छहढाला – दूसरी ढाल छंद 3 – जीव तत्त्व का विपरीत श्रद्धान
पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल, इनतैं न्यारी है जीव-चाल।
ताकों न जान विपरीत मान, करि करें देह में निज पिछान । ॥3 ॥
अन्वयार्थ (पुद्गल) पुद्गल (नभ) आकाश (धर्म) धर्म (अधर्म) अधर्म और (काल) काल (इनतै) इनसे (जीव-चाल) जीव का स्वभाव या परिणाम (न्यारी) भिन्न (है) है “किन्तु मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यादर्शन के प्रभाव से” (ताकों) उस आत्मस्वभाव को (न) नहीं (जान) जानकर (विपरीत) उल्टा (मान करि) मानकर (देह में) शरीर में (निज) आत्मा की (पिछान) पहचान (करें) करता है।
अर्थ –
पुद्गल नभ धर्म अधर्म काल: पाँच अजीव द्रव्य—पुद्गल (मैटर/पदार्थ), नभ (आकाश), धर्म (गति हेतु), अधर्म (स्थिति हेतु), और काल (समय)।
इनतें न्यारी है जीव चाल: इन पाँचों अजीव द्रव्यों से जीव (आत्मा) की चाल यानी उसका स्वभाव, चेतना और गुण पूरी तरह भिन्न और अलग हैं।
ताको न जान: इस मूल भेद और अंतर को न समझते हुए।
विपरीत मान: विपरीत (उल्टा) श्रद्धान या मिथ्या मान्यता धारण करना।
करि करे देह में निज पिछान: इस नश्वर और नाशवान शरीर (देह) में ही अपनी आत्मा (निज) की पहचान करना कि “यह शरीर ही मैं हूँ”।
प्रश्न एवं उत्तर
- जैन दर्शन के अनुसार छह द्रव्य कौन-कौन से हैं?
- संसार में छह द्रव्य हैं: जीव (चेतन आत्मा) तथा पाँच अजीव द्रव्य—पुद्गल, आकाश, धर्म, अधर्म, और काल।
- यहाँ “जीव की चाल” से क्या तात्पर्य है?
- “चाल” का अर्थ जीव के स्वभाव और उसकी चेतना से है। जहाँ पाँचों अजीव द्रव्य अचेतन हैं, वहीं जीव चेतना, ज्ञान और दर्शन (उपयोगमयी) स्वरूप वाला है।
- इस छंद में किस मुख्य भूल (मिथ्यात्व) को दर्शाया गया है?
- जीव और अजीव (पुद्गल) का भेद न समझ पाना ही मुख्य भूल है। अज्ञानता के कारण जीव अपने चेतन स्वरूप को न पहचानकर इस भौतिक शरीर को ही अपनी आत्मा मान बैठता है।
- क्या हमारा शरीर शुद्ध जीव है या अजीव?
- वर्तमान अवस्था में यह शरीर जीव और पुद्गल की मिली-जुली पर्याय (असमान जातीय द्रव्य पर्याय) है। मृत्यु के समय चेतन जीव निकल जाता है और शेष पड़ा हुआ शरीर शुद्ध अजीव रह जाता है।
छंद 4 – मिथ्यादृष्टि का शरीर आदि परपदार्थ के प्रति विचार
मैं सुखी दुखी मैं रंक राव, मेरे धन गृह गोधन प्रभाव।
मेरे सुत तिय मैं सबल दीन, बेरूप सुभग मूरख प्रवीन ॥4॥
अन्वयार्थ “मिथ्यादृष्टि जीव मिथ्यादर्शन के प्रभाव से मानता है कि” मैं (सुखी) सुखी (दुखी) दुःखी (रंक) गरीब (राव) राजा हूँ (मेरे) मेरे (धन) रुपया, पैसा आदि (गृह) मकान (गोधन) गाय, भैंस आदि (प्रभाव) बड़प्पन (सुत) सन्तान तथा (तिय) स्त्री हैं (मैं) मैं (सबल) बलवान् (दीन) निर्बल (बेरूप) कुरूप (सुभग) सुन्दर (मूरख) मूर्ख और (प्रवीन) चतुर हूँ।
अर्थ –
- मैं सुखी दुखी: “मैं सुखी हूँ” या “मैं दुखी हूँ” (बाहरी अनुकूलता-प्रतिकूलता को आत्मा का सुख-दुख मान लेना)।
- मैं रंक राव: “मैं गरीब (रंक) हूँ” या “मैं राजा (राव) हूँ”।
- मेरे धन गृह गोधन प्रभाव: बाहरी वस्तुओं पर अपना अधिकार मानना—”यह धन मेरा है, यह घर मेरा है, पशु-संपदा मेरी है और मेरा प्रभाव/वर्चस्व है”।
- मेरे सुत तिय: सांसारिक रिश्तों को अपना मानना—”यह मेरा पुत्र (सुत) है, यह मेरी स्त्री (तिय) है”।
- मैं सबल दीन: “मैं बलवान/शक्तिशाली हूँ” या “मैं कमजोर/दीन हूँ”।
- बेरूप सुभग: “मैं कुरूप (असुंदर) हूँ” या “मैं सुंदर हूँ”।
- मूरख प्रवीन: “मैं मूर्ख (अज्ञानी) हूँ” या “मैं चतुर (प्रवीण) हूँ”।
कर्म-उदय एवं आत्मा का स्वभाव
- प्रभाव और पद (सत्ता): सांसारिक प्रभाव, पद या प्रसिद्धि कर्म के उदय पर निर्भर करती है। उदाहरण के लिए, कोई नेता आज मुख्यमंत्री है और अगले दिन चुनाव हारकर साधारण विधायक रह जाता है। बाहर प्रभाव रहे या न रहे, आत्मा के निज स्वरूप पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
- शारीरिक बल एवं दुर्बलता: व्यक्ति का बलवान (सबल) या कमजोर (दीन) होना वीर्यान्तराय कर्म के क्षयोपशम पर आधारित है।
- रूप एवं रूपहीनता: सुंदर होना शुभ नाम-कर्म का उदय है और असुंदर होना अशुभ नाम-कर्म का। यह शरीर की अवस्थाएँ हैं, आत्मा की नहीं।
- बुद्धि एवं अज्ञान: मूर्ख या चतुर होना ज्ञानावरणीय कर्म के क्षयोपशम से तय होता है। आत्मा तो स्वभाव से अनंत ज्ञान, अनंत दर्शन और सिद्धों के समान पवित्र है।
सुख-दुख और बीमारी का सही दृष्टिकोण
- इंद्रिय सुख बनाम आत्मिक सुख: जो इंद्रियों को अनुकूल लगे उसे सुख और जो प्रतिकूल लगे उसे दुख कहा जाता है। इसका संबंध इंद्रियों (शरीर) से है, चेतन आत्मा से नहीं।
- बीमारी और इलाज: बीमारी शरीर को होती है, आत्मा को नहीं। सम्यग्दृष्टि जीव शरीर को अपना साधन मानकर इलाज कराता है, परंतु उसके सड़ने या नष्ट होने पर दुखी होकर रोता नहीं है।
निश्चय नय एवं व्यवहार नय की दृष्टि
- व्यावहारिक कथन: लौकिक जीवन में “यह मेरा घर है”, “यह मेरी स्त्री है”, “यह मेरा पुत्र है”—ऐसा कहना व्यवहार नय से सत्य है।
- निश्चय (वास्तविक) दृष्टि: निश्चय नय से यह सब पुद्गल (अजीव) हैं। मृत्यु के समय इनमें से कुछ भी साथ नहीं जाता, इसलिए वास्तव में मेरा कोई नहीं है।
- मायाचारी का दोष नहीं: व्यवहार में बाहरी संबंध स्वीकार करना और अंतरंग में स्वयं को केवल ज्ञायक-द्रष्टा मानना मायाचारी नहीं है, बल्कि दोनों नयों की अपनी-अपनी अपेक्षा से सही समझ है।
प्रश्न एवं उत्तर
- एक अज्ञानी (मिथ्यादृष्टि) जीव सुख और दुख को किस प्रकार देखता है?
- अज्ञानी जीव कर्मोदय (साता और असाता वेदनीय) से मिलने वाली बाहरी सुविधाओं और शारीरिक स्थितियों से खुद को सुखी या दुखी मानता है। वह यह भूल जाता है कि सच्चा सुख आत्मा का निज स्वभाव है।
- धन, कुटुंब या शारीरिक रूप-रंग से खुद को जोड़ना मिथ्यात्व क्यों है?
- धन, संपत्ति, राजा-रंक की स्थिति, सुंदरता या शारीरिक बल—ये सभी पुद्गल की क्षणभंगुर अवस्थाएँ हैं। इन क्षणिक और बाहरी चीज़ों को नित्य आत्मा का स्वरूप मान लेना ही मिथ्या श्रद्धान है।
- सम्यग्दृष्टि (सच्ची दृष्टि) वाले जीव का क्या दृष्टिकोण होना चाहिए?
- आत्मा केवल जानने और देखने वाली (ज्ञाता-दृष्टा) है। शरीर का दुख-दर्द, सुख, सुंदरता, धन और सामाजिक स्थिति का संबंध कर्मों के फल से है, अविनाशी आत्मा से नहीं।
- क्या सुख-सुविधाएँ मिलने पर भी स्वयं को सुखी नहीं मानना चाहिए?
- बाहर मिलने वाली सुख-सुविधाएँ कर्म-उदय के आधीन हैं और उनका संबंध केवल इंद्रियों से है। आत्मा तो ज्ञाता-द्रष्टा स्वरूप है; बाहरी स्थितियों में स्वयं को सुखी या दुखी मानना जीव तत्व की विपरीत मान्यता (मिथ्यात्व) है।
- यदि शरीर आत्मा से अलग है, तो बीमारी में इलाज क्यों कराया जाता है?
- शरीर धर्म-साधना का साधन है, इसलिए व्यवहार रूप से इसका इलाज कराया जाता है। परंतु इलाज कराने के बाद भी यदि शरीर ठीक न हो, तो दुखी न होकर यह मानना चाहिए कि असाता वेदनीय कर्म का उदय शरीर पर है, आत्मा पर नहीं।
- व्यवहार नय और निश्चय नय में क्या अंतर है?
- व्यवहार नय: लौकिक संसार में संबंध बताने के लिए उपयोग होता है (जैसे: “यह मेरा मकान/परिवार है”)।
- निश्चय नय: वस्तु के वास्तविक स्वरूप को दर्शाता है कि आत्मा इन सभी पुद्गल परमाणुओं से भिन्न केवल ज्ञाता-द्रष्टा है।
छहढाला पहली ढाल छंद 1 व 2 | छंद 3 व 4 | छंद 5 व 6 | छंद 7 व 8 | छंद 9 व 10 | छंद 11 व 12 | छंद 13 व 14 | छंद 15 व 16 |
दूसरी ढाल छंद 1 व 2 |
स्वाध्याय
छहढाला दूसरी ढाल छंद 3 व 4 पर आधारित बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)




