आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 65 to 108
श्लोक ( Shlok ) 65 – 67
खगाद्रेः पूर्वदिग्भागे नीलाद्रेरपि पश्चिमे । सुसीमाख्योऽस्ति देशोऽत्र महानगरमप्यदः ॥६५॥तद्भूतवनमेतत्त्वं सम्यक चित्तेऽवधारय । ‘अस्मिन्नेताः शिलाः सप्त परस्परधृताः कृताः ॥६६॥ येनाऽसौ चक्रवर्तित्वं प्राप्तेत्यादेश ईदृशः । इति तद्वचनादेष ‘तास्तथा कृतवांस्तदा ॥६७॥
‘विजयार्ध पर्वतकी पूर्व दिशा और नीलगिरिकी पश्चिमकी ओर यह सुसीमा नामका देश है, इसमें यह महानगर नामका नगर है और यह भूतारण्य वन है, यह तू अपने मनमें अच्छी तरह निश्वय कर ले, इधर इस वनमें ये सात शिलाएं पड़ी हैं जो कोई इन्हें परस्पर मिलाकर एकपर एक रख देगा वह चक्रवर्ती पदको प्राप्त होगा ऐसी सर्वज्ञ देवकी आज्ञा है’ विद्याधरके यह वचन सुनकर श्रीपालकुमारने उन शिलाओंको उसी समय एकके ऊपर एक करके रख दिया ।। ६५-६७।।
“This land is called Susima,” said the Vidyadhara, “situated to the east of Mount Vijayardha and to the west of the Nilagiri mountains. Within it lies this great city, known as Mahanagara, and here stretches the forest named Bhootaranya. Fix these truths firmly in your mind: in this forest rest seven massive stones, and it is decreed by the Omniscient Lord that whoever shall place these stones one atop the other shall attain the exalted position of a universal sovereign.”Hearing the words of the Vidyadhara, Prince Shripal immediately set about the task and, with steadfast resolve, stacked the seven stones one upon another.॥65–67॥
श्लोक ( Shlok ) 68 – 108
दृष्ट्वा तत्साहसं वक्तुं सोऽगमन्नगरे शिनः । कुमारोऽपि विनिर्गत्य ततो निर्विण्णचेतसा ॥६८॥ काञ्चिज्जरावतीं ‘कुत्स्यशरीरां कस्यचित्तरोः । ‘अवस्थितामधोभागे विषयं पुष्कलावतीम् ॥६९।। वद प्रयाति कः पन्था इत्यप्राक्षीत् प्रियं वहन् । विना गगनमार्गेण प्रयात् नैव शक्यते ॥७०॥ “स गव्यू तिदशतोत्सेधविजयार्द्धगिरेरपि । परस्मिन्नित्यसावाह तदाकर्ण्य नृपात्मजः ॥७१॥ ब्रूहि तत्प्रापणोपायमिति तां प्रत्यभाषत । इह जम्बूमति द्वीपे विषयो वत्सकावती ॥७२॥ तत्खेचरगिरौ राजपुरे खेचरचक्रिणः । देवी धरणिकम्पस्य सुप्रभा वा प्रभाकरी ॥७३॥ तयोरहं तनूजास्मि विख्याताख्या सुखावती । “त्रिप्रकारोरुविद्यानां पारगाऽन्येद्युरागता ॥७४॥ विषये वत्सकावत्यां विजयार्थमहीधरै । अकम्पनसुतां पिप्पलाख्यां प्राणसमां सखीम् ॥७५॥ ममाभिवीक्षितुं तत्र” चित्रमालोक्य कम्बलम् । कथयायं कुतस्त्यस्ते तन्वीति प्रश्नतो मम ॥७६॥ जगाद साऽपि मामेष’ प्रायादेशवशादिति । ‘कम्बलावाप्तितस्तद्वन्तं समाध्याय विह्वलाम् ॥७७॥ एतां तस्याः सखी श्रुत्वा समन्वेष्टु समागता । काञ्चनाख्यपुरानाम्ना मदनादिवती तदा ॥७८॥ दृष्ट्वा तत्कम्बलस्यान्ते निबद्धां रत्नमुद्रिकाम् । तत्र श्रीपालनामाक्षराणि चादेशसंस्मृतेः ॥७९॥ ‘अकाय सायकोद्भिन्नहृदयाऽभूदहं ततः । कथं वैद्याधरं लोकमिमं श्रीपालनामभूत् ॥८०॥ समागतः स इत्येतन्निश्चेत् पुण्डरीकिणीम् । उपगत्य जिनागार वन्दित्वा समुपस्थिता ॥८१॥ त्वत्प्रवासकथां सर्वां तव मातुः प्रजल्पनात् । विदित्वा विस्तरेण त्वाम् आनेष्यामीति निश्चयात् ॥ ८२॥ आगच्छन्ती भवद्वार्ता विद्युद्वेगामुखोद्गताम् । श्रवगत्य त्वया साद्ध योजयिष्यामि ते प्रियम् ॥८३॥ न “विषादो विधातव्य इत्याश्वास्य भवत्प्रियाम् । विनिर्गत्य ततोऽभ्येत्य सिद्धकूटजिनालयम् ॥८४॥ अभिवन्द्यागता ऽस्म्यहि मयाऽमा पुण्डरीकिणीम् । मातरं भ्रातरं चान्यांस्त्वद्वधूश्च समीक्षितुम् ॥८५॥ यदीच्छास्ति तवेत्याह सा तच्छू त्वा” पुनः कुतः । त्वमेव जरती जातेत्यब्रवीत् स सुखावतीम् ॥८६॥ कुमारवचनाकर्णनेन वार्द्धक्यमागतम् । भवतश्च न किं वेत्सीत्यपहस्य तयोदितम् ॥८७॥ जराभिभूतमालोक्य स्वशरीरमिदं त्वया । कृतमेवंविधं केन हेतुनेत्यनुयुक्तवान् ॥८८॥ तच्छ्रुत्वा साऽब्रवीदेवं पिप्पले त्याख्ययोदिता । मदनादिवती या च मैथुनौ विश्रुतौ तयोः ॥८९॥ बलवान् धूमवेगाख्यस्तादृग्घरिवरोऽपि च । तद्भयात्त्वां तिरोधाय पुरं प्रापयितुं मया ॥९०॥ मायारूपद्वयं विद्याप्रभावात् प्रकटीकृतम् । कुमार, मत्करस्थामृतास्वाद फलभक्षणात् ॥९१॥ विगतक्षुच्छ्मः विगतक्षुच्छ्रमः शीघ्र मामारुह्य पुरं प्रति । व्रजेति सोऽपि तच्छ्रुत्वा स्त्रियो रूपममामकम् ॥९२॥ न स्पृशामि कथं चाहमारोहामि पुरा गुरोः । ‘सन्निधावाददामीदृग्व्रतमित्यब्रवीदिदम् ॥९३॥ सा तदाकर्ण्य सञ्चिन्त्य कि जातमिति विद्यया । गृहीत्वा पुरुषाकारमुद्वहन्ती “तमित्वरी ॥९४॥ वन्दित्वा सिद्धकूटाख्यं तत्र विश्रान्तये स्थिता । तस्मिन्नेव दिन भोगवती शशिनमात्मनः ॥९५॥ प्रविश्य भवनं कान्त्या कलाभिश्चाभिवर्द्धितम् । निर्वर्त्तमानमालोक्य स्वप्नेऽमाङ्गल्यशान्तये ॥९६॥ तत्सिद्धकूटपूजार्थ कान्ता कान्तवती सती । रत्नवेगा सुवेगाऽमितमती रतिकान्तया ॥९७॥ सहिता चित्तवेगाख्या पिप्पला मदनावती । विद्युद्वेगा तथैवान्यास्ताभिः सा परिवारिता ॥९८॥ समागत्य महाभक्त्या परीत्य जिनमन्दिरम् । यथाविधि प्रणम्येशं सम्पूज्य स्तोतुमुद्यता ॥९९॥ ताश्च तासां तदा व्याकुलीभावमपि चेतसः । तस्मिन् शिवकुमारस्य वक्रताक्रान्तमाननम् ॥१००॥ ‘आदिष्टसन्निधानेन विलोक्य प्रकृति गतम् । सुखावती तदुद्देशाद्” अपनीय कुमारकम् ॥१०१।। स्थानेऽन्यस्मिन्न्यधादेनं तत्राप्यम्बुनि मुद्रया” । स्वरूपं कामरूपिण्या “प्रेक्षमाणं यदृच्छया ॥१०२॥ दृष्ट्वा “हरिवरस्तस्मान्नीत्वा कोपात् सपापभाक् । निचिक्षेप” महाकालगुहायां “विहितायकम् ॥१०३। वसंस्तत्र महाकालस्तं गृहीतुमुपागतः । तस्य पुण्यप्रभावेन सोऽप्यकिञ्चित्करो गतः ॥१०४॥ तत्र शय्यातले सुप्त्वा शुचौ मृदुनि विस्तृते । परेद्युर्निर्गतं तस्याः संप्रयुक्तैः परीक्षितुम् ॥१०५॥ आदिष्टपुरुषं भूत्यैर्ज्ञात्वाऽभ्येत्य निवेदितम् । गृहीत्वा स्थविराकारं कोपपावकदीपितः ॥१०६॥ तं वीक्ष्य धूमवेगाख्यः खगश्चन्द्रपुराद् बहिः । स्मशानमध्ये पाषाणनिशातविविधायुधैः ॥१०७॥ ‘न्यगृह्णात्तानि चास्यासन् पतन्ति कुसुमानि वा । परोऽपि खेचरस्तत्र नरेशोऽतिबला ह्वयः ॥१०८॥
कुमारका यह साहस देखकर वह विद्याधर नगरके राजाको खबर देनेके लिये चला गया और इधर कुमार भी कुछ उदासचित्त हो वहाँसे निकलकर आगे चला। आगे किसी वृक्षके नीचे निन्द्य शरीरको धारण करनेवाली एक बुढ़िया-को देखकर मधुर वचन बोलनेवाले कुमारने, उससे पूछा कि पुष्कलावती देशको कौन सा मार्ग जाता है, बताओ, तब बुढ़ियाने कहा कि वहां आकाश मार्गके बिना नहीं जाया जा सकता क्योंकि वह देश पच्चीस योजन ऊंचे विजयार्ध पर्वतसे भी उस ओर है, यह सुनकर राजपुत्र श्रीपालने उससे फिर कहा कि वहां जानेका कुछ भी तो मार्ग बतलाओ । तब वह कहने लगी इस जम्बू द्वीपमें एक वत्सकावती नामका देश है, उसके विजयार्ध पर्वतपर एक राजपुर नामका नगर है उसमें विद्याधरोंका चक्रवर्ती राजा धरणीकंप रहता है, उसकी कान्तिको फैलानेवाली सुप्रभा नामकी रानी है, मैं उन्हीं दोनोंकी प्रसिद्ध पुत्री हूं, सुखावती मेरा नाम है और मैं जाति विद्या, कुल विद्या तथा सिद्ध की हुई विद्या इन तीनों प्रकारकी बड़ी बड़ी विद्याओंकी पारगामिनी हूं । किसी एक दिन में वत्सकावती देशके विजयार्ध पर्वतपर अपने प्राणोंके समान प्यारी सखी, राजा अकंपनकी पुत्री पिप्पलाको देखनेके लिए गई थी। वहां मैंने एक विचित्र कम्बल देखकर उससे पूछा कि हे सखि, कह, यह कम्बल तुझे कहांसे प्राप्त हुआ है ? उसने कहा कि ‘यह कम्बल मेरी ही आज्ञासे प्राप्त हुआ है’ । कम्बल प्राप्तिके समयसे ही कम्बलवालेका ध्यान करती हुई वह अत्यन्त विह्वल हो रही है ऐसा सुनकर उसकी सखी मदनवती उसे देखनेके लिये उसी समय कांचनपुर नगरसे आई । उसने वह कम्बल देखा, कम्बलके छोरमें बंधी हुई रत्नोंकी अंगूठी और उसपर खुदे हुए श्रीपालके नामाक्षर देखकर मुझे अपने गुरुकी आज्ञाका स्मरण हो आया, उसी समय मेरा हृदय कामदेवके बाणोंसे भिन्न हो गया, मैं सोचने लगी कि श्रीपाल नामको धारण करनेवाला यह भूमिगोचरी विद्याधरोंके इस लोकमें कैसे आया ? इसी बातका निश्चय करनेके लिये में पुण्डरीकिणी पुरी पहुंची, वहां जिनालयमें भगवान्की वन्दनाकर बैठी ही थी कि इतनेमें वहां आपकी माता आ पहुंची, उनके कहनेसे मैंने विस्तारपूर्वक आपके प्रवास-की कथा मालूम की और निश्चय किया कि मैं आपको अवश्य ही ढूंढकर लाऊंगी । उसी निश्चयके अनुसार मैं आ रही थी, रास्ते में विद्युद्वेगाके मुखसे आपका सब समाचार जानकर मैंने उससे कहा कि ‘तू अभी विवाह मत कर मैं तेरे इष्टपतिको तुझसे अवश्य मिला दूंगी’ इस प्रकार आपकी भावी प्रियाको विश्वास दिलाकर वहांसे निकली और सिद्धकूट चैत्यालयमें पहुंची । वहांकी वन्दना कर आई हूं, यदि माता भाई तथा अन्य बन्धुओंको देखनेकी तुम्हारी इच्छा हो तो मेरे साथ पुण्डरीकिणी पुरीको चलो, यह सब सुनकर मैंने सुखावतीसे फिर कहा कि अच्छा, यह बतला तू इतनी बूढ़ी क्यों हो गई है ? कुमारके वचन सुनकर उस बुढ़ियाने हँसते हँसते कहा कि क्या आप अपने शरीरमें आये हुए बुढापेको नहीं जानते — आप भी तो बूढ़े हो रहे हैं । कुमारने अपने शरीरको बूढ़ा देखकर उससे पूछा कि ‘तूने मेरा शरीर इस प्रकार बूढ़ा क्यों कर दिया है।’ कुमारकी यह बात सुनकर वह इस तरह कहने लगी कि जिनका कथन पहले कर आई हूं ऐसी पिप्पला और मदनवती नामकी दो कन्याएं हैं, उन्हें दो प्रसिद्ध विद्याधर चाहते हैं, एकका नाम धूमवेग है और दूसरेका नाम हरिवर । ये दोनों ही अत्यन्त बलवान् हैं, उन दोनोंके भयसे ही मैंने आपको छिपाकर नगर में पहुंचाने के लिये विद्याके प्रभाव से मायामय दो रूप बनाये हैं। हे कुमार, मेरे हाथमें रखे हुए इस अमृतके समान स्वादिष्ट फलको खाकर आप अपनी भूख तथा थकावटको दूर कीजिये और मुझपर सवार होकर शीघ्र ही नगरकी ओर चलिये’ यह सुनकर कुमारने कहा कि मेरे सवार होनेके लिये स्त्रीका रूप अयोग्य है, मैं तो उसका स्पर्श भी नहीं करता हूं, सवार कैसे होऊं ? क्योंकि मैंने पहले गुरुके समीप ऐसा ही व्रत लिया है यह सुनकर उसने सोचा और कहा कि अब भी क्या हुआ ? वह विद्याके द्वारा उसी समय पुरुषका आकार धारण कर कुमारको बड़ी शीघ्रतासे ले चली । चलते चलते वह सिद्धकूट चैत्यालयमें पहुंची और वन्दना कर विश्राम करनेके लिये वहीं बैठ गई । उसी दिन भोगवतीने स्वप्नमें देखा कि कान्ति और कलाओंसे बढ़ा हुआ चन्द्रमा हमारे भवनमें प्रवेशकर लौट गया है इस स्वप्नको देखकर वह अमंगलकी शान्तिके लिये सिद्धकूट चैत्यालयमें पूजा करनेके लिये आई थी। वह सुन्दरी कान्तवती, सती रत्नवेगा, सुवेगा, अमितमती, रति-कान्ता, चित्तवेगा, पिप्पला, मदनावती, विद्युद्वेगा तथा और भी अनेक राजकन्याओंसे घिरी हुई थी । उन सभी कन्याओंने आकर बड़ी भक्तिसे जिन मन्दिरकी प्रदक्षिणा दी, विधिपूर्वक नमस्कार किया, पूजा की और फिर सबकी सब स्तुति करनेके लिये उद्यत हुई । स्तुति करते समय भी उनका चित्त व्याकुल हो रहा था । उसी चैत्यालयमें एक शिवकुमार नामका राज-पुत्र भी खड़ा था, उसका मुँह टेढ़ा था परन्तु श्रीपालकुमारके समीप आते ही वह ठीक हो गया, यह देखकर सुखावतीने उसे उसके स्थानसे हटाकर दूसरी जगह रख दिया। उस चैत्यालयमें श्रीपालकुमार अपनी कामरूपिणी मुद्रासे इच्छानुसार जलमें अपना खास रूप देख रहा था । उसे ऐसा करते पापी हरिवर विद्याधरने देख लिया और पूर्व जन्ममें पुण्य करनेवाले कुमारको क्रोधसे उस स्थानसे ले जाकर महाकाल नामकी गुफामें गिरा दिया। उस गुफामें एक महा-काल नामका व्यन्तर रहता था वह उसे पकड़नेके लिये आया परन्तु कुमारके पुण्यके प्रभावसे अकिंचित्कर हो चला गया — उसका कुछ नहीं बिगाड़ सका । वह कुमार उस दिन उसी गुफामें पवित्र, कोमल और बड़ी शय्यापर सोकर दूसरे दिन वहांसे बाहिर निकला, यद्यपि उसने अपना बूढ़ेका रूप बना लिया था तथापि धूमवेगके द्वारा परीक्षाके लिये नियुक्त किये हुए पुरुषोंने उसे पहिचान लिया, स्वामीके पास जाकर उन्होंने सब खबर दी और पकड़कर श्रीपालकुमार-को सामने उपस्थित किया । क्रोधरूपी अग्निसे प्रज्वलित हुए धूमवेग विद्याधरने कुमारको देखकर आज्ञा दी कि इसे नगरके बाहिर श्मशानके बीच पत्थरपर घिसकर तेज किये हुए अनेक शस्त्रोंसे मार डालो । सेवक लोग मारने लगे परन्तु वे सब शस्त्र उसपर फूल होकर पड़ते थे । इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और लिखी जाती है जो इस प्रकार है- उसी नगरमें एक अतिबल नामका दूसरा विद्याधर राजा रहता था ।।६८-१०८।।
Beholding the prince’s boldness, the Vidyadhara hastened to inform the king of the city, while Shripal, his heart weighed down with melancholy, continued on his way. Advancing further, he came upon an old crone of repugnant appearance seated beneath a tree. In his gentle voice, the prince asked her, “Pray, which path leads to the land of Pushkalavati?”The old woman replied, “There is no path to that country except by the aerial way, for it lies beyond, twenty-five yojanas higher than Mount Vijayardha.” Hearing this, Prince Shripal pleaded once more, “Reveal to me some means of reaching it.”Then the old woman spoke: “Know, child, that in this Jambudvipa lies the land called Vatsakavati. Upon its Mount Vijayardha stands a city named Rajapura, where reigns Dharnikampa, the universal sovereign of the Vidyadharas. His resplendent queen is named Suprabha, and I am their famed daughter, Sukhaavati is my name. I am well-versed in three supreme vidyas: the hereditary vidya, the caste vidya, and the perfected vidya.“One day, I had journeyed to Vijayardha mountain in Vatsakavati to visit my dearest friend, Princess Pippala, daughter of King Akampana. There, seeing a strange blanket, I inquired of my friend, ‘O beloved, from whence did you acquire this blanket?’ She replied, ‘It was obtained through my command.’ From the time she received it, she became deeply agitated, meditating ceaselessly upon the giver of the blanket. Hearing this, her companion Madanavati arrived that very moment from the city of Kanchanapura to see her friend. When she saw the blanket, with its fringe bearing a gem-studded ring inscribed with the name of Shripal, I recalled the words of my guru’s prophecy, and my heart was pierced by the arrows of love. I wondered, ‘How has Shripal, bearing this name, come to dwell among the Vidyadharas of the earthly realm?’ To ascertain this, I traveled to Pundarikini city. After offering worship at the shrine of the Lord, your mother arrived there; upon her counsel, I learned the full account of your wanderings and resolved that I would find you without fail.“Thus, I set forth. Along the way, I encountered Vidyudvega and heard from his lips your entire story. I told him, ‘Do not yet marry; I shall certainly reunite you with your chosen beloved.’ Having reassured your destined bride, I proceeded to the Siddhakoot temple, offered my worship, and now, if you wish to see your mother, brother, and kin, come with me to Pundarikini city.”Hearing all this, Shripal asked Sukhaavati, “Tell me then, why have you taken on the appearance of such an old woman?”At this, the crone laughed and said, “Do you not perceive the marks of old age upon your own body? You too have grown old.” When the prince looked at himself and saw his aged form, he demanded, “Why have you transformed me into an old man?”She answered, “The two maidens I spoke of earlier—Pippala and Madanavati—are sought by two mighty Vidyadharas, Dhumavega and Harivara. Fearing their wrath, I crafted two illusory forms with my vidya to disguise you and safely convey you to the city. O prince, partake of this delicious fruit I hold in my hand, for it will banish your hunger and fatigue. Then climb upon my back, and I shall swiftly carry you to the city.”But Shripal replied firmly, “A woman’s body is unfit for me to mount; I cannot even touch a woman, for I have taken a vow before my guru never to do so.”Hearing his resolute words, Sukhaavati considered and said, “No matter.” By her vidya, she transformed herself into the form of a man, and lifting the prince with great speed, carried him onwards. Traveling thus, they reached the Siddhakoot shrine, where they offered worship and sat down to rest.Meanwhile, that very day, Bhogavati had dreamed that a moon radiant with brilliance and beauty had entered their home and then departed again. Troubled by the ominous nature of this dream, she had come to Siddhakoot temple to perform propitiatory rites. The beauteous Kanthavati, the virtuous Ratnavega, Suvega, Amitamati, Ratikanta, Chittavega, Pippala, Madanavati, Vidyudvega, and many other royal maidens had accompanied her. Together, they circumambulated the shrine with deep devotion, offered salutations and worship according to the prescribed rites, and then prepared to sing hymns of praise, though their hearts were still restless.In that very shrine stood a prince named Shivakumara, whose face had been twisted and deformed; yet as soon as he approached Shripal, his countenance was miraculously restored to symmetry. Witnessing this, Sukhaavati quickly moved him away to another spot.There, Shripal, using his kama-rupini mudra, beheld his true form in the temple’s sacred waters. As he did so, the wicked Vidyadhara Harivara, spying upon him, was seized by rage; he snatched the prince and hurled him into a cave called Mahakala.Within that dark cavern dwelt a fierce being named Mahakala, who rushed forward to seize the prince. Yet by the power of Shripal’s accumulated merit, Mahakala was rendered powerless and could do him no harm. That night, the prince slept peacefully on a soft and immaculate bed within the cave. On the following day, he emerged once more, still bearing his aged form. Though disguised, the men stationed by Dhumavega for surveillance recognized him and, reporting back to their master, brought Shripal before him.Inflamed with wrath like a blazing fire, Dhumavega commanded, “Take him to the cremation ground beyond the city, grind him upon sharpened stones, and strike him with weapons until he is dead.” The servants began their assault, but every weapon fell upon Shripal like a harmless flower, unable to harm him.Here concludes this part of the tale; yet connected to it is another story, which begins thus: In that same city, there lived another Vidyadhara king named Atibala…॥68–108॥
श्लोक 109 से 122
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367 | जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 361 | श्लोक 362 से 369
आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 30 | श्लोक 31 से 45 | श्लोक 46 से 64