चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 193
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 194 to 201
श्लोक ( Shlok ) 194
धर्मादयो व्यवर्द्धत गुणाः पापाद्ययात्क्षयम् । कौमारेऽस्मिन् स्थितेऽप्येवं किं वाच्यं संयमे सति ॥१९४॥
जब भगवान् कौमार अवस्थामें ही थे तभी धर्म आदि गुणोंकी वृद्धि हो गई थी और पाप आदिका क्षय हो गया था, फिर संयम धारण करने पर तो कहना ही क्या है ? ॥ १९४ ॥
While the Lord was still in his youth (Kaumara avastha), his virtues, such as Dharma (righteousness), had already reached their height, and his sins (papa) had already been destroyed. If this was his state while still living a worldly life, what then can be said of his spiritual glory once he actually adopts formal self-restraint (Sanyam)? || 194 ||
श्लोक ( Shlok ) 195
इति द्विलक्षपञ्चाशत्सहस्त्रप्रमितैर्गतैः । पूर्वे राज्याभिषेकाप्त्या परमानन्दसुन्दरः ॥ १९५ ॥
इस प्रकार दो लाख पचास हजार पूर्व व्यतीत होने पर उन्हें राज्याभिषेक प्राप्त हुआ था और उससे वे बहुत ही हर्षित तथा सुन्दर जान पड़ते थे ॥ १९५ ॥
In this manner, after two lakh fifty thousand purvas had passed, he received his coronation (Rajyabhisheka). At that time, he appeared exceedingly joyful and magnificent. || 195 ||
श्लोक ( Shlok ) 196
नावतो मण्डलं राहोः स्वहस्ततलसस्मितम् । किं तेजोऽर्कस्य तेजोऽस्य तेजस्तैलोक्यरक्षिणः ।। १९६ ।।
जो अपनी हथेलीप्रमाण मण्डलकी राहुसे रक्षा नहीं कर सकता ऐसे सूर्यका तेज किस कामका ? तेज तो इन भगवान् चन्द्रप्रभका था जो कि तीन लोककी रक्षा करते थे ।। १९६ ।।
Of what use is the brilliance of the Sun, which cannot even protect its own small orb—the size of a palm—from being eclipsed by Rahu? True power and splendor belonged only to Lord Chandraprabha, who provided protection to all three worlds. || 196 ||
श्लोक ( Shlok ) 197
शक्रादयोऽपि कैक्ङ्कर्य जन्मनः प्राग्वहन्ति चेत् । ऐश्वर्यादिभिरेषोऽन्यैर्वृतः कैरुपमीयताम् ॥ १९७ ॥
जिन जन्मके पहले ही इन्द्र आदि देव किङ्करता स्वीकृत कर लेते हैं ऐसे अन्य ऐश्वर्य आदिसे घिरे हुए इन चन्द्रप्रभ भगवान्को किसकी उपमा दी जावे ? ॥ १९७ ॥
Even before his birth, the King of Heaven (Indra) and other gods had accepted the role of his servants. Surrounded as he was by such extraordinary and divine prosperity, to what could Lord Chandraprabha possibly be compared? (There is no equal to him in the universe.) || 197 ||
श्लोक ( Shlok ) 198
तले कपोलयोः स्त्रीणां छेदे वा दन्तिदन्तयोः । स विलोक्य स्मरस्मेरं स्वमुखं सुखमेयिवान् ॥ १९८ ॥
वे स्त्रियोंके कपोल-तलमें अथवा हाथी-दाँतके टुकड़ेमें कामदेवसे मुसकाता हुआ अपना मुख देखकर सुखी होते थे ॥ १९८ ॥
He would feel a sense of peaceful joy upon seeing his own face—smiling as beautifully as Kamadeva (the god of love)—reflected in the smooth cheeks of the palace women or in polished pieces of ivory. || 198 ||
श्लोक ( Shlok ) 199
विलोकिनीनां कान्तानामुत्सुकानां विलासकृत् । त्यागीव स सुखी जातः ‘स्ववक्त्ररसतर्पणात् ॥ १९९ ॥
जिस प्रकार कोई दानी पुरुष दान देकर सुखी होता है उसी प्रकार शृङ्गार चेष्टाओंको करने वाले भगवान्, अपनी ओर देखनेवाली उत्सुक स्त्रियोंके लिए अपने मुखका रस समर्पण करनेसे सुखी होते थे ।॥ १९९॥
Just as a charitable person (Daani) feels immense joy upon giving gifts, so too did the Lord feel a sense of peaceful satisfaction by “offering the nectar of his face” to the eager women who gazed upon him with admiration. || 199 ||
श्लोक ( Shlok ) 200
नान्तरायः परं तस्य कान्तावक्त्राब्जवीक्षणे । जातपक्ङ्केरुहाशङ्केभ्रंमद्भिर्भमरैर्विना ॥ २०० ॥
मुखमें कमलकी आशङ्का होनेसे जो पास हीमें मँडरा रहे हैं ऐसे भ्रमरोंको छोड़कर स्त्रीका मुख-कमल देखनेमें उन्हें और कुछ बाधक नहीं था ॥ २०० ॥
There was no obstacle to him beholding the lotus-like faces of the palace women, except for the swarms of bees that hovered closely, mistaking their faces for real lotuses. || 200 ||
श्लोक ( Shlok ) 201
मधुपैश्चपलैलोंलैर्युक्तायुक्ताविचारकैः । मलिनैः किमकर्तव्यं प्रवेशो यदि लभ्यते ॥ २०१ ॥
चञ्चल सतृष्ण, योग्य अयोग्यका विचार नहीं करनेवाले और मलिन मधुप-भ्रमर भी (पक्षमें मद्य-पायी लोग भी) जब प्रवेश पा सकते हैं तब संसारमें ऐसा कार्य ही कौन है जो नहीं किया जा सकता हो ।। २०१ ।।
When even bees (Madhupa)—who are restless, thirsty, and incapable of distinguishing between right and wrong—can find their way into the most private areas of the palace, then what task in this world remains impossible?
Alternative meaning: When even drunkards (Madya-payi)—who are fickle, greedy, lacking in judgment, and impure—can gain entry [into high places], then truly, what feat in this world is impossible [to achieve through means both fair and foul]? || 201 ||
श्लोक 202 से 211
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