पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 67 to 79
श्लोक ( Shlok ) 67
कमठः प्राक्तनः पापी प्रच्युतो नरकक्षितेः । कण्ठीरवत्वमासाद्य तन्मुनेः कण्ठमग्रहीत् ॥ ६७ ॥
पूर्व जन्मके पापी कमठका जीव नरकसे निकलकर उसी वनमें सिंह हुआ था सो उसने आकर उन मुनिका कण्ठ पकड़ लिया ।। ६७ ।।
“The soul of Kamath, who was a sinner in his past life, had emerged from hell and been reborn as a lion in that very same forest. He came and seized the throat of that Sage.” (67)
श्लोक ( Shlok ) 68
सोढसिंहोपसर्गोऽसौ चतुराराधनाधनः । व्यसुरानतकल्पेशो विमाने प्राणतेऽभवत् ॥ ६८ ॥
इस प्रकार सिंहका उपसर्ग सहकर चार आराधना रूपी धनको धारण करने-वाला वह मुनि प्राणरहित हो अच्युत स्वर्गके प्राणत विमानमें इन्द्र हुआ ॥ ६८ ॥
“In this manner, enduring the calamity (upasarga) caused by the lion, that Sage, possessing the immense wealth of the four-fold path of adoration (aradhana), left his mortal body and was reborn as the Indra (ruler) in the Pranata celestial vehicle (Vimana) of the Achyuta heaven.” (68)
श्लोक ( Shlok ) 69 – 73
तत्र विंशतिवाराशिविहितोपमजीवितः । सार्धारत्नित्रयोन्मेयशरीरः शुक्कुलेश्यया ॥ ६९ ॥दशमासान्तनिश्वासी मनसाऽमृतमाहरन् । खचतुष्कद्विवर्षान्ते मनसा स्त्रीप्रचारवान् ॥ ७० ॥आपञ्चमक्षितिव्याप्ततृतीयावगमेक्षणः । स्वावधिक्षेत्रमानाभाविक्रियाबलसङ्गतः ॥ ७१ ॥सामानिकादिसर्वद्धिसुधाशनसमचितः । कान्तकामप्रदानेकदेवीकृतसुधाकरः ॥ ७२ ॥विश्वान्वैषयिकान्भोगान् शश्वत्सम्प्राप्य निर्विशन् । तल्लोलो लीलया कालमला ‘वीत्कलयन्कलाम् ॥७३॥
वहाँपर उसकी बीस सागरकी आयु थी, साढ़े तीन हाथ ऊँचा शरीर था, शुक्ल लेश्या थी, वह दश माह बाद श्वास लेता था, और बीस हजार वर्ष बाद मानसिक अमृताहार ग्रहण करता था। उसके मानसिक स्त्रीप्रवीचार था, पांचवीं पृथिवी तक अवधिज्ञानका विषय था, उतनी दूरी तकही उसकी कान्ति, विक्रिया और बल था, सब ऋद्धियों के धारक सामानिक आदि देव उसकी पूजा करते थे, और वह इच्छानुसार काम प्रदान करने वाली अनेक देवियोंके द्वारा उत्पादित सुखकी खान था। इस प्रकार समस्त विषय-भोगप्राप्तकर वह निरन्तर उनका अनुभव करता रहता था और उन्हीं में सतृष्ण रहकर लीला पूर्वक बहुत लम्बे समयको एक कलाकी तरह व्यतीत करता था ।। ६९-७३ ॥
“There, his lifespan was twenty Sagaras (cosmic ocean-measured years), his body was three and a half hands tall, and he possessed the purest white spiritual coloration (Shukla Leshya). He breathed only once every ten months and partook in mental nectar-sustenance (Amritahara) once every twenty thousand years.
His indulgence in sexual pleasure with celestial maidens was purely mental (manasika stripravichara), and the scope of his clairvoyant knowledge (Avadhijnana) extended down to the fifth hell-earth. His bodily radiance, power of transformation (vikriya), and strength stretched to that same distance.
Celestial beings of equal status (Samanika Devas) and others, who possessed all mystical powers (riddhis), worshipped him. He was a treasure-grove of happiness generated by numerous goddesses who granted every wish. In this manner, having attained all objects of sensory pleasure, he continuously experienced them. Remaining deeply attached to those pleasures, he playfully spent an immensely long period of time as if it were a mere passing moment.” (69-73)
श्लोक ( Shlok ) 74 – 78
षण्मासैरन्ति मैस्तस्मिन्नागमिष्यत्यमूं महीम् । द्वीपेऽस्मिन् भरते काशीविषये नगरेऽधिपः ॥ ७४ ॥वाराणस्यामभूद्विश्वसेनः काश्यपगोत्रजः । ब्राह्ययस्य देवी सम्प्राप्तवसुधारादिपूजना ॥ ७५ ॥वैशाखकृष्णपक्षस्य द्वितीयायां निशात्यये । विशाखक्षै शुभस्वप्नानिरीक्ष्य तदनन्तरम् ॥ ७६ ॥स्ववक्त्राब्जप्रविष्टोरुगजरूपविलोकिनी । प्रभातपटहध्वानसमुन्मीलितलोचना ॥ ७७ ॥’मङ्गलाभिषवाविष्टतुष्टिः पुण्यप्रसाधना । विभावरीव सज्ज्योत्स्ना “राजानं समुपेत्य सा ॥ ७८ ॥
जिस समय उसकी आयुके अन्तिम छह माह रह गये और वह इस पृथिवी पर आनेके लिए सन्मुख हुआ उस समय इस जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र सम्बन्धी काशी देशमें बनारस नामका एक नगर था। उसमें काश्यपगोत्री राजा विश्वसेन राज्य करते थे। उनकी रानीका नाम ब्राह्मी था। देवोंने रत्नोंकी धारा बरसाकर उसकी पूजा की थी । रानी ब्राह्मीने वैशाखकृष्ण द्वितीयाके दिन प्रातःकालके समय विशाखा नक्षत्रमें सोलह शुभ स्वप्न देखे और उसके बाद अपने मुख-कमलमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा । प्रातःकालके समय वजनेवाले नगाड़ोंके शब्दोंसे उसकी आँख खुल गई और मङ्गलाभिषेकसे संतुष्ट होकर तथा वस्त्राभरण.. पहिन कर वह राजा के समीप इस प्रकार पहुँची मानो चाँदनी रात चन्द्रमाके समीप पहुँची हो ॥७४-७८ ।।
“When only six months remained of his lifespan and he was prepared to descend to this Earth, there was a city named Banaras in the Kashi region of the Bharata Kshetra, within this Jambudvipa. In that city ruled King Vishvasena of the Kashyapa lineage (gotra). The name of his queen was Brahmi. The celestial gods worshipped her by showering a stream of precious gems.
On the morning of the second day of the dark fortnight of the month of Vaishakha (Vaishakha Krishna Dwitiya), under the Vishakha constellation, Queen Brahmi saw sixteen highly auspicious dreams, followed by the sight of a magnificent elephant entering her lotus-like mouth.
She woke up to the resonant sound of drums beating at the break of dawn. Gratified by the auspicious morning ablutions (mangala-abhisheka) and adorned in fine garments and ornaments, she approached the King, looking just like the radiant moonlight approaching the moon.” (74-78)
श्लोक ( Shlok ) 79
कृतोपचारा संविश्य विष्टरार्धे महीपतेः । स्वदृष्टसकलस्वप्नान्यथाक्रममभाषत ॥ ७९ ॥
आदरपूर्वक वह महाराजके आधे सिंहासन पर बैठी और अपने द्वारा देखे हुए सब स्वप्न यथाक्रमसे कहने लगी ।। ७९ ।।
“With great respect, she sat on half of the King’s throne and began to narrate all the dreams she had seen, exactly in the order they appeared.” (79)
श्लोक 80 से 92
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