Hindi Translation of Adi purana Parv 46
श्लोक 1 से 13 पूर्वजन्म स्मरण और मूर्च्छा
अथानन्तर किसी अन्य समय जयकुमार अपने महलकी छतपर आनन्दसे बैठा था कि इतने में ही अपनी इच्छानुसार जाते हुए विद्याधर दम्पती दिखे, उन्हें देखकर ‘हा मेरी प्रभा-वती’ इस प्रकार कहता हुआ वह बहुत ही बेचैन हुआ और मूर्च्छाकी सहायता पाकर शीघ्र ही प्रेमको प्राप्त हुआ। भावार्थ पूर्वभवका स्मरण होनेसे मूच्छित हो गया ।॥१-२।। इसी प्रकार सुलोचना भी उत्ती स्थानपर कबूतरोंका युगल देखकर ‘हा मेरे रतिवर’ ऐसा कहकर मूर्च्छाको प्राप्त हो गई ॥ ३॥ जिस प्रकार चन्द्रमासे कुमुदिनी शीघ्र ही प्रबोधको प्राप्त हो जाती है-खिल उठती है उसी प्रकार चनुर दासी जनोंके द्वारा किये हुए शीतलोपचारके क्रमसे वह सुलोचना शीघ्र ही प्रबोधको प्राप्त हुई थी-मूर्च्छारहित हो गई थी ॥४॥ कपूर और चन्दन मिले हुए जलसे तथा मन्द मन्द वायुसे कुछ लज्जित हुआ और दिशाओंकी ओर देखता हुआ वह जयकुमार भी मूर्च्छारहित हुआ ।।५।। यद्यपि वह चतुर जयकुमार सब कुछ समझता था तथापि पूछने लगा कि तुम लोगोंके मुँह संध्याकालके कमलोंका अनुकरण क्यों कर रहे हैं ? अर्थात् कान्तिरहित क्यों हो रहे हैं ? ॥६॥ पतिके मुँहसे दूसरी स्त्रीका नाम निकल जाने के कारण दुखी हुई सुलोचनाको जयकुमारने अनेक प्रकारके अनुनय-विनय आदि आयोंजे समझाया तथा दूसरे जन्मकी प्रिया प्रभावती समझकर अपने मुँहका आकार छिपा वह उसी के साथ बातचीत करने लगा सो ठीक ही है क्योंकि सभी कामी पुरुष स्त्रियोंके ठगने में अत्यन्त चतुर होते हैं ।॥ ७-८ ।। उन दोनोंके जन्मान्तर सम्बन्धी अपना समाचार स्मरण होने के बाद ही स्वर्ग पर्यायसे सम्बन्ध रखनेवाला अवधिज्ञान भी प्रकट हो गया ।॥९॥ यह सब देखकर श्रीमती शिवंकरा तथा और भी जो सुलोचनाकी सौतें थीं वे उस समय ईर्ष्याकेउद्रेकसे परस्परमें इस प्रकार कहने लगीं ॥१०॥ देखो, यह सुलोचना मायाचारसे पतिकी मूर्छाको अपनी मूर्छाका कारण बनाकर ‘स्त्रियोंमें माया रहती है’ इस कहावतको कैसा सत्य सिद्ध कर रही है । और इस प्रकार जिसने कृत्रिम मूर्च्छाके द्वारा प्रकट हुई भावनाओंका साफ साफ संवरण कर लिया है, जिसकी चेतना सदासे हृदयमें बैठे हुए प्रौढ़ प्रेमसे प्रेरित हो रही है जो कन्याव्रतके भंग करनेते प्राप्त हुए गोत्रस्खलन (भूलसे दूसरे पतिका नाम लेने) से दूषित है तथा कुलको दूषण लगानेवाली है ऐसी यह सुलोचना अपने पहले के पतिको ‘हे रतिवर’ इस प्रकार कहकर बनावटी मूर्च्छाको प्राप्त हुई है ॥११-१३॥
श्लोक 14 से 21 पूर्वभव कथा का प्रारम्भ
यह जयकुमार इसे ‘यह बड़ी शीलवती है, इस प्रकार कहता हुआ वर्णन करता है सो ठीक ही है क्योंकि रागी पुरुषको प्रायः दोष भी गुणके समान जान पड़ते हैं ।।१४।। ‘हे प्रभावति’ ऐसा कहकर मूच्छित हो, क्रोध करनेवाली इस सुलोचनाको प्रसन्न करनेकी इच्छा करता हुआ यह धूर्त कुमार उसके प्रेमसे ही हम लोगोंको शोक उत्पन्न कर रहा है ।।१५।। अवधिज्ञानरूपी नेत्रको धारण करने-वाला जयकुमार उन लोगोंकी इन सब बातोंको जानकर मन्द हंसी के साथ साथ सुलोचनाके मुस्कुराते हुए मुखको देखता हुआ कहने लगा कि ‘हे प्रिये ! तू हम दोनोंके पूर्वभवका सब वृत्तान्त कहकर इस सभाको संतुष्ट तथा कौतुकके वशीभूत कर !’ यह सुनकर पतिके अभिप्रायको जाननेवाली और मधुर भाषण करनेवाली सुलोचनाने भी पूर्वभवकी सब कथा कहनी प्रारम्भकी ॥१६-१८।।
इस जम्बू द्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्र में एक पुण्डरीकिणी नामकी नगरी है जो कि पुष्कलावती देशके मध्यमें स्थित है। उस नगरीका राजा प्रजापाल था जो कि समस्त प्रजाका पालन करता हुआ धर्म, अर्थ तथा कामका फल स्वीकार कर सब पुण्यवानोंमें श्रेष्ठ था ॥१९-२०।। उस राजाका कुबेरमित्र नामका एक प्रसिद्ध राजशेठ था और उसकी हृदयको प्रिय लगनेवाली धनवती आदि बत्तीस स्त्रियां थीं ।॥२१॥
श्लोक 22 से 31 कुबेरकान्त का जन्म और सुख
अनेक भवनोंसे घिरे हुए उस शेठके अत्यन्त ऊंचे महलमें एक रतिवर नामका कबूतर रहता था जो कि अतिशय बुद्धिमान् और सब कबूतरोंमें श्रेष्ठ था ।।२२।। कभी तो राजभवनसे आये हुए सेठ कुवेरमित्र बड़े स्नेहसे हँस हँसकर वार्ता-लाप करते हुए उसे अपने हाथपर उठा लेते थे, कभी वह स्त्रियोंके सुन्दर करकमलों द्वारा दिये हुए और शक्कर मिले हुए उत्तम धान के चावलोंको खाता था, कभी सेठके द्वारा हेतु तथा दृष्टांतपूर्वक कई हुए प्राणिहितकारी अहिंसा धर्मका चिन्तवन करता था, कभी भवनमें आये हुए मुनिराजके चरणकमलोंकी धूलिको उनके समीप जाकर अपने पंखोंसे दूर करता था, जब कभी कोई कुतूहलवश उससे पूछता था कि पापी तथा पुण्यात्मा लोगोंकी क्या गति होती है ? तब वह शास्त्रों के जाननेवाले किसी मौनी महाशयके समान इशारेसे चोंचके द्वारा नीचेका भाग दिखाता हुआ पानी लोगों की गति कहता था और उसी चोंचके द्वारा ऊपरका भाग दिखलाता हुआ पुण्यात्मा लोगोंकी गति कहता था सो ठीक ही है क्योंकि क्षयोपशमके माहात्म्यसे तिर्यञ्च भी विवेकी हो जाते हैं ।॥ २३-२८।। इस प्रकार वह कबूतर अपनी रतिषेणा नामकी कबूतरी के साथ नाना प्रकारकी क्रीड़ा करता हुआ वहां सुखसे समय बिताता था ।॥२९॥ सुलोचना कह रही है कि वह रतिवर ही आप मेरे पति हैं और वह रतिषेणा ही में आपकी प्रिया हूं । देखो इस संसाररूनी आवर्त में भ्रमण करता हुआ यह जीव क्या क्या नहीं होता है ? ।।३०।। उस कुबेरदत्त सेठ के धनवती स्त्रीसे एक कुबेरकान्त नामका पुत्र हुआ था जो कि अतिशय पुण्यमान्, बुद्धिमान् तथा दूसरे कुबेरके समान जान पड़ता था ।॥३१॥
श्लोक 32 से 40 कुबेरकान्त का विवाह
उस कुबेरकान्तका एक प्रियसेन नामका श्रेष्ठ मित्र था जो कि बाल्य अवस्थासे ही उसके साथ रहता था और उसके दूसरे प्राणोंके समान था ॥ ३२॥ एक अत्यन्त उत्तम कामधेनु कुमार कुबेरकान्तके जन्मसे ही लेकर उसकी इच्छाके अनुकूल सुखके सब साधनों को पूरा करती थी। वह कामधेनु प्रति दिन एक खेत तो सुगन्धित धान्यका उत्पन्न करती थी और एक खेत अमृतके समान मीठे, पतले छिलकेवाले बड़े बड़े ईखोंका उत्पन्न करती थी ॥३३-३४।॥ इसके सिवाय वही कामधेनु कुमारके सामने निरन्तर मनोहर वीणा बजाती थी, और उसी कामधेनुके प्रतापसे उसके स्नानके समय समीपवर्ती आकाशसे आकर मधुर तथा गम्भीर गर्जना करते हुए मेघ सब प्रकारके रोग, पसीना और मलको हरण करनेवाला गंगा नदीका सुगन्धित जल बरसाते थे ॥३५-३६॥ उस कुमारके लिये एक कल्पवृक्ष वस्त्र देता था, एक आभूषण देता था, एक अन्न देता था और एक पेय पदार्थ देता था ।। ३७ ।। इस प्रकार इनके सिवाय देवोंके दिये हुए और भी सब प्रकार-के भोगोंका निरन्तर उपभोग करते हुए उस कुमारकी पहली अवस्था पूर्ण हुई थी ॥३८॥ पहली अवस्थाको पूर्ण हुआ देखकर माता पिताको चिन्ता हुई कि यह एक कन्या चाहता है अथवा बहुत । उसी चिन्तासे वे कुछ संदेह कर रहे थे और कुछ व्याकुल भी हो रहे थे । उन्होंने कुबेरकान्तके मित्र प्रियसेनको बुलाकर उसके मनकी बात पूछी और उसके कहनेपर उन्होंने निश्चय कर लिया कि इसके ‘एक पत्नीव्रत है’- यह एक ही कन्या चाहता है, सो ठीक ही है क्योंकि दोनोंका एक चित्त हो जाना ही मित्रता कहाती है ॥ ३९-४०।।
श्लोक 41 से 51 फल्गुमति मंत्री की दुष्टता
तदनन्तर-उसी नगरमें समुद्रदत्त नामका एक सेठ था, जो कि कुबेरमित्रकी स्त्री धनवती का भाई था और उसे कुबेरमित्रकी बहिन कुबेरमित्रा व्याही गई थी। इन दोनोंके प्रियदत्ता नामकी एक पुत्री हुई थी और रतिकारिणी उसकी दासी थी । समुद्रदत्त सेठके प्रियदत्ता आदि बत्तीस कन्याएं थीं। किसी एक दिन उस बुद्धिमान् सेठने एक बागमें यक्षकी पूजा करते समय सुन्दर आकारवाली उन बत्तीसों कन्याओंकी निमित्तवश परीक्षा की और उन सबमें प्रियदत्ताको ही गुणयुक्त समझा। फिर सूर्य, चन्द्र, गुरु, शुक्र और मंगल इन पांचों ताराओंके बलसे सहित किसी शुभ दिनमें बड़े वैभवके साथ कल्याण करनेवाली विधिसे उस प्रियदत्ताको अपने पुत्रके लिये स्वीकार किया ॥४१-४४।॥ राजा प्रजापालकी गुणवती यशस्वती नामकी दो कन्याएं भी वह नैमित्तिक परीक्षा देखनेके लिये आई थीं, जब मामा कुबेरमित्रने भोजनसे भरे हुए पात्र उन्हें नहीं दिये अपने आप ही लज्जाके भारसे उनके मुख नीचे हो गये और उसी समय उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया ।।४५-४६।। उन्होंने उसी समय अमितमति और अनन्तमति आर्थिकाके समीप उत्तम संयम धारण कर लिया। इस प्रकार कितना ही समय व्यतीत होनेपर राजा प्रजापालने भी अपनी सब लक्ष्मी लोकपाल नामक पुत्रके लिये देकर शिवंकर नामके वनमें शीलगुप्त नामक मुनिराजके समीप संयम धारण कर लिया । इसी प्रकार कनकमाला आदि रानियोंने भी कठिन तपश्चरण धारण किया था सो ठीक ही है क्योंकि यदि राजा आगे चलता है तो अल्प शक्तिके धारक लोग भी उसी कठिन रास्तेसे चलने लगते हैं ।॥४७-४९॥ इधर जिसे राज्यलक्ष्मी प्राप्त हुई है और जिसका वैभव सब जगह प्रसिद्ध हो रहा है ऐसा राजा लोकपाल भी कुबेरमित्रकी सम्मतिके अनुसार ही पृथिवीका पालन करने लगा ॥५०॥ उस राजाका फल्गुमति नामका एक मंत्री था, जो अज्ञानी था, असत्य बोलनेवाला था, राजाकी समान उमरका था, मूर्ख था और स्वभावसे चंचल तथा दुर्जन था ॥५१॥
श्लोक 52 से 61 मणि भ्रम और सेठ की बुद्धिमत्ता
वह मंत्री कुबेरदत्त सेठके सामने राजाके साथ मुँहपर आये हुए यद्वा तद्वा वचन कहनेमें कुछ डरता था इसलिये वह सेठको राजाके पाससे हटाना चाहता था । उसने राजाके शयनगृहके मुख्य पहरेदारको समझा बुझाकर और कुछ धन देकर अपने वश कर लिया, उसे समझाया कि तू रातके समय देवताके समान तिरोहित होकर राजासे कहना कि हे राजन्, राजसेठ कुबेरमित्र पिताके समान बड़े हैं, सदा अपने पास रखने में उनकी विनय नहीं हो पाती इसलिये उन्हें हमेशा अपने पास नहीं रखिये, कार्यके समय ही उन्हें बुलाया जाय इस प्रकार फल्गुमतिने शयनगृहके अध्यक्षसे कहा और उसने भी सब काम उसीके कहे अनुसार कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि धन चाहनेवाले लोगों के द्वारा नहीं करने योग्य कार्य इस संसारमें कुछ भी नहीं है ।॥५२-५५॥ शयनगृहके अधिकारीकी बात सुनकर राजाको भी कुछ भय हुआ और उसने बिना विचारे ही मामा (कुबेरमित्र) को बुलाकर कह दिया कि आप बिना बुलाये न आवें ।।५६।। जो बात पहले विना विचार किये ही कही जाती है उसका फल पीछे विषके समान होता है। राजाके वचन सुनकर सेठ भी दुःख सहित शीघ्र ही अपने घर चला गया ॥५७।। किसी एक दिन राजा ललितघट नामक हाथीपर बैठकर विहार करनेके लिये वनमें गया, उस वनमें एक बावड़ी थी, उसके तटपर एक सूखा वृक्ष था, उसकी एक शाखा बावड़ीके निकटसे निकली थी, उस शांखाके अग्रभागपर एक कोवेने कहींसे देदीप्यमान बहुमूल्य पद्मराग मणि लाकर रख दी। बावड़ी में उस मणिकी कान्ति पड़ रही थी, राजा तथा उसके सब साथियों ने उस कान्तिको मणि समझा और यह देखकर सवको आश्चर्य हुआ उस मणिको लेनेके लिये सब बावड़ी के भीतर घुसे परन्तु उनमें से वह मणि किसीको भी नहीं मिली सो ठीक ही है क्योंकि भ्रान्तिसे प्रवृत्ति करनेवाले पुरुषोंको क्लेशके सिवाय और क्या फल मिल सकता है ।।५८-६०।। उन सब लोगोंने बावड़ी में वह मणि बहुत देरतक देखी परन्तु जब नहीं मिली तब उदास हो अपने नगरको लौट आये सो ठीक ही है क्योंकि जिस प्रयत्नमें बुद्धि अग्रेसर नहीं होती वह प्रयत्न कभी सफर नहीं होता ॥ ६१ ॥
श्लोक 62 से 71 सेठ का वैराग्य और तप
किसी समय प्रेमसे भरी हुई वसुमती नामकी सेठकी पुत्रीने रात्रिके समय अपने सौभाग्यको सूचित करनेवाले तथा कुंकुमसे गीले अपने पैरसे राजाके ललाट में स्पष्ट विह्न बना दिया सो ठीक ही है क्योंकि पुरुषके अपने आधीन होनेपर स्त्रियां क्या क्या नहीं करती हैं ? ॥६२-६३॥ राजाने उस पैरके चिह्नको पट्टबन्धसे भी अधिक माना और सबेरा होते ही सभामें बैठकर मंत्री आदिसे इस प्रकार पूछा कि यदि कोई पैरसे राजाके ललाट-पर ताड़न करे तो उसका क्या करना चाहिये ? यह सुनकर फल्गुमति मंत्रीने कहा कि राजा-का जो ललाट पट्टके सिवाय किसी अन्य वस्तुके द्वारा छुआ भी नहीं जा सकता उसे यदि किसीने पैरसे ताड़न किया है तो उसे प्राण निकलने तक मारना चाहिये ॥६४-६६।। यह सुनकर राजाने उस मंत्रीका तिरस्कार किया तथा मन्द मन्द हँसी के साथ मामा कुबेरमित्रको बुलाकर उनसे सब हाल पूछा । प्रकृत बातको जाननेवाला कुबेरमित्र कहने लगा कि जिसने आपके शिरपर पैरसे प्रहार किया है उसकी सब प्रकारके आभूषणरूपी संपदासे पूजा करनी चाहिये । इस प्रकार उसके वचनोंसे संतुष्ट होकर राजाने वनविहारके समय बावड़ी में दिखनेवाले मणि- की बात निवेदन की ॥ ६७-६८॥ वैश्योंमें श्रेष्ठ कुबेरमित्रने विचारकर कहा कि वह मणि पानी के भीतर नहीं थी किन्तु किनारेपर खड़े हुए वृक्षपर थी, बावड़ी में केवल उसकी कान्ति पड़ रही थी ।।६९।। यह सुनकर उस समय राजा लोकपाल कुबेरमित्रकी बुद्धिमत्ता, अपनी मूर्खता और मंत्रीकी दुष्टता जानकर पश्चात्ताप करता हुआ इस प्रकार कहने लगा- “देखो इन धूर्तीने मुझ मूर्खको खूब ही ठगा।” इस प्रकार कहकर वह बुद्धिमान् राजा सेठका आदर-सत्कार कर उसे सदा अपने पास रखने लगा ।॥७०-७१।।
श्लोक 72 से 81 प्रियदत्ता का पुण्य और पूर्वजन्म ज्ञान
उस दिनसे राजाने तन्त्र अर्थात् अपने राष्ट्रकी रक्षा करना और अवाय अर्थात् परराष्टोंसे अपने सम्बन्धका विचार करना इन दोनोंका बड़ा भारी भार सेठको सौंप दिया और आप निर्द्वन्द्व होकर धर्म तथा काम पुरुषार्थका अनुभव करने लगा ॥७२॥ किसी समय सेठकी स्त्रीने सेठके शिरमें बाल देखकर सेठसे कहा । सेठने यह कहते हुए उसकी बड़ी प्रशंसा की कि तू आज सचमुच धर्मपत्नी हुई है। उस सेठने बड़ी प्रसन्नता के साथ राजाको छोड़कर समुद्रदत्त आदि अन्य सेठोंके साथ साथ देवगिरि नामक पर्वतपर वरधर्मगुरुके समीप तप धारण किया और दोनों ही तपकर ब्रह्मलोकके अन्तमें लौका न्तिक देव हुए सो ठीक ही है क्योंकि समयके अनुकूल होनेवाली परिस्थितिसे बुद्धिमानोंको क्या क्या सिद्ध नहीं होता ? ॥७३-७५।।
किसी दूसरे दिन प्रियदत्ता (समुद्रदत्तकी पुत्री और कुबेरकान्तकी स्त्री) ने विपुलमति नामके चारण ऋद्धिधारी महामुनिको नवधा भक्तिपूर्वक दान देकर पुण्य संपादन किया और फिर विनय प्रकटकर उन्हीं मुनिराजसे पूछा कि मेरे तपका समय समीप है या नहीं ! ॥७६-७७।। अवधिज्ञान ही हैं नेत्र जिनके ऐसे बुद्धिमान् मुनिराजने यह जानकर कि इसका चित्त संतानको चाह रहा है अपने दाहिने हाथकी पांच अंगुली और बायें हाथकी छोटी अंगुली दिखाई और उससे सूचित किया कि पांच पुत्र और एक पुत्री होगी । तथा कालान्तरमें उस प्रियदत्ता-ने भी पांच पुत्र और एक पुत्री दिखलाई अर्थात् उत्पन्न की ॥७८-७९॥ किसी समय गुणरूप आभूषणोंको धारण करनेवाली, जगत्पाल चक्रवर्तीकी पुत्री, अमितमति और अनन्तमति नाम
की बात निवेदन की ॥ ६७-६८॥ वैश्योंमें श्रेष्ठ कुबेरमित्रने विचारकर कहा कि वह मणि पानीके भीतर नहीं थी किन्तु किनारेपर खड़े हुए वृक्षपर थी, बावड़ी में केवल उसकी कान्ति पड़ रही थी ।।६९।। यह सुनकर उस समय राजा लोकपाल कुबेरमित्रकी बुद्धिमत्ता, अपनी मूर्खता और मंत्रीकी दुष्टता जानकर पश्चात्ताप करता हुआ इस प्रकार कहने लगा- “देखो इन धूर्तीने मुझ मूर्खको खूब ही ठगा।” इस प्रकार कहकर वह बुद्धिमान् राजा सेठका आदर-सत्कार कर उसे सदा अपने पास रखने लगा ॥ ७०-७१॥ उस दिनसे राजाने तन्त्र अर्थात् अपने राष्ट्रकी रक्षा करना और अवाय अर्थात् परराष्टोंसे अपने सम्वन्धका विचार करना इन दोनोंका बड़ा भारी भार सेठको सौंप दिया और आप निर्द्वन्द्व होकर धर्म तथा काम पुरुषार्थका अनुभव करने लगा ॥७२॥ किसी समय सेठकी स्त्रीने सेठके शिरमें बाल देखकर सेठसे कहा । सेठने यह कहते हुए उसकी बड़ी प्रशंसा की कि तू आज सचमुच धर्मपत्नी हुई है। उस सेठने बड़ी प्रसन्नता के साथ राजाको छोड़कर समुद्रदत्त आदि अन्य सेठोंके साथ साथ देवगिरि नामक पर्वतपर वरधर्मगुरुके समीप तप धारण किया और दोनों ही तपकर ब्रह्मलोकके अन्तमें लौका न्तिक देव हुए सो ठीक ही है क्योंकि समयके अनुकूल होनेवाली परिस्थितिसे बुद्धिमानोंको क्या क्या सिद्ध नहीं होता ? ॥७३-७५।।
किसी दूसरे दिन प्रियदत्ता (समुद्रदत्तकी पुत्री और कुबेरकान्तकी स्त्री) ने विपुलमति नामके चारण ऋद्धिधारी महामुनिको नवधा भक्तिपूर्वक दान देकर पुण्य संपादन किया और फिर विनय प्रकटकर उन्हीं मुनिराजसे पूछा कि मेरे तपका समय समीप है या नहीं ! ॥७६-७७।। अवधिज्ञान ही हैं नेत्र जिनके ऐसे बुद्धिमान् मुनिराजने यह जानकर कि इसका चित्त संतानको चाह रहा है अपने दाहिने हाथकी पांच अंगुली और बायें हाथकी छोटी अंगुली दिखाई और उससे सूचित किया कि पांच पुत्र और एक पुत्री होगी। तथा कालान्तरमें उस प्रियदत्ता-ने भी पांच पुत्र और एक पुत्री दिखलाई अर्थात् उत्पन्न की ॥ ७८-७९॥ किसी समय गुणरूप आभूषणोंको धारण करनेवाली, जगत्पाल चक्रवर्तीकी पुत्री, अमितमति और अनन्तमति नाम की गणिती (आयिकाओंकी स्वामिनी), तप धारण करनेवाली, प्रजापालकी पुत्री यशस्वती और गुणवती के साथ साथ उत्कृष्ट विभूतिसे सुशोभित उस पुण्डरीकिणी नगरीमें पधारीं ।।८०-८१।।
श्लोक 82 से 92 रतिवर-रतिषेणा का पूर्वजन्म प्रकट
सब अन्तःपुरके साथ साथ राजा लोकपाल और सेठ कुबेरकान्त भी उन आयि-काओंके समीप गये और चिरकालतक समीचीनधर्मका अस्तित्व सुनकर दान देना आदि उद्योग-को प्राप्त हुए ॥८२॥ किसी एक दिन सेठ कुबेरकान्तके घर दो जंघाचारण मुनि पधारे। दोनों ही दम्पतियोंने बड़ी भक्ति और आनन्दके साथ उनका पडगाहन किया ।।८३।। उन मुनियोंके दर्शन मात्रसे ही जिसने अपने पूर्वभवके सब समाचार जान लिये हैं ऐसे कबूतर कबूतरी (रति-वर-रतिषेणा) के जोड़ेने अपने पंखोंसे मुनिराजके चरणकमलोंका स्पर्श कर उन्हें नमस्कार किया और परस्परकी प्रीति छोड़ दी। यह देखकर उन मुनियोंको भी संसारसे वैराग्य हो गया और दोनों ही निराहार सेठके घरसे निकलकर बाहर चले गये ।।८४-८५।। इशारोंको समझनेवाली प्रियदत्ताने यह सब जानकर किसी समय रतिषेणा कबूतरीसे पूछा कि पूर्वजन्म-में तुम्हारा क्या नाम था ? ॥८६॥ उसने भी चोंचसे ‘रतिवेगा’ यह नाम लिख दिया । उसे देखकर यह पूर्वजन्मकी मेरी स्त्री है यह जानकर कबूतर बहुत प्रसन्न हुआ ॥८७॥ इसी प्रकार प्रियदत्ताने रतिवर कबूतरसे भी उसके पूर्वजन्मका नाम पूछा तब उसने भी मैं पूर्व जन्ममें सुकान्त नामका था ऐसे अक्षर जमीनपर लिख दिये ॥८८॥ उन्हें देखकर और यह मेरा ही पति है यह जानकर उसीके साथ रहनेकी अभिलाषा करती हुई रतिषेणा भी दैवके अनुग्रहसे उसी के साथ समागमको प्राप्त हुई-दोनों साथ साथ रहने लगे ।।८९।। यह सब सुनकर सभामें बैठे हुए सभी लोगोंको बहुत भारी प्रसन्नता हुई और कथाका शेष भाग सुननेकी इच्छा करते हुए सभी लोग बड़ी उत्कण्ठासे बैठे रहे ।।१०।। ‘इसके सिवाय हम दोनोंने और भी जो कुछ देखा या सुना है उसे यदि जानती हो तो कहो’ इस प्रकार जयकुमारके कहनेपर अपने ‘वचनामृतरूपी जलसे उस शुभ सभाको सींचती हुई सुलोचना कहने लगी’- ‘हाँ, अच्छी तरह जानती हूँ, सुनिये ॥ ९१-९२॥
श्लोक 93 से 100 मुनियों का प्रस्थान और व्रत नियम
उस समय वे मुनि आहार छोड़कर सेठके घरसे चले गये थे । जब राजाको उनके इस तरह चले जानेका कारण मालूम नहीं हुआ तब उसने अभितमति गणिनी (आयिका) से पूछा। अमितमतिने भी जैसा सुना था वैसा वह कहने लगी ॥९३॥
इसी पुष्कलावती देशमें विजयार्ध पर्वतके निकट एक ‘धान्यकमाल’ नामका बड़ा भारी वन है और उस बनके पास ही शोभानगर नामका एक बड़ा नगर है। उस नगरका स्वामी राजा प्रजापाल था और उसकी स्त्रीका नाम था देवथी। वह देवश्री दूसरी लक्ष्मीके समान सुख देनेवाली थी ।। ९४-९५॥ राजा प्रजापालके एक शक्तिषेण नामका सामन्त था, उसकी प्रीति उत्पन्न करनेवाली अटवीश्री नामकी स्त्री थी। उन दोनोंके सत्यदेव नामका पुत्र था। किसी समय निकटभव्य होनेके कारण इन सभीने मेरे चरणोंके आश्रयसे धर्मका उपदेश सुना। राजा भी इनके साथ था। उपदेश सुनकर सभीने मद्य-मांसका त्याग किया और पर्वके दिन उपवास करनेका नियम लिया। भक्ति करनेवाले शक्तिषेणने भी गृहस्थके व्रत धारण किये और साथमें यह नियम लिया कि मैं मुनियोंके भोजन करनेका समय टालकर भोजन करूंगा ॥९६-९८।। शक्तिषेणकी स्त्री अटवीश्रीने पांच वर्ष तक शुक्ल पक्षका प्रथम दिन और कृष्णपक्षकी अष्टमीको आहार त्याग करनेका नियम किया, अनुप्रबद्ध कल्याण नाम-का उपवास व्रत ग्रहण किया तथा सत्यदेवने भी साधुओंके स्तवन करनेका नियम लिया ।॥९९-१००।।
श्लोक 101 से 111 भवदत्त (दुर्मुख) की दुष्टता और विवाह विवाद
इस प्रकार ये सब सम्यग्दर्शनके बिना ही व्रतरूप आभूषणको धारण करनेवाले हो गये । किसी एक दिन सेनापति शक्तिषेण अपनी सेनाके साथ अटवीश्रीको लेनेके लिये उसके माता-पिताकी नगरी मृणालवतीको गया था। वहांसे लौटते समय वह धान्यकमाल नामके बनमें सर्पसरोवरके समीप ठहरा । उसी समय एक दूसरी घटना हुई जो इस प्रकार कही जाती है।मृणालवती नगरीका राजा धरणीपति था। उसी नगरी में सुकेतु नामका एक सेठ रहता था जो कि रतिवर्माका पुत्र था । सुकेतुकी स्त्रीका नाम कनकश्री था और उन दोनोंके एक भवदत्त नामका पुण्यहीन पुत्र था ।। १०१-१०४।। उसी नगरमें एक श्रीदत्त सेठ थे । उनकी स्त्रीका नाम था विमलश्री और उनके दोनोंके अत्यन्त प्यारी रतिवेगा नामकी सती पुत्री थी ।॥१०५॥ उसी नगरके अशोकदेव सेठ और जिनदत्ता नामकी उनकी स्त्रीसे पैदा हुआ सुकान्त नामका एक पुत्र था । जिसका वर्णन ऊपर कर आये हैं ऐसा भवदेव बड़ा दुराचारी था और उस दुरा-चारीपनके कारण ही उसका दूसरा नाम दुर्मुख भी हो गया था ।।१०६।॥ वह भवदेव धन उपार्जनकर रतिवेगाके साथ विवाह करना चाहता था इसलिये व्यापारके निमित्त वह बाहर गया था, परन्तु जब वह विवाहके अवसर तक नहीं आया तब माता पिताने वह कन्या अत्यन्त तेजस्वी सुकान्तके लिये दे दी। जब दुर्मुख (भवदेव) देशान्तरसे लौटकर आया और रति-वेगाके विवाहकी बात सुनी तब वह बहुत ही कुपित हुआ। उसके डरसे वधू और वर दोनों ही भागकर शक्तिषेणकी शरण में पहुंचे ॥१०७-१०९॥ दुर्मुखने भी हठसे वधू और वरका पीछा किया परन्तु शक्तिषेणके डरसे अपना वैर अपने ही मनमें रखकर वहांसे लौट गया ॥ ११०॥ शक्तिषेणने वहां पधारे हुए दो चारण मुनियोंके लिये अपने आगामी जन्मके कलेवाके समान आहार दान दिया था ॥ १११ ॥
श्लोक 112 से 122 : मेरुकदत्त सेठ और हीनांग व्यक्ति
उसी सरोवरके समीप धनी और सब संघके स्वामी मेरुकदत्त नामका सेठ बहुत लोगों के साथ आकर ठहरा हुआ था । उसकी स्त्रीका नाम धारिणी था । उस सेठके चार मंत्री थे-१ भूतार्थ, २ शकुनि, ३ बृहस्पति और ४ धन्वन्तरि । ये चारों ही मंत्री अपने अपने शास्त्रोंमें पण्डित थे ।।११२-११३॥ एक दिन सेठ इन सबसे घिरा हुआ बैठा था कि इतनेम वहां एक हीन अंगवाला पुरुष आया। उसे देखकर सेठने सब मंत्रियोस कहा कि यह ऐसा किस कारणसे हुआ है ? ।। ११४।। इसके उत्तरमें शकुनि मंत्रीने कहा कि जन्मके समय बुरे शकुन होनेसे यह ऐसा हुआ है ? बृहस्पतिने कहा कि जन्मके समय दुष्ट ग्रहोंके पड़नेसे यह हीनांग हुआ है और धन्वन्तरिने कहा कि जन्मके समय वात पित्त कफ इन तीन दोषोंके कारण यह विकलांग हो गया है। यह सुनकर भूतार्थ नामक मन्त्री ने कहा कि आप यह सब रहने दीजिये, इस जीवने पूर्वभवमें हिंसा आदिके द्वारा जो कर्म उपाजन किये थे. वे ही इसके हीतांग होने में प्रधान कारण हैं ।॥ ११५-११६।। इतने में ही शक्तिषेण सेनापतिने जिसे अपना पुत्र स्वीकार किया है ऐसे उस सत्यदेवका पिता अपनी इच्छानुसार उसे खोजता हुआ आ पहुंचा । उस हीनांग पुत्रको देखकर उसे बहुत ही दुःख हुआ और वह कहने लगा कि हे सभासदो, सुनो, एक दिन घर में चावल पक रहे थे सो पानी के उफानके कारण कुछ चावल बर्तनसे नीचे गिर गये और उन नीचे गिरे हुए चावलोंको कबूतर आदि पक्षी चुगने लगे परन्तु यह सब देखता हुआ चुपचाप खड़ा रहा-इसने उन्हें भगाया नहीं । तब इसकी मांकी छोटी बहिनने क्रोधसे इसे डांटा, उस डांटको न सह सकने के कारण ही यह यहां चला आया है। यह इतना असहन-शील है कि ‘तेरी नाकके नीचे मुँहका छेद है’ इस बातको भी नहीं सह सकता है। इस तरह सब सभासदोंसे उसके पिताने उसकी अकर्मण्यताका वर्णन किया। चूँकि सत्यदेव अपने पिताके साथ वापिस नहीं जाना चाहता था इसलिये उसने दुखी होकर निदान किया कि ‘अगले भवमें भी मैं तेरे स्नेहका पात्र होऊं’ इस प्रकार निदान कर वह द्रव्यलिङ्गी मुनि हो गया और सत्यदेवके प्रेमसे मोहित होकर मरा जिससे लोकपाल हुआ ।।११७-१२२॥
श्लोक 123 से 132 पुण्य और पूर्वजन्म स्मरण
किसी एक समय शुक्ल-पक्षकी प्रतिपदाके दिन शक्तिषेणने उपवास करनेवाली अपनी स्त्री अटवीश्रीके साथ साथ भक्ति-पूर्वक हो मुनियोंको आहारदान देकर पंचाश्चर्य प्राप्त किये, उसे देखकर सेठ मेरुकदत्त और उनकी स्त्री धारिणीने निदान किया कि’ये दोनों अगले जन्ममें हमारी ही संतान हों। ‘सेठ मेरुक-दत्तके चारों मंत्रियोंने सब परिग्रहका परित्याग कर तप धारण किया और आयुके अन्तमें लोकपालकी पर्याय प्राप्त की। इसी प्रकार सुकान्त और रतिवेगा नामके वधू-वरने भी दानकी अनुमोदना करनेसे प्राप्त हुआ बहुत भारी पुण्य प्राप्त किया ।॥ १२३-१२६।। यह सब सुनकर राजा लोकनालकी रानी वसुमती को अपने पूर्वजन्मकी सब बात याद आ गई जिससे वह मूच्छित हो गई और सचेत होनेपर अमितमति आर्थिकासे कहने लगी कि मैं पूर्वजन्ममें शोभानगरके राजा प्रजापालकी रानी देवश्री थी, आपके प्रसादसे ही मैं इस लक्ष्मीको प्राप्त हुई हूँ, मेरे उस जन्मके पति राजा प्रजापाल आज कहाँ हैं ? यह कहिये ।।१२७-१२८।। इस प्रकार वसुमतीका प्रश्न समाप्त होनेपर अमितमति आर्थिकाने कहा कि यह लोकपाल ही पूर्वजन्मका प्रजापाल राजा है। इतना कहते ही प्रियदत्ताको भी अपने पूर्वभवकी याद आ गई। उसने आयिकाको वन्दना कर कहा कि शक्तिषेणकी स्त्री अटवीश्री तो मैं ही हूँ, कहिये मेरा पति शक्तिषेण आज कहाँ है ? इस प्रकार पूछा जानेपर अमितमम्तिने कहा कि यह तेरा पति कुबेर-कान्त ही उस जन्मका शक्तिषेण है और यह कुबेरदयित ही उस जन्मका सत्यदेव है जो कि तुम्हारा पुत्र हुआ है। सेठ मेरुकदत्तके जो भूतार्थ आदि चार मंत्री थे वे देवपर्यायको प्राप्त हो स्नेहके कारण जन्मसे ही लेकर तुम्हारे पतिकी भारी सेवा कर रहे हैं- कामधेनु और कल्पवृक्ष बनकर सेवा कर रहें हैं ।॥ १२९-१३२॥
श्लोक 133 से 141 भवदत्त का प्रभाव और नए जन्म
कुबेरदयितका पूर्व जन्मका पिता सत्यक भी देव होकर उसकी रक्षा करता है सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके प्रभावसे दूसरी गतिमें रहनेवाले जीव भी स्नेह करने लग जाते हैं ॥ १३३॥ भवदेवने पूर्वोक्त वधू-वर (रतिवेगा और सुकान्त) को जला दिया था इसलिये वे दोनों ही मरकर ये कबूतर-कबूतरी हुए हैं। सेठ मेरुकदत्त औरउनकी स्त्री धारिणी यहां तेरे पति कुबेरकान्तके माता पिता हुए हैं ।॥१३४।। इतना कहकर अमितमति यह भी कहने लगी कि विजयार्ध पर्वतके समीप मलयकांचन नामके पर्वतपर दो मुनिराज रहते थे, जब पूर्वजन्ममें शक्तिषेण सर्पसरोवरके समीप डेरा डालकर वनमें ठहरा हुआ था तब वे भिक्षा के लिये तेरे यहां आये थे और तेरे अंगुलियोंके इशारेसे पांच पुत्र तथा एक पुत्री होगी ऐसा कहकर चले गये थे। तदनन्तर रत्नवृष्टि आदि पंचाश्चर्योंके कारण स्वरूप वे मुनिराज इस जन्ममें भी किसी समय तेरे घर आये थे परन्तु कबूतर-कबूतरीको देखकर दया-युक्त हो बिना भिक्षा लिये ही वनको लौट गये थे। वे ही तेरे पिता और तेरे पतिके गुरु हुए हैं। उन्हीं के उपदेशसे मैंने यह सब सुनकर अनुक्रमसे कहा है ॥ १३५-१३८॥ इस प्रकार जो पुरुष अमितमति आर्थिकाके द्वारा कही हुई कथाके सुननेमें तल्लीन हो रहे थे वे संसारके सच्चे स्वरूप का बार-बार चिन्तवन करने लगे ।।१३९।। इस प्रकार कुछ समय व्यतीत होनेपर किसी दिन प्रियदत्ताने प्रसङ्ग पाकर यशस्वती और गुणवतीसे पूछा कि आप लोगोंने यह दीक्षा किस कारण ग्रहण की है? मुझे यह जाननेका कौतुक हो रहा है। तब उन दोनोंने स्पष्ट रूपसे अपनी दीक्षा-का कारण बतला दिया ॥१४०-१४१॥
श्लोक 142 से 151 कबूतरों का मृत्यु और नए जन्म
तदनन्तर कुबेरमित्रकी स्त्री धनवतीने संघकी स्वामिनी अमितमतिके पास दीक्षा धारण कर ली और उन दोनों आयिकाओंकी माता कुबेर-सेनाने भी अपनी पुत्री के समीप दीक्षा धारण की ॥१४२।।
किसी एक दिन यमराजके द्वारा प्रेरित हुए ही क्या मानो वे दोनों कबूतर-कबूतरी चावल चुगने के लिये किसी दूसरे गांव गये। वहां एक बिलाव था जो कि भवदेवका जीव था। उस पापीको पूर्व जन्मसे बंधे हुए वैरके कारण कबूतर-कबूतरीको देखते ही पापकी भावना जागृत हो उठी और उसने उन दोनोंको मार डाला ॥१४३-१४४।। उसी पुष्कलावती देशके विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी में एक गांधार नामका देश है और उसमें उशीरवती नामकी एक नगरी है। उसके राजा थे आदित्यगति और उनकी रानीका नाम था शशिप्रभा । रतिवर कबूतर मरकर उन दोनोंके हिरण्यवर्मा नामका पुत्र हुआ ॥१४५-१४६॥ उसी विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीमें एक गौरी नामका देश है उसके भोगपुर नामके प्रसिद्ध नगरमें विद्याधरोंका स्वामी राजा वायुरथ राज्य करता था। उसकी स्वयंप्रभा नामकी रानी थी। रतिषेणा कबूतरी मरकर उन्हीं दोनोंको प्रभावती नामकी पुत्री हुई सो ठीक ही है क्योंकि जैनधर्मका एक अंश भी प्राणियोंका उद्धार कर देता है ॥१४७-१४८।। सुकान्त और रति-वेगाके जो पहले माता-पिता थे वे ही इस जन्ममें भी माता-पिता हुए हैं सो ठीक ही है क्योंकि यह संसार बड़ा ही विचित्र है। भावार्थ-सुकान्तके पूर्वभवके माता-पिता अशोक और जिनदत्ता इस भवमें आदित्यगति और शशिप्रभा हुए हैं तथा रतिवेगाके पूर्वभवके माता-पिता विमलश्री और श्रीदत्ता इस भवमें वायुरथ तथा स्वयंप्रभा हुए हैं ॥ १४९।। जब जयकुमारने सुलोचनाके साथ बैठकर ‘हा मेरी प्रभावती’ ऐसा कहा तब फिर उसके रूप आदिका वर्णन अलगसे क्या किया जाय ? ।॥ १५०॥ प्रभावती कन्याको यौवनसे सम्पन्न देखकर विद्याधरोंके अधिपति वायुरथने अपने मंत्रियोंसे कहा कि यह कन्या किसे देनी चाहिये ? ॥१५१॥
श्लोक 152 से 162 प्रभावती का स्वयंवर
मंत्रियोंने परस्परमें निश्चय कर कहा कि ‘शशिप्रभा आपकी बहिन है, और आदित्यगति आपकी पट्टराज्ञीका भाई है। ये दोनों तथा इनके सिवाय और भी अनेक विद्याधर राजा बड़े प्रेमसे कन्याकी याचना कर रहे हैं इसलिये स्वयंवर करना ठीक होगा क्योंकि ऐसा करनेसे किसी के साथ विरोध नहीं होगा।’ मन्त्रियोंकी यह बात राजाने भी स्वीकार की ॥१५२-१५३॥ तदनन्तर स्वयंवरकी बात सुनकर सभी राजकुमार आये परन्तु कन्या प्रभावतीने इन सबमें से किसीको भी रत्नमालाके द्वारा स्वीकार नहीं किया-किसी के भी गलेमें रत्नमाला नहीं डाली ॥१५४।। यह देखकर माता-पिताने उसकी सखी प्रियकारिणीसे इसका कारण पूछा, सखीने उन दोनोंसे कहा कि यह पहले कहती थी कि ‘जो मुझे गतियुद्धमें जीतेगा मैं उसीके गलेमें माला डालूंगी’ यह सुनकर राजाने उस दिन यथायोग्य कहकर सबको बिदा किया ।।१५५-१५६।। दूसरे दिन राजाने स्वयंवरकी घोषणा कराकर कहा कि ‘एक माला सिद्धकूट नामक चैत्यालयके द्वारसे नीचे छोड़ी जायगी’ जो कोई विद्याधर माला छोड़ने के बाद महामेरु पर्वतकी तीन प्रद-क्षिणाएं देकर प्रभावती के पहले उसे जमीनपर पड़ने के पहले ही ले लेगा वही इसका पति होगा’ यह सुनकर बहुतसे विद्याधरोंने प्रयत्न किया परन्तु पूर्वोक्त प्रकारसे माला न ले सके इसलिये प्रभावतीसे हारकर लज्जित होते हुए चले गये सो ठीक ही है क्योंकि मृत्यु भी अभिमानी लोगों के मानभंग की बराबरी नहीं कर सकती है ॥ १५७-१५९॥ तदनन्तर गतियुद्ध करनेमें चतुर हिरण्यवर्मा आया और उससे हारकर प्रभावतीने वह माला उसके गलेमें डाल दी ।।१०६।। पूर्व जन्मके स्नेहसे बढ़ी हुई सुखरूप सम्पत्तिसे जब उन दोनोंका कितना ही समय व्यतीत हो गया तब किसी एक दिन कबूतर-कबूतरीका जोड़ा देखनेसे प्रभावतीको पूर्वभवका सम्बन्ध याद आ गया, वह विरक्त होकर शोकसे व्याकुल होती हुई अकेली बैठकर कुछ सोचने लगी ॥१६१-१६२।।
श्लोक 163 से 170 पूर्वजन्म स्मरण और प्रेम
इधर हिरण्यवर्माको भी जाति स्मरण हुआ था, उसने एक पटियेपर अपने पूर्वजन्मका सब हाल साफ साफ लिखकर प्रभावतीकी सखी प्रियकारिणीको दिया था, प्रभावती ने प्रियकारिणीके हाथमें वह पटिया देखकर कहा कि यह चित्रपट तुझे कहां मिला है ? सखीने कहा कि ‘यह चित्रपट तेरे पतिने लिखा है और उनके नौकर सुकान्तने मुझे दिया है, इस प्रकार सखीके वचन सुनकर प्रभावतीने भी एक पटियेपर अपने पूर्वजन्मका सब वृत्तान्त लिखकर सखी के हाथमें दिया ॥१६३-१६५॥ वह चित्रपट देखकर हिरण्यवर्मा प्रभावतीपर बहुत अनुराग करने लगा और प्रभावती भी हिरण्यवर्मापर बहुत अनुराग करने लगी, उन दोनोंका प्रेम पूर्व पर्यायके प्रेमसे कहीं दूना हो गया था ।।१६६।। कुटुम्बके सब लोगोंने मिलकर उन दोनोंका मंगलाभिषेक किया मानो वे उनका दूसरा कल्याण ही करना चाहते हों ।। १६७।। किसी समय दशमी के दिन ये दोनों सिद्धकूटके चैत्यालयमें अभिषेक पूजन आदि कर रहे थे उसी समय हिरण्य- वर्माने परमावधि ज्ञानको धारण करनेवाले चारणमुनि देखे, प्रभावतीने उनसे अपने पूर्वभवका वृत्तान्त पूछा, मुनिराज भी अनुग्रह बुद्धिसे उन दोनोंके पूर्वभवका वृत्तान्त इस प्रकार कहने लगे ।।१६८-१६९॥ कि तुम दोनों इस जन्मसे तीसरे जन्ममें मृणालवती नगरीके वैश्य कुलमें रतिवेगा तथा सुकान्त हुए थे ।। १७०॥
श्लोक 171 से 181 वायुरथ का वैराग्य
स्त्री पुरुषका सम्बन्ध पाकर तुम दोनों शत्रुके भयसे भागकर शक्तिषेणकी शरण गये थे। वहां शक्तिषेणने मुनिराजके लिये जो आहार दान दिया था उसकी अनुमोदना कर तुम दोनोंने पुण्यबंध किया था, उसके बाद कबूतर-कबूतरी के भवमें धर्म लाभकर यहां विद्याधर-विद्याधरी हुए हो । तुम दोनोंके वैश्य जन्मके जो माता पिता थे वे ही इस जन्मके भी तुम्हारे माता पिता हुए हैं। तीसरे जन्मके तुम्हारे माता पिता तथा मैंने मिलकर एक साथ रतिषेण गुरुके समीप प्रोषध व्रत लिया था, और उसका चिरकाल तक पालन करते हुए श्रीजिनेन्द्रदेवके मन्दिरमें भक्तिपूर्वक अनेक उपकरणोंसे सदा पूजा की थी उसीके फलस्वरूप हम लोग यहां विद्याधर हुए हैं। मैं पूर्वभवमें रतिवर्म नामका भवदेवका पिता था, अब श्रीधर्म नामका विद्याधर हुआ हूँ, मैंने शुद्ध हृदयमेंसे संयम धारणकर चारण-ऋद्धि और तीसरा अवधि ज्ञान प्राप्त किया है इस प्रकार मुनिराजके बचन सुनकर हिरण्य-वर्मा और प्रभावती दोनों ही बहुत प्रसन्न हुए ॥ १७१-१७६।।
इस तरह इन सबका समय सुखसे व्यतीत हो रहा था कि किसी एक समय प्रभावती के पिता वायुरथ विद्याधरने प्रत्येक क्षण नष्ट होनेवाला मेघ देखकर ऐसा विचार किया कि यह समस्त संसार इसी प्रकार नष्ट हो जानेवाला हे, फिर भी लोग इसे स्थिर रहनेवाला समझत हैं, यह अज्ञानरूपी घोर अंधकार सब जगह क्यों छाया हुआ है ? इस प्रकार यथार्थ स्वरूपका विचारकर विरक्त हो मनोरथ नामक पुत्रके लिये राज्य दे दिया और स्वयं निर्ग्रन्थ अवस्था धारण करनेकी इच्छा करने लगे ।। १७७-१७९।। उसी समय वायुरथके सभी भाई-बन्धुओंने बड़े प्रेमसे आदित्यगतिके समीप जाकर प्रार्थना की ‘कि यह प्रभावतीकी पुत्री रतिप्रभा कन्या आप मेरे मनोरथके पुत्र चित्ररथके लिये दे दीजिये ।’ आदित्यगतिने भी स्वीकार कर समागत बन्धुओंको बिदा किया ॥ १८०-१८१।।
श्लोक 182 से 194 हिरण्यवर्मा का वैराग्य और दीक्षा
महाराज आदित्यगति सब विद्याधरोंके राज्यपर हिरण्यवर्माका अभिषेक कर अनेक लोगोंके साथ किन्हीं मुनिराजके समीप पहुंचे, और वायुरथ के साथ साथ स्वयं भी संयम धारण कर विधिपूर्वक शास्त्रोंमें कहे हुए बारह प्रकारके तपश्चरण करने लगे ।।१८२-१८३।। यह सब कहकर सुलोचनाने सब सभासदोंसे कहा कि वह रतिवेगा भी मैं ही हूँ, रतिषेणा (कबूतरी) भी मैं ही हूँ और प्रभावती भी मैं ही हूँ ॥ १८४।। यह सुनकर जयकुमारने भी सबको आश्चर्य करनेवाले वचन कहे कि उन तीनों भवोंमें अनुक्रमसे मैं ही उन रतिवेगा आदिका पति हुआ हूँ ॥ १८५।। जयकुमार फिर अपनी प्रिया-सुलोचनासे कहने लगा कि हे प्रिये, कुछ बात बाकी और रह गई है उसे भी तू अच्छी तरह कह दे ।।१८६।। जिस प्रकार चन्द्रमाकी मूर्ति कुमुदिनीको विकसित कर देती है उसी प्रकार वह सुलोचना भी अपने पतिके पूर्वोक्त प्रश्नसे दांतोंकी कान्तिके द्वारा सभाको विकसित हर्षित करती हुई अपने पुण्यके फलसे होनेवाले समाचारोंको इस प्रकार कहने लगी कि वह हिरण्यवर्मा राज्यसे उत्पन्न हुए सुखका इच्छानुसार उपभोग करने लगा । किसी एक दिन अपनी वल्लभाके साथ विहार करता हुआ वह आदित्यगतिका पुत्र हिरण्यवर्मा धान्यकमाल नामके वनमें जा पहुंचा । वहां सर्पसरोवर देखकर उसे अपने पूर्वभवके सब सम्बन्ध प्रत्यक्षकी तरह दिखने लगे, काल-लब्धिके निमित्तसे जिसे वैराग्य उत्पन्न हुआ है और जो विद्वानों में श्रेष्ठ है ऐसा वह हिरण्यवर्मा सोचने लगा कि प्राणियोंकी इच्छाका विषयभूत यह सभी समागम क्षणभंगुर है, इस समागममें थोडेसे संकलसे उत्पन्न हुआ यह सुख क्या वस्तु है ? यह आयु वायुके समान चंचल है। अनेक रोगोंका घर स्वरूप यह शरीर छोड़ने योग्य ही है। अनेक दोषोंको देनेवाले राज्यको चंचल और मूर्ख लोग ही भोगते हैं, इस शरीरका अन्त निकट है, यह असार है, और पापका आश्रय है, इसी शरीरके साथ इस आत्माका तादात्म्य हो रहा है, इसलिये अपवित्र पदार्थोंसे प्रेम करने-वाले इस प्राणीको धिक्कार हो, इस प्राणीको शरीरमें निवास करनेसे तो भय मालूम नहीं होता परन्तु उससे निकलनेमें बड़ा भय मालूम होता है, निश्चयसे इस संसारमें मोक्षमार्गसे विपरीत प्रवृति ही होती हे ॥१८७-१९४।।
श्लोक 195 से 211 हिरण्यवर्मा का वैराग्य-विचार
यह जीव स्व स्वरूपकी अपेक्षा रूपरहित है परन्तु शरीरके सम्बन्धसे रूपी हो रहा है, रूपरहित होना ही मोक्षकी प्राप्ति है इसलिये जिस प्रकार बने उसी प्रकार शरीरको अवश्य ही छोड़ना चाहिये ॥ १९५॥ सब प्रकार सम्बन्ध ही बन्ध है, भोग ही रोग हे, शरीर ही शत्रु है, लम्बी आयु ही तो दुःख देती है और धन ही तृष्णारूपी अग्निका ईंधन है ।।१९६।। इस जीवको पहले तो जन्म धारण करना पड़ता है, मध्यमें बुढ़ापा तथा अनेक रोग हैं और अन्तमें दुष्ट मरण है, इस प्रकार संसाररूप समुद्रके मध्यमें इस जीवको चक्रकी तरह भ्रमण करना पड़ता है ।। १९७॥ भोग करनेवाले लोगोंको ये भोग सर्पके फणों-के समान हैं इसलिये भोग करने योग्य नहीं है इस प्रकार भोगोंका बार बार विचार करनेवाले पुरुषके लिये ये भोग बड़े भयंकर जान पड़ने लगते है ।॥१९८॥ ये सेवन किये हुए विषय विषके समान हैं, जिस प्रकार उत्तेजक औषधियोंसे पेटकी आग भभक उठती है उसी प्रकार भोगकी इच्छाओंसे ये विषय भभक उठते हैं ।॥ १९९॥ इन विषयोंसे तृप्ति नहीं होती केवल इतना ही दोष नहीं है किन्तु तृष्णाको पुष्ट करनेवाले भी हैं और संसाररूपी विषकी बेलको सहारा देने-वाले भी हैं ।॥ २००॥ स्त्रियोंके शरीरसे उत्पन्न हुई यह कामरूपी अग्नि स्नेहरूपी तेलसे प्रज्वलित होकर कामी पुरुषोंको भस्म किये बिना नहीं लौटती है ॥२०१॥ भोग करनेके बाद इन समस्त भोगों में जीत्रोंको बेराग्य अवश्य होता है, बुद्धिमान् लोगोंको जो तपश्चरण आदि क्रिया करनी पड़ती है वे सब इस वैराग्यको स्थिर रखनेका उपाय ही है ॥ २०२॥ यद्यपि यह जीव भोगोंसे अनेक बार दुःखको प्राप्त है तथापि ये जीव उन्हीं भोगोंको चाहते हैं सो ठीक ही है क्योंकि माता बालकको जिस पैरसे ताड़ती हैं बालक उसी उसी प्रकार माताके चरणको पकड़ते हैं ॥२०३॥ भोग, आयु, काल और सम्पदाओंमें जो अस्थिरपना है उसे मैं एक प्रकारका गुण ही मानता हूं क्योंकि यदि ये सब स्थिर हो गये तो मुक्ति कैसे प्राप्त होगी ? और मुक्तिके बिना सुख कैसे प्राप्त हो सकेगा ? ॥ २०४॥ पहले तो विश्वास उत्पन्न करनेवाले और पीछे प्राण तथा धनको अपहरण करनेवाले शत्रु तुल्य इन विषयोंसे किसे भला आपदाएं प्राप्त नहीं होती हैं ? ॥२०५॥ इन विषयोंसे जो सुख होता है वह दुःखका ही माहात्म्य है क्योंकि जो करेला मीठा लगता है वह भूखका ही प्रभाव है ।। २०६।। यह जीव कल्पित सुखोंसे संतुष्ट होकर आत्मासे उत्पन्न होनेवाले वास्तविक सुखसे विमुख हो रहा है इसलिये यह जीव गुमचियों के तापनेसे संतुष्ट होनेवाले बानरके समान है । भावार्थ-जिस प्रकार गुमचियोंके तापनेसे बन्दरकी ठंड नहीं दूर होती है उसी प्रकार इन कल्पित विषयजन्य सुखोंसे प्राणियोंकी दुःख-रूप परिर्णात दूर नहीं होती है ? ॥२०७॥ इस जीवके निर्जरा तो सदा होती रहती है परन्तु बन्धका अभाव हुए बिना वह मोक्षका कारण नहीं हो पाती है, बन्धका अभाव बन्धके कारणों-का नाश होनेसे हो सकता है इसलिये मैं बन्धके कारणोंका नाश करनेमें ही प्रयत्नशील हूँ।।२०८* इस संसाररूरी समुद्रमें जिन्हें परिग्रहके ग्रहण करने रूप पिशाच लग रहा है उन्हें भला मोक्ष किस प्रकार मिल सकता हे ? उनका जीवन किस प्रकार रह सकता है ? उन्हें सुख कहांसे मिल सकता हे और उन्हें बुद्धि ही कहां उत्पन्न हो सकती है ? ॥ २०९ ॥ लक्ष्मी के कटाक्ष-रूपी वाणोंसे सुलाये हुए (नष्ट हुए) पुरुषमें अनित्यताको जानकर भी विद्वान् लोग ‘यह भव्य है ? अथवा अभव्य है ?’ इस प्रकार व्यर्थ संशय करने लगते हैं ।॥ २१०।। स्त्रीरूपी लताओं के समूहसे घिरा हुआ यह शरीररूपी वृक्ष संसाररूपी अटवीमें जीर्ण होकर कालरूपी अग्निका ग्रास हो जायगा ।।२११॥
श्लोक 212 से 221 हिरण्यवर्मा का तप और पुण्डरीकिणी आगमन
जब कि निदानरूपी विषसे दूषित धर्मके एक अंशसे मुझे ऐसा सुख मिला है तब धर्मरूनी अमृतके समुद्र में अवगाहन करनेसे जो सुख प्राप्त होगा उसका तो कहना ही क्या है ? ॥२१२।। यह संसार अज्ञान, द्वेष और राग स्वरूप है तथा मोक्ष इससे विपरीत है अथर्थात् सम्यग्ज्ञान और समता स्वरूप है। यदि विद्वान् लोग ऐसा देखते रहें तो फिर मोक्ष होने में देर ही क्या लगे ? ॥ २१३।। जिस प्रकार वेगसे जाते हुए पुरुषके हाथसे बीच समुद्र में छूटा हुआ रत्न फिर नहीं मिल सकता है उसी प्रकार देश काल आदिकी सामग्री मिलनेपर भी यदि तप नहीं किया तो वह तप फिर कैसे मिल सकता है ? ॥ २१४।॥ इसलिये हे आत्मन्, तू आत्माका हित करनेवाले मोक्षमार्गमें दुरात्मता छोड़कर अपने आत्माके द्वारा अपने ही आत्मामें परमात्मा रूप अपने आत्माको ही स्वीकार कर ॥ २१५॥ इस प्रकार चिन्तवन करते हुए परम तत्त्वके जाननेवाले राजा हिरण्यवर्माने अपने नगरमें जाकर अपने पुत्र सुवर्णवर्मा के लिए अभिषेकपूर्वक राज्य सौंपा और फिर विजयार्द्ध पर्वतसे पृथ्वीपर उतरकर लक्ष्मीके गृहस्वरूप श्रीपुर नामके नगर में श्रीपाल गुरुके समीप जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली ॥२१६-२१७।। परिग्रहरूपी पिशाचसे मुक्त हो दीक्षा धारण कर सूर्यके समान निर्मल हुआ वह राजा हिरण्यवर्मा तपश्चरणरूपी किरणोंसे बहुत ही देदीप्यमान हो रहा था ॥२१८।। प्रभावतीने भी हिरण्यवर्माकी माता-शशिप्रभाके साथ गुणवती आयिकाके समीक तप धारण किया था सो ठीक ही हे क्योंकि चन्द्रमाको छोड़कर चाँदनीकी पृथक् स्थिति भला कहाँ हो सकती है ? ॥२१९॥ वे हिरण्यवर्मा मुनिराज ठीक सूर्यके समान जान पड़ते थे क्योंकि जिस प्रकार सूर्य सद्वृत्त अर्थात् गोल है उसी प्रकार वे मुनिराज भी सद्वृत्त अर्थात् निर्दोष चारित्रको धारण करनेवाले थे । जिस प्रकार सूर्य तप अर्थात् गर्मीसे देदीप्यमान रहता है उसी प्रकार मुनिराज भी तप अर्थात् अनशनादि तपश्चरणसे देदीप्यमान रहते थे, जिस प्रकार सूर्य दिगम्बर अर्थात् दिशा और आकाशका आभूषण है उसी प्रकार मुनिराज भी दिगम्बर अर्थात् दिशारूप वस्त्र-को धारण करनेवाले निर्ग्रन्थ मुनियोंके आभूषण थे, जिस प्रकार सूर्य निःसंग अर्थात् सहायता-रहित अकेला होता है उसी प्रकार मुनिराज भी निःसङ्ग अर्थात् परिग्रहरहित थे, जिस प्रकार सूर्य आकाशमें गमन करता है उसी प्रकार चारणऋद्धि होनेसे मुनिराज भी आकाशमें गमन करते थे, जिस प्रकार सूर्य अकेला ही घूमता है उसी प्रकार मुनिराज भी अकेले ही घूमते थे-एकविहारी थे, जिस प्रकार सूर्यको सब वन्दना करते हैं उसी प्रकार मुनिराजको भी सब वन्दना करते थे, जिस प्रकार सूर्यका नित्य उदय होता है उसी प्रकार मुनिराजके भी ज्ञान आदिका नित्य उदय होता रहता था, जिस प्रकार सूर्य बुध अर्थात् बुधग्रहका स्वामी होता है उसी प्रकार मुनिराज भी बुध-अर्थात् विद्वानोंके स्वामी थे, जिस प्रकार सूर्य विश्वदृश्वा अर्थात् सब पदार्थों को प्रकाशित करनेवाला है उसी प्रकार मुनिराज भी विश्वदृश्वा अर्थात् सब पदार्थोंको जानने वाले थे, जिस प्रकार सूर्य विरोचन अर्थात् अत्यन्त देदीप्यमान रहता है अथवा विरोचन नामको धारण करनेवाला है उसी प्रकार मुनिराज भी विरोचन अर्थात् अत्यन्त देदीप्यमान थे अथवा रुचिरहित उदासीन थे और जिस प्रकार सूर्य पुण्डरीकिणी अर्थात् कमलिनीको प्रफुल्लित करता है उसी प्रकार मुनिराज भी पुण्डरीकिणी अर्थात् विदेह क्षेत्रकी एक विशेष नगरीको आनन्दित करते थे इस प्रकार सूर्यकी समानता रखनेवाले मुनिराज हिरण्यवर्मा किसी समय पुण्डरीकिणी नगरी में पधारे ॥२२०-२२१।।
श्लोक 222 से 232 गांधारी की माया और सेठ का संयम
प्रभासहित चन्द्रमाकी कलाके समान आर्थिका-प्रभावती भी वहाँ आई और गुणवती-गणिनी के साथ मिलकर रहने लगी सो ठीक ही है क्योंकि समागम अपनी इच्छानुसार ही होता है ।॥ २२२॥ गुणवती-गणिनीको देखकर प्रियदत्ताने नमस्कार कर पूछा कि संघाधिकारिणी अमितमति कहां हैं ? तब उसने कहा कि ‘वह तो स्वर्ग चली गई है’ यह सुनकर प्रभावती कुछ शोक करने लगी और कहने लगी कि ‘हम दोनोंकी आंखें वहीं थी,’ तब प्रियदत्ताने पूछा कि उनके साथ तुम्हारा प्रेम कैसे हुआ ? उत्तरमें प्रभावती कहने लगी कि आपको क्या स्मरण नहीं है आपके घरमें जो कबूतर-कबूतरीका जोड़ा रहता था उनमेंसे मैं रतिषेणा नामकी कबूतरी हूँ, यह सुनकर प्रियदत्ता आश्चर्यसे चकित होकर कहने लगी कि ‘वह रतिवर कबूतर आज कहाँ है तब प्रभावतीने कहा कि वह भी विद्याधरोंका राजा हिरण्यवर्मा हुआ है और कर्मरूपी शत्रुओंको नाश करनेवाला वह आज इसी पुण्डरीकिणी नगरी में विराजमान है। प्रियदत्ताने भी जाकर महामुनि-हिरण्यवर्माकी वन्दना की और फिर प्रभावती के पूछनेपर अपने पतिका वृत्तान्त इस प्रकार कहने लगी ॥ २२३-२२७।।
एक रतिषेण नामका विद्याधर अपनी स्त्री गांधारीके साथ साथ इसी विजयार्ध पर्वतके गांधार नगरसे विहार करनेके लिये यहां आया था ॥ २२८॥ मुझे सर्पने काट खाया है इस प्रकार झूठ झूठ बहानाकर गांधारी यहां पड़ रही, सेठ कुबेरकान्त और विद्याधरने बहुत सी औषधियोंका प्रयोग किया परन्तु गांधारीने मायाचारीसे कह दिया कि ‘अभी मुझे शान्ति नहीं हुई है, यह सुनकर उसके पति रतिषेणको बहुत दुःख हुआ। वह अधिक शक्तिवाली औषधि लानेके लिये वनमें चला गया, इधर उसके चले जानेपर गांधारीने कुलटापन धारण कर कामकी चेष्टाएं दिखाई, यह देखकर उपायको जाननेवाले और अपने व्रतमें दृढ रहनेवाले सेठ कुबेरकान्तने कहा कि अरे, मैं तो नपुंसक हूं-क्या तुझे मालूम नहीं ? ऐसा कहकर सेठने उसे अपनेसे विरक्तचित्त कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिका फल यही है ॥२२९-२३२।।
श्लोक 233 से 241 लोकपाल और सेठ की दीक्षा
इतनेमें ही उसका पति वापिस आ गया, तब गांधारीने कह दिया कि मैं पहले दी हुई औषधिके प्रयोगसे ही स्वस्थ हो गई हूँ ऐसा कहकर वह पतिके साथ नगरमें चली गई ।।२३३॥ कुबेरदयित, कुबेरमित्र, कुबेरदत्त, कुबेरदेव और कुबेरप्रिय ये पांच मेरे पुत्र थे। ये पांचों ही समस्त शास्त्रोंको जाननेवाले, कला कौशलमें निपुण तथा नव यौवनसे सुशोभित थे । किसी एक दिन जब कि कुबेरश्री कन्या मेरे गर्भमें थी तब मैं अपने पूर्वोक्त पुत्रोंके साथ पालकीमें बैठ-कर वनमें विहार करनेके लिये गई थी उसी समय गांधारीने मुझे देखकर और अलग ले जाकर मुझसे पूछा कि ‘आपके सेठ पुरुष नहीं हैं’ क्या यह बात सच है अथवा झूठ ? तब मैंने उत्तर दिया कि बिलकुल सच है क्योंकि वे मेरे सिवाय अन्य स्त्रियोंके प्रति पुरुष नहीं हैं यह सुनकर उसने विरक्त हो अपने पतिके साथ साथ संयम धारण कर लिया ॥ २३४-२३८॥ किसी एक दिन वह गांधारी आर्थिका यहां फिर आई तब मैंने दर्शन और प्रणाम कर प्रिय वचनों द्वारा पूछा कि ‘आपने यह दीक्षा किस कारणसे ली है ?’ उसने उत्तर दिया था कि ‘मेरे तपश्चरण-का कारण तेरा सेठ ही है, सेठ भी गुप्तरूपसे यह बात सुनकर सामने आकर खड़े हो गये और पूछने लगे कि जिसने मुझे जीत लिया है ऐसा मेरा मित्र आज कहाँ है ? तब गान्धारी आयिकाने कहा कि ‘वे भी मेरे ही कारण तप धारण कर यहाँ पधारे हैं, ॥२३९-२४१॥
श्लोक 242 से 255 मुनिराज का उपसर्ग और स्वर्ग प्राप्ति
यह सुनकर सेठ और राजा दोनों ही उन मुनिराजके समीप गये और दोनोंने ही वन्दना कर धर्मका स्वरूप पूछा । काललब्धिका निमित्त पाकर राजा लोकपालने अपने पुत्र गुणपालके लिये राज्य दिया और उन्हीं विद्याधर मुनि रतिषेणके निकट संयम धारण कर लिया ।।२४२-२४३॥ मोक्षके अभिलाषी सेठने भी अपने पांचवें पुत्र-कुबेरप्रियको अपने पदपर नियुक्त कर अन्य सब पुत्रोंके साथ साथ वहीं दीक्षा धारण की ॥२४४।। इस प्रकार प्रियदत्ता अपने पतिका वृत्तान्त कहकर उत्पन्न हुए आत्मज्ञानके द्वारा गृहवाससे विरक्त हो गई थी, उस सतीने अपनी कुबेरश्री पुत्री राजा गुणपालको दी और स्वयं गुणवती आर्थिकाके समीप जाकर प्रभावतीके उपदेशसे दीक्षा धारण कर ली ॥ २४५-२४६॥ किसी समय मुनिराज हिरण्यवर्माने सात दिनका नियम लेकर श्मशानभूमिमें प्रतिमा योग धारण किया, नगरके सब लोग उनकी वन्दना करनेके लिये गये थे। वन्दना कर उनके पूर्वभवकी कथाएं कहते हुए जब सब लोग नगरको वापिस लौट आये तब एक विद्युच्चोरने भी प्रियदत्ताकी चेटीसे उन मुनिराजका वृत्तान्त सुना, सुनकर उसे उनके प्रति कुछ क्रोध उत्पन्न हुआ और उसी क्रोध के कारण उसे विभंगावधि भी प्रकट हो गया, उस विभंगावधिसे उसने मुनिराजके पूर्वभवके सब समाचार जान लिये । यद्यपि मुनिराज प्रतिमायोग धारण कर अलग ही विराजमान थे और प्रभावती भी अलग विद्यमान थी तो भी उस दुष्टने पापसंचय करनेकी इच्छासे उन दोनोंको मिलाकर और एक ही चितापर रखकर जला दिया वे दोनों विशुद्ध परिणामोंसे उपसर्ग सहनकर स्वर्गमें उत्पन्न हुए सो ठीक ही है क्योंकि क्षमासे क्या क्या नहीं होता ? जब सुवर्ण-वर्माको इस बातका पता चला तब उसने प्रतिज्ञा की कि मैं विद्युच्चोरका निग्रह अवश्य ही करूँगा-उसे अवश्य ही मारूँगा। यह प्रतिज्ञा स्वर्गमें रहनेवाले हिरण्यवर्मा और प्रभावती के जीव देव-देवियोंने अवधिज्ञानसे जान ली, वे शीघ्र ही संयमीका रूप बनाकर पुत्रके पास पहुँचे, दयाधारण करनेवाले उन देवदेवियोंने धर्मकथाओं आदिके द्वारा तत्त्वश्रद्धान कराकर उसका क्रोध दूर किया और अन्तमें अपना दिव्यरूप प्रकटकर अपना सब हाल कहा तथा उसे बहुमूल्य आभूषण देकर दोनों ही अपने स्थानपर चले गये ॥ २४७-२५५॥
श्लोक 256 से 271 केवलज्ञान और पूर्वभव कथा
किसी एक दिन वत्स देशमें सुसीमानगरीके समीप घातिया कर्म नष्ट करनेवाले शिवघोष मुनिराजको केवलज्ञान उत्पन्न हुआ ॥२५६।। उस उत्सवमें शची और मेनका नामकी देवांगनाएं भी इन्द्रके साथ आईं और श्रीजिनेन्द्रदेवको नमस्कारकर इन्द्रके पास ही बैठ गई । इन्द्रने भगवान्से पूछा कि ये दोनों किस कारणसे देवियां हुई हैं ? तब तीर्थ कर देव कहने लगे कि दोनों ही पूर्वभवमें मालिनकी लड़कियां थीं, पहलीका नाम पुष्पपालिता था और दूसरीका पुष्पवती । इन दोनोंने आजसे सातवें दिन पहले श्रावकव्रत लिये थे । एक दिन ये वनमें फूल तोड़नेमें लगी हुई थीं कि सर्परूपी अग्निके कारण मर गई और मरकर देवियां हुई हैं ।॥ २५७-२५९॥ हिरण्यवर्मा और प्रभावती-के जीव जो देवदेवी हुए थे उन्होंने भी उस समय समवसरणमें अपने पूर्वभवके सम्बन्ध सुने और फिर दोनों ही सभाभूमिसे निकलकर इच्छानुसार पूर्वभव सम्बन्धी सुखानुभवनके स्थानोंको देखते हुए सर्पसरोवरके समीपवाले वनमें पहुंचे ॥ २६०-२६१॥ उस वनमें अपने संघके साथ साथ एक भीम नामके मुनि भी आये हुए थे, दोनोंने उन्हें देखकर विनयपूर्वक नमस्कार किया और धर्मका स्वरूप पूछा ।। २६२।। उनके वचन सुनकर मुनि कहने लगे कि अभी नवदीक्षित हूँ, धर्मका उपदेश देना तो समस्त शास्त्रोंका अर्थ जाननेवाले मुनियोंका कार्य है इसलिये यद्यपि मैं धर्मोपदेश देनेमें समर्थ नहीं हूं तथापि तुम्हारे अनुरोधसे शक्तिके अनुसार कुछ कहता हूँ तुम लोगोंको सावधान होकर सुनना चाहिये ॥ २६३-२६४॥ यह कहकर उन्होंने सम्यग्दर्शन तथा सत्पात्रदान आदि श्रावक सम्बन्धी और यम आदि मुनि सम्बन्धी धर्मका निरूपण किया । चारों गतियां, उनके कारण और फल, स्वर्ग मोक्षके निदान एवं जीवादि द्रव्य और तत्त्व इनसबका भी यथार्थ प्रतिपादन किया ॥ २६५-२६६॥ वह सुनकर उन देव-देवियोंने फिर पूछा कि आपने किस कारणसे दीक्षा धारण की हैं इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिराज कहने लगे ।।२६७।।
विदेहक्षेत्रके पुष्कलावती देशमें एक पुण्डरीकिणी नगरी है वहांपर मैं अपने पापोंके कारण एक अत्यन्त दरिद्र कुलमें उत्पन्न हुआ था। मेरा नाम भीम है ॥ २६८।। किसी अन्य दिन थोड़ी सी काललब्धि आदिके निमित्तसे मैं एक मुनिराजके पास पहुंचा और उनसे धर्मश्रवण कर मैंने गृहस्थोंके आठ मूल गुण धारण किये ॥ २६९।। जब हमारे पिताको इस बातका पता चला तब वे कहने लगे कि “दरिद्रतारूपी कीचड़से जिनका समस्त शरीर लिप्त हो रहा है ऐसे हम लोगोंको इन व्यर्थके कठिन व्रतोंसे क्या प्रयोजन है। इनका फल इस लोकमें तो मिलता नहीं है, इसलिये आओ, ये व्रत स्वर्गलोककी इच्छा करनेवाले उसी मुनिके लिये दे आवें। हम तो इस लोकसम्बन्धी फल चाहते हैं जिससे कि जीविका चल सके ॥ २७०-२७१।।
श्लोक 272 से 286 भीम मुनि का पूर्वजन्म और दीक्षा
व्रत देने-वाले गुरुका स्थान मुझे दिखा” ऐसा मेरे पिताने मुझसे कहा तब मैं उन्हें साथ लेकर चला । रास्तेमें मैंने देखा कि वज्रकेतु नामके एक पुरुषको दण्ड दिया जा रहा है। पितासे मैंने उसका कारण पूछा, तब कहने लगे कि यह सूर्यकी किरणोंमें अपना अनाज सुखा रहा था और किसी मन्दिरका मुर्गा उसे खा रहा था। इसने उसे इतना मारा कि बेचारा मर गया। इसलिये ही लोग इसे दण्ड दे रहे हैं। आगे चलकर देखा कि जिनदेवके द्वारा रखी हुई धरोहरको लोभसे छुपाने वाले दुर्बुद्धि धनदेवकी जीभ उखाड़ी जा रही है। कुछ आगे चलकर देखा कि एक सेठके घरसे बहुमूल्य मणियोंका हार चुराकर वेश्याको देनेके अपराधमें रतिपिङ्गलको कोतवाल शूलीपर चढ़ा रहा है, किसी जगह देखा कि कामवासनासे जिसका सब ज्ञान नष्ट हो गया है ऐसा एक कोतवाल रातमें अपनी माताकी छोटी बहिनकी पुत्रीके घर गया था इसलिये राज्यकर्मचारी उसका अंग काट रहे हैं। दूसरी जगह देखा कि सार्थक नाम धारण करनेवाले एक लोल नामके किसानने खेतके लोभ-से अपने बड़े लड़केको डण्डोंसे मार मारकर मार डाला है, इसलिये उसे देशनिकालेकी सजादी जा रही है और वह विलाप कर रहा है। आगे जानेपर देखा कि सागरदत्तने जुआमें समुद्रदत्तका बहुत सा धन जीत लिया था परन्तु समुद्रदत्त देनेमें असमर्थ था इसलिये उसने क्रोधसे उसे बहुत देर तक दुर्गन्धित धुआंके बीच धूपमें बैठाल रखा है, किसी जगह देखा कि आनन्द महाराजके अभय घोषणा कराये जानेपर भी उनके पुत्र अंगकने राजाका मेढ़ा मारकर खा लिया है इसलिये उसके हाथ काटकर उसे विष्ठा खिलाया जा रहा है और अन्य स्थानपर देखा कि मद्य पीनेवाली स्त्रीने मद्य खरीदनेके लिये आभूषण लेनेकी इच्छासे किसी बालकको मारकर जमीनमें गाड़ दिया था, वह यह समाचार अपने पुत्रसे कह रही थी कि किसी राज कर्मचारीने उसे सुन लिया इसलिये उसे दण्ड दिया जा रहा है। हिंसा आदि दोषोंसे उत्पन्न हुए इन पापकार्योंको देखकर मैंने निश्चय किया कि पापका फल इस लोक तथा परलोक दोनों ही जगह बुरा होता है। मैंने संसारके भयसे व्रत छोड़ना उचित नहीं समझा। मैं सोचने लगा कि हिंसा, झूठ, चोरी, परस्त्रीसेवन आदिसे दूषित हुए पुरुषोंको इसी जन्ममें अनेक प्रकारके वध-बन्धनका दुःख भोगना पड़ता हो सो बात नहीं किन्तु परलोकमें भी वही दुःख भोगने पड़ते हैं, हमारी यह दरिद्रता भी तो पहले के पापकर्मोंसे मिली है, इसलिये सदाचारी पुरुषोंको इस पुण्यका अधिकसे अधिक संचय करना चाहिये यह सोचकर मैंने अपने पिताको छोड़कर मोक्षकी इच्छासे दीक्षा धारण कर ली है ।।२७२-२८६॥
श्लोक 287 से 296 : भीम मुनि का ज्ञान और विद्यद्वेग चोर की कथा
गुरुके प्रसादसे में शीघ्र ही सब शास्त्ररूपी समुद्रका पारगामी हो गया और मेरी बुद्धि भी विशुद्ध हो गई । किसी अन्य दिन मैंने सर्वज्ञ देवके समीप दोषोंसे भरे हुए अपने पूर्वजन्म सुने थे सो उसीके अनुसार आप लोगोंका बड़ा भारी कौतुक करनेके लिये उन्हें कहता हूं । २८७-२८८।
इसी पुष्कलावती देशकी पुण्डरीकिणी नगरीको राजा वसुपाल बड़े प्रेमसे पालन करते थे ।।२८९।। किसी एक दिन कोतवालने विद्यद्वेग नामका चोर पकड़ा, उसके हाथमें जो धन था उसे लेकर कहा कि बाकीका धन और दो, धन न देनेपर रक्षकोंने उसे दण्ड दिया तब उसनेकहा कि मैंने बाकीका धन विमतिके लिये दे दिया है। जब विमतिसे पूछा गया तब उसने कह दिया कि मैंने नहीं लिया है, इसके बाद कोतवालने वह धन किसी उपायसे विमतिके घर ही देख लिया, उसे दण्ड देना निश्चित हुआ, दण्ड देनेवालोंने कहा कि या तो मिट्टीकी तीन थाली भरकर विष्ठा खाओ, या मल्लोंके तीस मुक्कोंकी चोट सहो या अपना सब धन दो । जीवित रहनेकी इच्छासे उसने पूर्वोक्त तीनों दण्ड सहे और अन्तमें मरकर नरक गतिको प्राप्त हुआ । राजाने एक चाण्डालको आज्ञा दी कि तू विद्युच्चोरको मार डाल, परन्तु आज्ञा पाकर भी उसने कहा कि मैं इसे नहीं मार सकता क्योंकि मैंने एक मुनिसे हिंसादि छोड़नेकी प्रतिज्ञा ले रखी है ऐसा कहकर उसने जब राजाकी आज्ञा नहीं मानी तब राजाने कहा कि इसने कुछ घूस खा ली है इसलिये उसने क्रोधित होकर चोर और चाण्डाल दोनोंको निर्दयतापूर्वक सांकलसे बंधवा दिया ।।२८९-२९६॥
श्लोक 297 से 313 चाण्डाल की कथा और उत्पलमाला का शील व्रत
चोरने संतुष्ट होकर चाण्डालसे पूछा कि तूने किस कारणसे मुझे नहीं मारा तब चाण्डाल इस प्रकार कहने लगा कि ॥ २९७॥ पहले इस नगरकी रक्षा इसी राजाके पिता गुणपाल करते थे और उनके पास कुबेरप्रिय नामका एक बड़ा सेठ रहता था ।।२९८।। इसी नगरीमें नाट्यमालिका नामकी नाटकाचार्यकी एक पुत्री थी एक दिन उसने राजसभामें रति आदि स्थायी भावों द्वारा शृङ्गारादि रस प्रकट करते हुए नृत्य किया ॥२९९।। वह नृत्य देखकर राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ तब उत्पलमाला नामकी वेश्या बोली कि हे देव, इसमें क्या आश्चर्य है ? एक दिन अत्यन्त शान्त और पूज्य कुबेरप्रिय सेठने उपवासके दिन प्रतिमा योग धारण किया था, उस दिन मैं उनका मन विचलित करनेके लिये गई थी परन्तु उसमें समर्थ नहीं हो सकी। इस संसारमें यही बड़े आश्चर्यकी बात है। यह सुनकर राजाने कहा कि “हे गुणप्रिये ! तुझे गुण बहुत प्यारे लगते हैं इसलिये जो इच्छा हो सो मांग।”
तब उसने कहा कि मुझे शीलव्रतकी रक्षा करना इष्ट है यही वर दीजिए राजाने वह वर उसेदिया और उस दिनसे उसने शील व्रत ग्रहण कर लिया। किसी दूसरे दिन सर्वरक्षित नामका कोतवाल रातके समय उसके घर गया, उसे देखकर उत्पलमालाने उससे कहा कि आज में बाहिर की हूं-रजस्वला हूं। इधर इन दोनोंकी यह बात चल रही थी कि इतनेमें ही मंत्रीका पुत्र और पृथुधी नामका राजाका साला आया, उसे देखकर उत्पलमालाने सर्वरक्षितको एक संदूकमें छिपा दिया और राजाके सालेसे कहा कि आपने जो मेरे आभूषण अपनी बहिन सत्यवती के लिये दिये थे वे लाइये। उसने पहले तो कह दिया कि हां अभी लाता हूं परन्तु बादमें जब उसने सुना कि उसने शील व्रत ले लिया है तब वह ईर्ष्या करता हुआ प्रतिकूल हो गया । दूसरे दिन वह वेश्या सन्दूकमें बैठे हुए कोतवालको गवाह बनाकर राजाके पास गई और वहां जाकर पृथुधीसे अपना धन मांगने लगी ॥ ३००-३०८।। पृथुधीने राजाके सामने भी झूठ कह दिया कि मैंने इसका धन नहीं लिया है। जब राजाने सत्यवतीसे पूछा तो उसने सब धन लाकर राजाके सामने रख दिया ॥३०९॥ यह देखकर राजा अपने सालेपर बहुत क्रोधित हुआ, उसने अपने नौकरोंको आज्ञा दी कि यह दुष्ट शीघ्र ही मार डाला जाय। सो ठीक ही है क्योंकि न्याय-मार्गमें चलनेवालेको यह उचित ही है ॥ ३१०॥ किसी एक दिन पाठ करते हुए मुनिराजसे धर्मशास्त्र सुनकर राजाके मुख्य हाथीको अपने पूर्व भवका स्मरण हो आया, वह अत्यन्त शान्त हो गया और उसने मांसका पिण्ड लेना भी छोड़ दिया, यह देख उपायोंके जानने-वाले सेठने हाथीकी सब चेष्टाएं समझकर घी, गुड़ और दूध मिला हुआ शालि चावलोंका भात उसे खानेके लिये दिया और हाथीने भी वह शुद्ध भोजन खा लिया ॥३११-३१३।।
श्लोक 314 से 322 सेठ का प्रतिमायोग और उपद्रव
उस समय संतुष्ट होकर राजाने कहा कि जो तुम्हें इष्ट हो सो मांगो । सेठने कहा-अच्छा यह वर अभी अपने पास रखिये, पीछे कभी ले लूंगा, ऐसा कहकर वह सेठ सुखसे रहने लगा ॥३१४।॥ इसी समय मंत्रीका पुत्र मारनेके लिये ले जाया जा रहा था उसे देखकर सेठको बहुत शोक हुआ और उसने राजासे अपना पहिलेका रक्खा हुआ वर मांगकर उस दुराचारी मंत्रीके पुत्रको छुड़वा दिया ॥३१५॥ परन्तु मंत्रीके पुत्रने समझा कि मेरा यह तिरस्कार सेठने ही कराया है, सो ठीक ही है क्योंकि पापी पुरुषोंका उपकार करना भी सांपको दूध पिलानेके समान है ॥३१६॥ किसी अन्य दिन वह राजाका साला अपनी इच्छासे वनमें घूम रहा था, उसे वहां एक विद्याधरसे इच्छानुसार रूप बना देनेवाली अंगूठी मिली ॥३१७॥ उसने वह अंगूठी अपने छोटे भाई वसुके हाथकी अंगुलीमें पहना दी एवं उसका सेठका रूप बनाकर उसे सत्यवतीके घर भेज दिया । और पाप बुद्धिको धारण करनेवाला पृथुधी स्वयं राजाके पास जाकर बैठ गया । सेठका रूप धारण करनेवाले वसुको देखकर राजाने कहा कि ‘यह सेठ असमयमें यहां क्यों आया है ?’ उसी समय पृथुधीने कहा कि ‘अपने आपको नहीं जाननेवाला यह पापी काम-रूपी अग्निसे संतप्त होकर सत्यवतीके पास आया है’ इस प्रकार उसके कहनेसे राजाने परीक्षा किये बिना ही उसी पृथुधीको आज्ञा दी कि तुम सेठको मार दो। सेठ उस दिन अपने घरपर ही प्रतिमायोग धारण कर वस्तुस्वरूपका चिन्तवन कर रहा था ॥ ३१८-३२२॥
श्लोक 323 से 331 सेठ पर तलवार और चमत्कार
पृथुधीने उसे वहीं कसकर बांध लिया और जो अपराध उसने किया नहीं था लोगोंमें उसकी घोषणा करता हुआ उसे श्मशानकी ओर ले गया ॥ ३२३॥ वहां जाकर उस पापीने उसे मारनेके लिये चाण्डालके हाथमें सौंप दिया। चाण्डालने भी यह राजाकी आज्ञा है ऐसा समझकर उसपर तलवारका मजबूत प्रहार किया ।। ३२४।। परन्तु क्या ही आश्चर्य था कि श्री अरहन्त परमदेवके भक्त और शीलव्रत पालन करनेवाले उस सेठके वक्षःस्थलपर वह तलवारका प्रहार मणियोंका हार बन गया ।। ३२५॥ बिना परीक्षा किये उस सेठको दण्ड देनेसे नगर-में ऐसा बड़ा भारी उपद्रव हुआ कि जिससे सबका क्षय हो सकता था सो ठीक ही है क्योंकि सज्जन पुरुषोंके वधसे क्या नहीं होता है ? ॥ ३२६॥ राजा और नगरके सब लोग यह उपद्रव देखकर भयसे घबड़ाये और उसी सेठकी शरण में जाने के लिये श्मशानकी ओर दौड़े ॥३२७।। जब सब उसकी शरणमें पहुंचे तब कहीं वह उपद्रव दूर हुआ, स्वर्गमें रहनेवाले देवोंने बड़े आश्चर्य से शीलव्रतके प्रभावका वर्णन कर उस सेठकी पूजा की ॥ ३२८॥ जिनके मन भयसे उद्विग्न हो रहे हैं ऐसे राजा आदिने सेठसे कहा कि हम लोगोंने परीक्षा किये बिना ही कार्य किया ह अतः आप हम सबको क्षमा कर दीजिये, ऐसा कहनेपर क्षमा धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ सेठने कहा कि यह सब हमारे पूर्वोपार्जित अशुभ कर्मके उदयसे ही हुआ है। निश्चयसे इस विषयमें आपको कुछ भी विषाद नहीं करना चाहिये ऐसा कहकर उसने सबका वैमनस्य दूर कर दिया । तदनन्तर सब लोगोंके द्वारा आगे किये हुए पूज्य सेठ-कुबेरप्रियने बड़ी विभूतिके साथ नगरमें प्रवेश किया ॥३२९-३३१।।
श्लोक 332 से 341 धर्म और पुरुषार्थ पर चर्चा
इस प्रकार समय व्यतीत होनेपर वैभवशाली राजाने वारिषेणा नामकी इसी सेठकी पुत्री अपने पुत्र वसुपालके लिये ग्रहण की ॥ ३३२॥ किसी अन्य दिन राजाने सभाके बीच सेठसे पूछा कि ये धर्म आदि चारों पुरुषार्थ परस्पर एक दूसरेके विरुद्ध हैं अथवा नहीं ? ॥३३३॥ तब धर्म आदिके तत्त्वको जाननेवाले सेठने कहा कि सम्यग्दृष्टि सज्जनोंके लिये तो ये चारों ही पुरुषार्थ परस्पर अनुकूल हैं परन्तु मिथ्यादृष्टियोंके लिये अनु-कूल नहीं है ॥ ३३४।। सेठके इन वचनोंसे राजा बहुत ही संतुष्ट हुआ, उसने सेठसे कहा कि ‘जो तुम्हें इष्ट हो मांग लो मैं दूंगा’ तब सेठने कहा कि मैं जन्म-मरणका क्षय चाहता हूं ॥३३५।। इसके उत्तरमें राजाने कहा कि ये दोनों तो मेरे साध्य नहीं हैं तब वैश्यवर सेठने कहा कि अच्छा मुझे छोड़ दीजिये मैं स्वयं उन दोनोंको सिद्ध कर लूंगा ।। ३३६॥ यह सुनकर राजाने कहा कि तेरे साथ में भी घर छोड़ता परन्तु मेरे पुत्र अभी बालक हैं- छोटे छोटे हैं इस प्रकार राजा विचार कर ही रहा था कि ॥३३७॥ अचानक उसकी दृष्टि छिपकलीके उन बच्चोंपर पड़ी जो उसी समय विदीर्ण हुए अंडेसे निकले थे, भूखकी पीड़ासे छटपटा रहे थे और इसलिये ही मक्खियां पकड़नेमें तत्पर थे, उन्हें देखकर राजा सोचने लगा कि अपनी अपनी आजीविकाके उपाय तो सभी जीव बिना किसीके उपदेशके अपने आप अच्छी तरह जानते हैं इसलिये मुझे अपने छोटे छोटे पुत्रोंकी चिन्ता करनेसे क्या लाभ है ? यही विचार कर गुणपाल महाराजने वसुपालके लिये विधिपूर्वक राज्य दिया और श्रीपालको पट्ट सहित युवराज बनाया । तदनन्तर सेठ कुबेरप्रिय तथा अन्य अनेक राजाओंके साथ साथ मुनिराजके समीप जाकर तप धारण किया ॥३३८-३४१।।
श्लोक 342 से 361 भीम मुनि का पूर्वजन्म और देवियों का प्रश्न
वह चाण्डाल कहने लगा कि सेठके अहिंसा व्रतका फल देखकर मैंने भी अहिंसा व्रत ले लिया था यही कारण है कि मैंने तुम्हें नहीं मारा है यह सुनकर उस विद्युच्चर चोरने भी उसकी बहुत प्रशंसा की ॥३४२॥
इतना कहकर वे भीम मुनि सामने बैठे हुए देव-देवियोंसे फिर कहने लगे कि सर्वज्ञ-देवने मुझसे स्पष्ट अक्षरोंमें कहा है कि ‘तू पहले मृणालवती नगरी में भवदेव नामका वैश्य हुआ था वहां तूने रतिवेगा और सुकान्तसे वैर बांधकर उन्हें मारा था, मरकर वे दोनों कबूतर कबू-तरी हुए सो वहां भी तूने बिलाव होकर उन दोनोंको मारा था, वे मरकर विद्याधर विद्याधरी हुए थे सो उन्हें भी तूने विद्युच्चोर होकर उपसर्ग द्वारा मारा था, उस पापसे तू नरक गया था’ और वहांके दुःख भोगकर वहांसे निकलकर यह भीम हुआ हूं इस प्रकार उन बुद्धिमान् भीम मुनिने सामने बैठे हुए देव-देवियोंके लिये अपना सब वृत्तान्त कहा ॥३४३-३४६॥ जिन्हें आपने पहले तीन बार मारा है वे दोनों हम ही हैं ऐसा कहकर जिनके मन, वचन, काय -तीनों शुद्ध हो गये हैं और जिन्हें सद्धर्मकी सद्भावना उत्पन्न हुई है ऐसे वे दोनों देव-देवी उन भीममुनिकी वन्दना कर अपने स्थानपर चले गये ।।३४७।।
यह कहकर हेमाङ्गदकी छोटी बहिन सुलोचना फिर कहने लगी कि एक समय पुण्डरी-किणी नगरीके शिवंकर नामके सुन्दर उद्यानमें घातिया कर्म नष्ट करनेसे जिन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे भीममुनिराज विराजमान थे, सभी लोग उनकी पूजा कर रहे थे, उसी समय वहांपर चार देवियोंने आकर उनकी वन्दना की, धर्मका स्वरूप सुना और पूछा कि हे तीन लोकके स्वामी, हम लोगोंके पापसे हमारा पति मर गया है। कहिये — अब दूसरा पति कौन होगा ? तब सर्वज्ञ-भीम मुनिराज कहने लगे कि इसी नगरमें सुरदेव नामका एक राजा था उसकी वसुषेणा, वसुंधरा, धारिणी और पृथिवी ये चार रानियां थीं तथा श्रीमती, वीतशोका, विमला और वसन्तिका ये चार उन रानियोंकी दासियां थीं। किसी एक दिन उन सबने वनमें जाकर किन्हीं मुनिराजके समीप दान आदिके द्वारा धर्म करना स्वीकार किया था । उस धर्मके फलसे वे अच्युत स्वर्गमें प्रतीन्द्रकी देवियां हुई हैं। क्रमसे उनके नाम इस प्रकार हैं-रतिषेणा, सुसीमा, सुखावती और सुभगा । वह देवियां तुम्हीं सब हो, तथा तुम्हारी दासियां चित्रषेणा, चित्रवेगा, धनवती और धनश्री नामकी व्यन्तर देवोंकी कन्याएं हुई हैं। राजा सुरदेव मरकर पिङ्गल नामका कोतवाल हुआ है और वह अपने ही दोषसे कारागारको प्राप्त हुआ था, सुरदेवकी माता राजाकी पुत्री हुई है और श्रीपालकुमारके साथ उसका विवाह हुआ है । विवाहोत्सवके समय सब कैदी छोड़े गये थे उनमें पिङ्गल भी छूट गया था, अब संन्यास लेकर अच्युत स्वर्गमें उत्पन्न होगा और वही तुम सबका पति होगा ! इधर मुनिराज ऐसे मनोहर वचन कह रहे थे कि उधर पिङ्गल संन्यास धारणकर अच्युत स्वर्गमें उत्पन्न हुआ और वहांसे आकर उसने मुनिराजके वचन सत्य कर दिखाये । इतनेमें ही चारों व्यन्तर कन्याएँ आकर सर्वज्ञदेवसे अपने होनहार पतिको पूछने लगीं ॥३४८-३६०॥ मुनिराज कहने लगे कि पूर्वोक्त पिङ्गल नामक कोतवालके एक अतिपिङ्गल नामका पुत्र है वही संन्यास धारणकर तुम्हारा पति होगा ॥ ३६१।।
श्लोक 362 से 369 कथा समापन और पर्व समाप्ति
भीम केवलीके ये वचन सुनकर चारों ही देवियां जाकर अति-पिङ्गलकी पूजा करने लगीं, उसे देखनेसे उन देवियोंको कामका अधिक विकार हुआ था ॥३६२॥ उन देवियोंने रतिकूल नामके मुनिका चरित्र सुना, उनके पिता मणिनागदत्तका चरित्र सुना, सुकेतुका चरित्र सुना और सबके सत्य सिद्ध होनेपर बड़े संतोषके साथ मुनिराजकी वन्दना कर अपने अपने स्थानोंकी ओर प्रस्थान किया ।। ३६३-३६४।। उस समय हम दोनों भी मुनिराज की वन्दना करनेके लिये वहां गये और यह सब देख सुनकर प्रसन्नचित्त होते हुए स्वर्ग चले गये थे ।।३६५।।
इस प्रकार अपने द्वारा उपार्जन किये हुए शुभ अशुभ कर्मोंके उदयवश जिसे ऊंची नीची अवस्था प्राप्त हुई है और जिसने अपने दांतोंकी फैलती हुई किरणोंसे समस्त सभाको सुशोभित कर दिया है ऐसी सुलोचनाने सब सभासदोंको क्रमबद्ध मान्य, मनोहर, स्पष्ट, अस्ख-लित, मधुर, अविरल और आकुलता रहित वचनों द्वारा अपने पूर्वभवकी परम्परा कह सुनाई
हृदयको प्रिय लगनेवाले सुलोचनाके वचन सुनकर जयकुमार उस प्रकार संतुष्ट हुए जिस प्रकार कि संभोगके बादमें सन्तुष्ट होते । वह सभा उस तरह विकसित हो उठी जिस तरह की शरॠतुमें सरोवरकी शोभा विकसित हो उठती है। और सुलोचनाके वचनरूपी सूर्यके उदय होनेसे अन्य स्त्रियोंके मुखरूपी चन्द्रमाओंकी कान्ति नष्ट हो गई थी सो ठीक ही है क्योंकि अयोग्य स्थानपर की हुई ईर्ष्या दुःख करनेवाली होती है इसलिये विद्वानोंको ऐसी ईर्ष्या अवश्य ही छोड़ देनी चाहिये ।। ३६७।। सुलोचनाने जयकुमारसे कहा कि में पहले रतिवेगा थी और आप मेरे ही साथ मेरे पति सुकान्त वैश्य हुए, फिर में सेठके घर रतिषेणा कबूतरी हुई और आप मेरे ही साथ रतिवर नामक कबूतर हुए, फिर में प्रभावती विद्याधरी हुई और आप मेरे ही साथ हिरण्यवर्मा विद्यावर हुए उसके बाद में स्वर्ग में महादेवी हुई और आप मेरे ही साथ अतिशय पूज्य देव हुए ॥३६८।। इस प्रकार जयकुमार प्रियाके मुखरूपी कमलके रससे भीगे हुए मनोहर, पूर्ण और विस्तारयुक्त वचनोंको अपने कर्णरूपी पात्रमें रखकर उसके द्वारा कहे हुए अन्य वृत्तान्त को सुननेकी इच्छा करने लगा सो ठीक ही है क्योंकि कामी पुरुष स्त्रियोंके रसीले वचनोंसे कभी तृप्त नहीं होते हैं ।।।।३६९।।
इस प्रकार भगवद्गुणभद्राचार्य विरचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके हिन्दी भाषानुवादमें जयकुमार और सुलोचनाके भवान्तर वर्णन करनेवाला छियालीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
हिन्दी-भाषानुवाद
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आदिपुराण सारांश
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena