छहढाला – तीसरी ढाल छंद 9 – आस्रव के त्याग का उपदेश और बंध, संवर और निर्जरा तत्त्व का लक्षण
ये ही आतम को दुख-कारण, तातैं इनको तजिये । जीव-प्रदेश बँधै विधिसों सो, बन्धन कबहुँ न सजिये ॥
शम-दमतैं जो कर्म न आवैं, सो संवर आदरिये । तप-बलतें विधि-झरन निरजरा, ताहि सदा आचरिये ॥9॥
अन्वयार्थ (ये ही) ये मिथ्यात्व आदि ही (आतम को) आत्मा के (दुखकारण) दुःख के कारण हैं (तातैं) इसलिए (इनको) इन मिथ्यात्व आदि को (तजिये) छोड़ देना चाहिए। (जीव प्रदेश) आत्मा के प्रदेशों का (विधिसों) कर्मों से (बँधै) बँधना (बंधन) बंध कहलाता है (सो) वह बंध (कबहुँ) कभी भी (न सजिये) नहीं करना चाहिए। (शम) कषायों का उपशम और (दम) इन्द्रिय और मन की विजय (तैं) से (कर्म) कर्म (न आवैं) नहीं आना (संवर) संवर तत्त्व है (ताहि) उस संवर को (आदरिये) ग्रहण करना चाहिए। (तपबलतें) तप की शक्ति से (विधि) कर्मों का (झरन) एकदेश झड़ जाना (निरजरा) निर्जरा कहलाती है (ताहि) उस निर्जरा को (सदा) हमेशा (आचरिये) प्राप्त करना चाहिए।
अर्थ –
ये ही आतम दुख के कारण। ये माने पहली पंक्तियों में, अर्थात जो आश्रव के 57 भेद बताए थे, ये आश्रव के 57 भेद ही आत्मा के दुख के कारण हैं।
अगर आश्रव नहीं हो, तो बंध होने का प्रश्न ही नहीं, बंध नहीं फिर तो कोई सवाल ही नहीं आत्मा को कष्ट होगा कहां से? तो ये जो, यही मतलब ये 57 प्रकार से जो आश्रव होता है, यही आत्मा को दुख देने वाले हैं। ताते इसलिए इनको मतलब आश्रव को तजिए, छोड़िए। अर्थात अपनी आत्मा का परिणमन मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग रूप जितना न हो, उतना अच्छा है।
अब बंध तत्व का निरूपण। जीव प्रदेश बंधे विधि सौं सो, अर्थात जीव के प्रदेश जो विधि माने कर्म से बंधते हैं, एक मेंक हो जाते हैं, सो बंधन, वह बंध है।
आश्रव माने कर्मों का आना और बंध माने आत्म प्रदेशों का और कर्मों का एक मेंक हो जाना दूध-पानी की तरह, उसे कहते हैं बंध। फिर देखें, जीव प्रदेशों का कर्मों से जो बंधना है, सु वह बंध है। कबहु न सजिये, ये कभी भी इस रूप परिणमन नहीं करो। अर्थात ये कभी अच्छा नहीं माना जाएगा।
आश्रव और बंध दोनों हेय तत्व हैं, इस रूप कभी परिणमन नहीं होना चाहिए। बंध तत्व का वर्णन हो गया। आश्रव में कर्मों का आना और बंध में कर्म और आश्रव का एक मेंक हो जाना।
अब आते हैं संवर। शम और दम. शम का अर्थ होता है शांति और दम का अर्थ होता है संयम. शम् माने शमन, किसका? कषायों का। दम माने दमन, किसका? पांच इंद्रिय और मन का। कर्मों के आश्रव में सबसे ज्यादा कारण है पांच इंद्रियां और दूसरी बात चार कषाय। तो चार कषायों का तो हम शमन करें, पांच इंद्रियों और मन का हम दमन करें, तो क्या होगा? कर्म नहीं आएंगे। दरवाजा खुला है तो फिर अंदर कचरा भी आ सकता है, हवा भी आएगी. लेकिन बंद कर दो तो रुक जाएंगे.इसी प्रकार, अपने अगर ये सारे आश्रव द्वार खुले हों, तो फिर कर्मों का बंधन होगा, निश्चित होगा. लेकिन यदि अपन ने इन द्वारों को बंद कर दिया, कैसे बंद करेंगे? शांति से और दम यानी संयम से.
सगुप्तिसमितिधर्मानुप्रेक्षापरीषहजयचारित्रैः!!२!! ही, ये साधन बताएं संवर के. तो इनसे संवर होगा, उसको आदरिये, उसका आदर करो.
आदर करो यानी दूर से हाथ मत जोड़ो. आदर करो यानी अपने जीवन में उसको अपना करके उसका आदर करो.
तो यहाँ क्या कह रहे हैं? कषायों का शमन करने से, पांच इंद्रियों और मन के दमन करने से जो कर्म नहीं आते हैं, कर्मों का जो आना रुक जाता है, उसका नाम संवर है। आदरिये, उसका आदर करो। अर्थात संवर रूप परिणामों को बनाओ। जितना संवर अधिक हो उतना लाभकारी है, इसलिए इस संवर का आदर करना चाहिए।
अब निर्जरा। तप बल ते, मतलब तप के द्वारा, तप के बल से विधि माने कर्मों का जो झड़ना है, झड़ना माने आत्मा से अलग होना है, उसे कहते हैं निर्जरा। ताहि उसका सदा आचरण करना चाहिए।
प्रश्न: आपने आश्रव के 57 भेद बताएं जिससे हम बचने बच सकते हैं, परंतु बंध से कैसे बचें? इसके बारे में भी बताइए।
उत्तर : जो आश्रव के कारण हैं, वही बंध के कारण हैं। सूत्र देखो- मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बंध हेतवः। आत्मा के परिणाम मिथ्यात्व, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग रूप होते हैं, तो उन एक परिणामों से दो कार्य होते हैं। कर्म, कार्मण वर्गणाएं कर्म रूप परिणमन भी करती हैं और परिणमन के साथ-साथ उसी समय में उनमें चार प्रकार का बंध भी पड़ जाता है। ये एक ही समय के कार्य हैं, इन दोनों में आत्मा के एक ही परिणाम कारण होते हैं। ऐसा नहीं होता जो आश्रव पहली समय में हो और बंध दूसरे समय में। जिस समय में आश्रव है, उसी समय में बंध है। इसलिए एक परिणाम दोनों में कारण होते हैं। हम क्या करें जो आश्रव के 57 कारण बताए हैं, उनसे हम बचेंगे, तो आश्रव नहीं होगा, तो आश्रव नहीं होगा तो बंध भी नहीं होगा। और आश्रव होगा तो बंध होगा ही। इसलिए दोनों के कारण एक हैं।
प्रश्न: संवर करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
उत्तर : संवर आश्रव का रुकना। संवर करने के लिए आश्रव के कारणों में रुकावट डालनी चाहिए। जैसे, मन-वचन-काय की क्रिया से आश्रव होता है। हमें मन-वचन-काय की क्रिया कम करनी चाहिए। जैसे मान लो खेल-कूद में आश्रव ज्यादा और हम सामायिक कर रहे हैं, स्थिर होकर तो आश्रव कम। तो पहली बात, मन-वचन-काय की क्रिया को हम घटाएं। दूसरी बात, अगर संवर करना चाहते हैं, तो आश्रव के कारणों को हटाएं, जैसे आश्रव होता है मिथ्यात्व के कारण। अगर सम्यक दर्शन प्राप्त कर लेंगे, तो आश्रव मिथ्यात्व के कारण होने वाला आश्रव रुक जाएगा। अविरति के कारण जो आश्रव हो रहा है, अगर वो आश्रव आपको रोकना है, तो क्या करें? व्रतों को धारण करें। अगर व्रतों को धारण कर लेंगे, तो अविरति के कारण होने वाला आश्रव रुक जाएगा। कषाय नहीं करेंगे, कषायों का हम शमन करेंगे, तो कषायों के कारण होने वाला आश्रव रुकेगा। इन्द्रियों का दमन करेंगे, तो पंच इंद्रियों के विषयों में प्रवृत्ति के कारण जो आश्रव होता था, वो रुकेगा। सीधी बात, जो आश्रव के कारण हैं, उन्हें हम रोकें, तो हमारा संवर होगा, वही है और कुछ नहीं। इसलिए निरंतर आश्रव के कारणों से बचना चाहिए।
प्रश्न: हम गृहस्थ लोग हैं, तो क्या हम गृहस्थी में रहकर निर्जरा कर सकते हैं?
उत्तर : पहली बात, निर्जरा शुरू कहां से होती है? यद्यपि मिथ्या दृष्टि जीव जब सम्यकत्व प्राप्ति के सन्मुख होता है, तब अपूर्वकरण से उसके अपाक निर्जरा का प्रारंभ हो जाता है। निर्जरा दो प्रकार की है- एक सविपाक, एक अविपाक। सविपाक निर्जरा तो प्रत्येक जीव की होती है, निगोदिया की भी होती है, एकेंद्रिय जीव सब की होती है, उससे आत्मा का कल्याण नहीं होता। कहा भी है- पहली सबके होय, नहीं कुछ सरे काज तेरा। और दूजी करे जो उद्यम करके, मिटे जगत फेरा। तो पहली सविपाक निर्जरा वो तो बेकार। अब आई अविपाक निर्जरा, अविपाक निर्जरा कहां से प्रारंभ होती है? अब हम गृहस्थ लोग हैं और हम चाहते हैं अगर ये कि हमारे प्रतिसमय निर्जरा हो, तो प्रतिसमय निर्जरा का एक ही कारण है, हम व्रतों को धारण कर लें। अगर हमने एक प्रतिमा भी धारण कर ली, तो हमारे 24 घंटे निर्जरा होना प्रारंभ हो जाएगा। निर्जरा का कारण है व्रत, हम व्रतों को धारण करें, निर्जरा हमारी होने लगेगी।
सात तत्वों में छह तत्वों का वर्णन पूरा हो गया, अब मोक्ष तत्व का वर्णन शेष रहता है, जो स्वयं दौलत राम जी आगे लिख रहे हैं
छंद 10 – मोक्ष तत्त्व का लक्षण और व्यवहार सम्यग्दर्शन का स्वरूप
सकल-कर्मतैं रहित अवस्था, सो शिव, थिर सुखकारी। इहिविधि जो सरधा तत्त्वन की, सो समकित व्यवहारी।
देव जिनेन्द्र गुरु परिग्रह बिन, धर्म दयाजुत सारो। येहु मान समकित को कारण, अष्ट अंग-जुत धारो ॥10॥
अन्वयार्थ – (सकलकर्मतैं) समस्त कर्मों से (रहित) रहित (थिर) स्थिर-अटल और (सुखकारी) अनंत सुखदायक (अवस्था) पर्याय (शिव) मोक्ष कहलाता है। (इहिविधि) इस प्रकार (जो) जो (तत्त्वन की) सातों तत्त्वों का (सरधा) अटल श्रद्धान करना है, वह (व्यवहारी) व्यवहार (समकित) सम्यग्दर्शन है (जिनेन्द्र) वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी (देव) सच्चे देव, (परिग्रह बिन) परिग्रह रहित (गुरु) वीतराग गुरु तथा (सारो) सारभूत (दयाजुत) अहिंसामय (धर्म) जैनधर्म (येहु) इन सब को (समकित को) सम्यग्दर्शन का (कारण) कारण (मान) जानना चाहिए। उस सम्यग्दर्शन को (अष्ट) आठ (अंगजुत) अंगों सहित (धारो) धारण करना चाहिए।
अर्थ – सकल कर्म ते, सकल माने संपूर्ण कर्मों से, अर्थात ज्ञानावरण, दर्शनाववरण, वेदनी, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अंतराय, इन आठ कर्मों से रहित जो अवस्था है, सो शिव वह मोक्ष है। और थिर, थिर माने हमेशा सुखकारी, सुख करने वाली है। एक बार मोक्ष प्राप्त हो जाए, अब उसमें कोई डिस्टरबेंस नहीं होता, अब तो अनंतानंत काल तक वह अवस्था रहेगी, इसलिए यहां शब्द दिया ‘थिर’। फिर देखें एक बार, सकल कर्म ते, ज्ञानावरणादि आठों कर्मों से रहित जो अवस्था है, वह अवस्था मोक्ष है। और वो प्राप्त हो जाए, तो थिर माने फिर हमेशा स्थिर रूप से सुखी करने वाली है।
इह विधि इस प्रकार जो सात तत्वों की श्रद्धा है, सो माने वह व्यवहार सम्यकत्व है। निश्चय सम्यक्त्व पहले बता दिया था, अपने आत्म स्वरूप को जानना, आत्म स्वरूप की श्रद्धा करना और आत्मा को आत्मा में लीन कर देना, यह निश्चय सम्यक दर्शन ज्ञान चरित्र था। अब यह व्यवहार सम्यकत्व की बात हो रही है कि सात तत्वों का यथार्थ श्रद्धान करना व्यवहार सम्यक दर्शन है। तो इन्होंने यहां तक मोक्ष तत्व को बता दिया और अब कह रहे हैं इस प्रकार जो तत्वों की श्रद्धा है, जो सात तत्वों का यथार्थ विश्वास है, वह व्यवहार सम्यक दर्शन है। यह व्यवहार सम्यक दर्शन की परिभाषा है।
इसके अलावा और भी परिभाषाएं व्यवहार सम्यक दर्शन की हैं, जैसे देव जिनेन्द्र, जिनेन्द्र भगवान और गुरु परिग्रह बिन, परिग्रह से रहित गुरु और दयामय धर्म, यह सार है, अर्थात संसार में सबसे श्रेष्ठ हैं। अगर देवों में कोई देव है, तो मात्र जिनेन्द्र देव हैं। गुरु में कोई गुरु है, तो परिग्रह रहित गुरु, दिगंबर साधु, मुनि महाराज। और दयायुक्त धर्म, अर्थात धर्म वो जो दया से सहित हों, यही संसार में श्रेष्ठ हैं, इनसे अच्छा और कोई नहीं। जिनेन्द्र भगवान सच्चे देव, उनसे और अच्छा कोई हो ही नहीं सकता। दिगंबर मुनि महाराज से और बड़ा गुरु कोई नहीं हो सकता और दयामय जो धर्म है, इससे और अच्छा धर्म कौन हो सकता है, कोई नहीं हो सकता। ये सार हैं।
येहु इनको भी समकित सम्यत्व का कारण मानो। ये भी सम्यत्व में कारण हैं, कौन? सच्चे देव, सच्चे गुरु और दयामयी धर्म इन पर श्रद्धा बनाना, ये भी सम्यक्त्व में कारण हैं. ऐसे सम्यक्त्व को आठ अंगों से सहित धारण करो.
मोक्ष मार्ग का प्रारंभ कहां से होता है? सम्यक् दर्शन से होता है. अगर सम्यक् दर्शन प्राप्त नहीं किया, तो मोक्ष मार्ग प्रारंभ हो ही नहीं पाएगा.
इसलिए वो क्या कह रहे हैं, इनको भी सम्यक्त्व का कारण मानकर आठ अंगों से सहित सम्यक् दर्शन को हे भव्य जीव धारण करो.
फिर मोक्ष मार्ग दो प्रकार का बताया, वैसे तो मोक्ष मार्ग किसको कहा? सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान, सम्यक् चरित्र को. लेकिन इसके दो भेद कर दिए. कारण और कार्य के रूप में. अब कारण को व्यवहार कह दिया और कार्य को निश्चय कह दिया. तो अभी यहां पर निश्चय सम्यक्त्व की, ज्ञान की और चरित्र की चर्चा तो पहले ही कर दी एक-एक लाइनों में. रुचि सम्यक्, परद्रव्य से भिन्न आप में रुचि सम्यक् भला है, यह निश्चय सम्यक् दर्शन हो गया. परद्रव्यों से भिन्न अपनी आत्मा का श्रद्धान हो जाना, सो निश्चय सम्यक्त्व कह दिया. और आप रूप को जान पनों सो सम्यक् ज्ञान कला है. और अपने स्वरूप को जान लिया, अपने आप को पहचान लिया, तो वो सम्यक् ज्ञान हो गया निश्चय. और फिर आप रूप में लीन भए थिर, सम्यक् चरित्र सोई. और अपने स्वरूप में, अपने आप में अपनी आत्मा में लीन हो गए, तल्लीन हो गए, उसी का नाम सम्यक् चरित्र है. तो इस तरह निश्चय सम्यक् दर्शन ज्ञान चरित्र का तो वो स्वरूप हो गया.
अब व्यवहार स्वरूप क्या है? तो सात तत्वों के श्रद्धान को व्यवहार सम्यक् दर्शन कहा. क्योंकि सात तत्वों का श्रद्धान ही अपनी आत्मा पर श्रद्धान उत्पन्न करने वाला है. इसलिए सात तत्वों के श्रद्धान को कारण मानो और आत्म श्रद्धान को कार्य मानो.
तो इस प्रकार यह व्यवहारी सम्यक्त्व होता है, सात तत्वों की जो श्रद्धा करने वाला होता है. और क्या-क्या श्रद्धा होती है उसकी? व्यवहार सम्यक्त्व में और भी कुछ बातें जुड़ी होती हैं. तो क्या बात है? देव जिनेन्द्र. देव यानी परमात्मा जो है, वो जिनेन्द्र से कम कोई नहीं है. जिनेन्द्र से छोटे कोई भी जीव को सम्यक् दृष्टि परमात्मा नहीं मानता.
और फिर जिनेन्द्र से बड़े जो हैं, जिनेन्द्र बनने के बाद जो सिद्ध पद प्राप्त हुआ, वो तो है ही है परमात्मा. लेकिन परमात्मा होने के लिए कम से कम जिनेन्द्र होना, भाव जिनेन्द्र की बात कर रहे हैं. नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव. तो यहां पर भाव जिनेन्द्र का अर्थ जो मनुष्य पर्याय में जिनेन्द्र पद को प्राप्त हुए हैं, वो देव हैं, अर्थात भगवान हैं, परमात्मा हैं.
और गुरु कौन है? यहां पर गुरु में उ की मात्रा दीर्घ होनी चाहिए, छंद के अनुसार. हिंदी में दोनों चलते हैं. र में जो उ है, वो दीर्घ भी हो सकता है और रस्व भी हो सकता है. रस्व जो होता है, वो र के साथ ऐसे करके नीचे की तरफ आता है. और दीर्घ जो होता है, वो नीचे वाली लकीर जो है र की, ऐसे करके ऐसी आती है ना, तो वो उसके पैरेलल जाता है, समानांतर जाता है.
तो गुरु कौन होते हैं? परिग्रह-बिन. जिन्होंने परिग्रह छोड़ा है, वही गुरु हैं सम्यक् दृष्टि के. परिग्रह वाले गुरु सम्यक् दृष्टि जीव के गुरु नहीं हो सकते, वो मिथ्या दृष्टियों के गुरु हो सकते हैं, कोई बात नहीं है. और धर्म दया-जुत सारो. और सारभूत जो दया-युक्त धर्म है, वही सम्यक् दृष्टि जीव के लिए धर्म होता है, वो और किसी को धर्म नहीं मानता.
और यही मान, यहू मान समकित को कारण और इसी को ऐसा समझो कि सम्यक् दर्शन जो वास्तविक सम्यक् दर्शन है, आत्मा में होने वाला, उसका कारण ये सब है. इसलिए इसको व्यवहार सम्यक्त्व कहा है और इसको अष्ट अंग-जुत धारो, इसको आठ अंगों से युक्त धारण करो.
यानी इस व्यवहार सम्यक्त्व को धारण कर लोगे, तो किसी दिन वो सम्यक्त्व भी हो जाएगा दूसरा वाला. इसलिए इसको तो धारण कर ही लो, क्योंकि यह आपके हाथ में है. व्यवहार सम्यक्त्व को धारण करना अपने हाथ में है और अंदर से चौथा गुणस्थान होना अपने हाथ में नहीं है. हो जाए तो हो जाए, अच्छी बात है. लेकिन बाहर से कम से कम इतना तो कर ही सकते हैं.
क्या करोगे? तो सात प्रकार के तत्वों पर श्रद्धान कर लेना. और सच्चे देव को ही देव मानना, यानी अरिहंत-सिद्ध को ही भगवान मानना और सबको भगवान नहीं मानना, इतना तो अपन कर ही सकते हैं.
और और किसी को भगवान क्यों नहीं मानना? इसकी चर्चा अपन ने पहले की थी दूसरी ढाल में. कि उसमें अन्य जो स्वरूप है भगवान का, उनमें बहुत सारी ऐसी बातें हैं, जो भगवान में नहीं होनी चाहिए. भगवान में राग-द्वेष होने चाहिए क्या? नहीं होने चाहिए. फिर भगवान में और भी जो बातें, काम-क्रोध आदि, ये होने चाहिए क्या? नहीं होने चाहिए.
तो अगर किसी ने भगवान के पद पर अपना आसन जमाया हो और उसमें ये सारी बातें पाई जाती हों, तो फिर उनको भगवान नहीं मानना.
और अगर आप सबकी कथाओं को पढ़ लो, प्रथमायोग का अध्ययन करो, तो फिर आपको अपने आप समझ में आ जाएगा, जैसे हमने धर्म परीक्षा का कहा था और अभी अष्टपाहुड़ में भी मोक्ष पाहुड़ के अंतर्गत जो पंडित पन्नालाल साहित्याचार्य जी का अनुवाद है, उसमें यहां स्यादवाद विद्वत परिषद से छपी हुई प्रति के 607वें पृष्ठ पर, अगर आप उस कथा को पढ़ लो, तो फिर उसको पढ़ने पर आपकी बुद्धिमत्ता का जितना भ्रम है, वो एक झटके में नष्ट हो जाएगा और आपको समझ में आ जाएगा कि नहीं, हम कहां भटके हुए हैं.
हम किसको-किसको भगवान मान रहे हैं, लोग जिसको भगवान मानते हैं, उसको अपन भी भगवान मान लें क्या आँख मूंद कर के. लोग पीपल के पेड़ को भी देवता मानते हैं. लोग नदियों को भी देवता मानते हैं, तालाबों की पूजा करते हैं, लोग पत्थरों के ढेर लगा करके भी उसकी पूजा करते हैं. और फिर क्या-क्या नहीं करते लोग? तो अपन को लोगों के समान मूढ़ नहीं बनना, अज्ञानी नहीं बनना, अपने को विवेक से काम करना है.
अब उसी पीपल के पेड़ पर अगर कोई प्रेतात्मा आ जाए, तो वो पूजा करने वाले जान बचा करके भागेंगे. यानी पूज्य का स्वरूप डरावना भी नहीं होना चाहिए और अपने अंदर प्रलोभन पैदा करने वाला भी नहीं होना चाहिए. निर्विकार शांत स्वरूप ही भगवान का स्वरूप हो सकता है, विकारी स्वरूप भगवत स्वरूप कभी नहीं हो सकता.
इसलिए विकारी स्वरूप को भगवान मानने पर अपन मिथ्या दृष्टि होते हैं और वो मिथ्यात्व संसार भ्रमण में कारण बनता है. तो ऐसे बहुत सारे इसमें दृष्टांत आते हैं.
उसमें तो इतना खतरनाक दृष्टांत है कि परसों स्वाध्याय चल रहा था शाम को, तो उसको पढ़ने के बाद सब लोग दंग रह गए थे, ऐसा लग रहा था कि कैसे लोग इतने अज्ञान में पड़े हुए हैं. फिर समझ में आता है कि जानकारी न होने के कारण ही लोग अज्ञान में रहते हैं, जानकारी हो जाए, फिर तो कोई भी ऐसी गलती नहीं करेगा.
तो ये सम्यक् दर्शन जो होता है, उसको धारण करने की बात कर रहे हैं कि देव किसको मानोगे? भगवान किसको मानोगे? जो निर्विकार परमात्मा है, निर्दोष परमात्मा है, जिनके अंदर दोष न हो, ऐसे परमात्मा, उनको भगवान मानना. और गुरु किनको मानना? जो निष्परिग्रह हैं, जिनके पास धन-दौलत हो, जमीन-जायदाद हो और दुनिया भर के और प्रपंच हों, उनको सम्यक् दृष्टि जीव गुरु नहीं मानता. क्योंकि गुरु का स्वरूप इन सब प्रपंचों से रहित है, जो खुद प्रपंच में फंसा है वो संसारी जीवों को, अपने भक्तों को प्रपंचों से कैसे तार सकता है? जो खुद फंसा हुआ है जाल में, वो दूसरों को जाल से मुक्त कैसे कर सकता है? इसलिए गुरु निष्परिग्रह होते हैं, क्योंकि परिग्रह ही हिंसा का कारण है, परिग्रह ही सब दुखों का कारण है। परिग्रह न हो, तो कोई दुख नहीं है।
ये अपनत्व का जो भाव है, उसी का नाम परिग्रह है। अब वो कभी प्रशस्त रूप में भी हो जाता है, कभी देव-शास्त्र-गुरु के प्रति भी जो अपनत्व का भाव होता है, उसके कारण भी अपने अंदर कभी-कभी कोई आयतनों पर कभी कोई उपद्रव हो जाए, तो अपने को पीड़ा होती है, तो वो तो ठीक है, उसको शुभ राग के अंतर्गत ले लो, लेकिन जो विषय-कषायों के प्रति अपनत्व होता है, वो तो केवल पाप बंध का कारण है।
इसलिए गुरु के विहार के समय गुरु नहीं रोते। भगत लोग रोते हैं, भक्त लोग। क्योंकि उनको लगता है कि हमारा कुछ दूर हो रहा है। अब गुरु को लगता नहीं कि हम कौन, हमारा कौन, तुम्हारा। गुरु जानते हैं, यहां हैं, तो यहां भी हैं लोग और फिर वहां चले जाएंगे, तो वहां भी ऐसे ही लोग मिलेंगे। सब जगह समान है गृहस्थों की स्थिति, तो फिर उनकी आंखों में आंसू नहीं, किंतु दूसरों की आंखों में आंसू रहते हैं, जिनको राग होता है, जिनको लगाव रहता है।
और फिर भी, ये स्थिति हमेशा नहीं बननी चाहिए। ये स्थिति कुछ समय तक तो बन सकती है, लेकिन उसके बाद जब आप भावनाओं से गुरु के साथ जुड़ गए हैं, तो गुरु चाहे जहां रहें, फिर वो इतना गहन संबंध होता है गुरु के प्रति श्रद्धा का संबंध, कि फिर बाहर से अगर गुरु दूर हो जाएं, तो भी अंदर से दूर नहीं हो सकते।
जैसे शिष्य गुरु से कहता है कि गुरुवर आप ठीक है मुझे अलग कर रहे हो, लेकिन मेरे हृदय से आप कहां से अलग करोगे मुझे? आप यहां से तो अलग कर सकते हो मुझे, लेकिन अपने हृदय से मुझे और आप आपको मेरे हृदय से पृथक नहीं कर सकते।
तो फिर वो श्रद्धा की उस अवस्था में, फिर भावना दशा में चले जाएं, तो फिर तो कभी वियोग होता ही नहीं। गुरु-शिष्य का वियोग हो ही नहीं सकता कभी। सम्यक् दृष्टि का देव-शास्त्र-गुरु से कभी वियोग हो सकता है क्या? भावनाओं में। बाहर से तो कभी हो सकता है कि कहीं ऐसी मुसाफिर पर निकले तो फिर कई दिनों तक दर्शन नहीं मिल रहे देव दर्शन, वो एक अलग बात है, लेकिन भावना में, भावना में जब आंख बंद की, तत्काल दिखते हैं।
और यह बात होना अलग बात है कि मतलब, ऐसी इच्छा होती है कि नहीं, आंखों के सामने भी रहें, वो फिर ठीक है, वो एक अलग प्रकार का वो एक शुभ राग कह लो आप उसको, जो भी कह लो।
तो सम्यक् दर्शन जो है, उसमें देव निर्दोष होने चाहिए, 18 दोषों से रहित, गुरु परिग्रहों से रहित होने चाहिए और धर्म, दया से युक्त होना चाहिए और सारभूत होना चाहिए। निःसार नहीं होना चाहिए, सारभूत होना चाहिए।
येहु मान समकित को कारण, इसी इन्हीं को सम्यक् दर्शन का कारण जानकर, अष्ट अंग-जुत धारो, उस सम्यक् दर्शन को आठ अंगों से युक्त धारण कर लो।
प्रश्न: मनुष्य गति में सम्यक्त्व उत्पत्ति की किन कारणों से होती है?
उत्तर: मनुष्य गति में जातिस्मरण, धर्म श्रवण और देव जिनबिम्ब दर्शन, इन तीन कारणों से होती है.मनुष्य गति में कभी जातिस्मरण हो जाए, दूसरी बात जिनबिम्ब दर्शन हो, तीसरी बात धर्म श्रवण हो, इससे उन जीवों को सम्यक्त्व की प्राप्ति हो जाती है.
प्रश्न: देवों में सम्यक्त्व उत्पत्ति के क्या-क्या कारण हैं?
उत्तर: देवों में सम्यक्त्व उत्पत्ति के कारण बताए- पहला जातिस्मरण, दूसरा धर्म श्रवण, तीसरा देव रिद्धि दर्शन और जिन महिमा दर्शन.
क्या मतलब हुआ जिन महिमा दर्शन, अर्थात भगवान के पांच कल्याणकों में देव लोग जाते हैं, वहां भगवान की महिमा देखते हैं, समवसरण में सौ-सौ इंद्र जिनके चरणों में खड़े हुए हैं, ऐसी महिमा जब उनकी देखते हैं, यही सच्चा है, यही भगवान सच्चे हैं, उनका श्रद्धान बन जाता है.
प्रश्न: हम इस जीवन जो मनुष्य जीवन मिला है, इस जीवन में हमें सम्यक्त्व उत्पत्ति के लिए क्या-क्या करना चाहिए?
उत्तर: कारणों की चर्चा हुई है और विशेष तरह समझ लेते हैं. सबसे पहले हमको चाहिए हम शास्त्रों का अध्ययन करें और सात तत्व का परिचय प्राप्त करें. परिचय प्राप्त करके उन सात तत्वों का उन पर विश्वास करें. सच्चे देव, सच्चे शास्त्र, सच्चे गुरु का स्वरूप बहुत अच्छी तरह बता दिया, छहडालाकार ने खोटे देव-शास्त्र-गुरु का स्वरूप बताया, पहले तो उनसे बचें.
वर्तमान में हम देखते हैं आधे से ज्यादा नहीं 75% से ज्यादा सारे जितने भी लोग हैं, वो गलत देव-शास्त्र-गुरु की पूजा में लगे हुए हैं. सम्यक्त्व प्राप्ति करनी है, सबसे पहले सच्चे देव के स्वरूप का निर्णय करो, सच्चे गुरु को कौन सा गुरु सच्चा है, सच्चे शास्त्र कौन से हैं, उनका निर्णय करके विश्वास करेंगे, तब हमें जो शास्त्र में लिखा हुआ होगा, उस पर विश्वास होगा.
मिथ्या दृष्टि जीव को सबसे पहले प्रथमोपशम या उपशम सम्यक् दर्शन होता है. तो जब उपशम सम्यक् दर्शन पहली बार होगा, इन्हीं कारणों से होगा. इतनी सुविधाएं तो हमें मिल गई. सब चीज मिल गई हमको, शरीर मिला, निरोगता मिली, धन-संपत्ति, खाने-पीने की व्यवस्था, समय, पढ़ाने वाले गुरु और सब मिल गए हमको, अब कसर किसकी है, कसर है अपने स्वयं के पुरुषार्थ की.
अगर हम स्वयं अपना पुरुषार्थ योग कर जाएं, तो निश्चित रूप से इस पर्याय में सम्यक्त्व प्राप्ति होगी. लेकिन यह बात ध्यान रखना, अगर इस पर्याय में सम्यक् दर्शन प्राप्त नहीं किया, तो अगली पर्याय कौन सी मिलेगी, जो सुविधाएं वर्तमान में मिली है, ये कब मिलेंगी कि नहीं मिलेंगी, इसका कोई भरोसा नहीं.
इसलिए इस पर्याय को सम्यक्त्व प्राप्ति में पूरे जोर से लगा देना चाहिए. बस यह इसका सारांश है,
जिनवाणी पुत्र क्षुल्लक श्री ध्यानसागर जी महाराजजी और पंडित श्री रतन लाल जी बैनाडा के प्रवचन पर आधारित स्वाध्याय
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 से 13 | छंद 14 व 15 |
तीसरी ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8