राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 586 to 594
श्लोक ( Shlok ) 586 – 587
द्विषतो वा न सत्वाभिव्यक्तिः स्यात्सुहृदः सताम् । मया मज्जीवितुं दातुं नृपाज्जीवितमाददे ॥ ५८६ ॥ तस्य कालोऽयमित्येको व्यतरत्तदृणं रणे । भृत्यकृत्यं यशः शूरगतिश्चात्र त्रयं फलम् ॥ ५८७ ॥
सो ठीक ही है क्योंकि सज्जनों का बल शत्रुसे प्रकट नहीं होता किन्तु मित्रसे प्रकट होता है। मैंने अपना जीवन देनेके लिए ही राजासे आजीविका पाई है- वेतन ग्रहण किया है। अब उसका समय आ गया है यह विचार कर कोई योद्धा रणमें वह ऋण चुका रहा था। युद्ध करने में एक तो सेवकका कर्तव्य पूरा होता है, दूसरे यश की प्राप्ति होती है और तीसरे शूर-वीरोंकी गति प्राप्त होती है ये तीन फल मिलते हैं ॥ ५८६-५८७ ।।
“That is only right, because the strength of the virtuous is not revealed by an enemy, but by a friend. I have accepted a livelihood—a salary—from the king solely to give my life for him. Now that the time for it has arrived, with this thought in mind, a warrior was repaying that debt in battle. By fighting, three rewards are attained: first, the duty of a servant is fulfilled; second, fame is achieved; and third, the ultimate destiny of brave heroes is attained.” || 586-587 ||
श्लोक ( Shlok ) 588 – 591
पुरुषार्थत्रयं चैतदेवेत्यन्योन्ययुध्यते । नास्मद्धले मृतिं वीक्षे कस्यापि स पराभवः ॥ ५८८ ॥ममेति मन्यमानोऽन्यः प्राग्युध्वानियत स्वयम् । अयुध्यन्तैवमुत्क्रोधाः सर्वशस्त्रैरनारतम् ॥ ५८९ ॥सव्यापसव्यमुक्तार्धमुक्तामुक्तैरनाकुलम् । ३अभीतमार्गणेनैव मार्गणा मार्गमात्मनः ॥ ५९० ॥मध्ये विधाय गत्वा द्राक् परत्र पतिताः परे । “दूरं त्यक्त्वा गुणान्वाणैस्तीक्ष्णैः शोणितपायिभिः ॥५९१॥
तथा हम लोगों के यही तीन पुरुषार्थ हैं यही सोचकर कोई योद्धा किसी दूसरे योद्धासे परस्पर लड़ रहा था। मैं अपनी सेनामें किसीका मरण नहीं देखूँगा क्योंकि वह मेरा ही पराभव होगा’ यह मानता हुआ कोई एक योद्धा स्वयं सबसे पहले युद्ध कर मर गया था। इस प्रकार तीव्र क्रोध करते हुए सब योद्धा, दायें-बायें दोनों हाथोंसे छोड़ने योग्य, आधे छोड़ने योग्य, और न छोड़ने योग्य सब तरहके शस्त्रोंसे विना किसी आकुलताके निरन्तर युद्ध कर रहे थे। दोनों ओरसे एक दूसरेके सन्मुख छोड़े जानेवाले बाण, बीचमें ही अपना मार्ग बनाकर बड़ी शीघ्रतासे एक दूसरेकी सेनामें जाकर पड़ रहे थे। गुण अर्थात् धनुषकी डोरीको छोड़कर दूर जानेवाले, तीक्ष्ण एवं खून पीने-वाले बाण सीधे होनेपर भी प्राणोंका घात कर रहे थे सो ठीक ही है क्योंकि दुष्ट पुरुषमें रहनेवाले गुण, गुण नहीं कहलाते हैं। बाणोंका न तो किसीके साथ वैर था और न उन्हें कुछ फल ही मिलता था तो भी वे शत्रुओंका घात कर रहे थे ॥ ५८८-५९१॥
“And thinking, ‘These alone are our three goals of human endeavor (Purusharthas),’ a warrior was fighting hand-to-hand with another warrior. Believing, ‘I will not witness the death of anyone in my army, for that would be my own defeat,’ a certain warrior fought foremost by himself and died. In this manner, burning with intense rage, all the warriors were incessantly fighting without any anxiety, using all kinds of weapons—those meant to be completely released, those partially released, and those not to be released from the hand.
The arrows shot from both sides toward each other, carving their own path right in the middle, were swiftly piercing the opposing armies. The sharp and blood-thirsty arrows, which left the guna (the bowstring) to travel far, were taking lives despite being straight (upright). And that is only fitting, for the guna (virtues/qualities) residing in a wicked person do not truly count as virtues. The arrows harbored no enmity toward anyone, nor did they gain any reward, yet they were destroying the enemies.” || 588-591 ||
श्लोक ( Shlok ) 592 – 594
ऋजुत्वाज्जहिरे प्राणान् गुणोऽपि न गुणः खले । न वैरं न फलं किञ्चित्तथाप्यप्नन् शराः परान् ॥ ५९२ ॥परप्रेरितवृत्तीनां तीक्ष्णानामीदृशी गतिः । ‘खगाः खगैः खगान् जम्नुबंद्धवैराः खगा इव ॥ ५९३ ॥तृणाय मन्यमानाः स्वान् प्राणान् पापाः परस्परम् । लक्ष्यबद्धात्मदृष्टान्वितानुपातिशितैः शरैः ॥५९४॥
सो ठीक ही है क्योंकिजिनकी वृत्ति दूसरोंके द्वारा प्रेरित रहती है ऐसे तीक्ष्ण (पैने-कुटिल) पदार्थोकी ऐसी ही अवस्था होती है। जिनका परस्पर वैर बँधा हुआ है ऐसे अनेक विद्याधर पक्षियोंके समान अपने प्राणोंको तृणके समान मानते हुए बाणोंके द्वारा परस्पर विद्याधरोंका घात कर रहे थे ।। ५९२-५९४ ।।
“And that is only fitting, because such is the fate of sharp (and crooked) entities whose actions are driven entirely by others. Many Vidyadharas, bound by mutual enmity, valued their own lives as cheap as straw and, like birds clashing in the sky, were destroying one another with arrows.” || 592-594 ||
श्लोक 595 से 604
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585
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