श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन पर्व 50 – श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 63 | श्लोक 64 से 70
Summary of Uttara Purana Parv 51 by Acharya Gunabhadra
संक्षिप्त सारांश उत्तरपुराण पर्व 51 :
उत्तरपुराण के इक्यावनवें पर्व में भगवान सुमतिनाथ तीर्थंकर के पूर्वभव, जन्म, वैराग्य, दीक्षा, केवलज्ञान और निर्वाण का अत्यंत प्रेरक वर्णन है।
श्लोक 1 से 11 : राजा रतिषेण का वैराग्यपूर्ण चिंतन
धातकीखण्ड द्वीप के पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा रतिषेण धर्मनिष्ठ, समृद्ध और न्यायप्रिय शासक थे। वे अर्थ, धर्म और काम का संतुलित पालन करते हुए भी संसार के सुखों की नश्वरता को समझने लगे। उन्होंने विचार किया कि अर्थ और काम संसारवृद्धि के कारण हैं तथा पापयुक्त धर्म भी मोक्षदायक नहीं; केवल निष्पाप मुनिधर्म ही जीव को जन्म-मरण से मुक्त कर सकता है। इस प्रकार उनके अंतःकरण में वैराग्य जागृत हुआ।
श्लोक 12 से 21 : दीक्षा, तीर्थंकर प्रकृति बन्ध और सुमतिनाथ के गर्भावतरण की भूमिका
राजा रतिषेण ने राज्य पुत्र को सौंपकर दीक्षा धारण की, कठोर तप किया और दर्शनविशुद्धि आदि कारणों से तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। अंतकाल में संन्यासमरण कर वे वैजयन्त विमान के अहमिन्द्र बने। आयु पूर्ण होने पर वे अयोध्या के राजा मेघरथ और रानी मंगला के गर्भ में अवतरित हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे, जो महान तीर्थंकर जन्म का संकेत बने।
श्लोक 22 से 31 : सुमतिनाथ भगवान का जन्म और दिव्य बालरूप
चैत्र शुक्ल एकादशी को सुमतिनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर ‘सुमति’ नाम दिया। उनका शरीर सुवर्ण सदृश कान्तिमान, अत्यंत मनोहर और दिव्य लक्षणों से युक्त था। बाल्यकाल से ही वे अलौकिक सौन्दर्य, ज्ञान और महापुरुषत्व के चिह्नों से विभूषित थे।
श्लोक 32 से 41 : दिव्य मुखमण्डल और भुजाओं की अलौकिक शोभा
भगवान के नेत्र, मुख, अधर, नासिका, कपोल, दन्तपंक्ति और कण्ठ अनुपम सौन्दर्य से युक्त थे। उनका मुख दिव्यध्वनि का आधार बना और स्याद्वाद से समस्त वादियों को पराजित करने वाला था। उनकी विशाल भुजाएँ और वक्षस्थल त्रिभुवनाधिपत्य तथा मोक्षलक्ष्मी के प्रतीक रूप में वर्णित हैं।
श्लोक 42 से 51 : शरीर के मध्यभाग से चरणों तक परम सौन्दर्य
भगवान का मध्यभाग, नाभि, कमर, जंघाएँ, घुटने और चरण सभी अनुपम दिव्य लक्षणों से सम्पन्न थे। उनके चरणों के नख चन्द्रमा को भी लज्जित करने वाले थे। सम्पूर्ण देह ऐसी प्रतीत होती थी मानो स्वयं मुक्ति ने उसे अपने योग्य स्वीकार किया हो।
श्लोक 52 से 61 : कुमारावस्था, राज्य और धर्मयुक्त भोग
कुमारावस्था से युवावस्था तक भगवान सुमतिनाथ अप्रतिम शोभा से युक्त रहे। राज्य प्राप्ति के पश्चात भी वे हिंसा, असत्य, चोरी, परिग्रह तथा आर्त-रौद्रध्यान से रहित रहे। वे धर्म, अर्थ और न्यायपूर्ण भोगों का सेवन करते हुए लोककल्याणकारी जीवन जीते रहे।
श्लोक 62 से 71 : वैराग्य, संसार की निस्सारता का बोध और दीक्षा
राज्य एवं दिव्य वैभव का उपभोग करते हुए भी भगवान के भीतर वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने विषयभोगों को पापरूपी बन्धन समझा और आत्मकल्याण का मार्ग चुना। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से वैशाख शुक्ल नवमी को सहस्र राजाओं सहित दीक्षा धारण कर संयममार्ग स्वीकार किया तथा तत्काल मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 72 से 81: तप, केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के बाद भगवान ने कठोर तप किया, दीर्घकालीन संयम के पश्चात प्रियंगु वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में असंख्य देव, मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित हुए। उनका धर्मसंघ अत्यंत विशाल था और वे अनगिनत जीवों को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र प्रदान करते रहे।
श्लोक 82 से 87 : लोककल्याण, निर्वाण और मंगलाशंसन
भगवान सुमतिनाथ ने अठारह क्षेत्रों में विहार कर दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को रत्नत्रय का उपदेश दिया। आयु पूर्ण होने पर सम्मेदगिरि पर प्रतिमायोग धारण कर चैत्र शुक्ल एकादशी को निर्वाण प्राप्त किया। पूर्वजन्म के राजा रतिषेण और अहमिन्द्र से लेकर तीर्थंकर पद तक उनकी यात्रा आत्मोन्नति की परम साधना है। वे राग-द्वेष रहित, पंचकल्याणक सम्पन्न और समस्त भव्य जीवों को शांति, सद्बुद्धि तथा मोक्षमार्ग प्रदान करने वाले हैं।
English translation of Uttar Puran parv 51- shlok 1 to 11
श्लोक 1 से 11 : राजा रतिषेण का वैराग्यपूर्ण चिंतन
श्लोक ( Shlok ) 1
लक्ष्मीरनश्वरी तेषां येषां ‘तस्य मते मतिः । देयादादेषवाक् सद्भिः सोऽस्मभ्यं सुमतिर्मतिम् ॥ १ ॥
अथानन्तर जो लोग सुमतिनाथकी बुद्धिको ही बुद्धि मानते हैं अथवा उनके द्वारा प्रति-पादित मतमें ही जिनकी बुद्धि प्रवृत्त रहती है उन्हें अविनाशी लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है। इसके सिवाय जिनके वचन सज्जन पुरुषोंके द्वारा ग्राह्य हैं ऐसे सुमतिनाथ भगवान् हम सबके लिए सद्बुद्धि प्रदान करें ॥ १ ॥
“Thereafter, those who regard the wisdom of Lord Sumatinatha as the only true wisdom, or those whose intellect remains devoted to the path propounded by him, attain indestructible prosperity (Moksha). Furthermore, may Lord Sumatinatha, whose words are accepted by the virtuous, grant us all right-intellect (Sadbuddhi).”1
श्लोक ( Shlok ) 2
अखण्डे धातकीखण्डे मन्दरे प्राप्चि पूर्वगे। विदेहे नद्युदक्कूले सुराष्ट्रं पुष्कलावती ॥ २ ॥
अखण्ड धातकीखण्ड द्वीपमें पूर्व मेरुपर्वतसे पूर्वकी ओर स्थित विदेह क्षेत्रमें सीता नदीके उत्तर तट पर एक पुष्कलावती नामका उत्तम देश है ॥ २ ॥
“In the indivisible Dhatakikhanda island, in the Videha region situated to the east of the Eastern Meru Mountain, there lies a magnificent country named Pushkalavati on the northern bank of the Sita River.”2
श्लोक ( Shlok ) 3 – 4
पुरेऽस्मिन् पुण्डरीकियां रतिषेणो महीपतिः । प्राग्जन्मोपार्जितोदीर्णपुण्यपण्यात्मसात्कृतम् ॥ ३ ॥राज्यं विनिर्जितारातिनिःकोपं नित्यवृद्धिकम् । स्वामिसम्पत्समेतः सन्नीत्या निर्व्यसनोऽन्वभूत् ॥ ४ ॥
उसकी पुण्डरीकिणी नगरीमें रतिषेण नामका राजा था। वह राजा राज-सम्पदाओंसे सहित था, उसे किसी प्रकारका व्यसन नहीं था और पूर्व भागमें उपार्जित विशाल पुण्यकर्मके उदयसे प्राप्त हुए राज्यका नीति-पूर्वक उपभोग करता था । उसका वह राज्य शत्रुओं से रहित था, क्रोधके कारणोंसे रहित था और निरन्तर वृद्धिको प्राप्त होता रहता था ॥ ३-४ ॥
“In its capital city, Pundarikini, lived King Ratishena. He possessed all royal splendors yet was free from any vices (Vyasanas). Due to the rise of immense merit (Punya) earned in his previous lives, he enjoyed his kingdom with strict adherence to ethics and policy (Niti). His realm was free from enemies, devoid of causes for anger, and was constantly flourishing.”3 – 4
श्लोक ( Shlok ) 5
“या स्वस्यैवास्य सा विद्या चतुर्थी न प्रयोगिणी । यदेकस्यापि दण्डेषु बर्तन्ते न पथि प्रजाः ॥ ५ ॥
राजा रतिषेणकी जो राजविद्या थी वह उसी की थी वैसी राजविद्या अन्य राजाओंमें नहीं पाई जाती थी। आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्ड इन चारों विद्याओंमें चौथी दण्डविद्याका वह कभी प्रयोग नहीं करता था क्योंकि उसकी प्रजा प्राणदण्ड आदि अनेक दण्डोंमें से किसी एक भी दण्डके मार्गमें नहीं जाती थी ॥ ५ ॥
“King Ratishena’s mastery over the science of royalty (Rajavidya) was uniquely his own; such expertise was not found in other kings. Among the four sciences—Anvikshiki (Logic), Trayi (Theology), Varta (Economics), and Danda (Politics/Punishment)—he never found a need to employ the fourth, Danda-vidya (the science of punishment). This was because his subjects never strayed into any path that warranted capital punishment or other penalties.”5
श्लोक ( Shlok ) 6
रक्तस्य मनसा तृप्तिः कामः करणगोचरे । स्वेष्टाशेषार्थसम्पतेः कामस्तस्य न दुर्लभः ॥ ६ ॥
इन्द्रियों के विषयमें अनुराग रखनेवाले मनुष्यको जो मानसिक तृप्ति होती है उसे काम कहते हैं। वह काम, अपने इष्ट समस्त पदार्थोकी संपत्ति रहनेसे राजा रतिषेणको कुछ भी दुर्लभ नहीं था ॥ ६ ॥
“The mental satisfaction experienced by a person who holds an attachment to the objects of the senses is called Kama. Since King Ratishena possessed the abundance of all his desired objects, such pleasure was not at all difficult for him to attain.”6
श्लोक ( Shlok ) 7
अर्थे चतुष्टयी वृत्तिरर्जनादि यथागमम् । देवोऽर्हनर्थधर्मों च तदनीषष्लभौ मतौ ॥ ७ ॥
राजा अर्जन, रक्षण, वर्धन और व्यय इन चारों उपायों से धन संचय करता था और आगमके अनुसार अर्हन्त भगवान्को ही देव मानता था । इस प्रकार अर्थ और धर्मको वह कामकी अपेक्षा सुलभ नहीं मानता था अर्थात कामकी अपेक्षा अर्थ तथा धर्म पुरुषार्थका अधिक सेवन करता था ।॥ ७ ॥
“The King accumulated wealth through the four means—Acquisition (Arjan), Protection (Rakshan), Multiplication (Vardhan), and Rightful Expenditure (Vyakti). According to the scriptures (Agamas), he accepted only the Arhant (the Omniscient Lord) as his God. In this manner, he did not consider Wealth (Artha) and Righteousness (Dharma) to be secondary to Pleasure (Kama); rather, he prioritized the pursuits of Artha and Dharma over the pursuit of sensual desires.”7
श्लोक ( Shlok ) 8
गच्छत्येवं चिरं काले हेलया पालितक्षितेः । परस्परानुकूल्येन वर्गत्रितयवर्द्धिनः ॥ ८ ॥
इस प्रकार लीलापूर्वक पृथिवीका पालन करनेवाले और परस्परकी अनुकूलतासे धर्म, अर्थ, काम इस त्रिवर्गकी वृद्धि करनेवाले राजा रतिषेणका जब बहुत-सा समय व्यतीत हो गया तब एक दिन उसके हृदयमें निम्न्नाङ्कित विचार उत्पन्न हुआ ।॥ ८ ॥
“In this manner, while King Ratishena was playfully (effortlessly) protecting the earth and increasing the ‘Three Goals’ (Trivarga)—Dharma, Artha, and Kama—through their mutual compatibility, a vast amount of time passed. Then, one day, the following thoughts arose within his heart.”8
श्लोक ( Shlok ) 9 -11
जन्तोः किं कुशलं कस्मात्सुखमेषोऽधितिष्ठति । पर्यायावर्तदुर्जन्मदुर्मृत्यूरगदूरगः ॥ ९ ॥न तावदर्थकामाभ्यां सुखं संसारवर्द्धनात् । नामुष्मादपि मे धर्माद्यस्मात्सावच्चसम्भवः ॥ १० ॥निःसावद्योऽस्ति धर्मोऽन्यस्ततः सुखमनुत्तमम् । इत्युदर्को वितर्कोऽस्य विरक्तस्याभवत्ततः ॥ ११ ॥
वह विचार करने लगा कि इस संसारमें जीवका कल्याण करनेवाला क्या है? और पर्यायरूपी भँवरा में रहनेवाले दुर्जन्म तथा दुर्मरण रूपी सर्पोंसे दूर रहकर यह जीव सुखको किस प्रकार प्राप्त कर सकता है ? अर्थ और कामसे तो सुख हो नहीं सकता क्योंकि उनसे संसारकी ही वृद्धि होती है। रहा धर्म, सो जिस धर्ममें पापकी संभावना है उस धर्मसे भी सुख नहीं होसकता। हां, पापरहित एक मुनिधर्म है उसीसे इस जीवको उत्तम सुख प्राप्त हो सकता है। इस प्रकार विरक्त राजाके हृदयमें उत्तम फल देनेवाला विचार उत्पन्न हुआ । ॥ ९-११ ।।
“He began to reflect: ‘What is truly beneficial for the soul in this world? How can this soul attain true happiness while remaining far from the serpents of painful birth and painful death that dwell in the whirlpool of changing life-forms (Paryaya)? Happiness cannot be found in Wealth (Artha) or Pleasure (Kama), for they only serve to increase one’s wanderings in the cycle of existence (Samsara). As for religion—even a religious path that contains the possibility of sin cannot provide true happiness. Indeed, there is only the sinless path of the Monk (Muni-dharma); through that alone can a soul attain supreme bliss.’ In this way, these thoughts, which yield the highest fruit, took root in the heart of the detached King.”9 -11
श्लोक 12 से 21
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्तीका वर्णन पर्व 48 – श्लोक 1 से 8 | संभवनाथ तीर्थकर का पुराण वर्णन पर्व 49 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 59
श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन पर्व 50 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 |श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 63 | श्लोक 64 से 70
Download PDF
आदिपुराण हिन्दी-भाषानुवाद :
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश :
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47