राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 –श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681 | श्लोक 682 से 691
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 692 to 701
श्लोक ( Shlok ) 692 – 694
मकदाचिलक्ष्मणो नागवाहिनीशयने सुखम् । ‘सुप्तो न्यग्रोधवृक्षस्य भन्जनं मत्तदन्तिना ॥६९२॥सैहिंकेय निगीर्णार्करसातलनिवेशनम् । सुधाधवलितोत्तङ्गप्रासादैकांशविच्युतिम् ॥ ६९३ ॥स्वप्ने दृष्ट्वा समुत्थाय समासाद्य निजाग्रजम् । स्वप्नान् संप्रश्रयं सर्वान् यथादृष्टान्न्यवेदयत् ॥६९४॥
किसी एक दिन लक्ष्मण नागवाहिनी शय्या पर सुखसे सोया हुआ था। वहाँ उसने तीन स्वप्न देखे – पहला मन्त हाथीके द्वारा वट वृक्षका उखाड़ा जाना, दूसरा राहुके द्वारा निगले हुए सूर्यका रसातलमें चला जाना और तीसरा चूनासे सफेद किये हुए ऊँचे राजभवनका एक-देश गिर जाना । इन स्वप्नोंको देखकर वह उठा, बड़े भाई रामचन्द्रजीके पास गया और विनयके साथ सब स्वप्नोंको जिस प्रकार देखा था उसी प्रकार निवेदन कर गया ।। ६९२-६९४ ।।
“One day, while Lakshmana was sleeping comfortably on his Nagavahini bed (a bed adorned with serpent motifs), he saw three dreams:
- First, a banyan tree being uprooted by a mad elephant;
- Second, the sun, swallowed by Rahu, sinking into the underworld (Rasatala);
- And third, a part of a tall, lime-whitened royal palace collapsing.
Having seen these dreams, he woke up, approached his elder brother Ramachandraji, and respectfully related all the dreams exactly as he had seen them.”
श्लोक ( Shlok ) 695 – 696
पुरोहितस्तदाकर्ण्य फलं तत्रेत्थमब्रवीत् । व्यग्रोधोन्मूलनाद् व्याधिमसाध्यं केशवो व्रजेत् ॥६९५॥राहुग्रस्तार्कसम्पाताद् ‘भाग्यभोगायुषां क्षयः । तुङ्गप्रासादभङ्गेन त्वं प्रयाता तपोवनम् ॥ ६९६ ॥
पुरोहितने सुनते ही उनका फल इस प्रकार कहा कि, वट वृक्षके उखड़नेसे लक्ष्मण असाध्य बीमारीको प्राप्त होगा, राहुके द्वारा मस्त सूर्यके गिरनेसे उसके भाग्य, भोग और आयुका क्षय सूचित करता है तथा ऊँचे भवनके गिरनेसे आप तपोवनको जावेंगे ॥ ६९५-६९६ ॥
“As soon as the priest heard this, he interpreted the fruits of the dreams as follows: the uprooting of the banyan tree indicates that Lakshmana will fall afflicted by an incurable illness; the fall of the sun eclipsed by Rahu signifies the destruction of his fortune, worldly pleasures, and lifespan; and the collapse of the tall palace indicates that you (Ramachandra) will depart for the penance-forest (Tapovana).” 695 – 696
श्लोक ( Shlok ) 697
इत्येकान्ते वचस्तस्य श्रुत्वा रामो यथार्थवित् । धीरोदात्ततया नायान् मनागपि मनःक्षतिम् ॥ ६९७॥
पदार्थों के यथार्थ स्वरूपको जानने वाले रामचन्द्रजीने पुरोहितके यह वचन एकान्तमें सुने परन्तु धीर-वीर होनेके कारण मनमें कुछ भी विकार-भावको प्राप्त नहीं हुए ॥ ६९७ ॥
“Ramachandraji, who knew the true nature of reality, listened to these words of the priest in private. However, being courageous and steadfast (Dheera-Veera), his mind remained completely undisturbed and free from any signs of distress or agitation.”697
श्लोक ( Shlok ) 698
लोकद्वयहितं मत्वा कारयामास २ घोषणाम् । प्राणिनो नहि हन्तव्याः कैश्चिश्चेति दयोद्यतः ॥६९८॥
तदनन्तर दयामें उद्यत रहनेवाले रामचन्द्रजीने दोनों लोकोंका हितकर मान कर यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करे ॥ ६९८ ॥
“Thereafter, Ramachandraji, who was always dedicated to compassion, considered it beneficial for both this world and the next, and made a proclamation that no human being should cause harm or violence to any living creature.”698
श्लोक ( Shlok ) 699
चकार शान्तिपूजां च सर्वज्ञसवनावधिम् । ददौ दानं च दीनेभ्यो येन यद्यदभीप्सितम् ॥६९९॥
इसके सिवाय उन्होंने सर्वज्ञ देवका स्तवन तथा शान्ति-पूजा की और दीनोंके लिए जिसने जो चाहा वह दान दिया ॥ ६९९ ॥
“In addition to this, he sang hymns of praise (Stavana) to the Omniscient Lord, performed the peace-ritual (Shanti-Puja), and bestowed upon the needy whatever charity they desired.” 699
श्लोक ( Shlok ) 700
बभूव क्षीणपुण्यस्य ततः कतिपयैर्दिनैः । केशवस्य महाव्याधिरसातोदयचोदितः ॥ ७०० ॥
तदनन्तर जिसका पुण्य क्षीण हो गया है ऐसे लक्ष्मणको कुछ दिनोंके बाद असाता वेदनीय कर्म के उदयसे प्रेरित हुआ महारोग उत्पन्न हुआ ।। ७०० ॥
“Thereafter, a few days later, Lakshmana—whose meritorious karma (Punya) had been exhausted—was afflicted with a severe, incurable disease, triggered by the rise and manifestation of his pain-producing karma (Asata Vedaniya Karma).”700
श्लोक ( Shlok ) 701
दुःसाध्येनामयेनाऽसौ माघे मास्यसितेऽन्तिमे । दिने तेनागमञ्चक्री पृथ्वीं पङ्कप्रभाभिधाम् ॥७०१॥
उसी असाध्य रोगके कारण चक्ररत्नका स्वामी लक्ष्मण मरकर माघ कृष्ण अमावस्याके दिन चौथी पङ्क-प्रभा नामकी पृथिवीमें गया ॥ ७०१ ॥
“On account of that very incurable disease, Lakshmana, the master of the divine discus (Chakra-ratna), passed away on the day of Magha Krishna Amavasya (the new moon day of the dark fortnight of the Hindu month of Magha) and descended into Panka-prabha, the fourth hell-world.”701
श्लोक 702 से 711
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484 | श्लोक 485 से 493 | श्लोक 494 से 501 | श्लोक 502 से 515 | श्लोक 516 से 531 | श्लोक 532 से 542 | श्लोक 543 से 551 | श्लोक 552 से 560 | श्लोक 561 से 575 | श्लोक 576 से 585 | श्लोक 586 से 594 | श्लोक 595 से 604 | श्लोक 605 से 622 | श्लोक 623 से 631 | श्लोक 632 से 641 | श्लोक 642 से 651 | श्लोक 652 से 661 | श्लोक 662 से 672 | श्लोक 673 से 681 | श्लोक 682 से 691
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