श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायणका वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 12 to 22
श्लोक ( Shlok ) 12
अधीत्यैकादशाङ्गानि श्रद्धानाद्याप्तसम्पदा । बद्ध्वा तीर्थकर नाम प्रान्ते संन्यस्य शुद्धधीः ॥ १२ ॥
निर्मल बुद्धिके धारक पद्मोत्तर मुनिने ग्यारह अंगोंका अध्ययन किया, दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं रूप सम्पत्तिके प्रभावसे तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध किया और अन्तमें संन्यास धारण किया ।। १२ ।।
“Possessing a pure intellect, Muni Padmottara studied the eleven Angas (scriptures). Through the influence of the wealth of virtues such as Darshan-vishuddhi (purity of right belief), he bound the Tirthankara Nama-Karma, and finally, he embraced Sanyasa (ascetic renunciation).”12
श्लोक ( Shlok ) 13
महाशुक्रविमानेऽभून्महाशुक्रोऽमराधिपः । षोडशाब्धिप्रमाणायुश्चतुर्हस्तशरीरभाक् ॥ १३ ॥
जिससे महाशुक्र विमानमें महाशुक्र नामका इन्द्र हुआ। सोलह सागर प्रमाण उसकी आयु थी और चार हाथ ऊँचा शरीर था ।। १३ ।।
“As a result, he became the Indra named Mahashukra in the Mahashukra celestial vehicle (Vimana). His life span was sixteen Sagaras, and his body was four hands tall.”13
श्लोक ( Shlok ) 14
पद्मलेश्यः श्वसन्मासैरष्टभिस्तुष्टमानसः । षोडशाब्दसहस्त्रान्ते मानसाहारमाहरन् ॥ १४ ॥
पद्मलेश्या थी, आठ माहमें एक बार श्वास लेता था, सदा संतुष्टचित्त रहता था और सोलह हजार वर्ष बीतने पर एक बार मानसिक आहार लेता था ।। १४ ॥
“He possessed Padma-leshya (pink thought-coloration), breathed once every eight months, remained perpetually contented in mind, and partook in mental sustenance (mansik aahaar) once every sixteen thousand years.”14
श्लोक ( Shlok ) 15
सदा शब्दप्रवीचारश्चतुर्थक्ष्मागतावधिः । प्रमावधिरिवैतस्य विक्रियाबलतेजसाम् ॥ १५ ॥
सदा शब्दसे ही प्रवीचार करता था अर्थात् देवाङ्गनाओंके मधुर शब्द सुनने मात्रसे उसकी कामबाधा शान्त हो जाती थी, चतुर्थ पृथिवी तक उसके अवधिज्ञानका विषय था, और चतुर्थ पृथिवी तक ही उसकी विक्रिया बल और तेजकी अवधि थी ॥ १५ ॥
“He always engaged in Pravichara (sensual gratification) through sound alone; that is, his desire was satiated merely by hearing the sweet voices of the goddesses. The scope of his Avadhijnana (clairvoyant knowledge) extended down to the fourth hell-world, and the range of his Vikriya (transformative power), strength, and radiance also reached as far as the fourth hell-world.”15
श्लोक ( Shlok ) 16
तत्रामरीकलालापगीतवाद्यादिमोदिते । चोदिते कालपर्यायैस्तस्मिन्नन्त्रागमिष्यति ॥ १६ ॥
वहाँ देवियोंके मधुर वचन, गीत, बाजे आदिसे वह सदा प्रसन्न रहता था। अन्त में काल द्रव्यकी पर्यायोंसे प्रेरित होकर जब वह यहाँ आनेवाला हुआ ॥ १६ ।।
“There, he remained perpetually delighted by the sweet words, songs, and instrumental music of the goddesses. Finally, impelled by the transitions of time (Kala-dravya), the moment arrived for him to descend to this world.” 16
श्लोक ( Shlok ) 17 – 20
द्वीपेऽस्मिन् भारते चम्पानगरेऽङ्गनराधिपः । इक्ष्वाकुः काश्यपः ख्यातो वसुपूज्योऽस्य भामिनी ॥ १७ ॥प्रिया जयावती प्राप्तवसुधारादिमानना । आषाढ़कृष्णषष्ठ्यन्ते चतुर्विशर्क्षलक्षिते ॥ १८ ॥दृष्ट्वा स्वप्नान् फलं तेषां पत्युर्ज्ञात्वाऽतितोषिणी । अष्टौ मासान् क्रमान्नीत्वा प्राप्तफाल्गुनमासिका ॥१९॥कृष्णायां ‘वारुणे योगे चतुर्दश्यां सुरोत्तमम् । सर्वप्राणिहितं पुत्रं सुखेनेयमजीजनत् ॥ २० ॥
तब इस जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रके चम्पा नगरमें वसुपूज्य नामका अङ्गदेशका राजा रहता था । वह इक्ष्वाकुवंशी तथा काश्यपगोत्री था। उसकी प्रिय स्त्रीका नाम जयावती था, । जया-वतीने रत्नवृष्टि आदि सम्मान प्राप्त किया था। तदनन्तर उसने आषाढ़कृष्ण षष्ठीके दिन चौबीसवें शतभिषा नक्षत्रमें सोलह स्वप्न देखे और पतिसे उनका फल जानकर बहुत ही सन्तोष प्राप्त किया । क्रम-क्रमसे आठ माह बीत जानेपर जब नौवाँ फाल्गुन माह आया तब उसने कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके दिन वारुण योगमें सब प्राणियोंका हित करनेवाले उस इन्द्ररूप पुत्रको सुखसे उत्पन्न किया ।। १७-२० ।।
“At that time, in the city of Champa within the Bharat-Kshetra of this Jambudvipa, lived a King of the Anga Kingdom named Vasupujya. He belonged to the Ikshvaku lineage (Vansh) and the Kashyapa clan (Gotra). His beloved queen’s name was Jayavati, who was honored with the ‘Rain of Gems’ and other divine marks of respect. Subsequently, on the sixth day of the dark fortnight of the month of Ashadha, during the twenty-fourth Shatabhisha Nakshatra, she witnessed sixteen auspicious dreams and attained great contentment upon learning their significance from her husband. Gradually, after eight months had passed and the ninth month of Phalguna arrived, on the fourteenth day of the dark fortnight under the Varuna Yoga, she gave birth with ease to that son—the former Indra—who is the benefactor of all living beings.”17 – 20
श्लोक ( Shlok ) 21 – 22
सुराः सौधर्ममुख्यास्तं सुराद्रौ क्षीरसागरात् । घटैरानीय पानीयं स्नपयित्वा प्रसाधनम् ॥ २१ ॥विधाय वासुपूज्यं च नामादाय पुनर्गुहम् । नीत्वा वासान् स्वकीयाँस्ते जग्मुर्जातमहोत्सवाः ॥ २२ ॥
सौधर्म आदि देवोंने उसे सुमेरु पर्वत पर ले जाकर घड़ों द्वारा क्षीरसागरसे लाये हुए जलके द्वारा उसका जन्माभिषेक किया, आभूषण पहिनाये, वासुपूज्य नाम रक्खा, घर वापिस लाये और अनेक महोत्सव कर अपने अपने निवास स्थानोंकी ओर गमन किया ।। २१-२२ ।।
“The deities, led by Saudharma and others, carried him to Mount Sumeru and performed his Janmabhisheka (birth-consecration) using pitchers filled with water brought from the Kshira-Sagara (Ocean of Milk). They adorned him with ornaments, bestowed upon him the name ‘Vasupujya’, and brought him back home. After celebrating with great festivities, they departed for their respective abodes.” 21 – 22
श्लोक 23 से 32
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