आलोचना पाठ – छंद 28 व 29 : अर्थ एवं व्याख्या
ताको जु उदय अब आयो, नाना विध मोहि सतायो
फल भुंजत जिय दुःख पावै, वचतै कैसे करि गावै ॥28॥
शब्दार्थ
- ताको — उन कर्मों का।
- उदय — कर्म का फल देने के लिए प्रकट होना।
- नाना विध — अनेक प्रकार से।
- मोहि सतायो — मुझे कष्ट दिया।
- फल भुंजत — कर्मों का फल भोगते हुए।
- जिय — जीव/आत्मा।
- दुःख पावै — दुःख अनुभव करता है।
- वचतै कैसे करि गावै — शब्दों में उसका वर्णन कैसे किया जा सकता है?
‘ताको जो उदय अब आयो’, अब जब उन पापों का उदय आ रहा है, ‘नाना विधि मोहि सतायो’, ये मुझे नाना प्रकार से सता रहे हैं। जब कर्म हम करते हैं ना, तो हम बहुत हँसते-हँसते कर्मों को करते हैं, लेकिन जब हमें फल भोगना पड़ता है ना, तो बहुत रुला-रुला के ये कर्म हमें मारते हैं। उन पाप कर्मों का उदय अब मेरे सामने आया है और वे मुझे अनेक प्रकार से कष्ट दे रहे हैं।
तो ‘ताको जो उदय अब आयो’, जब इन कर्मों का, इन पाप कर्मों का जब उदय में आएँगे, तो ये क्या हैं? ये मुझे बहुत सताते हैं। ‘फल भुंजत जीय दुख पावे’, इनके फलों को भोगकर मैं बहुत दुःखी होता हूँ, ये मुझे बहुत दुःख पहुँचाते हैं। ‘वचते कैसे करि गावे’, हे जिनेंद्र भगवान! मैं अपने वचनों के द्वारा कैसे इनके फल का वर्णन करूँ कि कैसे ये मुझे दुःखी कर रहे हैं। उन कर्मों का फल भोगते हुए मेरी आत्मा दुःख अनुभव कर रही है। उस दुःख की पूरी व्यथा मैं शब्दों में कैसे व्यक्त करूँ?
यह पद जैन कर्म-सिद्धांत की ओर संकेत करता है।
समझते हैं कि किए गए कर्म समाप्त नहीं हो जाते। जब उनके फल देने का समय आता है, तब उनका उदय होता है और जीव को उनके अनुरूप सुख या दुःख का अनुभव होता है।
यहाँ अपने वर्तमान दुःख को केवल बाहरी परिस्थितियों का परिणाम नहीं मानते, बल्कि अपने पूर्वकृत कर्मों के उदय और फल के रूप में देखते हैं।
महत्वपूर्ण बात यह है कि दुःख की शिकायत मात्र नहीं करते। अपने दुःख को आत्मावलोकन का अवसर बनाते हैं—
मैंने कर्म किए → वे कर्म बंधे → उनका उदय हुआ → मुझे फल भोगना पड़ा।
इस समझ से व्यक्ति दूसरों को दोष देने के बजाय अपने भावों और कर्मों को सुधारने की दिशा में बढ़ता है।
कर्मफल की स्वीकृति व्यक्ति में जिम्मेदारी की भावना उत्पन्न करती है। आज के कर्म ही भविष्य के अनुभवों का कारण बन सकते हैं, इसलिए—
भाव शुद्ध करो, कर्म शुद्ध होंगे; कर्म शुद्ध होंगे तो भविष्य का मार्ग भी शुद्ध होगा।
छंद 29
तुम जानत केवलज्ञानी, दुःख दूर करो शिवथानी
हम तो तुम शरण लहि है, जिन तारन विरद सही हैं ॥29॥
शब्दार्थ
- केवलज्ञानी — जिसे समस्त पदार्थों का पूर्ण ज्ञान है।
- शिवथानी — मोक्ष/कल्याण का स्थान।
- शरण लहि है — शरण ग्रहण की है।
- तारन — संसार-सागर से पार लगाने वाला।
- विरद — प्रसिद्ध गुण/प्रतिज्ञा/महिमा।
- सही — सत्य/उचित।
‘तुम जानत केवलज्ञानी’, हे केवलज्ञानी! आपके ज्ञान में तो सब कुछ स्पष्ट झलक रहा है, आप तो युगपत सब चीज़ों को जानते हैं। आप मेरे सभी भावों और कर्मों को जानते हैं। तो हे जिनेंद्र भगवान! आप मेरे इन दुःखों को देखकर मेरे इन दुःखों को दूर करिए।मुझे इन दुःखों से दूर करके शिव अर्थात् मोक्ष के मार्ग की ओर ले जाने की प्रेरणा दें। ‘हम तो तुम शरण लही है’, हम तो आपकी शरण में आए हैं, क्योंकि आप ही हमारे लिए शरणभूत हो। ‘जिन तारण विरद सही है’, क्योंकि आप ही हमारे कष्टों को दूर करने में समर्थ हैं। मैंने आपकी शरण ग्रहण की है, क्योंकि जिनराज का संसार से पार लगाने वाला स्वरूप प्रसिद्ध है।
यहाँ आलोचना का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण चरण आता है—शरणागति।
कर्मों का वास्तविक ज्ञान केवल स्वयं नहीं, बल्कि केवलज्ञानी जिनराज को पूर्ण रूप से है। इसलिए वे अपने सभी ज्ञात-अज्ञात दोषों को स्वीकार करके जिनराज के समक्ष समर्पित होते हैं।
लेकिन यहाँ “दुःख दूर करो” का अर्थ यह नहीं है कि जिनराज स्वयं किसी के कर्मों को नष्ट कर देते हैं या बिना साधना के पापों का फल समाप्त कर देते हैं।
जैन दर्शन की दृष्टि से जिनराज मार्गदर्शक और आदर्श हैं। वे जीव को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र के मार्ग की प्रेरणा देते हैं। अपने कर्मों का क्षय और आत्मशुद्धि जीव को स्वयं साधना द्वारा करनी होती है।
इसलिए जिनराज की शरण का वास्तविक अर्थ है—
उनके उपदेश में श्रद्धा → अपने दोषों की आलोचना → प्रायश्चित्त → संयम → कषायों का क्षय → आत्मशुद्धि → मोक्षमार्ग।
छंद 30 व 31 – अर्थ
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