राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 284 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 360
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मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 361 to 371
श्लोक ( Shlok ) 361 – 364
इति तद्वचनादेष मुनिर्मन्मनसि स्थितम् । ज्ञातवानिति सञ्जातसम्मदं स शृगालकम् ॥ ३६१ ॥मुनिस्तदिङ्गिताभिज्ञः पुनरेवं समब्रवीत् । त्वमन्यस्य न शक्नोषि व्रतस्यामिषलालसः ॥ ३६२ ॥गृहाणेदं व्रतं श्रेष्ठं रात्रिभोजनवर्जनम् । परलोकस्य पाथेयमिति धर्म्य मुनेर्वच्चः ॥ ३६३ ॥श्रुत्वा भक्त्या परीत्यैनं प्रणम्य कृतसम्मदः । गृहीत्वा तद्ब्रतं मद्यमांसादीनि च सोऽस्यजत् ॥ ३६४॥
मुनिराजके यह वचन सुनकर शृगालको इस बातका बहुत हर्ष हुआ कि यह मुनिराज मेरे मनमें स्थित बातको जानते हैं। शृगालकी चेष्टाको जाननेवाले मुनिराजने उस शृगालसे फिर कहा कि तू मांसका लोभी होनेसे अन्य व्रत ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं है अतः रात्रिभोजन त्याग नामका श्रेष्ठ व्रत धारण कर ले। मुनिराजके वचन क्या थे मानो परलोकके लिए सम्बल (पाथेय ) ही थे। मुनिराजके धर्मपूर्ण वचन सुनकर वह शृगाल बहुत ही प्रसन्न हुआ उसने भक्तिपूर्वक उनकी प्रदक्षिणा दी, उन्हें नमस्कार किया और रात्रिभोजन त्यागका व्रत लेकर मद्य-मांस आदिका भी त्याग कर दिया ।। ३६१-३६४ ॥
“Upon hearing these words of the ascetic, the jackal was deeply overjoyed that the ascetic knew the thought residing in his mind. The ascetic, understanding the jackal’s state of mind, spoke to him again, ‘Since you are fond of meat, you are not capable of observing other strict vows. Therefore, adopt the supreme vow of renouncing food at night (Ratri-bhojan Tyaga).’ The ascetic’s words were as if provisions (provisions for a journey) for the afterlife. Hearing the righteous words of the ascetic, the jackal became immensely delighted; he devoutly circumambulated him, bowed down, and upon taking the vow of renouncing food at night, he also gave up alcohol, meat, and other such substances. ॥ 361-364 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 365
तदा प्रभृति शाल्यादि विशुद्धाशनमाहरन् । अतिकृच्छ्रं तपः कुर्वन् कञ्चित्कालमजीगमत् ॥ ३६५॥
उस समयसे वह शृगाल चावल आदिका विशुद्ध आहार लेने लगा। इस तरह कठिन तपञ्चरण करते हुए उसने कितना ही काल व्यतीत किया ।॥ ३६५ ॥
“From that time onward, the jackal began consuming a pure diet of rice and similar items. Spending his time in this manner, he passed a considerable period performing rigorous penance. ॥ 365 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 366 – 371
शुष्काहारमथान्येद्यर्भुक्त्वा तृष्णातिबाधितः । अकास्तमयवेलायां पयःपानाभिलाषया ॥ ३६६ ॥कूपं सोपानमार्गेण प्रविश्यान्तः किमप्यसौ । तत्रालोकमनालोक्य दिनेशोऽस्तमुपाग्रतः ॥ ३६७ ॥इति निर्गत्य दृष्ट्वामां पुनः पातुं प्रविष्टवान् । गोमायुरेवं द्विस्तिर्वा कुर्वस्तत्र गमागमौ ॥ ३६८ ॥दिनेशमस्तमानीय सोढतृष्णापरीषहः । विशुद्धपरिणामेन मृतिमित्वा दृढम्रतः ॥ ३६९ ॥एवं कुबेरदत्तस्य भूस्वा प्रीतिङ्करः सुतः । व्रतेन धनमित्रायामीहगैश्वर्यमाप्तवान् ॥ ३७० ॥ इति तद्वचनाज्जातसंवेगस्तं यतीश्वरम् । शंसन् व्रतस्य माहात्म्यमभिवन्द्य ययौ गृहम् ॥ ३७१
किसी एक दिन उस शृगालने सूखा आहार किया जिससे प्याससे पीड़ित होकर वह सूर्यास्तके समय पानी पीनेकी इच्छासे सीढ़ियोंके मार्ग-द्वारा किसी कुएँ के भीतर गया। कुएँके भीतर प्रकाश न देखकर उसने समझा कि सूर्य अस्त हो गया है इसलिए पानी बिना पिये ही बाहर निकल आया। बाहर आनेपर प्रकाश दिखा इसलिए पानी पीनेके लिए फिरसे कुएँके भीतर गया। इस तरह वह शृगाल दो तीन बार कुऍके भीतर गया और बाहर आया। इतनेमें सचमुच ही सूर्य अस्त हो गया। निदान, उस शृगालने अपने व्रतमें दृढ़ रहकर तृषा-परिषद् सहन किया और विशुद्ध परिणामोंसे मरकर कुबेरत सेठकी धनमित्रा स्त्रीसे प्रीतिंकर नामका पुत्र हुआ। व्रतके प्रभावसे ही उसने ऐसा ऐश्वर्य प्राप्त किया है। इस प्रकार मुनिराज बचन सुनकर प्रीतिकर संसारत्ते भयभीत हो उठा, उसने व्रतके माहात्म्यकी बहुत भारी प्रशंसा की तथा मुनिराजको नमस्कार कर वह अपने घर लौट आया ॥ ३६६-३७१ ॥
“One day, that jackal consumed dry food, due to which he became afflicted with severe thirst. With the intention of drinking water at sunset, he entered a well via its steps. Seeing no light inside the well, he thought that the sun had already set; therefore, he came back out without drinking any water. Upon coming out, he saw light, so he went back down into the well to drink water. In this manner, the jackal went inside the well and came back out two or three times. In the meantime, the sun actually set. Ultimately, remaining steadfast in his vow, that jackal endured the affliction of thirst (Trisha-Parishaha). Dying with pure, auspicious thoughts, he was reborn as the son named Pritinkar to Dhanamitra, the wife of Seth Kuberat. It was solely due to the power of his vow that he attained such magnificent opulence.
Upon hearing these words of the ascetic, Pritinkar became deeply detached from and fearful of the worldly cycle (Samsara). He highly praised the immense glory of the vow, bowed down to the ascetic, and returned to his home. ॥ 366-371 ॥”
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
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