नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 184 to 191
श्लोक ( Shlok ) 184
उत्कृष्टायुःस्थितिस्तत्र भुक्तभोगोऽत्र तीर्थकृत् । भूत्वा निर्दग्धकर्मारिर्देहमुक्तो भविष्यसि ॥ १८४ ॥
वहांपर सात सागरकी उत्कृष्ट आयु पर्यन्त भोगोंका उपभोगकर इसी भरत क्षेत्रमें तीर्थंकर होगा तथा कर्मरूपी शत्रुओंको जलाकर शरीरसे मुक्त होगा ॥ १८४ ॥
“Having enjoyed the highest pleasures there for the duration of seven Sagaras (an immense celestial time period), he will then be born as a Tirthankara in this Bharata Kshetra (region). Destroying the enemies in the form of Karmas, he will ultimately achieve liberation from the physical body (attain Moksha).”— 184
श्लोक ( Shlok ) 185 – 187
इति तीर्थेशिना प्रोक्त श्रुत्वा द्वीपायनाह्वयः । सद्यः संयममादाय प्रायाज्जनपदान्तरम् ॥ १८५ ॥तथा जरत्कुमारश्च कौशाम्ब्यारण्यमाश्रयत् । प्राग्बद्धनरकायुष्यो हरिरन्वाप्तदर्शनः ॥ १८६ ॥भाव्यमानान्त्यनामासौ नाहं शक्नोमि दीक्षितुम् । शक्तान्न प्रतिबनामीत्यास्त्रीबालमघोषयत् ॥ १८७ ॥
श्री तीर्थंकर भगवान्का यह उपदेश सुनकर द्वीपायन तो उसी समय संयम धारणकर दूसरे देशको चला गया तथा जरत्कुमार कौशाम्बीके वनमें जा पहुँचा। जिसने पहले ही नरकायुका बन्ध कर लिया था ऐसे श्रीकृष्णने सम्यग्दर्शन प्राप्तकर तीर्थंकर प्रकृतिके बन्धमें कारणभूत सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन किया तथा स्त्री बालक आदि सबके लिए घोषणा कर दी कि मैं तो दीक्षा लेनेमें समर्थ नहीं हूं परन्तु जो समर्थ हों उन्हें मैं रोकता नहीं हूं ॥ १८५-१८७ ॥
“Hearing this preaching of the Tirthankara Lord, Dvaipayana immediately embraced self-restraint (Sanyama) and departed for another country, while Jaratkumara reached the forest of Kaushambi. On the other hand, Shri Krishna—who had previously bound his lifespan for hell (Narakayu)—attained right belief (Samyagdarshana) and contemplated upon the Sixteen Cause Reflections (Solah Karana Bhavanas) that lead to the binding of Tirthankara nature (Tirthankara Prakriti). He then made an announcement to all, including women and children, saying: ‘I am unable to take initiation (Diksha) myself, but I do not stop anyone else who is capable of doing so.'”— 185–187
श्लोक ( Shlok ) 188
प्रद्यन्नादिसुता देव्यो रुक्मिण्याद्याश्च चक्रिणम् । बन्धूंश्चापृच्छय तैर्मुक्ताः प्रत्यपद्यन्त संयमम् ॥ १८८ ॥
यह सुनकर प्रद्युम्न आदि पुत्रों तथा रुक्मिणी आदि देवियोंने चक्रवर्ती श्रीकृष्ण एवं अन्य बन्धुजनोंसे पूछकर उनकीआज्ञानुसार संयम धारण कर लिया ।। १८८ ॥
“Hearing this, his sons—led by Pradyumna—and his queens—led by Rukmini—sought permission from the Cakravartin Shri Krishna and other kinsmen, and in accordance with their instructions, embraced self-restraint (Sanyama).”— 188
श्लोक ( Shlok ) 189 – 190
द्वीपायननिदानावसाने जाम्बवतीसुतः । अनिरुद्धश्च कामस्य सुतः सम्प्राप्य संयमम् ॥ १८९ ॥प्रद्युन्नमुनिना सार्धमूर्जयन्ताचलाग्रतः । कूटत्रयं समारुह्य प्रतिमायोगधारिणः ॥ १९० ॥
द्वीपायन द्वारिका-दाहका निदान अर्थात् कारण था. जब वहांसे अन्यत्र चला गया तब जाम्बवतीके पुत्र शम्भव तथा प्रद्युम्नके पुत्र अनिरुद्धने भी संयम धारण कर लिया और प्रद्युम्नमुनिके साथ गिरनार पर्वतकी ऊँची तीन शिखरोंपर आरूढ होकर सब प्रतिमा योगके धारक हो गये ।। १८९-१९० ॥
“Dvaipayana was the cause (Nidana) behind the burning of Dvaraka. When he left that place for elsewhere, Sambhava (the son of Jambavati) and Aniruddha (the son of Pradyumna) also embraced self-restraint (Sanyama). Ascending the three high peaks of Mount Girnar alongside the monk Pradyumna, they all adopted the Pratima Yoga (a steadfast, unmoving meditative posture).”— 189–190
श्लोक ( Shlok ) 191
शुक्लध्यानं समापूर्य त्रयस्ते घातिघातिनः । कैवल्यनवकं प्राप्य प्रापन्मुक्तिमथान्यदा ॥ १९१ ॥
उन तीनोंने शुक्ल ध्यानको पूराकर घातिया कर्मोंका नाश किया और नव केवललब्धियाँ पाकर मोक्ष प्राप्त किया ॥ १९१ ।।
“Completing the Shukla Dhyana (purest white meditation), those three destroyed the Ghatiya Karmas (destructive karmas). Attaining the nine Kevala-Labdhis (supreme spiritual attainments), they achieved final liberation (Moksha).”— 191
श्लोक 192 से 201
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183
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