अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती का वर्णन
Hindi Translation of Uttara purana Parv 48
श्लोक 1–8 : अजितनाथ पुराण की मंगलाचरण और विमलवाहन का धर्माभिमुख जीवन
अनन्तचतुष्टय रूप अन्तरङ्ग लक्ष्मी और अष्टप्रातिहार्य रूप बहिरङ्ग लक्ष्मीसे युक्त वे अजितनाथ स्वामी सदा जयवन्त रहें जिनके कि निर्दोष-पूर्वापरविरोध आदि दोपोंसे रहित वचन, जलकी तरह भव्य जीवोंके मनमें स्थित रागद्वेषादिरूप मलको धो डालते हैं ।॥ १ ॥ मैं उन अजितनाथ स्वामीके उस पुराणको कहूँगा जिसके कि सुननेसे भव्य जीवोंको बाधाहीन महा-भ्युदयसे युक्त मोक्षरूपी लक्ष्मीका समागम प्राप्त हो जाता है ।। २ ।। इस जम्बूद्वीपके अतिशय प्रसिद्ध पूर्वविदेह क्षेत्रमें सीता नदीके दक्षिण तटपर वत्स नामका विशाल देश है ।॥ ३ ॥ उसमें अपने वैभवसे आश्चर्य उत्पन्न करनेवाला सुसीमा नामका नगर है। किसी समय इस सुसीमा नगरका राजा विमलवाहन था जो बड़ा ही प्रभावशाली था ।। ४ ।। संसारमें यह न्याय प्रसिद्ध है कि गुणोंकी चाह रखनेवाले मनुष्य गुणोंकी खोज करते हैं परन्तु इस राजामें यह आश्वर्यकी बात थी कि स्नेहसे भरे हुये सभी गुण अपने आप ही आकर रहने लगे थे ।। ५ ।। वह राजा उत्साह शक्ति, मन्त्रशक्ति और फलशक्ति इन तीन शक्तियोंसे तथा उत्साहसिद्धि, मन्त्रसिद्धि और फल-सिद्धि इन तीन सिद्धियोंसे सहित था, आलस्यरहित था और अपनी सन्तानके समान न्यायपूर्वक प्रजाका पालन करता था ।। ६ ।। ‘धर्मसे पुण्य होता है, पुण्यसे अर्थकी प्राप्ति होती है और अर्थसे काम-अभिलषित भोगोंकी प्राप्ति होती है, पुण्यके बिना अर्थ और काम नहीं मिलते हैं’ यही सोचकर वह राजा जैनधर्मके द्वारा सञ्था धर्मात्मा हो गया था ।॥ ७ ॥ किसी समय उस राजाके अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्याख्यानावरण कषाय का उदय दूर होकर सिर्फ संज्वलन कषाय का उदय रह गया उसी समय उसे आत्मज्ञान अथवा रत्नत्रयकी प्राप्ति हुई और वह संसारसे विरक्त हो मन ही मन एकान्तमें इस प्रकार विचार करने लगा ।॥ ८ ॥
श्लोक 9–20 : वैराग्य, दीक्षा, तीर्थंकर नामकर्म और विजय विमान
‘इस जीवका शरीरमें जो निवास हो रहा है वह आयुकमेसे ही होता है, मैं यद्यपि शरीरमें स्थित हूँ तो भी कालकी परिमित घाड़योंमें धारण किया हुआ मेरा आयुरूपी जल शीघ्र ही गलता जाता है- उत्तरोत्तर कम होता जाता है इसलिए मेरा वह आयुरूपी जल जब तक समाप्त नहीं होता नब तक मैं स्वर्ग और मोक्षके मार्गभूत जैनधर्ममें उत्साहके साथ प्रवृत्ति करूँगा’ ॥ -१० ॥
इस प्रकार आशारूपी पाशको बेदकर वह राजा राज्यलक्ष्मीसे निस्पृह हो गया तथा स्वाधीन होनेपर भी अनेक राजाओंके साथ दीक्षारूपी लक्ष्मीके द्वारा अपने आधीन कर लिया गया अर्थात् अनेक राजाओंके साथ उसने जिन-दीक्षा धारण कर ली ।॥ ११ ॥ जिसने बहुत समय तक तीव्र तपस्या की है, ग्यारह जिसने अङ्गोंका स्पष्ट ज्ञान हो गया है, जिसकी आत्मा पुण्यके प्रकाशसे जगमगा रही है और जो दर्शनविशुद्धि आदि सोलह भावनाओंके चिन्तनमें निरन्तर तत्पर रहता है ऐसे इस विमलवाहनने तीर्थकर नामकमका बन्ध किया ॥ १२ ॥ इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त करने-वाला वह विमलवाहन आयुके अन्त समय पञ्चपरमेष्ठियोंमें चित्त स्थिरकर – समाधिमरण कर तैंतीस सागरकी आयुका धारक हो विजय नामक अनुत्तरविमानमें पहुँचा ॥ १३ ॥ वहाँ वह द्रव्य और भाव दोनों ही शुक्तलेश्याओंसे सहित था तथा समचतुरस्त्रसंस्थानसे युक्त एक हाथ ऊँचे एवं प्रशस्त रूप, रस, गन्ध, स्पर्शसे सम्पन्न शुभ शरीरको लेकर उत्पन्न हुआ था, सोलह महीने और पन्द्रह दिन बाद उच्छ्वास लेता था, तैंतीस हजारवर्ष बाद मानसिक आहार ग्रहण करता था, उसने अपने अवधिज्ञानके द्वारा लोकनाड़ीको व्याप्त कर रखा था अर्थात् लोकनाड़ी पर्यन्तके रूपी पदार्थोंको वह अपने अवधिज्ञानसे देखता था, उसमें लोकनाड़ीको उखाड़कर दूसरी जगह रख देनेकी शक्ति थी, वह उतने ही क्षेत्रमें अपने शरीरकी विक्रिया भी कर सकता था और सुखस्वरूप पंचेन्द्रियों के द्वारा प्रवीचारजन्य सुखसे अनन्तगुणा अधिक अप्रवीचार सुखका उपभोग करता था ॥ १४-१७ ॥ उस महाभागके स्वर्गसे पृथिवीपर अवतार लेनेके छह माह पूर्वसे ही प्रतिदिन तीर्थकर नामक पुण्यप्रकृतिके प्रभावले जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रके अधिपति इक्ष्वाकुवंशीय काश्यपगोत्री राजा जितशत्रुके घरमें इन्द्रकी आज्ञासे कुबेरने साढ़े तीन करोड़ रत्नोंकी वृष्टि की ।॥ १८-२० ।।
श्लोक 21–31 : माता के स्वप्न, अजितनाथ का जन्म और राजवैभव
तदनन्तर जेठ महीनेकी अमावसके दिन जब. कि रोहिणी नक्षत्रका कला मात्रसे अवशिष्ट चन्द्रमाके साथ संयोग था तब ब्राह्ममुहूर्तके पहले महारानी विजयसेनाने सोलह स्वप्न देखे । उस समय उसके नेत्र बाकी बची हुई अल्प निद्रासे कलुषित हो रहे थे। सोलह स्वप्न देखनेके बाद उसने देखा कि हमारे मुखकमलमें एक मदोन्मत्त हाथी प्रवेश कर रहा है। जब प्रातःकाल हुआ तो महारानीने जितशत्रु महाराजसे स्वप्नोंका फल पूछा और देशावधिज्ञानरूपी नेत्रको धारण करनेवाले महाराज जितशत्रुने उनका फल बत-लाया कि तुम्हारे स्फटिकके समान निर्मल गर्भमें विजयविमानसे तीर्थंकर पुत्र अवतीर्ण हुआ है। वह पुत्र, निर्मल तथा पूर्वभवसे साथ आनेवाले मति-श्रुत-अवधिज्ञानरूपी तीन नेत्रोंसे देदीप्यमान है ।। २१-२४ ॥ जिस प्रकार नीति, महान् अभ्युदयको जन्म देती है उसी प्रकार महारानी विजय-सेनाने माघमास के शुक्लपक्षकी दशमी तिथिके दिन प्रजेशयोगमें प्रजापति तीर्थंकर भगवान्को जन्म दिया ।। २५ ।। भगवान् आदिनाथके मोक्ष चले जानेके बाद जब पचास लाख करोड़ सागर वर्ष बीत-चुके तब द्वितीय तीर्थंकरका जन्म हुआ था। इनकी आयु भी इसी अन्तरालमें सम्मिलित थी । जन्म होते ही, सुन्दर शरीरके धारक तीर्थंकर भगवान्का देवोंने मेरुपर्वतपर जन्माभिषेक कल्याणक किया और अजितनाथ नाम रक्खा ॥ २६-२७ ॥ इन अजितनाथकी बहत्तर लाख पूर्वकी आयु थी और चार सौ पचास धनुष शरीरकी ऊँचाई थी। अजितनाथ स्वामीके शरीरका रङ्ग सुवर्णके समान पीला था। उन्होंने बाह्य और आभ्यन्तर के समस्त शत्रुओंपर विजय प्राप्त कर ली थी। जब उनकी आयुका चतर्थांश बीत चुकातब उन्हें राज्य प्राप्त हुआ। उस समय उन्होंने अपने तेजसे सूर्यका तेज जीत लिया था। एक लाख पूर्व कम अपनी आयुके तीनभाग तथा एक पूर्वाङ्ग तक उन्होंने राज्य किया। ‘देखूँ, आपके साथ सम्भोगमुखका अन्त आता है या मेरा ही अन्त होता है’ इस विचारसे राज्य-लक्ष्मीके द्वारा आलिंगित हुए भगवान् अजितनाथने प्रशंसनीय भोगोंका अनुभव किया ।। २८-३१।।
श्लोक 32–41 : वैराग्य, दीक्षा और केवलज्ञान की भूमिका
किसी समय अजितनाथ स्वामी महलकी छतपर सुखसे विराजमान थे कि उन्होंने लक्ष्मीको अस्थिर बतलानेवाली बड़ी भारी उल्का देखी ॥३२॥ ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ अजितनाथ स्वामी उसी समय विषयोंसे विरक्त हो गये सो ठीक ही है क्योंकि जिन्हें शीघ्र ही मोक्ष प्राप्त होनेवाला है उन्हें लक्ष्मीको छोड़नेके लिए कौन-सा कारण नहीं मिल जाता ? ॥ ३३ ॥ उसी समय सारस्वत आदि देवर्षियों अर्थात् लौकान्तिक देवोंने ब्रह्मस्वर्गसे आकर उनके विचारोंकी बहुत भारी प्रशंसा तथा पुष्टि की ॥३४॥
जिस प्रकार लोग देखते तो अपने नेत्रोंसे हैं परन्तु ‘सूर्य उसमें सहायक हो जाता है उसी प्रकार भगवान् यद्यपि स्वयं बुद्ध थे तो भी लौकान्तिक देवोंका कहना उनके यथार्थ अवलोकनमें सहायक हो गया ।॥ ३५॥ उन्होंने जूँठनके समान विवेकी मनुष्योंके द्वारा छोड़नेयोग्य राज्य, राज्या-भिषेकपूर्वक अजितसेन नामक पुत्रके लिए दे दिया ॥ ३६ ॥ देवोंने उनका दीक्षाकल्याणकसम्बन्धी महाभिषेक किया । अनन्तर वे सुप्रभा नामकी पालकीपर आरूढ़ होकर सहेतुक वनकी ओर चले । उनकी पालकीको सर्वप्रथम मनुष्योंने, फिर विद्याधरोंने और फिर देवोंने उठाया था। माधमासके शुक्लपक्षकी नवमीके दिन रोहिणी नक्षत्रका उदय रहते हुए उन्होंने सहेतुक वनमें सप्तपर्ण वृक्षके समीप जाकर सायंकालके समय एक हजार आज्ञाकारी राजाओंके साथ वेलाका नियम लेकर संयम धारण कर लिया-दीक्षा ले ली ।। ३७-३६॥ दीक्षा लेते ही वे भनःपर्यय ज्ञानसे सम्पन्न हो गये और दूसरे दिन दानियोंको अपूर्व आनन्द उपजाते हुए साकेतनगरीमें प्रविष्ट हुए ॥ ४० ॥ वहाँ ब्रह्मा नामक राजाने उन्हें यथाक्रमसे दान दिया और सातावेदनीय आदि पुण्यप्रकृतियोंका बन्धकर पश्ञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। ४१ ।।
श्लोक 42–51 : केवलज्ञान, धर्मसंघ और विश्वविहार
शुद्धज्ञान के धारक भगवान्ने बारहवर्ष छद्मस्थ अवस्था में बिताये । तदनन्तर पौषशुक्ल एकादशी के दिन शामके समय रोहिणी नक्षत्रमें आप्तपना प्राप्त किया अर्थात् लोकालोकावभासी केवलज्ञानको प्राप्तकर सर्वज्ञ हो गये ॥४२॥ उनके सिंहसेन आदि नब्बे गणधर थे। तीन हजार सात सौ पचास पूर्वधारी, इक्कीस हजार छह सौ शिक्षक, नौ हजार चार सौ अवधिज्ञानी, बीस हजार केवल-ज्ञानी, बीस हजार चार सौ विक्रियाऋद्धिवाले, बारह हजार चार सौ पचास मनःपर्ययज्ञानी और बारह हजार चार सौ अनुत्तरवादी थे। इस प्रकार सब मिलाकर एक लाख तपस्वी थे, प्रकुब्जा आदि तीन लाख बीस हजार आर्यिकाएँ थीं, तीन लाख श्रावक थे, पाँच लाख श्राविकाएँथीं, और असंख्यात देघ देवियाँ थीं। इस तरह उनकी बारह सभाओंकी संख्या थी ॥ ४३-४८ ॥ इस प्रकार बारह सभाओंसे वेष्टित भगवान् अजितनाथ संसार, मोक्ष, उनके कारण तथा फलके भेदोंका विस्तारसे कथन करते
नष्ट कर थे ।। ४६ ॥ उन अजितनाथ स्वामीको समवसरण लक्ष्मी कटाक्षोंसे देख रही थी, वे पुण्योत्पादित चिह्नस्वरूप आठ प्रातिहार्योंसे युक्त थे, उन्होंने कर्मरूपी शत्रुओंमेंसे घातिया कर्मरूप शत्रुओंको दिया था और अघातिया कर्मरूप शत्रुओंको अभी नष्ट नहीं कर पाया था, उनकी वैराग्यपरिति अत्यन्त बढ़ी हुई थी, वे निज और परके गुरु थे, कृतकृत्य मनुष्यकि प्रार्थनीय थे और अतिशयप्रसिद्ध अथवा समृद्ध थे ॥ ५० ॥ ‘यह न तो कहीं पापोंसे जीते जाते हैं और न समस्त वादी ही इन्हें जीत सकते हैं इसलिए ‘अजित’ इस सार्थक नामको प्राप्त हुए हैं’ इस प्रकार विद्वानोंकी स्तुतिके पात्र होते हुए भगवान् अजितनाथने समस्त आर्यक्षेत्रमें बिहार किया और अन्तमें सम्मेदाचलपर पहुँचकर दिव्यध्वनिसे रहित हो एक मासतक वहींपर स्थिर निवास किया ॥ ५१ ॥
श्लोक 52–61 : मोक्ष, धर्ममहिमा और सगर चक्रवर्ती की भूमिका
उस समय उन्होंने प्रतिसमय कर्म-प्रकृतियोंकी असंख्यातगुणी निर्जरा की, उनकी स्थिति आदिका विधान किया, दण्डप्रतर आदि लोकपूरणसमुद्घात किया, सूक्ष्मक्रिया-प्रतिपाती ध्यानके द्वारा योगोंका वैभव नष्ट किया, औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंके सम्बन्धको पृथक् किया, और सातिशय विशुद्धताको प्राप्त हो व्युपरतक्रियानिवर्ती नामक चतुर्थ शुक्तध्यानके आश्रयसे अनन्तज्ञानादि आठ गुणोंको प्राप्त किया ॥५२॥ इस प्रकार चैत्रशुक्ल पञ्चमीके दिन जब कि चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्रपर था, प्रातःकालके समय प्रतिमायोग धारण करनेवाले भगवान् अजितनाथने मुक्तिपद प्राप्त किया ॥ ५३ ॥
जो पहले विमलवाहन भवमें युद्धके समय दुर्जेय रहे, फिर पापनाशक तपञ्चरणमें उद्यत रहे, तदनन्तर विजयविमानमें सुखके भण्डार स्वरूप श्रेष्ठ देव हुए उन अजित जिनेन्द्रको हे भव्यजीवो
नमस्कार करो ।। ५४॥ चूँकि धर्म सोलह भावनाओं से महापुण्य तीर्थंकर प्रकृतिको उत्पन्न करता है, श्रेष्ठ ध्यानके प्रभावसे समस्त दुष्ट कर्मोंके समूहका नाश कर देता है, स्वयं निर्मल है, सुखकी परम्परा को करनेवाला है और नित्य मोक्षसुखको देता है इसलिए शुद्ध तथा आप्तोपज्ञ धर्मकी हे विद्वज्जनो ! मदरहित होकर उपासना करो ।। ५५ ।। जो तीर्थंकरोंमें द्वितीय होनेपर भी श्रुतके मार्गमें अद्वितीय हैं- अनुपम हैं वे अजितनाथ भगवान्, कविको पुराणका विशाल मार्ग पूरा करनेमें सहायता प्रदान करें ।। ५६ ।।
सगर चक्रवर्तीका वर्णन
द्वितीय तीर्थकर अजितनाथके तीर्थमें सगर नामका दूसरा चक्रवर्ती हुआ। हे बुद्धिमान् श्रेणिक ! तू अब उसका चरित्र सुन ॥ ५७ ॥ इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेहमें सीता नदीके दक्षिण तटपर वत्सकावती नामका देश है। उसमें पृथिवी नगरका अधिपति, मनुष्योंके द्वारा सेवनीय जयसेन नामका राजा था। उसकी स्त्रीका नाम जयसेना था। उन दोनोंके रतिषेण और धृतिषेण नामके दो पुत्र थे ।। ५८-५६ ॥ वे भाग्यशाली दोनों पुत्र अपने तेजसे सदा सूर्य और चन्द्रमाको जीतते हुए शोभित होते थे। उनके माता-पिता आकाश और पृथिवीके समान उनसे कभी पृथक् नहीं रहते थे अर्थात् स्नेहके कारण सदा अपने पास रखते थे ।। ६०।। एक दिन किसी कारणवश रतिषेण की मृत्यु हो गई सो ठीक ही है क्योंकि मृत्युका कारण क्या नहीं होता ? अर्थात् जब मरणका समय आता है तब सभी मृत्युके कारण हो जाते हैं ।॥ ६१ ॥
श्लोक 62–73 : जयसेन का वैराग्य और सगर का जन्म
रतिषेणकी मृत्युरूपी मेघसे निकले हुए शोक-रूपी वज्रने लतासहित कल्पवृक्षके समान भार्यासहित राजा जयसेनको वाधित किया- दुखी किया ॥ ६२ ॥ उस समय अवसर पाकर यमराजके आगे-आगे चलनेवाली मूर्च्छाने उन दोनोंका आलिंगन किया अर्थात् वे दोनों मूच्छित हो गये सो ठीक ही है क्योंकि छिद्र प्राप्त करनेवाले शत्रु अपकार किये बिना नहीं रहते ।। ६३ ।। जब वैद्यजनोंके श्रेष्ठ उपायोंके द्वारा धीरे-धीरे वे चैतन्यको प्राप्त हुए तो बृहस्पतिके समान श्रेष्ठ गुरुने राजा जयसेनको बड़ी कठिनाईसे समझाया ।। ६४ ।। तदनन्तर वह इस शरीरको दुःखका घर मानकर उसका निग्रह करनेके लिए आग्रह करने लगा। और यमराजको मारने के लिए उद्यत हुआ सो ठीक ही है क्योंकि मनस्वी मनुष्योंको यही योग्य है ।। ६५ ।। वह प्राणोंका अन्त करनेवाले अथवा इन्द्रियादि प्राण हैं अन्तमें जिनके ऐसे परिग्रहोंको पुराने पत्तोंके समान समझने लगा तथा राज्यके उपभोगमें भाग्यशाली आर्य धृतिषेण नामक पुत्रको नियुक्त कर अनेक राजाओं और महारुत नामक सालेके साथ यशोधर गुरुके द्वारा बतलाये हुए शुद्ध मोक्षमार्गको प्राप्त हुआ-दीक्षित हो गया ।। ६६-६७ ।। जयसेन मुनिने आयुके अन्तमें संन्यासमरण किया जिससे अन्तिम अच्युत स्वर्गमें महाबल नामके देव हुए ॥ ६८ ।। जयसेनका साला महारुत भी उसी स्वर्गमें मणिकेतु नामका देव हुआ। वहाँ उन दोनोंमें परस्पर प्रतिज्ञा हुई कि हमलोगोंके बीच जो पहले पृथिवीलोकपर अवतीर्ण होगा – जन्म धारण करेगा, दूसरा देव उसे समझानेवाला होगा – संसारका स्वरूप समझाकर दीक्षा लेनेकी प्रेरणा करेगा। महाबल देव, अच्युत स्वर्गमें बाईस सागर पर्यन्त देवोंके सुख भोगकर कौशल देशकी अयोध्या नगरीमें इक्ष्वाकुवंशी राजा समुद्र-विजय और रानी सुबालाके सगर नामका पुत्र हुआ। उसकी आयु सत्तरलाख पूर्वकी थी। वह चार सौ पचास धनुष ऊँचा था, सब लक्षणोंसे परिपूर्ण था, लक्ष्मीमान् था तथा सुवर्णके समान कान्तिसे युक्त था ।। ६६-७३ ।।
श्लोक 74–84 : सगर का चक्रवर्ती वैभव और मणिकेतु का प्रथम उपदेश
उसके अठारह लाख पूर्व कुमार अवस्थामें व्यतीत हुए। तदनन्तर महामण्ड-लेश्वर पद प्राप्त हुआ। उसके बाद इतना ही काल बीत जानेपर छह खण्डोंकी पृथिवीके समूहपर आक्रमण करनेमें समर्थ चक्ररत्न प्रकट हुआ और दिशाओंके समूहपर आक्रमण करती हुई प्रतापपूर्ण कीर्ति प्रकट हुई ।। ७४-७५ ॥ प्रथम चक्रवर्ती भरतके समान इसने भी चिर कालतक दिग्विजय किया, वहाँकी सारपूर्ण वस्तुओंके ग्रहण किया और सबलोगोंको अपनी आज्ञा ग्रहण कराई ।। ७६ ।। दिग्विजयसे लौटकर वह साम्राज्य लक्ष्मीके गृहस्वरूप अयोध्या नगरीमें वापिस आया और निर्विन-रूपसे दश प्रकारके भोगोंका उपभोग करता हुआ सुखसे रहने लगा ॥ ७७ ॥ उस पुण्यवान्के साठ-हजार पुत्र थे जो ऐसे जान पड़ते थे मानो विधाताने पुत्रोंके आकारमें उसके गुण ही प्रकट किये हों ।।७८।। किसी समय सिद्धिवनमें श्रीचतुर्मुख नामके मुनिराज पधारे थे और उसी समय उन्हें समस्त पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था ।। ७६ ।। उनके कल्याणोत्सवमें अन्य देवों तथा इन्द्रोंके साथ मणिकेतु देव भी आया था। वहाँ आकर उसने जानना चाहा कि हमारा
मित्र महाबल कहाँ उत्पन्न हुआ है ? इच्छा होते ही उसने अवधिज्ञानके प्रकाशसे जान लिया कि वह बाकी बचे हुए पुण्यसे सगर चक्रवर्ती हुआ है। ऐसा जानकर वह सगर चक्रवर्तीके पास पहुँचा और कहने लगा ।। ८०-८१ ॥ कि ‘क्यों स्मरण है ? हम दोनों अच्युत स्वर्गमें कहा करते थे कि हमलोगोंके बीच जो पहले पृथिवीपर अवतीर्ण होगा उसे यहाँ रहनेवाला साथी समझावेगा ।।॥ ८२ ॥ हे भव्य ! मनुष्यजन्मके सारभूत, साम्राज्यका तू चिरकाल तक उपभोग कर चुका है। अब सर्पके फणाके समान भय उत्पन्न करनेवाले इन भोगोंसे क्या लाभ है ? हे राजन् ! अब मुक्तिके लिए उद्योग कर’ । मणिकेतुके इतना कहनेपर भी वह चक्रवर्ती इससे विमुख रहा सो ठीक ही है क्योंकि मुक्तिका मार्ग काललब्धिके बिना कहाँ से मिल सकता है ? ॥ ८३-८४ ॥
श्लोक 85–101 : मणिकेतु के पुनः प्रयास और राजपुत्रों की उत्सुकता
सगर चक्रवर्तीकी विमुखता जान मणिकेतु अन्य वार्तालाप कर वापिस लौट गया सो उचित ही है क्योंकि अनुक्रमको जानने-वाले पुरुष अहितकी बात जाने दो, हितके द्वारा भी किसीकी इच्छाके विरुद्ध काम नहीं करते ॥ ८५।। इन भोगोंको धिक्कार है जो कि मनुष्योंको इस प्रकार अपने कहे हुए वचनोंसे च्युत करा देते हैं, पाप उत्पन्न करनेवाले हैं और बड़ी कठिनाईसे छोड़े जाते हैं’ इस तरह निर्वेदको प्राप्त होता हुआ मणिकेतु देव स्वर्ग चला गया ॥ ८६ ॥ फिर कुछ समय बाद मणिकेतुदेव राजाको तप ग्रहण करानेका एक दूसरा उपाय साचकर पृथिवीपर आया ।॥ ८७ ॥ उसने चारण ऋद्धिधारी मुनिका रूप बनाया। वह मुनि अनेक लक्षणोंसे युक्त था, कान्तिसे चन्द्रमाको, प्रभासे सूर्यको और सुन्दर शरीरसे कामदेवको जीत रहा था। इस प्रकार जितेन्द्रिय हो उत्कृष्ट संयमकी भावना करता हुआ वह मुनि जिनेन्द्र भगवान्की वन्दनाकर सगर चक्रवर्तीके चैत्यालयमें जा ठहरा ॥ ८८-८६ ॥ उस चारण मुनिको देख चक्रवर्तीको बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने पूछा कि आपने इस अवस्थामें यह तप क्यों धारण किया है ? चारण मुनिने भी झूठमूठ कहा कि यह यौवन बुढ़ापाके द्वारा ग्रास्य है- प्रसनेके योग्य है, आयु प्रतिक्षण कम हो रही है, यह शरीर चूँकि अपवित्र है, पापी है, दुर्धर है, और दुःखोंका पात्र है अतः छोड़नेके योग्य है। सदा अनिष्ट वस्तुओंका संयोग और इष्ट वस्तुओंका वियोग होता रहता है। यह संसार रूपी भँवर, अनादि काल से बीत रही है फिर भी अनन्त ही बनी हुई है। जीवकी यह सब दशा कर्मरूप शत्रुओंके द्वारा की जा रही है अतः मैं तपरूपी अग्निके द्वारा उन कर्म-शत्रुओंको जलाकर सुवर्ण पाषाणके समान अविनाशी शुद्धिको प्राप्त होऊँगा-मोक्ष
पाप करूँगा ।। ६०-६३ ॥ मणिकेतुके इस प्रकार कहने पर वह चक्रवर्ती संसारसे भयभीत तो हुआ परन्तु मोक्षमार्गको प्राप्त नहीं कर सका क्योंकि पुत्ररूपी सॉकलोंसे मजबूत बँधा हुआ था ॥ ६४ ॥ ‘अभी इसका संसार बहुत बड़ा है’ इस प्रकार विषाद करता हुआ मणिकेतु चला गया सो ठीक ही है क्योंकि निष्फल उपाय किस बुद्धिमान्को विषाद नहीं करता ? ॥ ६५ ॥ वह देव सोचने लगा कि देखो साम्राज्यकी तुच्छ लक्ष्मीसे वशीभूत हुए चक्रवर्तीने अच्युत स्वर्गकी लक्ष्मी भुला दी सो ठीक ही है क्योंकि कामी मनुष्योंको अच्छे-बुरे पदार्थोंके अन्तरका ज्ञान कहाँ होता है ? ॥ ६६ ॥ मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि यह चक्रवर्ती सब लाभोंमें पुत्र-लाभको ही लाभ मानता है, स्वर्ग और मोक्षलक्ष्मीका लाभ इसके लिए लाभ नहीं है, ऐसा समझकर ही यह पुत्रोंमें अत्यन्त लीन हो रहा है ॥ ६७ ॥
किसी समय सिंहके बच्चोंके समान उद्धत और अहङ्कारसे भरे हुए वे राजपुत्र सभामें विराज-मान चक्रवर्तीसे इस प्रकार निवेदन करने लगे कि शूरवीरता और साहससे सुशोभित क्षत्रिय-पुत्रोंका यौवन यदि दुःसाध्य कार्यमें पिताका मनोरथ सिद्ध नहीं करता तो वह यौवन नहीं है। ऐसे प्राणीके जन्म लेने अथवा जीवन धारण करनेसे क्या लाभ है ? जन्म लेना और जीवन धारण करना ये दोनों ही सर्वसाधारण हैं अर्थात् सब जीवोंके होते हैं। इसलिए हे राजन् ! हम लोगोंको साहससे भरा हुआ कोई ऐसा कार्य बतलाइये कि जिससे हमारी केवल भोजनमें सम्मिलित होनेसे उत्पन्न होनेवाली दीनता अथवा अधर्म दूर हो सके ।। ६८-१०१ ।।
श्लोक 102–112 : कैलास पर कार्य, गंगापरिखा और मणिकेतु की कठोर नीति
यह सुन चक्रवर्तीने हर्षित होकर कहा कि ‘हे पुत्रो ! चक्रसे सब कुछ सिद्ध हो चुका है, हिमवान् पर्वत और समुद्रके बीच ऐसी कौनसी वस्तु है जो मुझे सिद्ध नहीं हुई है ? तुम्हारे लिए मेरा यही काम है कि तुम लोग मिलकर मेरी इस विशाल राज्यलक्ष्मीका यथायोग्य रीतिसे उपभोग करो’ ।।१०२-१०३।। इस प्रकार राजाने जब उन्हें बहुत निवारण किया तब वे चुप हो रहे सो ठीक ही है क्योंकि शुद्ध वंशमें उत्पन्न हुए पुत्र पिताके आज्ञाकारी ही होते हैं ।॥ १०४ ॥ आत्मशुद्धिसे भरे वे राजपुत्र किसी एक दिन फिर राजाके पास जाकर कहने लगे कि यदि आप हम लोगोंको कोई कार्य नहीं देते हैं तो हम भोजन भी नहीं करते हैं ।॥ १०५ ॥ पुत्रोंका निवेदन सुनकर राजा कुछ चिन्तामें पड़ गये । वे सोचने लगे कि इन्हें कौनसा कार्य दिया जावे । अकस्मात् उन्हें याद आ गई कि अभी धर्मका एक कार्य बाकी है। उन्होंने हर्षित होकर आज्ञा दी कि भरत चक्रवर्तीने कैलास पर्वत पर महारत्नोंसे अरहन्तदेवके चौबीस मन्दिर बनवाये हैं, तुम लोग उस पर्वतके चारों ओर गङ्गा नदीको उन मन्दिरोंकी परिखा बना दो।’ उन राजपुत्रोंने भी पिताकी आज्ञानुसार दण्डरत्नसे वह काम शीघ्र ही कर दिया ।। १०६-१०८ ।।
प्रेम और सज्जनतासे प्रेरित हुआ मणिकेतु देव फिर भी अपने मन्त्रियोंके साथ राजा सगरको समझानेके लिए योग्य उपायका इस प्रकार विचार करने लगा ॥ १०६ ॥ कि वचन चार प्रकारके होते हैं-कुछ वचन तो हित और प्रिय दोनों ही होते हैं, कुछ हित और अप्रिय होते हैं, कुछ प्रिय होकर अहित होते हैं और कुछ अहित तथा अप्रिय होते हैं। इन चार प्रकारके वचनोंमें अन्तके दो वचनोंको छोड़कर शेष दो प्रकारके वचनोंसे हितका उपदेश दिया जा सकता है। ऐसा निश्चय कर वह मणिकेतु एक दुष्ट नागका रूप धरकर कैलास पर्वत पर आया और उन अहङ्कारी राजकुमारोंको भस्मकी राशिके समान कर चला गया सो ठीक ही है क्योंकि मंत्रीगण जब कुछ उपाय नहीं देखते हैं तब हित होनेपर भी अप्रिय वचनोंका प्रयोग करते ही हैं ।। ११०-११२ ।।
श्लोक 113–121 : ब्राह्मण वेश में शोकसंदेश और यम पर प्रश्न
मंत्री यह जानते थे कि राजाका पुत्रों पर कितना स्नेह है अतः पुत्रोंका मरण जानकर भी वे राजाको यह समाचार सुनानेके लिए समर्थ नहीं हो सके। समाचारका सुनाना तो दूर रहा किन्तु उसे छिपा कर ही बैठ रहे ।।११३।।
तदनन्तर मणिकेतु ब्राह्मणका रूप रख कर चक्रवर्ती सगरके पास पहुँचा और बहुत भारी शोकसे आक्रान्त होकर निम्न्नाङ्कित वचन कहने लगा ॥ ११४ ॥ ‘हे देव ! जब आप पृथिवीमण्डलका पालन कर रहे हैं तब हम लोगोंकी यहाँ सब प्रकार कुशल है किन्तु आयुकी अवधि दूर रहने पर भी यमराजने मेरा पुत्र हरण कर लिया है। वह मेरा एक ही पुत्र था। यदि आप उसे आयुसे युक्त अर्थात् जीवित नहीं करते हैं तो आज मुझे भी आपके देखते-देखते उस यमराजके द्वारा ले जाया हुआ समझें । क्योंकि अहङ्कारी लोग क्या नहीं करते हैं। जो कच्चे फल खानेमें सतृष्ण है वह भला पके फल क्यों छोड़ेगा ।। ११५-११७ ।।
ब्राह्मणके वचन सुनकर राजाने कहा कि हे द्विजराज ! क्या आप नहीं जानते कि यमराज सिद्ध भगवान्के द्वारा ही निवारण किया जाता है; अन्य जीवोंके द्वारा नहीं, यह बात तो आबाल-गोपाल प्रसिद्ध है । ।। ११८ ॥ इस संसारमें कितने ही प्राणी ऐसे हैं कि जिनकी आयु बीचमें ही छिद जाती है और कितने ही ऐसे हैं कि जो जितनी आयुका बंध करते हैं उतना जीवित रहते हैं-बीचमें उनका मरण नहीं होता। यह यमराज उन सब जीवोंका संहार करता है पर स्वयं संहारसे रहित है ।। ११६ ।। यदि तुम उस यमराज पर द्वेष रखते हो तो घरके भीतर व्यर्थ ही जीर्ण-शीर्ण मत होओ। मोक्ष प्राप्त करनेके लिए शीघ्र ही दीक्षा धारण करो; शोक छोड़ो’ ।। १२० ॥
जब राजा सगर यह कह चुके तो ब्राह्मण-वेषधारी मणिकेतु बोला- ‘हे देव! यदि यह सच है कि यमराजसे बढ़कर और कोई बलवान् नहीं है तो मैं जो कुछ कहूँगा उससे आपको भयभीत नहीं होना चाहिये । ।। १२१ ।। आपके जो पुत्र कैलास पर्वत पर खाई खोदनेके लिए गये थे वे सब उस यमराजके द्वारा अपने पास बुला लिये गये हैं इसलिए आपको अपने कहे हुए मार्गके अनुसार दुष्ट यमराज पर बहुत वैर धारण करना चाहिये अर्थात् दीक्षा लेकर यमराजको जीतनेका प्रयत्न करना चाहिये ।। १२२ ।।
श्लोक 122–131 : पुत्रशोक से वैराग्य, दीक्षा और राजकुमारों का जागरण
ब्राह्मणके उक्त वचन रूपी वासे जिसका हृदय विदीर्ण हो गया है ऐसा राजा सगर क्षण भरमें मरे हुएके समान निश्चेष्ट हो गया ।। १२३ ॥ चन्दन और खससे मिले हुए जलसे, मित्रोंके वचनोंसे तथा पंखोंकी कोमल वायुसे जब वह सचेत हुआ तो इस प्रकार विचार करने लगा कि व्यर्थ ही खेदको बढ़ानेवाली यह लक्ष्मीरूपी माया मुझे प्राप्त न हो मुझे इसकी आवश्यकता नहीं। यह काम भयंकर है, यमराज नीच है, प्रेमका समागम नश्वर है, शरीर अपवित्र है, क्षय हो जानेवाला है और इसीलिए सेवन करने योग्य नहीं है अथवा अकल्याणकारी है, यह यौवन इन्द्रधनुषके समान नश्वर है. ऐसा जानते हुए तीर्थंकर भगवान् वनमें चले जाते हैं। परन्तु मैं मूर्ख अब भी इन्हींमें मूढ़ हो रहा हूँ ऐसा विचार कर सगर चक्रवर्तीने भगलि देशके राजा सिंहविक्रमकी पुत्री विदर्भाके पुत्र भव्य भगीरथके लिए राज्य सौंप दिया और आप दृढ़धर्मा केवलीके समीप दीक्षा धारण कर तप-चरण रूपी राज्यमें सुशोभित होने लगा सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन पुरुष घरमें तभी तक रहते हैं जबतक कि विरक्त होनेका कोई कारण नहीं दिखाई देता ।। १२४-१२८ ।। इधर चक्रवर्तीने दीक्षा ली उधर वह मणिकेतु देव उन पुत्रोंके पास पहुँचा और कहने लगा कि किसीने आपके मरणका यह अश्रवणीय समाचार राजासे कह दिया जिसे सुनकर वे शोकाग्निसे बहुत ही अधिक उद्दीपित हुए और भगीरथके लिए राज्य देकर तप करने लगे हैं। मैं आपकी कुल-परम्परासे चला आया ब्राह्मण हूँ अतः शोकसे यहाँ आप लोगोंको खोजनेके लिए आया हूँ ।। १२६-१३० ॥ ऐसा कहकर उस देवने मायामयी भस्मसे अवगुण्ठित राजकुमारोंको सचेत कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि मित्रोंकी माया भी हित करनेवाली होती है ॥ १३१ ॥
श्लोक 132–143 : भगीरथ, गंगातीर्थ, मित्रधर्म और सगर की परम सिद्धि
मणिकेतुके वचन सुन उन चरमशरीरी राजकुमारोंने भी जिनेन्द्र भगवान्का आश्रय लेकर तप धारण कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जो उचित वातको जानते हैं उन्हें ऐसा करना ही योग्य है ।। १३२ ।। जब भगीरथने यह समाचार सुना तब वह भी उन मुनियोंके पास गयाँ और वहाँ उसने उन सबको भक्तिसे नमस्कार कर जिनेद्रोक्त धर्मका स्वरूप सुना तथा श्रावकके व्रत ग्रहण किये ॥ १३३ ॥ अन्तमें मित्रवर मणिकेतुने उन सगर आदि मुनियोंके समक्ष अपनी समस्त माया प्रकट कर दी और कहा कि आप लोग क्षमा कीजिये ।। १३४ ।। ‘इसमें आपका अपराध ही क्या है? यह तो आपने हमारा हित तथा प्रिय कार्य किया है’ इस प्रकारके प्रसन्नतासे भरे हुए शब्दों द्वारा उन सब मुनियोंने मणिकेतु देवको सान्त्वना दी ।। १३५ ।। जिसका कार्य सिद्ध हो गया है ऐसा देव भी सन्तुष्ट होकर स्वर्ग चला गया सो ठीक ही है क्योंकि अन्य पुरुषोंके कार्य सिद्ध करनेसे ही प्रायः महापुरुषोंको संतोष होता है ॥ १३६ ॥ वे सभी विद्वान् मुनि-राज चिरकाल तक यथाविधि तपश्चरण कर सम्मेद शैल पर पहुँचे और शुक्लध्यानके द्वारा परम पदको प्राप्त हुए ।। १३७ ॥ उन सबका मोक्ष जाना सुनकर भगीरथका मन निर्वेसे भर गया अतः उसने वरदत्तके लिए अपनी राज्यश्री सौंपकर कैलास पर्वत पर शिवगुप्त नामक महामुनिसे दीक्षा ले ली तथा गङ्गा नदीके तट पर प्रतिमा योग धारण कर लिया ॥ १३८-१३६ ॥ इन्द्रने क्षीरसागरके जलसे महामुनि भगीरथके चरणोंका अभिषेक किया जिसका प्रवाह गङ्गामें जाकर मिल गया। उसी समयसे गङ्गा नदी भी इस लोकमें तीर्थरूपताको प्राप्त हुई अर्थात् तीर्थ मानी जाने लगी। भगीरथ गङ्गा नदीके तट पर उत्कृष्ट तप कर वहीं से निर्वाणको प्राप्त हुआ ।। १४०-१४१ ॥ गौतम स्वामी राजा श्रेणिकसे कहते हैं कि हे श्रेणिक ! इस लोक तथा परलोकमें मित्रके समान हित करनेवाला दूसरा नहीं है। न मित्रसे बढ़कर कोई भाई है। जो बात गुरु अथवा माता-पितासे भी नहीं कही जाती ऐसी गुप्तसे गुप्त बात मित्रसे कही जाती है, मित्र अपने प्राणोंकी भी परवाह नहीं करता हुआ कठिनसे कठिन कार्य सिद्ध कर देता है। मणिकेतु ही इस विषयका स्पष्ट दृष्टान्त है इसलिए सबको ऐसा ही मित्र बनाना चाहिये ॥ १४२ ॥ जो पहले शत्रुओंकी सेनाको जीतनेवाले जयसेन हुए, फिर अच्युत स्वर्गमें महाबल देव हुए, वहाँ से आकर शत्रुओं द्वारा अजेय सगर चक्रवर्ती हुए और अन्तमें अपना चरम शरीर- अन्तिम देह नष्ट कर शरीर प्रमाण आत्माके धारक रह गये ऐसे महाराज सगर सदा जयवन्त रहें ।॥ १४३ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद् गुणभद्राचार्य द्वारा प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें अजितनाथ तीर्थकर तथा सगर चक्रवर्तीका वर्णन करनेवाला अड़तालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥ ४८ ॥
पर्व 49
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena