेत्र की काशी देश स्थित बनारस नगरी में राजा सुप्रतिष्ठ और रानी पृथिवीषेणा के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को भगवान सुपार्श्वनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘सुपार्श्व’ रखा। वे प्रियंगु पुष्प के समान कान्तिमान, दिव्य लक्षणों से युक्त, तीन ज्ञानों के धारक और अलौकिक पुण्यसम्पन्न थे। युवावस्था में उन्होंने राज्य स्वीकार किया, किन्तु विपुल भोग-संपदा के बीच भी आत्मसंयम, धर्मनिष्ठा और वैराग्य बनाए रखा।
ऋतु परिवर्तन और संसार की नश्वरता के चिंतन से भगवान सुपार्श्वनाथ को राज्य, वैभव और भोगों की असारता का बोध हुआ। उन्होंने समझा कि मायामय संसार में आसक्ति दुःख का कारण है और आत्मज्ञान ही शाश्वत कल्याण का पथ है। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को सहेतुक वन में एक हजार राजाओं सहित दीक्षा धारण की तथा तत्काल मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। इसके पश्चात उन्होंने नौ वर्ष तक कठोर तप, मौन, संयम और ध्यान का पालन किया। शिरीष वृक्ष के नीचे फाल्गुन कृष्ण षष्ठी को उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में विशाल मुनिसंघ, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ और असंख्य देवगण उपस्थित हुए तथा उन्होंने धर्मामृतमयी दिव्यध्वनि द्वारा जीवों को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और मोक्षमार्ग का उपदेश दिया।
अंततः आयु पूर्ण होने पर भगवान सुपार्श्वनाथ सम्मेदशिखर पहुँचे, प्रतिमायोग धारण किया और फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाणकल्याणक का उत्सव मनाया। इस प्रकार राजा नन्दिषेण से अहमिन्द्र और फिर भगवान सुपार्श्वनाथ तक की उनकी आत्मयात्रा संसार की नश्वरता के बोध, वैराग्य, तप, केवलज्ञान और मोक्ष की परम साधना का उज्ज्वल आदर्श प्रस्तुत करती है।
श्लोक 1 से 11 राजा नन्दिषेण का धर्ममय राज्य और वैराग्य का उदय
धातकीखण्ड के पूर्व विदेह क्षेत्र के सुकच्छ देश की क्षेमपुर नगरी में राजा नन्दिषेण बुद्धिमान, पराक्रमी, धर्मपरायण और लोकहितकारी शासक थे। उनके राज्य में सुख, समृद्धि और नीति का वास था। धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ उनके जीवन में संतुलित थे, परंतु उन्होंने संसार के बन्धन, मोह और कर्मचक्र की गहनता को समझा। आत्मकल्याण की भावना से उन्होंने संसार की आसक्ति को धिक्कारा और मोक्षमार्ग की ओर उन्मुख हुए।
श्लोक 12 से 22 : दीक्षा, तीर्थंकर प्रकृति बन्ध और सुपार्श्वनाथ का गर्भावतरण
राजा नन्दिषेण ने पुत्र धनपति को राज्य देकर स्वयं अर्हन्नन्दन मुनि से दीक्षा ग्रहण की। ग्यारह अंगों का अध्ययन कर उन्होंने दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं से तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। संन्यासमरण के पश्चात वे मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र विमान में अहमिन्द्र देव बने। वहाँ से च्युत होकर वे काशी देश की बनारस नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ और रानी पृथिवीषेणा के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को दिव्य पुत्र का जन्म हुआ।
श्लोक 23 से 34 : जन्मकल्याणक, अलौकिक सौन्दर्य और राज्यवैभव
इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘सुपार्श्व’ रखा। वे प्रियंगु पुष्प के समान कान्तिमान, दिव्य लक्षणों से युक्त और अतिशयों से सम्पन्न थे। युवावस्था में उन्होंने राज्य स्वीकार किया, परन्तु भोगों के मध्य भी आत्मसंयम बनाए रखा। उनका जीवन ज्ञान, पुण्य, करुणा और अलौकिक प्रभाव से परिपूर्ण था।
श्लोक 35 से 42 : नश्वरता का बोध, वैराग्य और दीक्षा
ऋतु परिवर्तन देखकर भगवान सुपार्श्वनाथ को संसार और राज्यलक्ष्मी की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने समझा कि भोग और वैभव मायामय हैं तथा आत्मज्ञान ही शाश्वत है। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से वे मनोगति पालकी में सवार होकर सहेतुक वन पहुँचे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को एक हजार राजाओं सहित दीक्षा धारण की। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 43 से 51 : तप, केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
दीक्षा के पश्चात भगवान सुपार्श्वनाथ ने नौ वर्ष तक मौनपूर्वक तप और संयम का पालन किया। शिरीष वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर फाल्गुन कृष्ण षष्ठी को उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में विशाल मुनिसंघ, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा असंख्य देव उपस्थित रहे। उन्होंने धर्मामृतमयी वाणी से जीवों को मोक्षमार्ग की प्रेरणा दी।
श्लोक 52 से 56 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और मंगलमयी महिमा
अंतकाल समीप जानकर भगवान सुपार्श्वनाथ सम्मेदशिखर पहुँचे और प्रतिमायोग धारण किया। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने निर्वाणकल्याणक मनाया और सम्मेदशिखर को पवित्र निर्वाणभूमि घोषित किया। पूर्वभव के राजा नन्दिषेण, फिर अहमिन्द्र और अंततः सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के रूप में उनकी आत्मयात्रा वैराग्य, तप, सर्वज्ञता और मोक्ष का दिव्य आदर्श प्रस्तुत करती है।
पर्व 54
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