Summary of Uttar Puran Parv 70 by Acharya Gunabhadra
उत्तरपुराण पर्व 70 (श्लोक 1–497) का संक्षिप्त सारांश
उत्तरपुराण के सत्तरवें पर्व में नवम नारायण श्रीकृष्ण तथा उनके परिवार से संबंधित घटनाओं का विस्तृत वर्णन किया गया है। प्रारम्भ में अन्धकवृष्टि पूर्वभवों का ज्ञान प्राप्त कर वैराग्य धारण करते हैं, राज्य समुद्रविजय को सौंपकर दीक्षा लेते हैं और अंततः मोक्ष प्राप्त करते हैं। समुद्रविजय के शासनकाल में वसुदेव अपने अनुपम सौन्दर्य और पराक्रम के कारण प्रसिद्ध होते हैं। नगरवासियों की शिकायत से दुःखी होकर वे गुप्त रूप से नगर त्याग देते हैं और विभिन्न देशों की यात्राओं के दौरान अनेक राजकुमारियों से उनका विवाह होता है।
वसुदेव के जीवन में अनेक अद्भुत घटनाएँ घटती हैं। वे विद्याधरों के प्रदेशों में सम्मान प्राप्त करते हैं, गन्धर्वदत्ता के स्वयंवर में अपनी संगीत-कला से विजय प्राप्त करते हैं तथा अनेक राजकन्याओं से विवाह करते हैं। बाद में वे पुनः अपने परिवार से मिलते हैं। उनकी पत्नी रोहिणी से पद्म नामक पुत्र उत्पन्न होता है, जो आगे चलकर नवम बलभद्र बनता है।
इसी पर्व में वशिष्ठ तापस की कथा आती है, जो अज्ञानपूर्ण तप का त्याग कर मुनि बनता है, किन्तु अंत में क्रोध और निदान के कारण उग्रसेन के पुत्र कंस के रूप में जन्म लेता है। कंस अपनी जन्मकथा जानकर माता-पिता को कारागार में डाल देता है तथा बहन देवकी का विवाह वसुदेव से कर देता है। अतिमुक्त मुनि की भविष्यवाणी से उसे ज्ञात होता है कि देवकी का पुत्र उसका विनाश करेगा, जिससे वह भयभीत रहने लगता है।
देवकी के प्रथम छह पुत्र देवों की व्यवस्था से सुरक्षित अन्यत्र पहुँचाए जाते हैं। सातवें गर्भ से उत्पन्न होने वाले महान पुरुष को बचाने के लिए वसुदेव और बलदेव उसे गुप्त रूप से नन्दगोप के घर पहुँचा देते हैं और वहाँ की कन्या को ले आते हैं। वही बालक आगे चलकर श्रीकृष्ण कहलाता है। बाल्यकाल में कृष्ण पूतना तथा अन्य देवियों और असुरों के अनेक उपद्रवों को विफल कर देते हैं। वे अर्जुन वृक्षों को उखाड़ते हैं, ताड़-वृक्ष सम्बन्धी संकटों का निवारण करते हैं, गोवर्धन पर्वत उठाकर गौओं की रक्षा करते हैं तथा अपने असाधारण बल और साहस से सबको चकित कर देते हैं।
कृष्ण की बढ़ती हुई कीर्ति से भयभीत कंस उनकी परीक्षा लेने के लिए विभिन्न उपाय करता है। नागशय्या, शंख और धनुष जैसे दिव्य रत्नों की सिद्धि, सहस्रदल कमल की प्राप्ति तथा विषधर नाग पर विजय प्राप्त कर कृष्ण अपने असाधारण पुरुषार्थ का परिचय देते हैं। अंततः कंस उन्हें मथुरा बुलाकर मल्लयुद्ध के माध्यम से समाप्त करना चाहता है। कृष्ण मत्त हाथी को परास्त कर रंगभूमि में प्रवेश करते हैं, चाणूर जैसे बलशाली मल्ल का वध करते हैं और अंत में स्वयं कंस को युद्ध में मारकर उसका अत्याचार समाप्त कर देते हैं।
पर्व के अंत में श्रीकृष्ण की विजय, उनके अप्रतिम पराक्रम, पुण्यबल और भावी सार्वभौम महिमा का वर्णन किया गया है। इस प्रकार यह पर्व श्रीकृष्ण के जन्म, बाल्यकाल, पराक्रम, कंस-वध तथा उनके नारायणत्व की प्रतिष्ठा का विस्तृत और प्रेरणादायक आख्यान प्रस्तुत करता है।
श्लोक 1 से 11 अपराजित का जन्म और बाल्यकाल
सिंहपुर नगर के राजा अर्हद्दास और रानी जिनदत्ता ने अष्टाह्निका महापूजा के पश्चात् पुत्र-प्राप्ति की कामना की। उसी रात्रि रानी ने पाँच शुभ स्वप्न देखे और एक पुण्यात्मा जीव उनके गर्भ में अवतीर्ण हुआ। नौ माह बाद एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम अपराजित रखा गया, क्योंकि उसके जन्म के बाद राजा शत्रुओं द्वारा अजेय हो गया था। अपराजित रूप, गुण और वैभव से युक्त होकर युवावस्था में इन्द्र के समान शोभायमान हुआ।
श्लोक 12 से 21 विमलवाहन तीर्थंकर के प्रति भक्ति
राजा अर्हद्दास ने विमलवाहन तीर्थंकर के दर्शन कर वैराग्य ग्रहण किया और राज्य पुत्र अपराजित को सौंप दिया। अपराजित ने श्रावक धर्म स्वीकार कर धर्मपूर्वक राज्य संचालन किया। जब उसे ज्ञात हुआ कि विमलवाहन भगवान मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं, तब उसने उनके दर्शन के बिना भोजन न करने का संकल्प लिया। आठ दिन उपवास के बाद यक्ष ने उसे भगवान का दिव्य दर्शन कराया। पूजा-वंदना करने के पश्चात् उसका संकल्प पूर्ण हुआ और उसने भोजन ग्रहण किया।
श्लोक 22 से 31 चारण ऋद्धिधारी मुनियों का आगमन और पूर्वजन्म का परिचय
अष्टाह्निका पर्व में अपराजित जिनपूजा कर धर्मोपदेश दे रहा था तभी दो चारण ऋद्धिधारी मुनि वहाँ आए। राजा ने विनयपूर्वक उनका सम्मान किया। मुनियों ने बताया कि पूर्वजन्म में वे तीन भाई थे—चिन्तागति, मनोगति और चपलगति। उसी प्रदेश में अरिञ्जय राजा की पुत्री प्रीतिमती रहती थी, जिसने अपनी विद्या से अनेक विद्याधरों को पराजित किया था।
श्लोक 32 से 43 वैराग्य, दीक्षा और पुनर्जन्म का वृत्तांत
प्रीतिमती ने केवल विजेता को ही पति स्वीकार करने का निश्चय किया। चिन्तागति के वचनों से उसे वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने आर्यिका दीक्षा धारण कर ली। उसके प्रभाव से अनेक लोग विरक्त हुए। चिन्तागति और उसके दोनों भाइयों ने भी संयम ग्रहण किया तथा चौथे स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से आयु पूर्ण कर दोनों छोटे भाई अमितमति और अमिततेज के रूप में जन्मे। स्वयंप्रभ तीर्थंकर से उन्हें अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान हुआ और उन्होंने जाना कि उनका बड़ा भाई सिंहपुर में अपराजित राजा के रूप में जन्मा है।
श्लोक 44 से 52 अपराजित का संन्यास और स्वर्गगमन
दोनों मुनियों ने अपराजित को बताया कि उसकी आयु केवल एक माह शेष है, अतः आत्मकल्याण का विचार करे। राजा ने उनका आभार व्यक्त किया, राज्य पुत्र प्रीतिकर को सौंप दिया, अष्टाह्निका पूजा सम्पन्न की और प्रायोपगमन संन्यास धारण कर लिया। संन्यास के प्रभाव से वह सोलहवें स्वर्ग के अच्युतेन्द्र पद को प्राप्त हुआ। वहाँ से च्युत होकर हस्तिनापुर में राजा श्रीचन्द्र और रानी श्रीमती के पुत्र सुप्रतिष्ठ के रूप में जन्मा।
श्लोक 53 से 61 सुप्रतिष्ठ का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म का बंध
राजा श्रीचन्द्र ने राज्य सुप्रतिष्ठ को सौंपकर दीक्षा धारण कर ली। सुप्रतिष्ठ ने धर्मपूर्वक राज्य किया और यशोधर मुनि को आहारदान देकर महान पुण्य अर्जित किया। एक दिन उल्कापात देखकर उसे संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उसने पुत्र सुदृष्टि को राज्य देकर संयम ग्रहण किया। ग्यारह अंगों का अध्ययन तथा सोलह कारण भावनाओं का चिंतन करके उसने तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया। समाधिपूर्वक मृत्यु के बाद वह जयन्त अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव हुआ।
श्लोक 62 से 71 वीरदत्त का वैराग्य
अहमिन्द्र देव रूप में दीर्घकाल तक दिव्य सुख भोगने के पश्चात् आगे उसके वंश का वर्णन किया गया। कौशाम्बी में सुमुख नामक धनवान सेठ रहता था। कलिंग देश का वैश्य वीरदत्त अपनी पत्नी वनमाला सहित वहाँ आकर रहने लगा। सुमुख वनमाला पर मोहित हो गया और छलपूर्वक वीरदत्त को व्यापार हेतु दूर भेजकर वनमाला को अपने पास रख लिया। बारह वर्ष बाद लौटकर जब वीरदत्त ने यह स्थिति देखी, तब संसार की दुःखमयता का विचार कर उसने प्रोष्ठिल मुनि के पास दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 72 से 83 चित्रांगद देव और सिंहकेतु–विद्युन्माला की रक्षा
वीरदत्त संन्यास-मरण कर सौधर्म स्वर्ग में चित्रांगद देव हुआ। दूसरी ओर सुमुख और वनमाला ने पश्चात्तापपूर्वक धर्मसिंह मुनि को आहारदान दिया, किन्तु अगले ही दिन वज्रपात से उनकी मृत्यु हो गई। पुनर्जन्म में सुमुख सिंहकेतु और वनमाला विद्युन्माला के रूप में उत्पन्न हुए। चित्रांगद देव ने पूर्व वैर के कारण उन्हें मारने का विचार किया, परन्तु सूर्यप्रभ देव ने उसे समझाकर ऐसा करने से रोक दिया। अंततः दोनों को सुरक्षित रूप से चम्पापुर के वन में पहुँचा दिया गया।
श्लोक 84 से 94 माकण्डेय का राज्यारोहण और हरिवंश की परंपरा
चम्पापुर का राजा पुत्रहीन मर गया था। योग्य उत्तराधिकारी की खोज के लिए शुभलक्षणयुक्त हाथी छोड़ा गया। वह हाथी सिंहकेतु और विद्युन्माला को अपने ऊपर बैठाकर नगर ले आया। मंत्रियों ने सिंहकेतु का राज्याभिषेक किया। उसके माता-पिता के नाम जानकर लोगों ने उसका नाम माकण्डेय रखा। माकण्डेय ने दीर्घकाल तक राज्य किया। उसके वंश में अनेक राजा हुए और अंततः शौर्यपुर के पराक्रमी राजा शूरसेन का जन्म हुआ। शूरसेन के पुत्र वीर और उसकी पत्नी धारिणी से अन्धकवृष्टि तथा नरवृष्टि नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 95 से 111 यदुवंश, कौरव वंश और कर्ण का जन्म
अन्धकवृष्टि और सुभद्रा से समुद्रविजय, वसुदेव आदि दस पुत्र तथा कुन्ती और माद्री नामक दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। नरवृष्टि से उग्रसेन, देवसेन और महासेन नामक पुत्र हुए। दूसरी ओर कौरव वंश में पराशर, व्यास, धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर की वंशपरम्परा का वर्णन किया गया। एक विद्याधर की चमत्कारी अंगूठी पाण्डु को प्राप्त हुई, जिससे वे इच्छानुसार अदृश्य हो सकते थे। उसी अंगूठी के प्रभाव से कुन्ती के साथ उनके संसर्ग से कर्ण का जन्म हुआ। लोकलज्जा के कारण नवजात कर्ण को कुण्डल और कवच सहित एक संदूक में रखकर यमुना नदी के प्रवाह में बहा दिया गया।
श्लोक 112 से 124 पाण्डवों का जन्म और सुप्रतिष्ठ का केवलज्ञान
कर्ण के पालन-पोषण के बाद पाण्डु का कुन्ती और माद्री के साथ विधिपूर्वक विवाह हुआ। कुन्ती से युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन उत्पन्न हुए, जो धर्म, अर्थ और काम के समान श्रेष्ठ माने गए। माद्री से सहदेव और नकुल का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र और गांधारी से दुर्योधन सहित सौ पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए। इसी समय गन्धमादन पर्वत पर सुप्रतिष्ठ मुनिराज विराजमान हुए। राजा शूरवीर ने उनके उपदेश से वैराग्य प्राप्त कर राज्य अन्धकवृष्टि को सौंप दिया और स्वयं संयम धारण कर लिया। बारह वर्ष बाद सुप्रतिष्ठ मुनि ने घोर उपसर्ग सहकर घातिया कर्मों का क्षय किया और केवलज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 125 से 131 सूरदत्त और सुदत्त की लोभजनित भूल
अन्धकवृष्टि के प्रश्न पर सुप्रतिष्ठ भगवान् ने बताया कि कलिंग देश के काञ्चीपुर में सूरदत्त और सुदत्त नामक दो वैश्य भाई रहते थे। उन्होंने विदेशों से बहुत धन कमाया, किन्तु कर देने के भय से उसे नगर के बाहर गाड़ दिया। अगले दिन एक व्यक्ति को वह धन मिल गया और वह उसे लेकर चला गया। जब दोनों भाइयों ने अपना धन नहीं पाया, तब वे एक-दूसरे पर चोरी का आरोप लगाकर वैरभाव में पड़ गए।
श्लोक 132 से 144 वैर के दुष्परिणाम और सुप्रतिष्ठ का पूर्वभव
धन के मोह और क्रोध से दोनों भाइयों ने परस्पर युद्ध कर प्राण त्याग दिए तथा नरकगति को प्राप्त हुए। वहाँ से निकलकर वे अनेक जन्मों में मेढ़े, बैल और वानर बने, किन्तु प्रत्येक जन्म में पूर्व वैर के कारण संघर्ष करते रहे। वानर योनि में एक वानर ने चारण ऋद्धिधारी मुनियों से नमोकार मंत्र सुना और शुभ परिणामों से सौधर्म स्वर्ग में चित्रांगद देव बना। बाद में वही जीव पोदनपुर के राजा सुस्थित के पुत्र सुप्रतिष्ठ के रूप में जन्मा। पूर्वजन्म का स्मरण होने पर उसने दीक्षा ग्रहण की। उसका पूर्वभव का भाई सुदत्त आगे चलकर सुदर्शन देव बना और पूर्व वैर के कारण उसने सुप्रतिष्ठ पर उपसर्ग किया था। यह जानकर सुदर्शन देव ने वैर त्याग दिया और धर्म का आश्रय लिया।
श्लोक 145 से 153 धर्मशील सेठ और विश्वासघाती मित्र
अन्धकवृष्टि ने अपने पूर्वभव का वृत्तांत जानना चाहा। तब सुप्रतिष्ठ भगवान् ने बताया कि अयोध्या में सुरेन्द्रदत्त नामक धर्मशील सेठ रहता था, जो नियमित रूप से जिनपूजा, दान, शील और उपवास करता था। व्यापार के लिए विदेश जाते समय उसने बारह वर्षों की पूजा हेतु आवश्यक धन अपने मित्र रुद्रदत्त ब्राह्मण को सौंप दिया। किन्तु रुद्रदत्त ने उस धन को परस्त्रीगमन, जुआ और अन्य दुर्व्यसनों में नष्ट कर दिया।
श्लोक 154 से 164 रुद्रदत्त का पतन और दुःखद पुनर्जन्म
धन समाप्त होने पर रुद्रदत्त चोरी में प्रवृत्त हो गया। पकड़े जाने पर उसे नगर से निकाल दिया गया, परन्तु उसने दुष्कर्म नहीं छोड़ा। मृत्यु के बाद वह अनेक बार नरक, मछली, सिंह, सर्प, व्याघ्र, गरुड़ और भील आदि योनियों में जन्म लेकर घोर दुःख भोगता रहा। अंततः हस्तिनापुर में कपिष्टल गोत्र के ब्राह्मण के घर गौतम नामक अत्यन्त दरिद्र और दुःखी पुत्र के रूप में जन्मा। उसका जीवन भूख, अभाव, रोग और अपमान से भरा हुआ था।
श्लोक 165 से 181 गौतम का उद्धार और अन्धकवृष्टि का पूर्वभव
गौतम भिक्षा के लिए भटकता रहता था और अत्यन्त दीन अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहा था। एक दिन उसे समुद्रसेन मुनिराज के पीछे चलने का अवसर मिला। वैश्रवण सेठ ने उसे भोजन कराया। उसके मन में वैराग्य जागा और उसने मुनिराज से दीक्षा की प्रार्थना की। परीक्षण के बाद उसे संयम प्रदान किया गया। एक वर्ष में उसने उत्कृष्ट आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त की और अंत में समाधिमरण कर उच्च स्वर्ग में अहमिन्द्र देव हुआ। वहीं से च्युत होकर वह वर्तमान जन्म में अन्धकवृष्टि राजा बना। यह सुनकर अन्धकवृष्टि ने अपने पुत्रों के पूर्वभव का विवरण पूछना आरम्भ किया।
श्लोक 182 से 202 अन्धकवृष्टि के पुत्रों और पुत्रियों का पूर्वजन्म
भगवान् ने बताया कि भद्रिलपुर नगर में मेघरथ राजा और धनदत्त सेठ रहते थे। धनदत्त के नौ पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। मन्दिरस्थविर मुनि के उपदेश से राजा मेघरथ, धनदत्त तथा उनका परिवार वैराग्य को प्राप्त हुआ और सभी ने संयम धारण कर लिया। क्रमशः वे सब केवलज्ञान प्राप्त कर सिद्ध पद को प्राप्त हुए। धनदत्त की पत्नी नन्दयशा ने निदान किया कि अगले जन्म में भी यही पुत्र-पुत्रियाँ उसे प्राप्त हों। उसी भाव के कारण वह स्वर्ग से च्युत होकर अन्धकवृष्टि की रानी सुभद्रा बनी। उसके पूर्वजन्म के पुत्र ही वर्तमान जन्म में समुद्रविजय, वसुदेव आदि पुत्र बने तथा दोनों पुत्रियाँ प्रसिद्ध कुन्ती और माद्री बनीं। इसके बाद अन्धकवृष्टि ने विशेष रूप से वसुदेव की भवावली पूछी।
श्लोक 203 से 211 वसुदेव का पूर्वभव और महान भविष्य
भगवान् ने बताया कि कुरुदेश के पलाशकूट ग्राम में नन्दी नामक एक निर्धन ब्राह्मण-पुत्र रहता था। वह अपने मामा की पुत्रियों से विवाह करना चाहता था, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। इस कारण वह अत्यन्त दुःखी हो गया। एक दिन अपमान और निराशा से व्यथित होकर वह पर्वत से कूदकर आत्महत्या करने का विचार करने लगा। उसी समय द्रुमषेण मुनि के शिष्यों ने उसे समझाया कि तप और धर्म से ही वास्तविक सौभाग्य प्राप्त होता है। उनके उपदेश से नन्दी ने संयम और तप का मार्ग ग्रहण किया। तप के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से च्युत होकर वर्तमान जन्म में वसुदेव के रूप में उत्पन्न हुआ। भगवान् ने घोषणा की कि इसी वसुदेव से आगे चलकर बलभद्र और नारायण की महान परम्परा का प्रादुर्भाव होगा।
श्लोक 212 से 222 अन्धकवृष्टि का मोक्ष और वसुदेव का यौवन वैभव
पूर्वभवों का विस्तृत वर्णन सुनकर राजा अन्धकवृष्टि को संसार से वैराग्य हो गया। उन्होंने राज्य समुद्रविजय को सौंपकर सुप्रतिष्ठ जिनेन्द्र के समीप दीक्षा ग्रहण की और अंततः कर्मक्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। समुद्रविजय धर्मपूर्वक राज्य करने लगे। उनके शासन में सभी वर्ण और आश्रम के लोग सुखपूर्वक धर्माचरण करते थे। सबसे छोटे और अत्यन्त रूपवान वसुदेव प्रतिदिन हाथी पर सवार होकर नगर भ्रमण करते थे। उनके तेज, सौन्दर्य और वैभव को देखकर नगर की स्त्रियाँ मोहित हो जाती थीं और अपने कार्यों तक को भूल जाती थीं।
श्लोक 223 से 243 वसुदेव का गृहत्याग
नगरवासियों ने समुद्रविजय से निवेदन किया कि वसुदेव के अनुपम रूप के कारण नगर की स्त्रियाँ विचलित हो रही हैं। समुद्रविजय ने प्रेमपूर्वक उन्हें नगर के बाहर जाने से रोककर राजमहल के उद्यानों में ही विहार करने की सलाह दी। बाद में निपुणमति नामक सेवक ने वसुदेव को इस व्यवस्था का वास्तविक कारण बताया। जब वसुदेव ने स्वयं बाहर जाने का प्रयास किया और द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया, तब उन्हें अत्यन्त अपमान का अनुभव हुआ। उन्होंने माता के नाम पत्र लिखकर यह भ्रम उत्पन्न किया कि वे अग्नि में प्रवेश कर मर गए हैं और रात्रि में गुप्त मार्ग से नगर छोड़कर निकल पड़े।
श्लोक 244 से 252 वसुदेव की खोज और श्यामला से विवाह
प्रातःकाल वसुदेव के न मिलने पर उनकी खोज आरम्भ हुई। श्मशान में घोड़े के गले से बँधा पत्र मिलने पर समुद्रविजय और समस्त परिवार शोकाकुल हो गया, किन्तु निमित्तज्ञानी ने उनके सुरक्षित होने का संकेत दिया। दूसरी ओर वसुदेव विजयपुर ग्राम पहुँचे। वहाँ एक अशोक वृक्ष की स्थिर छाया देखकर निमित्तज्ञानी की भविष्यवाणी सत्य मानी गई और मगधदेश के राजा ने अपनी पुत्री श्यामला का विवाह वसुदेव से कर दिया। कुछ समय वहाँ रहने के बाद वे आगे बढ़ गए और वन में हाथी के साथ क्रीड़ा करते हुए यात्रा जारी रखी।
श्लोक 253 से 273 विद्याधर प्रदेश की यात्रा और गन्धर्वदत्ता का स्वयंवर
एक विद्याधर वसुदेव को विजयार्ध पर्वत पर ले गया। वहाँ किन्नरगीत नगर के राजा अशनिवेग ने अपनी रूपवती पुत्री शाल्मलिदत्ता का विवाह उनसे कर दिया। कुछ समय बाद विभिन्न घटनाओं से होते हुए वसुदेव चम्पापुर पहुँचे और गन्धर्वविद्या के आचार्य मनोहर के आश्रम में रहने लगे। वहाँ उन्होंने जानबूझकर स्वयं को संगीत में अयोग्य प्रदर्शित किया। इसी बीच गन्धर्वदत्ता के स्वयंवर की तैयारी होने लगी। जब वीणाओं की परीक्षा का अवसर आया, तब वसुदेव ने उनमें विद्यमान सूक्ष्म दोषों को पहचानकर अपनी असाधारण विद्वत्ता का परिचय दिया और एक विशेष वीणा की मांग की।
श्लोक 274 से 283 विष्णुकुमार और वलि मन्त्री की कथा का प्रारम्भ
वसुदेव ने अपनी इच्छित वीणा का इतिहास सुनाते हुए बताया कि हस्तिनापुर के राजा मेघरथ के पुत्र विष्णुकुमार और पद्मरथ थे। राजा के तपस्वी बनने के बाद पद्मरथ राज्य करने लगे। उनके मन्त्री वलि ने राज्य को संकट से बचाया, जिससे प्रसन्न होकर राजा ने उसे सात दिनों के लिए राज्य सौंप दिया। उसी समय अकम्पन गुरु और अन्य मुनि सौम्य पर्वत पर तप कर रहे थे। वलि को पूर्व वैर के कारण उन मुनियों से द्वेष था और उसने उनके तप में बाधा पहुँचाने का षड्यन्त्र रचा।
श्लोक 284 से 292 विष्णुकुमार द्वारा उपसर्ग का निवारण
वलि ने यज्ञ और रसोई के बहाने पर्वत के चारों ओर धुआँ और अग्नि फैलाकर मुनियों को कष्ट पहुँचाया। विष्णुकुमार मुनि ने राजा पद्मरथ से उपसर्ग रोकने का अनुरोध किया, किन्तु राजा अपने वचनबद्ध होने के कारण असमर्थ रहे। तब विष्णुकुमार स्वयं वामन ब्राह्मण का रूप धारण कर वलि के पास पहुँचे और तीन पग भूमि माँगी। वलि के दान देते ही मुनि ने अपनी विक्रिया ऋद्धि से विराट रूप धारण कर एक चरण मानुषोत्तर पर्वत और दूसरा सुमेरु पर्वत पर रख दिया। उनकी अद्भुत शक्ति देखकर समस्त लोक आश्चर्यचकित हो गया।
श्लोक 293 से 301 वलि का पराभव और घोषवती वीणा का इतिहास
विद्याधरों और भूमिगोचरियों ने स्तुति करके विष्णुकुमार को शांत किया। प्रसन्न होकर उन्होंने अपना विराट रूप समेट लिया। देवों ने उनकी महिमा से प्रसन्न होकर घोषा, सुघोषा, महाघोषा और घोषवती नामक चार दिव्य वीणाएँ प्रदान कीं। इसके बाद विष्णुकुमार ने वलि को वश में कर उसके द्वारा उत्पन्न उपसर्ग समाप्त कर दिया और उसे धर्ममार्ग पर लगाया। कथा समाप्त कर वसुदेव ने बताया कि उन्हीं दिव्य वीणाओं में से घोषवती वीणा गन्धर्वदत्ता के वंश में सुरक्षित है और वही वीणा वे बजाना चाहते हैं।
श्लोक 302 से 311 गन्धर्वदत्ता और रोहिणी का वरण
घोषवती वीणा प्राप्त होने पर वसुदेव ने अपने अनुपम संगीत कौशल से सभी श्रोताओं को मुग्ध कर दिया। गन्धर्वदत्ता ने प्रसन्न होकर स्वयं अपने हाथों से वसुदेव के गले में वरमाला डाल दी। उनका कल्याणाभिषेक हुआ और विजयार्ध पर्वत के अनेक विद्याधर राजाओं ने सम्मानपूर्वक अपनी कन्याएँ भी उन्हें समर्पित कीं। बाद में वसुदेव पृथ्वी पर लौटे और अरिष्टपुर की राजकुमारी रोहिणी के स्वयंवर में सम्मिलित हुए। रोहिणी ने भी अन्य सभी राजाओं को छोड़कर वसुदेव का वरण किया। यह देखकर अन्य राजा क्रोधित हो उठे और बलपूर्वक रोहिणी का हरण करने का प्रयास करने लगे, जिससे युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।
श्लोक 312 से 321 वसुदेव का पुनर्मिलन और पद्म बलभद्र का जन्म
युद्ध की स्थिति उत्पन्न होने पर वसुदेव ने अपने नाम से अंकित एक बाण समुद्रविजय की ओर छोड़ा। बाण पर लिखे नाम को पढ़कर समुद्रविजय आश्चर्यचकित और आनंदित हो उठे कि उनका बिछुड़ा हुआ भाई वसुदेव मिल गया है। उन्होंने तत्काल युद्ध रुकवा दिया और अपने भाइयों सहित वसुदेव से मिलने पहुँचे। वसुदेव ने विनयपूर्वक बड़े भाइयों को प्रणाम किया। इसके बाद उनकी पूर्व विवाहित पत्नियाँ भी उनसे मिला दी गईं और सभी आनंदपूर्वक नगर लौट आए। कुछ समय पश्चात् रोहिणी के गर्भ से पद्म नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर नवम बलभद्र बना। वह असाधारण बुद्धि, तेज और प्रताप से युक्त था।
श्लोक 322 से 331 वशिष्ठ तापस का अज्ञान दूर होना
गंगा और गन्धावती नदियों के संगम पर वशिष्ठ नामक तापस पंचाग्नि तप करता था। वहाँ गुणभद्र और वीरभद्र नामक चारण मुनि आए और उन्होंने उसके तप को अज्ञानपूर्ण बताया। वशिष्ठ ने इसका कारण पूछा तो गुणभद्र मुनि ने उसके तप से होने वाली हिंसा का प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाया। उन्होंने जटाओं में उत्पन्न जीवों, स्नान के समय मरी हुई मछलियों और अग्नि में जलते कीटों की ओर संकेत कर समझाया कि यह तप वास्तविक धर्म नहीं है। सत्य को समझकर वशिष्ठ को वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने दीक्षा ग्रहण कर कठोर तप आरम्भ कर दिया। उसके तप से प्रसन्न होकर सात व्यन्तर देवियाँ उपस्थित हुईं, किन्तु उसने उनसे किसी प्रकार की सहायता स्वीकार नहीं की। बाद में वह मथुरा पहुँचा और एक मास के उपवास सहित आतापन योग धारण किया।
श्लोक 332 से 341 उग्रसेन के प्रति वैरभाव और कंस के रूप में जन्म
मथुरा के राजा उग्रसेन ने घोषणा कर दी कि वशिष्ठ मुनि को केवल राजमहल से ही आहार मिलेगा। किन्तु प्रत्येक बार कोई न कोई विघ्न उपस्थित हो जाता और मुनि निराहार लौट जाते। लगातार उपवास और दुर्बलता के बीच जब उन्होंने लोगों को यह कहते सुना कि राजा स्वयं भी आहार नहीं देता और दूसरों को भी नहीं देने देता, तब उनके भीतर क्रोध उत्पन्न हो गया। मोहवश उन्होंने निदान किया कि तप के प्रभाव से अगले जन्म में वे उग्रसेन के पुत्र बनकर उसका राज्य छीनेंगे। इसी कषाययुक्त भाव से मृत्यु होने पर वे उग्रसेन की रानी पद्मावती के गर्भ में उत्पन्न हुए।
श्लोक 342 से 351 कंस का परित्याग और प्रारम्भिक जीवन
गर्भावस्था में ही रानी पद्मावती को राजा के हृदय का मांस खाने की इच्छा हुई, जिसे मंत्रियों ने युक्तिपूर्वक पूरा कराया। समय आने पर एक क्रूर स्वभाव वाला बालक उत्पन्न हुआ, जिसके लक्षण अशुभ प्रतीत होते थे। माता-पिता ने उसके भविष्य को अशुभ मानकर उसे एक कांसे की संदूक में रखकर यमुना में बहा दिया। कौशाम्बी की मण्डोदरी नामक गणिका ने उस बालक को पाया और उसका पालन-पोषण किया। बड़ा होने पर वह अन्य बालकों को पीड़ा देने लगा, जिससे तंग आकर मण्डोदरी ने भी उसे घर से निकाल दिया। इसके बाद वह शौर्यपुर जाकर वसुदेव की सेवा में रहने लगा।
श्लोक 352 से 363 कंस की वास्तविक पहचान
उसी समय जरासन्ध ने घोषणा की कि जो उसके शत्रु सिंहरथ को पराजित कर बंदी बनाएगा, उसे आधा राज्य और पुत्री जीवद्यशा प्रदान की जाएगी। वसुदेव ने युद्ध में सिंहरथ को परास्त कर दिया, किन्तु विनम्रतावश उसका श्रेय अपने सेवक कंस को दे दिया। जब जरासन्ध ने कंस का कुल जानना चाहा, तब मण्डोदरी स्वयं कांसे की संदूक लेकर उसके पास पहुँची और सारी घटना सुनाई। संदूक में रखे पत्र से ज्ञात हुआ कि कंस वास्तव में उग्रसेन और पद्मावती का पुत्र है। यह जानकर जरासन्ध ने अपनी पुत्री जीवद्यशा और आधा राज्य कंस को प्रदान कर दिया।
श्लोक 364 से 375 कंस का अत्याचार और भविष्यवाणी
अपनी वास्तविक जन्मकथा जानकर कंस के मन में माता-पिता के प्रति तीव्र वैरभाव जाग उठा। उसने मथुरा जाकर उग्रसेन और पद्मावती को बंदी बना लिया। बाद में उसने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव से करा दिया। एक दिन अतिमुक्त मुनि भिक्षा के लिए राजमहल आए। जीवद्यशा ने उनका उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर मुनि ने भविष्यवाणी की कि देवकी का पुत्र उसके पति कंस और पिता जरासन्ध दोनों का विनाश करेगा। जीवद्यशा के बढ़ते क्रोध के साथ मुनि ने बार-बार उसी भविष्यवाणी को और अधिक स्पष्ट रूप में दोहराया कि देवकी का पुत्र महान सम्राट बनेगा और पृथ्वी पर राज्य करेगा।
श्लोक 376 से 392 देवकी के पुत्रों का रहस्य और सातवें पुत्र की रक्षा
जीवद्यशा ने सारी बात कंस को बताई। भविष्यवाणी से भयभीत होकर कंस ने अनुरोध किया कि देवकी की प्रत्येक प्रसूति उसके ही महल में हो। बाद में देवकी और वसुदेव ने अतिमुक्त मुनि से पूछा कि क्या वे कभी दीक्षा ग्रहण कर सकेंगे। मुनि ने बताया कि उनके सात पुत्र होंगे; छह पुत्र अंततः मोक्षमार्ग के अधिकारी होंगे और सातवाँ पुत्र चक्रवर्ती बनेगा। देवकी के प्रथम छह पुत्रों को इन्द्र की प्रेरणा से नैगमेष देव गुप्त रूप से भद्रिलपुर पहुँचा देता और वहाँ के मृत शिशुओं को देवकी के पास रख देता था। कंस उन्हें मृत समझकर निश्चिंत रहता, यद्यपि उसकी शंका बनी रहती थी। सातवें गर्भ में महाशुक्र स्वर्ग से च्युत एक महान जीव आया। तब वसुदेव और पद्म बलभद्र ने निश्चय किया कि इस बालक को गुप्त रूप से नन्दगोप के यहाँ सुरक्षित रखा जाएगा। रात्रि में वे बालक को लेकर निकले और उसके पुण्य के प्रभाव से मार्ग में अनेक चमत्कार घटित हुए।
श्लोक 393 से 402 यमुना पारगमन और नन्दगोप से भेंट
बालक के चरण-स्पर्श से कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। उग्रसेन ने यह देखकर आश्चर्य प्रकट किया, तब बलभद्र ने उन्हें आश्वासन दिया कि यही बालक भविष्य में उन्हें बन्धन से मुक्त करेगा। वसुदेव और बलभद्र बालक को लेकर यमुना तट पहुँचे। चक्रवर्ती के पुण्य-प्रभाव से यमुना दो भागों में विभक्त हो गई और उन्हें मार्ग मिल गया। दूसरी ओर नन्दगोप अपनी नवजात कन्या को लेकर जा रहा था, क्योंकि उसकी पत्नी पुत्री-जन्म से दुःखी होकर उसे त्याग देना चाहती थी। जब नन्दगोप ने पूरी बात बताई, तब वसुदेव और बलभद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए, क्योंकि उनकी योजना पूर्ण करने का उपयुक्त अवसर उन्हें मिल गया।
श्लोक 403 से 411 कृष्ण का नन्दगोप के यहाँ पालन और विन्ध्यवासिनी की कथा
वसुदेव और बलदेव ने नन्दगोप को सम्पूर्ण रहस्य बताकर अपना पुत्र उसे सौंप दिया तथा उसकी कन्या को साथ ले आए। उन्होंने नन्दगोप को बताया कि यह बालक भविष्य में महान चक्रवर्ती बनेगा। नन्दगोप बालक को घर ले आया और अपनी पत्नी को यह कहकर दे दिया कि देवताओं ने प्रसन्न होकर उसे यह पुण्यशाली पुत्र प्रदान किया है। इधर कंस ने देवकी के यहाँ कन्या-जन्म का समाचार सुनकर उसे अपने संरक्षण में रखवाया। बड़ी होने पर कन्या ने अपने विकृत रूप से दुःखी होकर आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ली। बाद में वन में एक व्याघ्र द्वारा उसका शरीर नष्ट हो गया, किन्तु लोकमान्यता के कारण लोग उसकी तीन अंगुलियों की पूजा करने लगे और उसे विन्ध्यवासिनी देवी के रूप में मानने लगे।
श्लोक 412 से 421 पूतना और अन्य देवियों के असफल प्रयास
मथुरा में अनेक उत्पात देखकर कंस चिंतित हुआ। निमित्तज्ञानी वरुण ने बताया कि उसका महान शत्रु जन्म ले चुका है। तब कंस ने अपने पूर्वभव से सम्बद्ध सात व्यन्तर देवताओं को उस शत्रु की खोज और वध का आदेश दिया। पूतना नामक देवी ने कृष्ण को पहचानकर उसकी माता का रूप धारण किया और विषैले स्तनों से उसे मारने का प्रयास किया, किन्तु एक रक्षक देवी ने उसके स्तनों में असह्य पीड़ा उत्पन्न कर दी जिससे वह भाग गई। बाद में गाड़ी, उलूखल और अर्जुन वृक्षों के रूप में आई अन्य देवियाँ भी कृष्ण को हानि नहीं पहुँचा सकीं। बालक कृष्ण ने सहज ही उनके सभी प्रयास विफल कर दिए।
श्लोक 422 से 431 बालक कृष्ण का अद्भुत पराक्रम
कृष्ण के वध हेतु देवियाँ ताड़ वृक्ष, गधी और घोड़े के रूप में भी आईं, किन्तु कृष्ण ने उन्हें भी परास्त कर दिया। सातों देवियाँ अंततः कंस के पास जाकर अपनी असफलता स्वीकार कर लौटीं। एक अवसर पर अरिष्ट नामक असुर बैल का रूप धारण कर कृष्ण की शक्ति परखने आया, परन्तु कृष्ण उसे भी पराजित करने के लिए तत्पर हो गए। यद्यपि माता यशोदा उन्हें बार-बार ऐसे साहसिक कार्यों से रोकती थीं, फिर भी उनका पराक्रम निरन्तर बढ़ता गया। जब देवकी और वसुदेव ने कृष्ण के अद्भुत कार्यों की चर्चा सुनी, तब वे उन्हें देखने की तीव्र इच्छा से व्रज पहुँचे।
श्लोक 432 से 441 देवकी का वात्सल्य और दिव्य रत्नों का प्रादुर्भाव
व्रज में पहुँचकर देवकी और बलदेव ने कृष्ण का सम्मान किया। कृष्ण को देखकर देवकी के स्तनों से स्वतः दूध प्रवाहित होने लगा, जिससे उनके मातृत्व का भाव प्रकट हुआ। स्थिति की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बलदेव ने इसे उपवासजनित दुर्बलता बताकर ढँक दिया। सबने मिलकर उत्सवपूर्वक भोजन किया और मथुरा लौट आए। कुछ समय बाद भारी वर्षा के समय कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर गौओं की रक्षा की। उनके पुण्य के प्रभाव से मथुरा के एक देवालय में नागशय्या, धनुष और शंख नामक तीन दिव्य रत्न प्रकट हुए, जो उनके भावी वैभव और साम्राज्य के सूचक थे।
श्लोक 442 से 455 तीन दिव्य रत्नों की सिद्धि
कंस ने उन रत्नों के महत्व के विषय में वरुण निमित्तज्ञानी से पूछा। वरुण ने बताया कि जो पुरुष इन्हें सिद्ध कर लेगा, वही महान राज्य का अधिकारी बनेगा। कंस स्वयं उन्हें सिद्ध करने में असफल रहा। तब उसने घोषणा करवाई कि जो नागशय्या पर चढ़कर शंख बजाए और धनुष चढ़ा दे, उसे राजकन्या प्रदान की जाएगी। अनेक राजा मथुरा आए। स्वर्भानु राजा भी अपने पुत्र भानु के साथ आया और मार्ग में कृष्ण को साथ ले लिया। मथुरा पहुँचकर कृष्ण ने गुप्त रूप से तीनों कार्य सम्पन्न कर दिए, किन्तु श्रेय भानु को मिलने दिया और स्वयं व्रज लौट गए।
श्लोक 456 से 471 सहस्रदल कमल और नागराज पर विजय
जब इस कार्य के वास्तविक कर्ता के विषय में मतभेद उत्पन्न हुआ, तब कंस ने उसकी खोज का आदेश दिया। नन्दगोप को ज्ञात हो गया कि यह कार्य कृष्ण ने किया है, इसलिए वह भयभीत हो गया। बाद में कंस ने परीक्षा लेने के लिए सहस्रदल कमल मँगवाया, जिसकी रक्षा भयंकर नाग करते थे। नन्दगोप के अनुरोध पर कृष्ण निर्भय होकर उस सरोवर में गए। वहाँ नागराज ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु कृष्ण ने उसकी फण को वस्त्र पटकने के समान साधन बनाकर उसका अभिमान नष्ट कर दिया। नागराज भयभीत होकर अदृश्य हो गया और कृष्ण सहस्रदल कमल लेकर लौट आए।
श्लोक 472 से 481 मथुरा प्रवेश और कंस-वध की तैयारी
कृष्ण द्वारा सहस्रदल कमल लाने पर कंस को निश्चित हो गया कि उसका शत्रु नन्दगोप के यहाँ ही पल रहा है। उसने नन्दगोप और उसके मल्लों को मल्लयुद्ध देखने के लिए मथुरा बुलाया। मथुरा में प्रवेश करते ही एक उन्मत्त हाथी कृष्ण पर छोड़ दिया गया, किन्तु कृष्ण ने उसका दाँत उखाड़कर उसी से उसे परास्त कर दिया। इसके बाद वे रंगभूमि में पहुँचे। वसुदेव भी गुप्त रूप से अपनी सेना तैयार रखे हुए थे। बलदेव ने कृष्ण को संकेत दिया कि अब कंस का अंत करने का समय आ गया है।
श्लोक 482 से 491 रंगभूमि में कृष्ण का वीर रूप
रंगभूमि में गोपबालक और कंस के मल्ल आमने-सामने खड़े हुए। चाणूर आदि प्रमुख मल्ल अपने बल और अहंकार के कारण अत्यन्त भयानक प्रतीत हो रहे थे। दूसरी ओर कृष्ण का व्यक्तित्व अद्वितीय तेज और आत्मविश्वास से युक्त था। उनका शरीर युद्ध के लिए पूर्णतः उपयुक्त था, उनकी भुजाएँ वज्र के समान सुदृढ़ थीं और उनका उत्साह अदम्य था। वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सम्पूर्ण वीरता और शक्ति ने मानव रूप धारण कर लिया हो। उनके सिंहनाद और पराक्रम से सम्पूर्ण रंगभूमि कम्पायमान हो उठी।
श्लोक 492 से 497 चाणूर और कंस का वध तथा कृष्ण की विजय
कृष्ण ने युद्ध में पहले चाणूर मल्ल का वध किया और फिर स्वयं कंस क्रोधपूर्वक रंगभूमि में उतर आया। कृष्ण ने उसे पकड़कर आकाश में घुमाया और भूमि पर पटककर उसका अंत कर दिया। कंस के वध के साथ ही देवताओं ने पुष्पवर्षा की और दुन्दुभियाँ बजाईं। बलदेव ने भी शत्रु राजाओं को परास्त कर विजय सुनिश्चित की। इस प्रकार कृष्ण ने अपने महान पराक्रम से शत्रुओं का नाश किया और वीरलक्ष्मी को प्राप्त किया। उनकी विजय के साथ नेमिनाथ स्वामी के चरित्र में वर्णित श्रीकृष्ण की महिमा का यह प्रसंग पूर्ण हुआ तथा उत्तरपुराण का सत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ।
पर्व 71
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