शीतल पुराण का वर्णन
Hindi Translation of Uttar puran Parv 56
श्लोक 1 से 11 : राजा पद्मगुल्म का वैभव और वैराग्य की भूमिका
जिनका कहा हुआ समीचीन धर्म, कर्मरूपी सूर्यकी किरणोंसे संतप्त प्राणियोंके लिए चन्द्रमाके समान शीतल है- शान्ति उत्पन्न करनेवाला है वे शीतलनाथ भगवान् हम सबके लिए शीतल हों-शान्ति उत्पन्न करनेवाले हों ।॥ १ ॥ पुष्करवर द्वीपके पूर्वार्ध भागमें जो मेरु पर्वत है उसकी पूर्व दिशाके विदेह क्षेत्रमें सीतानदी के दक्षिण तट पर एक वत्स नामका देश है। उसके सुसीमा नगरमें पद्मगुल्म नामका राजा राज्य करता था। राजा पद्मगुल्म साम, दान, दण्ड और भेद इन चार उपायोंका ज्ञाता था, सहाय, साधनोपाय, देशविभाग, कालविभाग और विनिपातप्रतीकार इन पाँच अंगोंसे निर्णीत संधि और विग्रह-युद्धके रहस्यको जाननेवाला था । उसका राज्य-रूपी वृक्ष बुद्धि-रूपी जलके सिजनसे खूब वृद्धिको प्राप्त हो रहा था, तथा स्वामी, मंत्री, किला, खजाना, मित्र, देश और सेना इन सात प्रकृतिरूपी शाखाओंसे विस्तारको प्राप्त होकर धर्म, अर्थ और कामरूपी तीन फलोंको निरन्तर फलता रहता था ।। २-४ ।। वह प्रताप-रूपी बड़वानलकी चञ्चल ज्वालाओंके समूहसे अत्यन्त देदी-प्यमान था तथा उसने अपने चन्द्रहास-खङ्गकी धाराजलके समुद्रमें समस्त शत्रु राजा रूप-पर्वतों को डुबा दिया था ॥ ५ ॥ उस गुणवान् राजाने दैव, बुद्धि और उद्यमके द्वारा स्वयं लक्ष्मीका उपार्जन कर उसे सर्वसाधारणके द्वारा उपभोग करने योग्य बना दिया था। साथ ही वह स्वयं भी उसका उप-भोग करता था ।। ६ ।। न्यायोपार्जित धनके द्वारा याचकोंके समूहको संतुष्ट करनेवाला तथा समस्त ऋतुओंके सुख भोगनेवाला राजा पद्मगुल्म जब इस धराचक्रका – पृथिवीमण्डलका पालन करता था तब उसके समागमकी उत्सुकतासे ही मानो वसन्त ऋतु आ गई थी। कोकिलाओं और भ्रमरोंके मनोहर शब्द ही उसके मनोहर शब्द थे, वृक्षोंके लहलहाते हुए पल्लव ही उसके ओठ थे, सुगन्धिसे एकत्रित हुए मत्त भ्रमरोंसे सहित पुष्प ही उसके नेत्र थे, कुहासे रहित निर्मल चाँदनी ही उसका हास्य था, स्वच्छ आकाश ही उसका वस्त्र था, सम्पूर्ण चन्द्रमाका मण्डल ही उसका मुख था, मौलिश्रीकी सुगन्धिसे सुवासित मलय समीर ही उसका श्वासोच्छ्वास था और कनेरके फूल ही उसके शरीरकी पीत कान्ति थी ॥ ७-१० ॥ कामदेव यद्यपि शरीररहित था और उसके पास सिर्फ पाँच ही वाण थे, तो भी वह राजा पद्मगुल्मको इस प्रकार निष्ठुरतासे पीड़ा पहुँचाने लगा जैसे कि अनेक वाणोंसहित हो सो ठीक ही है क्योंकि समयका बल पाकर कौन नहीं बलवान् हो जाता है ? ॥ ११ ॥
श्लोक 12 से 22 : वैराग्य, दीक्षा और स्वर्गगमन
जिसका मन वसन्त-लक्ष्मीने अपने अधीन कर लिया है तथा जो अनेक सुख प्राप्त करना चाहता है ऐसा वह राजा प्रीतिको बढ़ाता हुआ उस वसन्तलक्ष्मीके साथ निरन्तर क्रीड़ा करने लगा ।। १२ ।। परन्तु जिस प्रकार वायुसे उड़ाई हुई मेघमाला कहीं जा छिपती है उसी प्रकार कालरूपी वायुसे उड़ाई वह वसन्त ऋतु कहीं जा छिपी – नष्ट हो गई और उसके नष्ट होनेसे उत्पन्न हुए शोकके द्वारा उसका चित्त बहुत ही व्याकुल हो गया ॥ १३ ॥ वह विचार करने लगा कि यह काम बड़ा दुष्ट है, यह पापी समस्त संसारको दुःखी करता है, सबके चित्तमें रहता है और विग्रह-शरीर रहित होनेपर भी विग्रही- शरीरसहित (पक्षमें उपद्रव करनेवाला) है ॥ १४ ॥ मैं उस कामको आज ही ध्यानरूपी अग्निके द्वारा भस्म करता हूँ। इस प्रकार उसे वैराग्य उत्पन्न हुआ । धह चन्दन नामक पुत्रके लिए राज्यका भार सौंपकर आनन्द नामक मुनिराजके समीप पहुँचा और समस्त परिग्रह तथा शरीरसे विमुख हो गया ।। १५-१६ ॥ शान्त परिणामोंको धारण करनेवाले उसने विपाकसूत्र तक सब अंगोंका अध्ययन किया, चिरकाल तक तपश्चरण किया, तीर्थकर नाम-कर्मका बन्ध किया, सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीन आराधनाओंका साधन किया तथा आयुके अन्त में वह समाधिमरण कर आरण नामक पन्द्रहवें स्वर्ग में विशाल वैभवको धारण करनेवाला इन्द्र हुआ ।।१७-१८॥ वहाँ उसकी आयु बाईस सागरकी थी, तीन हाथ ऊँचा उसका शरीर था, द्रव्य और भाव दोनों ही शुक्तलेश्याएँ थी, ग्यारह माहमें श्वास लेता था, बाईस हजार वर्षमें मानसिक आहार लेकर संतुष्ट रहता था, लक्ष्मीमान् था, मानसिक प्रवीचारसे युक्त था, प्राकाम्य आदि आठ गुणोंका धारक था, छठवें नरकके पहले-पहले तक व्याप्त रहनेवाले अवधिज्ञानसे देदीप्य-मान था, उतनी ही दूर तक उसका बल तथा विक्रिया शक्ति थी और बाह्य-विकारोंसे रहित विशाल श्रेष्ठ सुखरूपी सागरका पारगामी था, इस प्रकार उसने अपनी असंख्यात वर्षकी आयुको कालकी कलाके समान-एक क्षणके समान बिता दिया ॥ १६-२२ ॥
श्लोक 23 से 31 : भगवान् शीतलनाथ का गर्भ और जन्म कल्याणक
जब उस इन्द्रकी आयु छह माहकी बाकी रह गई और वह पृथिवी पर आनेके लिए उद्यत हुआ तब जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र सम्बन्धी मलय नामक देशमें भद्रपुर नगरका स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा दृढ़रथ राज्य करता था। उसकी महारानीका नाम सुनन्दा था। कुबेरकी आज्ञासे यक्ष जातिके देवोंने छह मास पहलेसे रत्नोंके द्वारा सुनन्दाका घर भर दिया। मानवती सुनन्दाने भी रात्रिके अन्तिम भागमें सोलह स्वप्न देखकर अपने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। प्रातःकाल राजासे उनका फल ज्ञात किया और उसी समय चैत्रकृष्ण अष्टमी के दिन पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें सदृत्तता – सदाचार आदि गुणोंसे उपलक्षित वह देव स्वर्गसे च्युत होकर रानीके उदमें उस प्रकार अवतीर्ण हुआ जिस प्रकार कि सद्वृत्तता – गोलाई आदि गुणोंसे उपलक्षित जलकी बूँद शुक्तिके उदरमें अवतीर्ण होती है ।। २२-२७ ॥ देवोंने आकर बड़े प्रेमसे प्रथम कल्याणककी पूजा की। क्रम-क्रमसे नव माह व्यतीत होनेपर माघकृष्ण द्वादशीके दिन विश्वयोगमें पुत्र-जन्म हुआ ॥ २८ ॥ उसी समय बहुत भारी उत्सवसे भरे देव लोग आकर उस बालकको सुमेरु पर्वत पर ले गये। वहाँ उन्होंने उसका महाभिषेक किया और शीतलनाथ नाम रक्खा ॥२६।। भगवान् पुष्पदन्तके मोक्ष चले जानेके बाद नौ करोड़ सागरका अन्तर बीत जानेपर भग-वान् शीतलनाथका जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसीमें सम्मिलित थी । उनके जन्म लेनेके पहले पल्यके चौथाई भाग तक धर्म-कर्मका विच्छेद रहा था। भगवान्के शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी, आयु एक लाख पूर्वकी थी और शरीर नब्बे धनुष ऊँचा था ॥ ३०-३१ ॥
श्लोक 32 से 41 : राज्यपालन और संसार की अनित्यता का बोध
जब आयुके चतुर्थ-भागके प्रमाण कुमारकाल व्यतीत हो गया तब उन्होंने अपने पिताका पद प्राप्त किया तथा प्रधान सिद्धि प्राप्त कर प्रजाका पालन किया ॥ ३२ ॥ गति आदि शुभ नामकर्म, साता वेदनीय, उत्तम गोत्र और अपघात मरणसे रहित तथा तीर्थकर नामकर्मसे सहित आयु-कर्म ये सभी मिलकर उत्कृष्ट अनुभाग-बन्धका उदय होनेसे उनके लिए सब प्रकारके सुख प्रदान करते थे अतः उनके सुखकी उपमा किसके साथ दी जा सकती है ? ॥ ३३-३४ ॥ इस प्रकार जब उनकी आयुका चतुर्थ भाग शेष रह गया, तथा संसार-भ्रमण अत्यन्त अल्प रह गया तब उनके प्रत्याख्यानावरण कषायका अन्त हो गया । महातेजस्वी भगवान् शीतलनाथ किसी समय विहार करनेके लिए वनमें गये। वहाँ उन्होंने देखा कि पालेका समूह जो क्षण भर पहले समस्त पदार्थोको ढके हुए था शीघ्र ही नष्ट हो गया है ॥ ३५-३६ ।। इस प्रकरणसे उन्हें आत्म-ज्ञान उत्पन्न हो गया और वे इस प्रकार विचार करने लगे कि प्रत्येक पदार्थ क्षण-क्षण भरमें बदलते रहते हैं उन्हींसे यह सारा संसार विनश्वर है ॥ ३७ ॥ आज मैंने दुःख, दुःखी और दुःखके निमित्त इन तीनोंका निश्चय कर लिया। मोहके अनुबन्धसे मैं इन तीनोंको सुख, सुखी और सुखका निमित्त समझता रहा ॥ ३८ ॥ ‘मैं सुखी हूँ, यह सुख है और यह मात्र प्रण्योदय से फिर भी मुझे मिलेगा’ यह बड़ा भारी मोह है जो कि काललब्धिके बिना हो रहा है ॥ ३६ ॥ कर्म पुण्यरूप हों अथवा न हों, यदि कर्म विद्यमान हैं तो उनसे इस जीवको सुख कैसे मिल सकता है ? क्योंकि यह जीव राग-द्वेष तथा अभिलाषा आदि अनेक दोषोंसे युक्त है ।। ४० ।। यदि विषयोंसे ही सुख प्राप्त होता है तो मैं विषयोंके अन्तको प्राप्त हूँ अर्थात् मुझे सबसे अधिक सुख प्राप्त हैं फिर मुझे संतोष क्यों नहीं होता। इससे जान पड़ता है कि विषय-सम्बन्धी सुख मिथ्या सुख है ।॥ ४१ ॥
श्लोक 42 से 55 : दीक्षा, केवलज्ञान और दिव्य संघ
उदासीनता ही सच्चा सुख है और वह उदासीनता मोहके रहते हुए कैसे हो सकती है ? इसलिए मैं सर्वप्रथम इस मोह शत्रुको ही शीघ्रताके साथ जड़-मूलसे नष्ट करता हूँ ।। ४२ ।। इस प्रकार पदार्थके यथार्थ स्वरूपका विचार कर उन्होंने विवेकियोंके द्वारा छोड़नेके योग्य और मोही जीवोंके द्वारा आदर देनेके योग्य अपना सारा साम्राज्य पुत्रके लिए दे दिया ॥ ४३ ॥ उसी समय आये हुए लौकान्तिक देवोंने जिनकी स्तुति की है तथा उन्होंने दीक्षा-कल्याणक पूजा प्राप्त की है ऐसे भगवान् शीतलनाथ शुक्रप्रभा नामकी पालकी पर सवार होकर सहेतुक वनमें पहुँचे ।। ४४ ।। वहाँ उन्होंने माघकृष्ण द्वादशीके दिन सायंकालके समय पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें दो उप-वासका नियम लेकर एक हजार राजाओंके साथ संयम धारण किया ।। ४५ ।। चार ज्ञानके धारी भग-वान् दूसरे दिन चर्याके लिए अरिष्ट नगरमें प्रविष्ट हुए। वहाँ नवधा भक्ति करनेवाले पुनर्वसु राजाने बड़े हर्षके साथ उन्हें खीरका आहार देकर संतुष्ट देवोंके द्वारा प्रदत्त पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। ४६-४७ ॥ तदनन्तर छद्मस्थ अवस्थाके तीन वर्ष बिताकर वे एक दिन बेलके वृक्षके नीचे दो दिनके उपवासका नियम लेकर विराजमान हुए। जिससे पौषकृष्ण चतुर्दशीके दिन पूर्वाषाढ़ नक्षत्रमें सायंकालके समय सुवर्णके समान कान्तिवाले उन भगवान्ने केवलज्ञान प्राप्त किया। उसी समय देवोंने आकर उनके ज्ञान-कल्याणककी पूजा की ॥ ४८-४६ ॥ उनकी सभा में सप्त ऋद्धियोंको धारण करनेवाले अनगार आदि इक्यासी गणधर थे। चौदह सौ पूर्वधारी थे, उनसठ हजार दो सौ शिक्षक थे, सात हजार दो सौ अवधिज्ञानी थे, सात हजार केवलज्ञानी थे, बारह हजार विक्रिया ऋद्धिके धारक मुनि उनकी पूजा करते थे, सात हजार पाँच सौ मनःपर्ययज्ञानी उनके चरणोंकी पूजा करते थे, इस तरह सब मुनियोंकी संख्या एक लाख थी, धरणा आदि तीन लाख अस्सी हजार आर्यिकाएँ उनके साथ थीं, दो लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ उनकी अर्चा तथा स्तुति करती थीं, असंख्यात देव-देवियाँ उनका स्तवन करती थीं और संख्यात तिर्यश्न उनकी सेवा करती थीं ॥ ५०-५५ ।।
श्लोक 56 से 61 : मोक्ष और भगवान् की स्तुति
असंख्यात देशोंमें विहार कर धर्मोपदेशके द्वारा बहुतसे भव्य मिध्यादृष्टि जीवोंको सम्यक्त्व आदि गुणस्थान प्राप्त कराते हुए वे सम्मेदशिखर पर पहुँचे। वहाँ एक माहका योग-निरोध कर उन्होंने प्रतिमा योग धारण किया और एक हजार मुनियोंके साथ आश्विन शुक्ला अष्टमीके दिन सायंकालके समय पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें समस्त कर्म-शत्रुओंको नष्टकर मोक्ष प्राप्त किया ॥ ५६-५८ ॥ अपने शरीरकी कान्तिसे सब पदार्थोंको प्रकाशित करनेवाले इन्द्र पंचम कल्याणक कर तथा शीतलनाथ जिनेन्द्रकी स्तुति कर स्वर्गको चले गये ॥ ५६ ॥
जिनका जन्म होते ही संसार इस प्रकार प्रसन्नताको प्राप्त हो गया जिस प्रकार कि चन्द्रोदयसे होता है। समस्त भाई-बन्धुओंके मुख इस प्रकार विकसित हो गये जिस प्रकार कि सूर्यसे कमल विकसित हो जाते हैं और याचक लोग इच्छित पदार्थ पाकर बड़े हर्षसे कृतकृत्य हो गये उन देव पूजित, रति तथा तृष्णाको नष्ट करनेवाले शीतल जिनेन्द्रकी मैं वन्दना करता हूँ – स्तुति करता हूँ ॥ ६० ॥ दिग्गजोंके कपोलमूलसे गलते हुए तथा सबको सुगन्धित एवं हर्षित करनेवाले मद-जलसे जिन्होंने ललाट पर अर्धचन्द्राकार तिलक दिया है, जिनके कण्ठ मधुर हैं ऐसी दिक्कन्याएँ स्वरचित पद्योंके द्वारा जिनकी अत्यन्त उद्दण्ड मोहरूपी शूर-वीरको जीत लेनेके गीत गाती हैं उन शीतल जिनेन्द्रकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ ६१ ॥
श्लोक 62 से 71 : धर्म का ह्रास और दानों का विवेचन
जो पहले सब तरहके गुणोंसे स्तुत्य पद्मगुल्म नामके राजा हुए, फिर देवोंके द्वारा पूजित आरण स्वर्गके इन्द्र हुए और तदनन्तर दशम तीर्थकर हुए उन दयालु तथा सबको शान्त करनेवाले श्री शीतल जिनेन्द्रको हे भव्य जीवो ! नमस्कार करो ।॥ ६२ ॥
अथानन्तर-श्री शीतलनाथ भगवान्के तीर्थके अन्तिम भागमें काल-दोषसे वक्ता, श्रोता और आचरण करनेवाले धर्मात्मा लोगोंका अभाव हो जानेसे समीचीन जैन धर्मका नाश हो गया ।॥६३॥ उस समय भागलपुरम मलय दशका स्वामी राजा मघरथ रहता था, उसके मंत्रीका नाम सत्यकीति था ॥ ६४ ॥ किसी एक दिन राजा मेघरथ सभा-भवनमें सिंहासन पर बैठे हुए थे, उसी समय उन्होंने धर्मके लिए धन दान करनेकी इच्छासे सभामें बैठे हुए लोगों से कहा ॥ ६५ ॥ कि सब दानों-में ऐसा कौन-सा दान है कि जिसके देनेपर बहुत फल होता हो ? इसके उत्तरमें दानके तत्त्वको जाननेवाला मंत्री इस प्रकार कहने लगा ।।६६॥ कि श्रेष्ठ मुनियोंने शास्त्रदान, अभयदान और अन्नदान ये तीन प्रकारके दान कहे हैं। ये दान बुद्धिमानोंके लिए पहले-पहले अधिक फल देनेवाले हैं अर्थात् अन्नदानकी अपेक्षा अभयदानका और अभयदानकी अपेक्षा शास्त्रदानका बहुत फल है ॥ ६७ ॥ जो सर्वज्ञ-देवका कहा हुआ हो, पूर्वापरविरोध आदि दोषोंसे रहित हो, हिंसादि पापोंको दूर करनेवाला हो और प्रत्यक्ष परोक्ष दोनों प्रमाणोंसे सम्पन्न हो उसे शास्त्र कहते हैं ।॥ ६८ ॥ संसारके दुःखोंसे डरे हुए सत्पुरुषोंका उपकार करनेकी इच्छासे पूर्वोक्त शास्त्रका व्याख्यान करना शास्त्रदान कहलाता -है ।। ६६ ॥ मोक्ष प्राप्त करनेका इच्छुक तथा तत्त्वोंके स्वरूपको जाननेवाला मुनि कर्मबन्धके कारणों-को छोड़नेकी इच्छासे जो प्राणिपीड़ाका त्याग करता है उसे अभयदान कहते हैं ।॥ ७० ॥ हिंसादि दोषोंसे दूर रहनेवाले ज्ञानी साधुओंके लिए शरीरादि बाह्य साधनोंकी रक्षाके अर्थ जो शुद्ध आहार दिया जाता है उसे आहारदान कहते हैं ।॥ ७१।।
श्लोक 72 से 81 : शास्त्रदान की महिमा और मिथ्या मत का उदय
इन आदि और अन्तके दानोंसे देने तथा लेनेवाले दोनोंको ही कर्मोंकी निर्जरा एवं पुण्प कर्मका आस्त्रव होता है और अभयदानसे सिर्फ देनेवालेके ही उक्त दोनों फल होते हैं।॥७२॥ इस संसारमें ज्ञानसे बढ़कर अन्य दान नहीं हैं और ज्ञान शास्त्रके बिना नहीं हो सकता। वास्तवमें शास्त्र ही हेय और उपादेय तत्त्वोंको प्रकाशित करनेवाला श्रेष्ठ साधन है ।। ७३ ।। शास्त्रका अच्छी तरह व्याख्यान करना, सुनना और चिन्तवन करना शुद्ध बुद्धिका कारण है। शुद्ध बुद्धिके होने पर ही भव्य जीव हेय पदार्थको छोड़कर और हितकारी पदार्थको ग्रहण कर व्रती बनते हैं, मोक्षमार्गका अवलम्बन लेकर क्रम-क्रमसे इन्द्रियों तथा मनको शान्त करते हैं और अन्तमें शुक्ल-ध्यानका अवलम्बन लेकर अविनाशी मोक्ष पद प्राप्त करते हैं ।॥ ७४-७५ ॥ इसलिए सब दानोंमें शास्त्रदान ही श्रेष्ठ है, पाप-कार्योंसे रहित है तथा देने और लेनेवाले दोनोंके लिए ही निजानन्द रूप मोक्ष-प्राप्तिका कारण है ॥ ७६ ॥ अन्तिम आहारदानमें थोड़ा आरम्भ-जन्य पाप करना पड़ता है इसलिए उनकी अपेक्षा अभयदान श्रेष्ठ है। यह जीव इन तीन महादानोंके द्वारा परम पदको प्राप्त होता है ।। ७७ ।। इस प्रकार कहे जानेपर भी राजाने दानका यह निरूपण स्वीकृत नहीं किया क्योंकि वह कपोतलेश्याके माहात्म्यसे इन तीन दानोंके सिवाय और ही कुछ दान देना चाहता था ।। ७८ ।।
उसी नगरमें एक भूतिशर्मा नामका ब्राह्मण रहता था। वह अपनी बुद्धिके अनुसार खोटे-खोटे शास्त्र बनाकर राजाको प्रसन्न किया करता था ॥ ७६ ॥ उसके मरने पर उसका मुण्डशालायन नामक पुत्र समस्त शास्त्रोंका जाननेवाला हुआ। वह उस समय उसी सभामें बैठा हुआ था अतः मंत्रीके द्वारा पूर्वोक्त दानका निरूपण समाप्त होते ही कहने लगा ।। ८० ॥ कि ये तीन दान मुनियोंके लिए अथवा दरिद्र मनुष्योंके लिए हैं। बड़ी-बड़ी इच्छा रखनेवाले राजाओंके लिए तो दूसरे ही उत्तम दान हैं ॥ ८१ ॥
श्लोक 82 से 91 : कुपात्र दान की निन्दा
शाप तथा अनुग्रह करनेकी शक्तिप्ते सुशोभित ब्राह्मणोंके लिए, जब तक चन्द्र अथवा सूर्य हैं तब तक यशका करनेवाला पृथिवी तथा सुवर्णादिका चहुत भारी दान दीजिए ।। ८२ ।। इस दानका समर्थन करनेवाला ऋषिप्रणीत शास्त्र भी विद्यमान है, ऐसा कहकर वह अपने घरसे अपनी बनाई हुई पुस्तक ले आया और सभामें उसे बचवा दिया ।। ८३ ॥ इस प्रकार अभि-प्रायको जाननेवाले मुण्डशालायनने अवसर पाकर कुमार्गका उपदेश दिया और राजाने उसे बहुत माना – उसका सत्कार किया ।॥ ८४ ॥ देखो, मुण्डशालायन पापसे नहीं डरता था, अभद्र था, विषयान्ध था और दुर्बुद्धि था फिर भी राजा परलोककी बड़ी भारी आशासे उसपर अनुरक्त हो गया- प्रसन्न हो गया ।॥ ८५ ॥ किसी समय कार्तिक मासकी पौर्णमासीके दिन उस दुर्बुद्धि राजाने शुद्ध होकर बड़ी भक्तिके साथ अक्षतादि द्रव्योंसे मुण्डशालायनकी पूजा कर उसे उसके द्वारा कहे हुए भूमि तथा सुवर्णादिके दान दिये। यह देख भक्त मंत्रीने राजासे कहा ।। ८६-८७ ॥ अनुग्रहके लिए अपना धन या अपनी कोई वस्तु देना सो दान है ऐसा जिनेन्द्र भगवान्ने कहा है और इस विषयके जानकार मनुष्य अपने तथा परके उपकारको ही अनुग्रह कहते हैं ।॥ ८८ ॥ पुण्य कर्मकी वृद्धि होना यह अपना उपकार है- अनुग्रह है और परके गुणोंकी वृद्धि होना परका उपकार है। स्व शब्द धनका पर्यायवाची है। धनका पात्रके लिए देना स्व दान कहलाता है। यही दान प्रशंस-नीय दान है फिर जानते हुए भी आप इस प्रकार कुपात्रके लिए धन दान देकर आप दाता, दान और पात्र तीनोंको क्यों नष्ट कर रहे हैं ॥ 89-90॥ उत्तम बीज कितना ही अधिक क्यों न हो, यदि ऊसर जमीनमें डाला जावेगा तो उससे संक्तंश और बीज नाश-रूप फलके सिवाय और क्या होगा ? कुछ भी नहीं ॥ 91 ॥
श्लोक 92 से 96 : मिथ्या दानों का प्रचार और पर्व की पूर्णता
इसके विपरीत उत्तम बीज थोड़ा भी क्यों न हो, यदि समयको जाननेवाले मनुष्यके द्वारा उत्तम क्षेत्रमें बोया जाता है तो बोनेवाले के लिए उससे हजारगुना फल प्राप्त होता है ॥ 92 ॥ इस प्रकार उस बुद्धिमान् एवं भक्त मंत्रीने यद्यपि करोड़ों उदाहरण देकर उस राजाको समझाया परन्तु उससे राजाका कुछ भी उपकार नहीं हुआ ॥ 93 ॥ सो ठीक ही है क्योंकि विपरीत बुद्धिवाले मनुष्यके लिए सत्-पुरुषोंके वचन ऐसे हैं जैसे कि कालके काटेके लिए मंत्र, जिसकी आयु पूर्ण हो चुकी है उसके लिए औषधि, और जन्मके अन्धेके लिए दर्पण ॥ 94 ॥ उस कुमार्गगामी राजाने प्रारम्भसे ही चले आये दानके मार्गको छोड़कर मूर्ख मुण्डशालायनके द्वारा कहे हुए आधुनिक दानके मार्गको प्रचलित किया ।॥ 95 ॥ इस प्रकार लौकिक वस्तुओंके लोभी, भूतिशर्मा के पुत्र मुण्डशालायन ने श्री शीतलनाथ जिनेन्द्र के तीर्थ के अन्तिम समयमें दरिद्रोंको अच्छा लगनेवाला-कन्यादान, हस्तिदान, सुवर्णदान, अश्वदान, गोदान, दासीदान, तिलदान, रथदान, भूमिदान और गृहदान यह दश प्रकारका दान स्वयं ही अच्छी तरह प्रकट किया – चलाया ॥ 96॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें शीतलपुराणका वर्णन करनेवाला छप्पनवाँ पर्व पूर्ण हुआ ।
पर्व 57
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena