सुपार्श्वनाथ स्वामी भगवान का पुराण वर्णन
उत्तरपुराण के त्रेपन्नवें पर्व में सप्तम तीर्थंकर भगवान सुपार्श्वनाथ के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण का अत्यंत प्रेरक वर्णन किया गया है।
Hindi Translation of Uttar puran Parv 53
श्लोक 1 से 11 राजा नन्दिषेण का धर्ममय राज्य और वैराग्य का उदय
जिन्होंने जीवाजीवादि तत्त्वोंको सत्त्व असत्त्व आदि किसी एक रूपसे निश्चित नहीं किया है फिर भी उनके जानकार वही हैं ऐसे सुपार्श्वनाथ भगवान् मेरे गुरु हों ॥ १ ॥ धातकीखण्ड के पूर्व विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके उत्तर तट पर सुकच्छ नामका देश है। उसके क्षेमपुर नगरमें नन्दिपेण नामका राजा राज्य करता था ।। २ ।। वह राजा बुद्धि और पराक्रमसे युक्त था, उसके अनुचर सदा उसमें अनुराग रखते थे, यही नहीं दैव भी सदा उसके अनुकूल रहता था। इसलिए उसकी राज्य-लक्ष्मी सबको सुख देनेवाली थी ।॥ ३ ॥ उसके शरीरकी न तो वैद्य लोग रक्षा करते थे और न राज्यकी मंत्री ही रक्षा करते थे फिर भी पुण्योदयसे उसके शरीर और राज्य दोनों ही कुशलयुक्त थे ॥ ४ ॥ धर्म, अर्थ और काम ये तीनों पुरुषार्थ परस्परका उपकार करते हुए उसी एक राजामें स्थित थे इसलिए यह उस राजाका उपकारीपना ही था ।। ५ ।। शत्रुओंको जीतनेवाले इस राजा नन्दिषेणको जीतनेकी इच्छा सिर्फ इस लोक सम्बन्धी ही नहीं थी किन्तु समीचीन मार्गकी रक्षा करते हुए इसके परलोकके जीतनेकी भी इच्छा थी ।। ६ ।। इस प्रकार वह श्रीमान् तथा बुद्धिमान् राजा बन्धुओं, मित्रों तथा सेवकोंके साथ राज्य-सुखका अनुभव करता हुआ शीघ्र ही विरक्त हो गया ।। ७ ।। वह विचार करने लगा कि यह जीव दर्शनमोह तथा चारित्रमोह इन दोनों मोहकर्मके उदयसे मिली हुई मन, वचन, कायकी प्रवृत्तिते कर्मोंको बाँधकर उन्होंके द्वारा प्रेरित हुआ चारों गतियोंमें उत्पन्न होता है ।। ८ ।। अत्यन्त दुःखसे तरने योग्य इस अनादि संसारमें चक्रकी तरह चिरकालसे भ्रमण करता हुआ भव्य प्राणी दुःखसे दूषित हुआ कदाचित् कालादि लब्धियाँ पाकर अतिशय कठिन मोक्षमार्गको पाता है फिर भी मोहित हुआ स्त्रियों आदिके साथ क्रीडा करता है। मैं भी ऐसा ही हूँ अतः कामियोंमें मुख्य मुझको बार-बार धिक्कार है ।। ९-१० ॥ मैं समस्त कर्मोंको नष्ट कर निर्मल हो ऊर्ध्व-गामी बनकर सबका हित करनेवाले सर्वज्ञ-निरूपित निर्वाणलोकको नहीं प्राप्त हो रहा हूँ यह दुःख की बात है ।। ११ ।।
श्लोक 12 से 22 : दीक्षा, तीर्थंकर प्रकृति बन्ध और सुपार्श्वनाथ का गर्भावतरण
इस प्रकार विचार कर उत्तम हृदयको धारण करनेवाले राजा नन्दिषेणने अपने पद पर सज्जनोत्तम धनपति नामक अपने पुत्रको विराजमान किया और स्वयं अनेक राजाओंके साथ पाप कर्मको नष्ट करता हुआ बड़े हर्षसे पूज्य अर्हन्नन्दन मुनिका शिष्य बन गया ।। १२-१३ ।। तदनन्तर ग्यारह अङ्गका धारी होकर उसने आगममें कही हुई दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओंके द्वारा तीर्थकर नामकर्मका बन्ध किया और आयुके अन्तमें संन्यास मरण कर मध्यम मैवेयकके सुभद्र नामक मध्यम विमानमें अहमिन्द्रका जन्म धारण किया। वहाँ उसके शुक्ल लेश्या थी, और दो हाथ ऊँचा शरीर था ।। १४-१५ ॥ चार सौ पाँच दिनमें श्वास लेता था और सत्ताईस हजार वर्ष बाद आहार ग्रहण करता था ।। १६ ।। उसकी विक्रिया ऋद्धि, अवधिज्ञान, बल और कान्ति सप्तमी पृथिवी तक थी तथा सत्ताईस सागर उसकी आयु थी। इस प्रकार समस्त सुख भोगकर आयुके अन्तमें जब वह पृथिवी तल पर अवतीर्ण होनेको हुआ तब इस जम्बूद्वीपके भारत-वर्ष सम्बन्धी काशी देशमें बनारस नामकी नगरी थी। उसमें सुप्रतिष्ठ महाराज राज्य करते थे। सुप्रतिष्ठका जन्म भगवान् वृषभदेवके इक्ष्वाकु वंशमें हुआ था। उनकी रानीका नाम था पृथिवी-घेणा था। रानी पृथिवीषेणाके घरके आंगनमें देवरूपी मेघोंने छह माह तक उत्कृष्ट रत्नोंकी वर्षा की थी। उसने भाद्रपद शुक्ल षष्ठी के दिन विशाखा नक्षत्रमें सोलह शुभ स्वप्न देखकर मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। उसी समय वह अहमिन्द्र रानीके गर्भमें आया । पतिके मुखसे स्वप्नों-का फल जानकर रानी पृथिवीषेणा बहुत ही हर्षित हुई। तदनन्तर ज्येष्ठशुक्ल द्वादशीके दिन अग्निमित्र नामक शुभयोगमें उसने ऐरावत हाथीके समान उन्नत और बलवान् अहमिन्द्रको पुत्र रूपसे उत्पन्न किया ॥ १७-२२ ॥
श्लोक 23 से 34 : जन्मकल्याणक, अलौकिक सौन्दर्य और राज्यवैभव
इन्द्रोंने सुमेरु पर्वतके मस्तक पर उसका जन्मकालीन महोत्सव किया, उसके चरणोंमें अपने मुकुट झुकाये और ‘सुपार्श्व’ ऐसा नाम रक्खा ॥ २३ ॥ पद्मप्रभ जिनेन्द्रके बाद नौ हजार करोड़ बीत जानेपर भगवान् सुपार्श्वनाथका जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें सम्मिलित थी ।। २४ ।। उनकी आयु बीस लाख पूर्वकी थी, और शरीरकी ऊँचाई दो सौ धनुष थी, वे अपनी कान्तिसे चन्द्रमाको लज्जित करते थे। इस तरह उन्होंने यौवन अवस्था प्राप्त की ।। २५ ।। जब उनके कुमार-कालके पाँच लाख पूर्व व्यतीत हो गये तब उन्होंने दानीकी भाँति धनका त्याग करनेके लिए साम्राज्य स्वीकार किया ॥ २६ ॥ उस समय इन्द्र शुश्रूषा आदि बुद्धिके आठ गुणोंसे श्रेष्ठ, सर्वशास्त्रोंमें निपुण झुण्डके झुण्ड नटोंको, देखने योग्य तथा नृत्य करनेमें निपुण नर्तकोंको, उत्तम कण्ठवाले गायकोंको, श्रवण करने योग्य साढ़ेसात प्रकारके वादित्र-वादकोंको, हास्य-विनोद करनेमें चतुर, अनेक विद्याओं और कलाओंमें निपुण अन्य अनेक मनुष्योंको, ऐसे ही गुणोंसे सहित अनेक स्त्रियोंको तथा गन्धर्वोकी श्रेष्ठ सेनाको बुलाकर अनेक प्रकारके विनोदोंसे भगवान्को सुख पहुँचाता था ।। २७-२६ ॥ इसी प्रकार चक्षु और कर्णके सिवाय शेष तीन इद्रियोंके उत्कृष्ट विषयोंसे भी इन्द्र, भगवान्को निरन्तर सुखी रखता था। यथार्थमें संसारमें सुख वही था जिसका कि भगवान् सुपार्श्वनाथ उपभोग करते थे ॥ ३० ॥ प्रशस्त नामकर्मके उदयसे उनके निःस्वेत्व आदि आठ अतिशय प्रकट हुए थे, वे सर्वप्रिय तथा सर्वहितकारी वचन बोलते थे, उनका व्यापाररहित अतुल्य बल था, वे सदा प्रसन्न रहते थे, उनकी आयु अनपवर्त्य थी- असमयमें कटनेवाली नहीं थी, गुण, पुण्य और सुख रूप थे, उनका शरीर कल्याणकारी था, वे मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानोंसे सहित थे, प्रियङ्गुके पुष्पके समान उनकी कान्ति थी, उनके अशुभ कर्मका अनुभाग अत्यन्त मन्द था, शुभ कर्मका अनुभाग अत्यन्त उत्कृष्ट था, उनका कण्ठ मानो मोक्ष-स्वर्ग तथा मानवोचित ऐश्वर्यकी कण्ठीसे ही सुशोभित था। उनके चरणोंके नखोंमें समस्त इन्द्रेाके मुखकमल प्रतिविम्बित हो रहे थे, इस प्रकार लक्ष्मीको धारण करनेवाले प्रकृष्टज्ञानी भगवान् सुपार्श्वनाथ अगाध संतोष-सागरमें वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे ।। ३१-३४ ॥
श्लोक 35 से 42 : नश्वरता का बोध, वैराग्य और दीक्षा
जिनके प्रत्याख्यानावरण और संज्वलन सम्बन्धी क्रोध, मान, माया, लोभ इन आठ कषायोंका ही केवल उदय रह जाता है ऐसे सभी तीर्थंकरोंके अपनी आयुके प्रारम्भिक आठ वर्षके बाद देश-संयम हो जाता है ॥ ३५ ॥ इसलिए यद्यपि उनके भोगो-पभोगकी वस्तुओंकी प्रचुरता थी तो भी वे अपनी आत्माको अपने वश रखते थे, उनकी वृत्ति नियमित थी तथा असंख्यातगुणी निर्जराका कारण थी ।। ३६ ॥
जब उनकी आयु बीस पूर्वाङ्ग कम एक लाख पूर्वकी रह गई तब किसी समय ऋतुका परि-वर्तन देखकर वे ‘समस्त पदार्थ नश्वर हैं’ ऐसा चिन्तवन करने लगे ॥ ३७ ॥ उनके निर्मल सम्यग्-ज्ञान रूपी दर्पणमें काललब्धिके कारण समस्त राज्य-लक्ष्मी छायाकी क्रीडाके समान’ नश्वर जान पड़ने लगी ॥ ३८ ॥ मैं नहीं जान सका कि यह राज्यलक्ष्मी इसी प्रकार शीघ्र ही नष्ट हो जानेवाली तथा मायासे भरी हुई है। मुझे धिक्कार हो, धिक्कार हो। सचमुच ही जिनके चित्त भोगोंके रागसे अन्धे हो रहे हैं ऐसे कौन मनुष्य हैं जो मोहित न होते हों ॥ ३६ ॥ इस प्रकार भगवान्के मनरूपी सागर में चन्द्रमाके समान उत्कृष्ट आत्मज्ञान उत्पन्न हुआ और उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर समयानुकूल पदार्थोंसे भगवान्की स्तुति की ।॥ ४० ॥ तदनन्तर भगवान् सुपार्श्वनाथ, देवोंके द्वारा उठाई हुई मनोगति नामकी पालकी पर आरूढ़ होकर सहेतुक वनमें गये और वहाँ ज्येष्ठशुक्त द्वादशी-के दिन सायंकालके समय, गर्भके विशाखा नक्षत्रमें वेलाका नियम लेकर एक हजार राजाओंके साथ संयमी हो गये-दीक्षित हो गये। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया ।। ४१-४२ ।।
श्लोक 43 से 51 : तप, केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
दूसरे दिन वे चर्याके लिए सोमखेट नामक नगर में गये। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले महेन्द्रदत्त नामके राजाने पडगाह कर देवोंसे पूजा प्राप्त की ॥ ४३ ॥ सुपार्श्वनाथ भगवान् छद्मस्थ अवस्थामें नौ वर्ष तक मौन रहे। तदनन्तर उसी सहेतुक वनमें दो दिनके उपवासका नियम लेकर वे शिरीष वृक्षके नीचे ध्यानारूढ़ हुए। वहीं फाल्गुन (१) कृष्ण षष्ठी के दिन सायंकालके समय गर्भावतारके विशाखा नक्षत्रमें उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ जिसमें देवोंने उनकी पूजा की ।। ४४-४५ ।। वे बलको आदि लेकर पंचानवे “गुणधरोंसे सदा घिरे रहते थे, दो हजार तीस पूर्वधारियोंके अधिपति थे, दो लाख चवालीस हजार नौ सौ बीस शिक्षक उनके साथ रहते थे, नौ हजार अवधिज्ञानी उनकी सेवा करते थे, ग्यारह हजार केवलज्ञानी उनके सहगामी थे, पन्द्रह हजार तीन सौ विक्रियाऋद्धिके धारक उनकी पूजा करते थे, नौ हजार एक सौ पचास मनःपर्ययज्ञानी उनके साथ रहते थे, और आठ हजार छह सौ वादी उनकी वन्दना करते थे। इस प्रकार सब मिलाकर तीन लाख मुनियोंके स्वामी थे। मीनार्याको आदि लेकर तीन लाख तीस हजार आर्यिकाएँ उनके साथ रहती थीं, तीन लाख श्रावक और पाँच लाख श्राविकाएँ उनकी पूजा करती थीं, असंख्यात देव-देवियाँ उनकी स्तुति करती थीं और संख्यात तिर्यञ्च उनकी वन्दना करते थे ।। ४६-५१ ।।
श्लोक 52 से 56 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और मंगलमयी महिमा
इस प्रकार लोगोंको धर्मामृतरूपी वाणी ग्रहण कराते हुए वे पृथिवीपर विहार करते थे। अन्तमें जब आयुका एक माह रह गया तब विहार बन्द कर वे सम्मेदशिखर पर जा पहुँचे। वहाँ एक हजार मुनियोंके साथ उन्होंने प्रतिमा-योग धारण किया और फाल्गुन कृष्ण सप्तमीके दिन विशाखा नक्षत्रमें सूर्योदय के समय लोकका अग्रभाग प्राप्त किया – मोक्ष पधारे ।। ५२-५३ ।। तदनन्तर पुण्यवान् कल्पवासी उत्तम देवेोंने निर्वाण-कल्याणक किया) तथा ‘यहाँ निर्वाण-क्षेत्र है’ इस प्रकार सम्मेदशिखरको निर्वाण-क्षेत्र ठहराकर स्वर्गकी ओर प्रयाण किया ।। ५४ ।। अत्यन्त बुद्धिमान् और निपुण जिन सुपाश्र्वनाथ भगवान्ने दुःखसे निवारण करनेके योग्य पापरूपी बड़े भारी शत्रुओंके समूहको निष्क्रिय कर दिया, मौन रखकर उसके साथ युद्ध किया, कुछ काल तक समवसरणमें प्रतिष्ठा प्राप्त की, अत्यन्त दुष्ट दुर्वासनाको दूर किया और अन्तमें निर्वाण-की अवधिको प्राप्त किया, वे श्रेष्ठतम भगवान् सुपार्श्वनाथ हम सब परिचितोंको चिरकालके लिए शीघ्र ही अपने समीपस्थ करें ॥ ५५ ॥ जो पहले भवमें क्षेमपुर नगरके स्वामी तथा सबके द्वारा स्तुति करने योग्य नन्दिषेण राजा हुए, फिर तप कर नव ग्रैवेयकोंमेंसे मध्यके मैवेयकमें अहमिन्द्र हुए, तदनन्तर बनारस नगरी में शत्रुओंको जीतनेवाले और इक्ष्वाकु वंशके तिलक महाराज सुपार्श्व हुए वे सप्तम तीर्थंकर तुम सबकी रक्षा करें ।॥ ५६ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्यसे प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण वर्णन करनेवाला त्रेपनवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
पर्व 54
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena