राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 272 to 283
श्लोक ( Shlok ) 272
प्रकुर्वन् भीमको राज्यं विद्याः शाख्येन केनचित् । हिरण्यवर्मणो हृत्वा तं च हन्तुं समुद्यतः ॥२७२॥
इधर भीमक राज्य करने लगा उसने किसी छलसे हिरण्यवर्माकी विद्याएँ हर लीं। यही नहीं, वह उसे मारनेके लिए भी तैयार हो गया ।। २७२ ॥
“Meanwhile, Bhimaka began to rule. Through deception, he seized all the sacred spells and sciences (vidyas) belonging to Hiranyavarma. Not stopping at that, he even prepared to put him to death.” [272]
श्लोक ( Shlok ) 273- 274
ज्ञात्वा हिरण्यवर्मैतत्सम्मेदाद्रिमशिश्रियत् । भीमकस्तं क्रुधान्वित्य गिरिं गन्तुमशक्तकः ॥ २७३ ॥ तीर्थेशसन्निधानेन तीर्थत्वादागमत्पुरम् । ततो हिरण्यवर्मापि पितृव्यं समुपागतः ॥ २७४ ॥
हिरण्यवर्मा यह जानकर सम्मेदशिखर पर्वतपर भाग गया। क्रोधवश भीमकने वहाँ भी उसका पीछा किया परन्तु तीर्थंकर भगवान्के सन्निधान और स्वयं तीर्थ होनेके कारण वह वहाँ जा नहीं सका इसलिए नगर में लौट आया। तदनन्तर हिरण्यवर्मा अपने काका महासेनके पास चला गया ।। २७३-२७४ ॥
“Upon discovering this, Hiranyavarma fled to Mount Sammed Shikhar. Driven by anger, Bhimaka pursued him even there; however, due to the divine presence of the Tirthankara Lords and the intrinsic sanctity of the pilgrimage site itself, he could not enter the sacred mountain and thus returned to his city. Thereafter, Hiranyavarma sought refuge with his paternal uncle, Mahasena.” [273-274]
श्लोक ( Shlok ) 275 – 280
तच्छत्वा तं निराकर्तुं पूज्यपादोऽर्हतीत्यसौ । महासेनमहाराजं प्राहिणोत्प्रतिपत्रकम् ॥ २७५ ॥ तस्यानिराकृति 3 तस्माज्ञात्वायातं युयुत्सया । क्रूर एष दुरात्मेति मत्पिता भीमकं रणे ॥ २७६ ॥ निर्जित्य शृङ्खलाक्रान्तमकरोत्क्रमयोद्वयोः । पुनः क्रमेण शान्तात्मा नैतद्युक्तं ममेति तम् ॥ २७७ ॥मुक्त्वा विधाय सन्धानं प्रशमय्य हितोक्तिभिः । हिरण्यवर्मणा सार्धं दत्वा राज्यञ्च पूर्ववत् ॥ २७८ ॥विससर्ज तथावज्ञा बद्धवैरः स भीमकः । हिरण्यवर्मणि प्रायो विद्यां संसाध्य राक्षसीम् ॥ २७९ ॥ तया हिरण्यवर्माणं पापी मत्पितरं पुरम् । मद्वन्धूनपि विध्वस्य मामुद्दिश्यागमिष्यति ॥ २८० ॥
जब भीमकने यह समाचार सुना तो उसने महाराज महासेनके लिए इस आशयका एक पत्र भेजा कि आप पूज्यपाद हैं- हमारे पूजनीय हैं इसलिए हमारे शत्रु हिरण्यवर्माको वहाँ से निकाल दीजिए। महाराज महासेनने भी इसका उत्तर भेज दिया कि मैं उसे नहीं निकाल सकता। यह जानकर भीमक युद्धकी इच्छासे यहाँ आया। ‘यह दुरात्मा बहुत ही क्रूर है’ यह समझ कर हमारे पिताने युद्धमें भीमकको जीत लिया तथा उसके दोनों पैर सांकलसे बाँध लिये । तदनन्तर अनुक्रमसे शान्त होनेपर हमारे पिताने विचार किया कि मुझे ऐसा करना उचित नहीं है ऐसा विचार कर उन्होंने उसे छोड़ दिया और हितसे भरे शब्दोंसे उसे शान्त कर हिरण्यवर्माके साथ उसकी सन्धि करा दी तथा पहलेके समान ही राज्य देकर उसे भेज दिया । भीमक उस समय तो चला गया परन्तु इस अपमानके कारण उसने हिरण्यवर्माके साथ वैर नहीं छोड़ा। फलस्वरूप उस पापी भीमकने राक्षसी विद्या सिद्ध कर हिरण्यवर्माको, मेरे पिताको तथा मेरे भाइयोंको मार डाला है, इस नगरको उजाड़ दिया है और अब मुझे लेनेके उद्देश्यसे आनेवाला है ।। २७५-२८० ॥
“When Bhimaka received this news, he dispatched a letter to King Mahasena to this effect: ‘You are our revered and worshipful elder; therefore, banish our enemy Hiranyavarma from your realm.’ King Mahasena, however, sent a reply saying, ‘I cannot banish him.’
Upon learning this, Bhimaka arrived here with the intent to wage war. Realizing that ‘this evil soul is exceedingly cruel,’ my father defeated Bhimaka in battle and bound both his feet in chains. Subsequently, when the tension gradually subsided, my father reflected, ‘It is not proper for me to act in this manner.’ With this thought, he released him, pacified him with benevolent words, brought about a reconciliation between him and Hiranyavarma, and sent him back after restoring his kingdom just as before.
Bhimaka left at that time, but due to this humiliation, he did not abandon his enmity toward Hiranyavarma. Consequently, that sinful Bhimaka mastered a demonic lore (Rakshasi Vidya), with which he has now slaughtered Hiranyavarma, my father, and my brothers, devastated this city, and is now bound to arrive here with the intent of seizing me.” [275-280]
श्लोक ( Shlok ) 281 – 283
इति सर्व समाकर्ण्य कुमारो विस्मयं वहन् । शय्यातलस्थमालोक्य खड्गमेष सुलक्षणः ॥ २८१ ॥यस्य हस्तगतो ‘जेतुं तं शक्रोऽपि न शक्नुयात् । इति मत्वा पितानेन किं ते केनापि युद्धवान् ॥२८२॥ इत्यप्राक्षीत्स तां सापि न स्वप्नेऽपीत्यभाषत । तदा प्रीतिङ्करो हस्तगतमस्त्रं विधाय तत् ॥ २८३ ॥
यह सब कथा सुनकर आश्चर्यको धारण करते हुए कुमार प्रीतिङ्करने शय्यातलपर पड़ी हुई एक तलवारको देखकर कहा कि इस तलवारके बहुत ही अच्छे लक्षण हैं। यह तलवार जिसके हाथमें होगी उसे इन्द्र भी जीतनेके लिए समर्थ नहीं हो सकता है। क्या तुम्हारे पिताने इसतलवारके द्वारा किसीके साथ युद्ध किया है ? इस प्रकार उस कन्या से पूछा। कन्याने उत्तर दिया कि इस तलवारसे पिताने स्वप्नमें भी युद्ध नहीं किया है। तदनन्तर प्रीतिङ्कर कुमारने वह तलवार अपने हाथमें ले ली ।। २८१-२८३ ॥
Upon hearing this entire tale, Prince Pritinkar was filled with astonishment. Noticing a sword lying upon the bed, he said, “This sword possesses exceptionally auspicious characteristics. Indued with this sword in hand, not even Indra (the king of heaven) would be capable of conquering a person. Did your father ever wage war against anyone using this sword?”
Thus he questioned the maiden. The maiden replied, “Father never used this sword in battle, not even in his dreams.”Thereupon, Prince Pritinkar took that sword into his own hands. [281-283]
श्लोक 284 से 291
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राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 64 | श्लोक 65 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 271
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