सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42
English translation of Uttar Puran parv 53- shlok 43 to 51
श्लोक ( Shlok ) 43
पश्चिमे दिवसे सोमखेटे तं कनकद्युतिः । नृपो महेन्द्रदत्ताख्यः प्रतीक्ष्यापामरार्चनम् ॥ ४३ ॥
दूसरे दिन वे चर्याके लिए सोमखेट नामक नगर में गये। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले महेन्द्रदत्त नामके राजाने पडगाह कर देवोंसे पूजा प्राप्त की ॥ ४३ ॥
“On the second day, they went to the city named Somakheta for their daily alms-round (Charya). There, King Mahendradatta, whose radiance was like gold, performed the formal welcome (Padagaha) and received honor from the gods.”43
श्लोक ( Shlok ) 44 – 45
सुपार्श्वे मौनमास्थाय छाग्नस्थ्ये नववर्षकः । सहेतुकवने मूले शिरीषस्य द्वयुपोषितः ॥ ४४ ॥गर्भावतारनक्षत्रे कृष्णषष्ठय पराह्नगः । समुत्पन्नान्तरग्ज्ञानः सम्प्राप्तामरपूजनः ॥ ४५ ॥
सुपार्श्वनाथ भगवान् छद्मस्थ अवस्थामें नौ वर्ष तक मौन रहे। तदनन्तर उसी सहेतुक वनमें दो दिनके उपवासका नियम लेकर वे शिरीष वृक्षके नीचे ध्यानारूढ़ हुए। वहीं फाल्गुन (१) कृष्ण षष्ठी के दिन सायंकालके समय गर्भावतारके विशाखा नक्षत्रमें उन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ जिसमें देवोंने उनकी पूजा की ।। ४४-४५ ।।
“Lord Suparshvanath remained in a state of silence for nine years during his stage as a practitioner (Chadmastha). Thereafter, in that same Sahetuka forest, he took a vow of a two-day fast and sat in deep meditation beneath a Shirish tree. There, on the evening of the sixth day of the dark half of the month of Phalguna, under the Vishakha nakshatra (the same constellation as his conception), he attained Kevalgyan (Omniscience), and the gods performed his worship.”44 – 45
श्लोक ( Shlok ) 46 – 51
बलाख्यमुख्यपञ्चान्तरन्ध्रोक्तगणभृद्धृतः । शून्यत्रिशून्यपक्षोक्तसर्वपूर्वधराधिपः ॥ ४६ ॥शून्यद्विरन्ध्रवायब्धिपक्षमानोक्तशिक्षकः । शून्यत्रयनवज्ञाततृतीयावगमश्रितः ॥ ४७ ॥खत्रयैकैकनिदिंष्टकेवलावगमान्वितः । शून्यद्वयत्रिपञ्चेकसङ्ख्यावैक्रियिकाचितः ॥ ४८ ॥शून्यपञ्चै करन्ध्रोक्तमनः पर्ययबोधनः । षट्शताष्टसहस्त्रोक्तवादिवन्दितवापतिः ॥ ४९ ॥पिण्डीकृतत्रिलक्षोक्तमुनिबृन्दारकाधिपः । मीनार्याद्यायिकात्रिंशत्सहस्रान्तत्रिलक्षकः ॥ ५० ॥त्रिलक्षश्रावकः पञ्चलक्षसत्श्राविकाचितः । असङ्ख्यदेवदेवीब्यस्तिर्यक्सङ्ख्यातसंयतः १ ॥ ५१ ॥
वे बलको आदि लेकर पंचानवे “गुणधरोंसे सदा घिरे रहते थे, दो हजार तीस पूर्वधारियोंके अधिपति थे, दो लाख चवालीस हजार नौ सौ बीस शिक्षक उनके साथ रहते थे, नौ हजार अवधिज्ञानी उनकी सेवा करते थे, ग्यारह हजार केवलज्ञानी उनके सहगामी थे, पन्द्रह हजार तीन सौ विक्रियाऋद्धिके धारक उनकी पूजा करते थे, नौ हजार एक सौ पचास मनःपर्ययज्ञानी उनके साथ रहते थे, और आठ हजार छह सौ वादी उनकी वन्दना करते थे। इस प्रकार सब मिलाकर तीन लाख मुनियोंके स्वामी थे। मीनार्याको आदि लेकर तीन लाख तीस हजार आर्यिकाएँ उनके साथ रहती थीं, तीन लाख श्रावक और पाँच लाख श्राविकाएँ उनकी पूजा करती थीं, असंख्यात देव-देवियाँ उनकी स्तुति करती थीं और संख्यात तिर्यञ्च उनकी वन्दना करते थे ।। ४६-५१ ।।
“He was always surrounded by ninety-five Gandharas (chief disciples), led by Bala. He was the leader of 2,030 Purvadharis (scholars of the ancient scriptures) and was accompanied by 244,920 teachers (Shikshaks).
9,000 possessors of Avadhigyan (clairvoyance) served him, 11,000 Kevalgyanis (omniscient beings) were his companions, 15,300 holders of Vikriya-riddhi (miraculous transformational powers) worshipped him, 9,150 possessors of Manah-paryaygyan (mind-reading knowledge) stayed with him, and 8,600 Vadis (great debaters/orators) offered him salutations.
In this manner, he was the master of a total of 300,000 monks. Along with them were 330,000 Aryikas led by Minarya, while 300,000 Shravaks and 500,000 Shravikas worshipped him. Innumerable gods and goddesses sang his praises, and a vast number of animals (Tiryancha) bowed before him.” ( 46–51)
श्लोक 52 से 56
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सुमतिनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन पर्व 51 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 87
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सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42
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