आलोचना पाठ – छंद 12 & 13 : अर्थ एवं व्याख्या
अनन्तानुबन्धी सो जानो, प्रत्याख्यान अप्रत्याख्यानो
संज्वलन चौकड़ी गुनिये, सब भेद जु षोडश गुनिये ॥१२॥
शब्दार्थ
- अनन्तानुबन्धी — अत्यंत तीव्र कषाय, जो सम्यग्दर्शन के विनाश का कारण बनती है।
- प्रत्याख्यान — वह कषाय जो लिए हुए व्रत/संयम में बाधा उत्पन्न करे।
- अप्रत्याख्यान — वह कषाय जो पूर्ण संयम या व्रत ग्रहण करने में बाधक बने।
- संज्वलन — अपेक्षाकृत मंद कषाय, जो संयम में भी सूक्ष्म रूप से बनी रह सकती है।
- चौकड़ी — चार-चार का समूह।
- षोडश — सोलह।
यहाँ पर जो कषाय है, मोहनीय की… देखिए, मोहनीय जो है, आठ कर्म हैं। आठ प्रकार के कर्म हैं—ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय, वेदनीय, आयु, नाम और गोत्र। इस तरह से कुल आठ प्रकार के कर्म हैं। इसमें एक कर्म है मोहनीय। अभी मोहनीय के दो भेद हैं—एक है दर्शन मोहनीय और एक है चारित्र मोहनीय।
दर्शन मोहनीय के तीन भेद हैं—मिथ्यात्व, सम्यक् मिथ्यात्व और सम्यक् प्रकृति।
चारित्र मोहनीय के अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलन चार भेद हैं। तो जो सबसे सीवियर (severe) होती है, जो जन्मों-जन्मों तक कषाय चलती है, वह कहलाती है अनंतानुबंधी, ठीक है? और जो जो है 6 महीने से अधिक समय तक नहीं चलती है, वह कहलाती है अप्रत्याख्यान। और जो 15 दिन के लिए होती हैं, वह कहलाती है प्रत्याख्यान। और संज्वलन, तो वह जो है—वह तो होती है और नष्ट हो जाती है, ऐसी कषाय है तो यह कहलाते हैं हमारी जो है यह 16 प्रकार की कषायें होती हैं। तो अनंतानुबंधी सो जाने, प्रत्याख्यान, अप्रत्याख्यान, संज्वलन चौकड़ी गुनिये। यह सब जो चौकड़ी है, यह जो चार अनंतानुबंधी कषाय × 4 कषाय (4X4), तो यह चार कषाय और गुणा ‘क्रोध, मान, माया, लोभ’—मतलब अनंतानुबंधी क्रोध-मान-माया-लोभ, अप्रत्याख्यान क्रोध-मान-माया-लोभ, प्रत्याख्यान क्रोध-मान-माया-लोभ, संज्वलन क्रोध-मान-माया-लोभ। यानी 16 प्रकार की जो कषायें हैं, ‘सब भेद जु शोडश गुनिये‘, यह इसके कितने भेद हो गए? 16 भेद हो गए।
अनंतानुबंधी कषाय
यहाँ पर हम जो चार मूल कषाय हैं, उसकी हम बात करेंगे।
अनंतानुबंधी: तो अनंतानुबंधी जो कषाय होती है, हे भगवान! मैंने अनंतानुबंधी संबंधित जितनी भी चार चौक कषाय हैं (25 कषाय), उसका मैंने बहुत पाप किया। उस संबंधित मैंने कर्म बहुत बाँधे, तो उसकी मैं क्षमा माँगता हूँ आपसे। तो अनंतानुबंधी कषाय जो है, वह किस प्रकार की होती है? तो हम थोड़ा एकदम easy way में, उदाहरण के माध्यम से समझेंगे।
अनंतानुबंधी कषाय में कैसे परिणाम जीव के होते हैं? जैसे देव-शास्त्र-गुरु के प्रति विराधना के परिणाम। अभी विराधना के परिणाम मतलब कि जैसे कोई घर में धर्म कर रहा हो, जैसे कोई धर्मात्मा जीव हो, या फिर husband हो तो उसकी wife ज़्यादा धार्मिक हो, अगर Wife हो तो Husband ज़्यादा धार्मिक हो। तो दोनों में से किसी एक को, जो धर्म करता है वह पसंद न हो, तो उस संबंधित वह कुछ न कुछ अड़चनें लाता हो। इस तरह से कुछ विराधना के परिणाम, उसको देव-शास्त्र-गुरु के प्रति अच्छा न लगना, अरुचि का परिणाम, मंदिर जाना अच्छा नहीं लगता हो। तो ऐसी जो कषाय होती है, वह कहते हैं अनंतानुबंधी कषाय।
फिर और कैसी होती है? कि भाई अपनी जो कोई भी ज़िद है, तो वह ज़िद छोड़े नहीं। मतलब अगर अपनी जैसे कोई गलती हो गई हो, तो गलती को वह स्वीकार ही न करे। ऐसी जो कषाय होती है—अपने से गलती हुई हो तो उसको स्वीकार न करे, या फिर ऐसा भी हुआ हो कि किसी को कषाय ज़्यादा हो रही हो, तो भी वह अपनी ज़िद न छोड़े। ऐसा नहीं कि ‘चलो छोड़ दो, जाने दो, अब जो हो गया सो हो गया’—ऐसा करके ‘लेट गो’ की भावना न हो और अपनी हठ पकड़े रखे। अपनी जो हठ है, वह पकड़े रखे। तो उसको कहेंगे कि वह अनंतानुबंधी कषाय में आती है, उस तरह की कषाय।
फिर उसमें ऐसा भी देखने में आता है कि जैसे किसी ने कोई वस्तु का त्याग किया हो, जैसे किसी ने एकासन किया हो या उपवास किया हो या फिर कुछ न कुछ वस्तु का त्याग किया हो, तो उसको उस संबंधित त्याग का घमंड आ जाता है। आप समझ रहे हैं? कि ‘अच्छा, मैंने तो 10 उपवास किए!’ मतलब उसको उस त्याग का घमंड आ जाता है, तो वह अनंतानुबंधी कषाय में जाता है। मतलब वह उपवास करके भी पाप बाँध रहा है। आप समझ रहे हैं? कि खाली भूखा रहना, उसमें कोई धर्म नहीं है।
फिर जो विषय-कषाय है, उसके अंदर तीव्र आसक्ति होना। जो विषय-भोग हैं, उनके अंदर तीव्र आसक्ति होना। जैसे हम एक साधारण उदाहरण से समझें कि कहीं पे घूमने गए हैं—कहीं रिसॉर्ट में गए हों या फिर कोई जगह पे घूमने के लिए गए, अभी वहाँ पे उसको तीव्र आसक्ति है। जहाँ पे वह जा रहा है ना, उस संबंधित उसको तीव्र आसक्ति है कि वहाँ पे ऐसा घूमेंगे, फिर ऐसा करेंगे, ऐसा करेंगे—इस तरह से उसको तीव्र आसक्ति है। वहाँ पे जाके भी वह जो हरी घास होती है, उसके ऊपर भी वह आराम से पैर रख देगा। अभी हरी घास के अंदर छोटे-छोटे फ्रॉग (मेढक) होते हैं, छोटे-छोटे जीव होते हैं, तो वह ऐसा विचार नहीं करेगा। बस वह अपने भोगों में मस्त है।
मतलब ऐसा कुछ विवेक नहीं रखता और अपने एकदम भोगों में मस्त है। कहीं पे भी घूमने गया हो, एकदम आसक्तिपूर्वक वह भोग करता है। मतलब वहाँ पे जाके वह सेल्फ़ी लेगा, यह करेगा, वह करेगा—’क्या करूँ मैं जिससे मैं ज़्यादा से ज़्यादा सुखी हो जाऊँ?’ तो उसमें कुछ विवेक नहीं रखता है। अगर रिसॉर्ट में गया है तो स्विमिंग पूल में भी वह नहाने बैठ जाएगा। स्विमिंग पूल मतलब पूरा अनछना पानी का पिंड है। एक-एक बूँद के अंदर—स्विमिंग पूल की एक बूँद के अंदर असंख्यात जीव हैं। अभी इतना बड़ा जीव उसके अंदर डुबकी लगाएगा तो कितने जीवों का घात होगा! तो मतलब ऐसा कुछ विवेक नहीं करता और बस उसी मस्ती में मस्त हो जाता है। मतलब एकदम तीव्र विषयों की आसक्ति और नए-नए प्रोग्राम खड़े करना, मतलब भोग आदि के।
और ऐसे ही लोगों के बीच में रहना, ऐसे ही वीडियोज़ देखना, ऐसे ही इंस्टाग्राम में एडिक्ट हो जाना… और कोई अन्य जीव भोग रहा है, तो उसको देख-देख के, देख-देख के उसकी महिमा करना कि ‘अहा! कितना ज़ोरदार है, यह कितना ज़ोरदार है!’ मतलब यह सब जो है, वह तीव्र आसक्ति के परिणाम हैं। आप समझ रहे हैं? कि उसी में ही मस्त हो जाता है जीव। तो यह तीव्र आसक्ति के परिणाम हैं, यह अनंतानुबंधी कषाय के अंदर आते हैं। अनंतानुबंधी क्रोध-मान-माया-लोभ के कषाय के अंदर आते हैं और इसका परिणाम जो है, वह अनंत संसार तक उसको भोगना पड़ता है।
तो ऐसे परिणाम विषय-कषाय के प्रति अति आसक्ति के परिणाम। फिर जैसे मंदिर के अंदर भी आता है अनंतानुबंधी कषाय में जो जीव, मंदिर के अंदर भी आता है तो वहाँ पे आकर भी वह अपना मान-कषाय पुष्ट करना चाहता है। जैसे कुछ दान दिया हो, या फिर कुछ न कुछ विशिष्ट काम किया हो मंदिर के अंदर, तो वहाँ पे वह अपने मान-कषाय की पुष्टि चाहता है। जैसे अपना नाम डिक्लेयर हो जाए, कुछ अपना स्वागत-सम्मान जैसा हो जाए, तो मुझे बहुत अच्छा लगे। तो वह ऐसा कुछ हो जाए, और नहीं होवे तो उसको बुरा लग जाए। और वही बात का वह स्मरण करता रहे कि ‘मेरा नाम ज़िक्र नहीं किया, मेरा नाम डिक्लेयर नहीं किया, मैंने इतना धन दिया, मैंने इतना काम किया था मंदिर में।’ तो वहाँ पे जाकर भी वह अपना मान-कषाय की पुष्टि करना चाहता है। वह सब अनंतानुबंधी कषाय वाले जीव हैं।
और जैसे ऐसा भी कहते हैं कि उसको शायद मंदिर निर्माण का भी काम वह करेगा और धर्मानुराग भी वह करेगा, जैसे स्वाध्याय में भी बैठेगा, प्रवचन में भी बैठेगा, वह सब भी करेगा, लेकिन वहाँ पे जाकर भी अपना वह अस्तित्व पुष्ट करना चाहता है। वह सहजता में यह सब सीखने के लिए भद्र परिणाम से बैठा नहीं है। वह कहीं न कहीं कि ‘मैं बैठा हूँ, सब लोग मुझे देखें कि मैं भी एक धार्मिक जीव हूँ’—उस तरह से वह अपना अस्तित्व स्थापित करना चाहता है।
तो यह सब जो परिणाम आते हैं, वह अनंतानुबंधी कषाय के परिणाम हैं। और ऐसे परिणामों के कारण जीव को सम्यक्त्व नहीं हो पाता है। क्योंकि वह ऐसे परिणाम जो हैं, वह अपने शरीर के संबंधित हैं। मतलब शरीर से ही अपना अस्तित्व स्थापित करना चाहता है और ऐसे परिणाम होने के कारण उसको आत्मा दिखाई ही नहीं देता। बस उसको ‘शरीर ही मैं हूँ’, बस उसी संबंधित उसकी क्रियाएँ, उसके परिणाम, उसके भाव बस ऐसे ही चलते रहते हैं।
सम्यग्दृष्टि को क्या होना चाहिए? कि ‘मैं तो एक चैतन्य स्वरूपी आत्मा हूँ। अभी जो लोग मुझे जैसे कोई किशन के नाम से देख रहा है, तो ठीक है, यह तो इस समय की पर्याय है।’ तो वह ऐसा नहीं सोचता है। तो ऐसा हमें सोचना चाहिए तो हम सम्यक्त्व की ओर आगे बढ़ेंगे।
अप्रत्याख्यान कषाय
अभी अनंतानुबंधी कषाय हो गई, अब फिर आएगी अप्रत्याख्यान।
अभी प्रत्याख्यान का मतलब ऐसा होता है कि त्याग। प्रत्याख्यान का मीनिंग होता है त्याग, और अप्रत्याख्यान का मीनिंग होता है त्याग नहीं होना। आप समझ रहे हैं? जैसे हम कोई भी ऑपोजिट होता है तो उसके आगे ‘अ’ लगा देते हैं, तो वह उसका ऑपोजिट हो जाता है। तो इसी के अंदर जैसे प्रत्याख्यान, तो उसका ऑपोजिट हो गया अप्रत्याख्यान।
तो यहाँ पे किंचित् भी त्याग नहीं होने देता। उसको वह जो कषाय होती है, वह अप्रत्याख्यान… जैसे कुछ लोग कहते हैं ना कि ‘हम… मैं एक भी नियम नहीं ले सकता।’ मतलब ‘मैं नियम एक भी नहीं ले सकता’, तो वह जो है वह अप्रत्याख्यान जो परिणाम है, वह उसको बोलता है। मतलब वह परिणाम के… वह कषाय के कारण वह नियम नहीं ले पाता है। मतलब वह पुरुषार्थ नहीं कर पाता है, उसकी पुरुषार्थ में कमजोरी पड़ी हुई है।
तो वह अप्रत्याख्यान के कषाय हैं। अभी अप्रत्याख्यान कषाय वाला जो जीव है, वह सम्यग्दृष्टि हो सकता है। तो उसके अंदर कैसे परिणाम आएँगे? तो भक्ति-भाव के परिणाम आएँगे। भगवान के प्रति भक्ति का परिणाम आएगा। और वह भक्ति ऐसी होगी कि वहाँ पे वह अपना अस्तित्व स्थापित नहीं, परंतु भगवान के प्रति उसको सही में महिमा आ रही हो, उनके गुणों की महिमा। ऐसा नहीं कि गुणों की महिमा आ रही हो… ऐसा नहीं कि उनके बाहर के जो मतलब पहले वह राजा थे, फिर चक्रवर्ती भी थे, तो इसीलिए उनकी महिमा आ रही है—ऐसा नहीं है।
मतलब सही में बोलें ना, तो आप्तमीमांसा जो है, उसमें वह देवागम स्तोत्र में पहला श्लोक आता है ना—
देवागम नभोयान चामरादिविभूतयः। मायाविष्वपि दृश्यन्ते नातस्त्वमसि नो महान्॥
तो मतलब देव उनको नमस्कार कर रहे हैं इसीलिए हमें उनकी महिमा आती है—ऐसा नहीं है। उन्होंने जो पुरुषार्थ किया है, उन्होंने जो संसार अवस्था में पुरुषार्थ करके वे भगवान बने हैं, तो वैसा भी मैं बन सकता हूँ—इस जो पुरुषार्थ है, वह पुरुषार्थ की हमें महिमा आती है। आप समझ रहे हैं? तो वह उस महिमा करके वह भक्ति करता है।
फिर जैसे सामने वाला जीव कोई कषाय करता हो, तो वह सामने झुक जाता है—’हाँ भाई, आप सही हो’—ऐसा करके वह छोड़ देता है। मतलब वह सामने कषाय करने के लिए खड़ा नहीं रहता है। तो वह ऐसा जो परिणाम होता है, वह अप्रत्याख्यान का परिणाम होता है, अप्रत्याख्यान कषाय का। मतलब वह ढीला हो जाता है। वह तीव्र कषाय के सामने वह भी तीव्र कषाय करे ऐसा नहीं, वह ढीला हो जाता है।
जैसे एक एकदम सिंपल उदाहरण से हम समझते हैं कि जैसे दो भाई हैं। अभी दो भाई के बीच में प्रॉपर्टी का बँटवारा हुआ। अभी ऐसा हुआ कि समझ लो कि जैसे 1 करोड़ की प्रॉपर्टी थी। 1 करोड़ की प्रॉपर्टी थी, अभी 50-50 लाख दोनों के बीच में डिवाइड होने थे। अभी एक भाई ने ऐसा किया कि मतलब कुछ ज़्यादा दिमाग़ इस्तेमाल करके 50 लाख की जगह 60 या 65 लाख उसके साइड आ गए। मतलब अच्छी वाली जो वस्तुएँ थीं, front वाली जो प्रॉपर्टी थी, वह उसने ले ली और जो थोड़ी डीम थी (अच्छी नहीं थी), तो वह उसने दूसरे भाई को दी।
तो अगर दूसरा भाई अगर सम्यग्दृष्टि होगा, तो वह ऐसा मानेगा… एक-दो बार कहेगा कि ‘यह जो हुआ वह ठीक नहीं हुआ है, अपन को इस तरह से होना चाहिए।’ अप्रत्याख्यान कषाय में ऐसा कहेगा कि ‘हम दोनों को एक जैसा होना चाहिए था।’ तो फिर वह सामने वाला नहीं माने, उसका भाई नहीं माने और कषाय करे, तो वह फिर तुरंत छोड़ देगा कि ‘ठीक है, अभी मेरे पुण्य में जितना था उतना मुझे मिल गया।’ लेकिन एक बार वह कहेगा, अप्रत्याख्यान कषाय वाला।
और अनंतानुबंधी कषाय वाला क्या करेगा? वह कोर्ट में जाएगा! अपने भाई के ऊपर केस करेगा कि ‘यह जो डिवाइड हुआ है वह बराबर नहीं हुआ है’, वकील रोकेगा। तो वह सब और फिर दोनों भाइयों के बीच में कोर्ट में चक्कर चलेगा। तो वह सब कहेगा अनंतानुबंधी कषाय। और अप्रत्याख्यान कषाय वाला एक-दो बार कहेगा, अगर नहीं हुआ तो ‘ठीक है, मेरे पुण्य में जितना था उतना मुझे मिल गया’—ऐसा मान के वह छोड़ देगा। तो ऐसा हमारा परिणाम होना चाहिए कि अति कषाय का परिणाम नहीं होना चाहिए। अपना नुकसान हो रहा हो तो एक-दो बार बोलेगा, नहीं हुआ तो ठीक है फिर ‘भाई तू ले जा, कोई बात नहीं, मेरे पुण्य में जितना था इतना ही मुझे मिला’—ऐसा होना चाहिए। फिर विषय-कषाय में शायद वह क्रिया करेगा, लेकिन उसको वह क्रिया के प्रति आसक्ति नहीं है। उसको वह क्रिया के प्रति अंदर से कहें ना तो रुचि हट गई है।
अप्रत्याख्यानावरण कषाय और प्रायश्चित
फिर अप्रत्याख्यान वाला जो जीव होगा, उसने पूरे मतलब दिन में या फिर पूरे मतलब महीने में, पूरे एक हफ्ते में कोई भी मतलब पाप का काम किया होगा, तो वह प्रतिदिन भगवान के सामने या देव-शास्त्र-गुरु के सामने पश्चाताप का भाव करेगा। मतलब उसने पूर्व भव में या फिर इस भव में कुछ न कुछ पाप का काम किया हो। प्रतिदिन, वह जैसे इसमें जिनवाणी के अंदर है—प्रतिक्रमण है, सामायिक है—तो वह अपने किए हुए पापों का प्रायश्चित करेगा कि भाई ऐसी गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए।
जैसे किसी के ऊपर कषाय हो गई हो, ठीक है? औदयिक भावों के कारण या फिर ऐसी कोई Situation के कारण उसको कषाय हो गई हो—घर में या फिर बाहर में किसी के साथ—तो वह कषाय का वह बहुत प्रायश्चित करेगा। आप समझे? कि कषाय हो गई तो ठीक है, मेरी थोड़ी न गलती थी, ऐसा मान के वह ऐसा नहीं, ऐसा नहीं होगा। उसको भले ही सामने वाले की गलती थी या फिर कुछ भी था, लेकिन उसने स्वयं ने तो कषाय की न? तो वह स्वयं की कषाय का भी वह प्रायश्चित करेगा।
जैसे पुत्र के ऊपर कषाय हो गई हो या कुछ न कुछ हो गया हो, कोई जीव की हिंसा हो गई हो। प्रतिदिन हमसे तो मतलब छोटी-मोटी हिंसा तो होती रहती है। मतलब कोई छोटे-छोटे जीव हों या गमन आदि करने में या फिर कुछ भोजन आदि क्रिया करने में हिंसा हो गई हो, पानी छानने में… मतलब कुछ न कुछ हिंसा ही चलती रहती है। तो वह सभी पापों का वह प्रतिदिन प्रायश्चित करेगा। अंदर के मतलब अंदर से वह प्रायश्चित करेगा, तभी तो वह अप्रत्याख्यान कषाय के अंतर्गत आएगा। उसके परिणाम प्रतिदिन ढीले होंगे। ऐसा नहीं कठोरता कि यह लोग, यह तो सब कर रहे हैं, मतलब जैसे होटल में तो सब खा रहे हैं, तो हम तो खाएं न? अरे, ऐसा नहीं होगा, ऐसा बिल्कुल भी नहीं होगा। अगर एकाध दिन भी अगर वह वहां पर चला भी जाए, तो भी उसको प्रायश्चित बहुत होगा।
आप समझ रहे हैं? तो प्रतिदिन वह प्रायश्चित करेगा और हमें प्रतिदिन प्रायश्चित करना चाहिए। तभी तो हमारी परिणति ढीली होगी, क्योंकि कठोर परिणति में धर्म-ध्यान नहीं हो सकता। यहां पर ढीली परिणति चाहिए।
प्रत्याख्यानावरण कषाय और अणुव्रत
अभी प्रत्याख्यान का मतलब होता है त्याग, ठीक है? अभी यहां पर आती है अणुव्रत की बात। अभी यह जीव जब… अभी अप्रत्याख्यान में क्या था? कि वह घर में रहेगा, विषय-भोग में भी जाएगा, लेकिन वह प्रायश्चितपूर्वक होगा। अभी वह उससे और आगे बढ़ गया है—प्रत्याख्यान कषाय में। अभी प्रत्याख्यान कषाय में क्या होता है कि उसको विषय-भोग सम्बन्धी जो हिंसा आदि जो क्रियाएं हैं, उसका सर्वांग रूप से उसने त्याग कर दिया है। आप समझ रहे हैं? जिसमें त्रस जीव की हिंसा होती हो, उतना उसका उसने सर्वांग रूप से त्याग कर दिया है।
तो वह कहलाएगा अणुव्रती जीव। अभी जैसे अणुव्रती सर्वांग रूप से—मतलब जैसे कोई जहां पर त्रस जीवों की, मतलब जैसे भोजन में कुछ त्रस जीवों की उत्पत्ति होती हो, ऐसा भोजन वह नहीं करेगा, जैसे द्विदल है या फिर हमने जो बाह्य सभक्ष की बात की, तो वह सभी का वह सेवन कभी भी नहीं करेगा, उसने सर्वांग रूप से त्याग कर दिया है।
फिर उसके अलावा वह क्या करेगा? क्योंकि यहां पर उसका पुरुषार्थ हो गया है कि भाई अशुभ से तो वह ज्यादातर हट गया है। मतलब ज्यादातर वह, मतलब यूं समझ लो कि ज्यादातर परिणाम उसके अशुभ से तो हट गए हैं, शुभ के माध्यम से मतलब—जैसे सामायिक करने बैठा, तो वह प्रतिदिन वह प्रत्याख्यान कषाय वाला जो जीव है, मतलब अणुव्रती जो जीव है, वह सामायिक करने बैठेगा, ठीक है?
तो सामायिक करने के लिए जब वह बैठेगा, तब शुरुआत में तो शुभ भाव होगा, तो वह ज्यादातर समय शुभ उसके करीब पहुंचने के लिए वह पुरुषार्थ करता रहेगा प्रतिदिन। मतलब अष्टमी, चौदस जो होती है, अष्टमी-चतुर्दशी, तो उस दिन वह उपवास करेगा। तो उपवास के दिन वह क्या करेगा? कि दिन में कम से कम तीन से चार घंटे वह शुद्धोपयोग के लिए पुरुषार्थ करेगा, आत्मा का अनुभव करने के लिए वह पुरुषार्थ करेगा। समझ रहे हैं? और बाकी का टाइम स्वाध्याय आदि में लगाएगा।
वीतराग भाव सहित जो शुभ भाव होता है, तो वह शुभ भाव भी बहुत कार्यकारी होता है। तो यह जो जीव है, उसको अशुभ के प्रति तो बिल्कुल अरुचि हो गई है ठीक है? फिर यह हिंसामय जो धर्म की क्रिया होती है, उसमें वह बिल्कुल भी अनुमोदन या फिर कृत-कारित का कार्य नहीं करेगा। लेकिन जैसे किसी को प्रवचन करना हो, पाठशाला पढ़ानी हो, तो वह सब वह करेगा, ठीक है? लेकिन जो सम्यक् दृष्टि जीव है, तो वह मंदिर बनवा सकता है, लेकिन उसके आगे पंचम गुणस्थानवर्ती है, जो अणुव्रती है, वह हिंसामय कुछ भी परिणाम वह नहीं करेगा, ठीक है?
फिर धीरे-धीरे जो उसका परिग्रह है—जो अणुव्रती जो होता है न—वह धीरे-धीरे उसका परिग्रह है वह कम करता चला जाएगा, क्योंकि ज्यादा परिग्रह है उसमें ज्यादा उलझनें हैं, ज्यादा उपयोग लगता है। तो वह वह सब कम करके-करके और सीमित परिग्रह बना रहेगा। जैसे अणुव्रती जीव के पास जैसे समझ लो तीन या चार जोड़ी कपड़े रखेगा। फिर घर होगा, तो घर में कुछ ज्यादा फर्नीचर-वर्नीचर ऐसा कुछ भी नहीं, एकदम जितनी जरूरत हो—एक बेड मतलब पाट हो या कुछ पाट, कुछ बर्तन हो, बर्तन की भी वह मर्यादा रखेगा कि भाई इतने ही बर्तन। फिर सभी वस्तुओं के—कपड़े हों तो कपड़े, फिर धन हो, पैसा हो—तो पैसा की भी वह मर्यादा रखेगा कि इससे आगे हमें नहीं कमाना है, क्योंकि ज्यादा कमाने में भी फिर वह ज्यादा उलझनें हैं। तो उसमें भी वह सीमित रखेगा।
फिर जितनी भी वस्तुएं हैं, जैसे घर में भी कुछ सामान हो, तो उसकी भी वह मर्यादा रखेगा कि भाई जैसे गेहूं है तो गेहूं इससे ज्यादा नहीं, बादाम है या फिर सभी वस्तुओं की वह मर्यादा बना के रखेगा कि भाई उसमें ज्यादा उलझनें न हों। ज्यादा वस्तुएं होंगी तो ज्यादा विकल्प होंगे। तो चप्पल होगा तो एकाध जोड़ी शायद होगा, उससे ज्यादा नहीं, तीन-चार जोड़ी ऐसा नहीं होगा, एकाध जोड़ी अणुव्रती होगा वह। तो वह कम से कम, कम से कम वह सामान रखेगा, तो इससे ज्यादा उसको विकल्प… जैसे मतलब अगर एक जोड़ी चप्पल है तो उसको कोई विकल्प ही नहीं है। अगर 10 जोड़ी, 20 जोड़ी चप्पल है तो वह कितना विकल्प! मतलब उसमें कोई खराब हो गया या फिर कौन सा पहनूं, कौन सा नहीं पहनूं, वह सम्बन्धी विकल्प, फिर उसको सफाई करने का विकल्प, तो वह सब में पूरा मतलब जीवन चला जाता है। मतलब ऐसे सभी वस्तु में हम लगा सकते हैं। तो वह सब का वह धीरे-धीरे वह कम करता चला जाएगा और निराकुलता की ओर आगे बढ़ेगा, ठीक है?
संज्वलन कषाय और मुनिपद
फिर उसके बाद आती है संज्वलन कषाय। अभी संज्वलन कषाय में वह घर में नहीं रहेगा, क्योंकि उसको बिल्कुल भी परिग्रह नहीं चाहिए। आप समझ रहे हैं? मतलब मुनिराज की बात करते हैं, मुनिराज की बात। कि संज्वलन कषाय में वह सब वस्तुओं का त्याग कर देगा। सभी—मतलब एक भी किंचित मात्र भी परिग्रह वह रखना नहीं चाहता। घर, कपड़े, सामान आदि सब का त्याग और घर छोड़ के जंगल में चला जाएगा। क्योंकि यह सब में भी घर में रहना भी बहुत उलझनें, बहुत विकल्प हैं, बहुत मतलब उसमें उपयोग चला जाता है। अभी यहां पर जो संज्वलन कषाय में जो जीव आ गया, वह ऐसा है कि बस उसको एक ही लक्ष्य है कि उसको शुद्धोपयोग करना है और भगवान बनना है। बस एक ही लक्ष्य, उसके अलावा और कुछ भी लक्ष्य नहीं है।
मतलब अगर वह आहार भी करेगा, तो भी उसमें एक ही लक्ष्य है कि मेरी साधना में बाधक न हो। अगर वह विहार भी करेगा, तो इसीलिए करेगा कि भाई कोई एक क्षेत्र के प्रति राग न हो जाए। मतलब मुनिराज तीन-चार दिन, तीन-चार दिन में जगह बदलते रहते हैं। एक जगह पे मतलब स्थिर नहीं रहते हैं, ऐसा क्यों करते हैं? क्योंकि वह क्षेत्र के सम्बन्धी राग हो जाता है, उस क्षेत्र के सम्बन्धी मोह हो जाता है—’भाई यह हमारा अच्छा एरिया है, मतलब यहां पे अच्छा लगता है, यह लोग अच्छे हैं।’ मतलब ऐसा किसी के प्रति वह राग बढ़ाना ही नहीं चाहते। इसीलिए वह प्रतिदिन मतलब कुछ-कुछ दिनों में वह जगह बदलते रहते हैं।
तो अभी उनको मतलब किसी के प्रति राग नहीं, किसी के प्रति द्वेष नहीं, कुछ भी नहीं, सिर्फ और सिर्फ एक ही काम है—आत्मा का अनुभव करना है, बस। अभी यह शरीर का भी उन्होंने एक तरह से यूं कहें कि भाई शरीर का भी उन लोगों ने बुद्धिपूर्वक उसमें वह उलझना नहीं चाहते। शरीर को इसीलिए टिकाये रखना चाहते हैं कि भाई उनकी साधना में बाधक न हो, बस उसी के लिए वह टिकाये रखना चाहते हैं।
परिहास अरति रति शोक, भय ग्लानि त्रिवेद संयोग
पनबीस जु भेद भये इम, इनके वश पाप किये हम ॥१३॥
शब्दार्थ
- परिहास — हास्य, उपहास।
- अरति — अप्रसन्नता, अरुचि।
- रति — आसक्ति, प्रसन्नता या अनुराग।
- शोक — दुःख, विषाद।
- भय — डर।
- ग्लानि — घृणा/अरुचि/मन की विक्षुब्धता।
- त्रिवेद — स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद।
- पच्चीस भेद — कुल २५ नोकषाय-भेद।
अब इसके साथ ही, यह तो 16 प्रकार की कषायें हैं, इसके अलावा ईषत् कषाय हैं, मतलब नौ कषाय कह लो इसको। जो थोड़े रूप में हैं, जिनकी कषाय की तीव्रता थोड़े रूप में है—जैसे हास्य, रति, अरति, शोक, भय और जुगुप्सा। और उसके बाद स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपुंसकवेद। तो यह जो है त्रिवेद—तीन वेद में तीन वेद आ गए: स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद। इस तरह से नौ नौ-कषाय हैं। इनका विभिन्न रूपों में प्रकट होना आत्मा में अनेक प्रकार की आसक्ति और विक्षेप उत्पन्न करता है। इन भावों का प्रभाव समझना महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए—
- अत्यधिक परिहास व्यक्ति को असंयमित वाणी की ओर ले जा सकता है।
- अरति से धर्म और संयम के प्रति अरुचि उत्पन्न हो सकती है।
- रति से विषयों के प्रति आसक्ति बढ़ सकती है।
- शोक विवेक को कमजोर कर सकता है।
- भय व्यक्ति को अनुचित कर्म करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
- ग्लानि मन को अस्थिर कर सकती है।
- वेद विषय-आकर्षण और आसक्ति को बढ़ाने वाले भावों से जुड़े हैं।
‘पन बीस जु भेद भये इम‘, तो यह सारे, जो 16 कषाय तो यह और नौ नोकषाय, यह मिलकर के कितने हो गए तो कुल मिलाकर हुईं 25 कषाय। मतलब अनंतानुबंधी की संबंधित… अनंतानुबंधी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान, संज्वलन 4 × 4 = 16 और 9 ये, Total 25 कषाय। यह जो 25 प्रकार की कषाय हो गई,
‘इन के वश पाप किये हम‘, मैंने इनके वश बहुत पाप किया है। यानी मैंने क्रोध, मान, माया, लोभ किया है। मैंने वह जो क्रोध, मान, माया, लोभ है, वह मेरा—मैंने बहुत समय तक अपने भीतर रखा किसी के प्रति, या फिर मैंने जो है उसको 6 महीने के लिए रखा, मैंने 15 दिन के लिए रखा या और कम समय के लिए रखा। मैंने हास्य करा, मैंने किसी से रति करी, अरति करी, शोक करा, भय मुझे लगा, मैंने किसी से घृणा का भाव रखा, मैंने पुरुषवेद, स्त्रीवेद—पुरुष में रमने की इच्छा करी, स्त्री से रमने की इच्छा करी या फिर नपुंसकवेद, यानी स्त्री और पुरुष दोनों से मैंने रमने की इच्छा करी। तो इनके थ्रू जो मैंने पाप कमाए हैं, इनके थ्रू मैंने बहुत तरह से पाप कमाए हैं।
आलोचना-पाठ Home page
आलोचना-पाठ – छंद 1 से 4 | छंद 5 से 7 | छंद 8 व 9 | छंद 10 व 11 |