मेरी भावना – छंद 8: व्याख्या और अर्थ
होकर सुख में मग्न न फूलें दुख में कभी न घबरावें, पर्वत नदी-श्मशान-भयानक-अटवी से नहिं भय खावें ।
रहे अडोल-अकंप निरंतर, यह मन, दृढ़तर बन जावे, इष्टवियोग अनिष्टयोग में सहनशीलता दिखलावे ॥8॥
अब कविवर जुगलकिशोर जी ‘मुख्तार’ इस छंद के माध्यम से मनुष्य को समत्व, धैर्य और मानसिक दृढ़ता का अमूल्य संदेश देते हैं। वे प्रभु से ऐसी आंतरिक शक्ति की प्रार्थना करते हैं कि जीवन की किसी भी परिस्थिति में मन संतुलित बना रहे।
होकर सुख में मग्न न फूलें दुख में कभी न घबरावें
इन पंक्तियों के माध्यम से हमें अपने जीवन में समभाव (समता भाव) के साथ रहने का अभ्यास करने की प्रेरणा दी जा रही है। इसका तात्पर्य यह है कि हम अपने जीवन में आने वाले सुख और दुख, दोनों ही परिस्थितियों में अपने मन का संतुलन बनाए रखते हुए उन्हें सहजता से स्वीकार करें।
सामान्यतः होता यह है कि जब हम सुख में अत्यधिक मग्न हो जाते हैं, तो हम यह भूल जाते हैं कि वास्तव में हम कौन हैं और हमारा कर्तव्य क्या है। कभी-कभी सुख के अतिरेक में व्यक्ति इतना अहंकारी या असावधान हो जाता है कि जब वह सुख का समय बीत जाता है, तो दुख आने पर घबराहट होना स्वाभाविक हो जाता है। इसलिए, सुख और दुख—दोनों ही स्थितियों में तटस्थ रहना अंतरात्मा की शांति के लिए एक अनिवार्य अभ्यास है।
सुख और दुख में मन की स्थिति
यदि आप अपने मन की शांति के लिए सुख और दुख, दोनों परिस्थितियों को तटस्थ होकर देखना शुरू करेंगे, तो आपमें वह परिपक्वता आ जाएगी जिसकी बात यहाँ की जा रही है।
अक्सर देखा जाता है कि सुख के समय मनुष्य इतना प्रफुल्लित हो जाता है कि खुद को सँभाल नहीं पाता, और भीतर ही भीतर दूसरों के प्रति ईर्ष्या या खिंचाव भी रखता है। वहीं दूसरी ओर, जब दुख का समय आता है, तो व्यक्ति बाहर से उदास दिखता है और भीतर ही भीतर घुटता रहता है। वह बार-बार सोचता है—“यह क्या हो गया? अब मैं क्या करूँगा?” यहाँ तक कि अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने के लिए वह दूसरों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास भी करने लगता है ताकि लोग समझे कि वह कितना दुखी है। ऐसी प्रवृत्ति हमारे मानसिक क्लेश को और बढ़ा देती है।
समता भाव का अभ्यास
इसीलिए यहाँ यह समझाया जा रहा है कि यदि हम सुख में बहुत अधिक मग्न या लीन हो जाएँगे, तो दुख आने पर वह हमें आवश्यकता से अधिक भारी और कष्टदायी प्रतीत होगा। जब हम किसी भौतिक सुख में पूरी तरह डूब जाते हैं, तो उसके छूट जाने पर पीड़ा होना अवश्यंभावी है।
जीवन का शाश्वत नियम
हमें सदा यह ध्यान रखना चाहिए कि सुख और दुख हमारे जीवन में दिन और रात की तरह आने-जाने वाली दो स्वाभाविक प्रक्रियाएँ हैं।
- न तो सदा सुख किसी के पास रहता है, और न ही सदा दुख टिका रहता है।
- ये दोनों ही स्थितियाँ परिवर्तनशील हैं—सुख आता है तो वह भी बीत जाता है, और यदि दुख आता है तो वह भी टल जाता है।
इसलिए, दोनों परिस्थितियों में अडोल, अकंप और शांत रहकर सहनशीलता बनाए रखना ही सच्चा धर्म और विवेक है।
धैर्य और तटस्थता का महत्त्व – हमारी अधीरता और समय का प्रभाव
हमारी सबसे बड़ी अधीरता यह होती है कि हम सुख को हमेशा पकड़कर रखना चाहते हैं और दुख से भागना चाहते हैं। यह हमारे भीतर धैर्य की कमी को दर्शाता है। जब व्यक्ति में धैर्य आने लगता है, तो वह सुख और दुख—दोनों को तटस्थ होकर (समभाव से) देखने में सक्षम हो जाता है।
सुख और दुख, दोनों ही ‘वक्त’ यानी समय की देन हैं। समय का तकाज़ा ही कुछ ऐसा है कि जब कठिन समय बीत जाता है, तो वही समय हमारे दुख को भी कम करने और मिटाने में सहायक सिद्ध होता है।
पर्वत नदी-श्मशान-भयानक-अटवी से नहिं भय खावें,
निर्भयता और एकांत साधना एकांत स्थानों में अभय रहना
छंद में आगे कहा गया है कि यदि आपके सामने पर्वत, नदी, श्मशान या भयानक अटवी (सघन जंगल) जैसी प्रतिकूल और भयानक परिस्थितियाँ आ जाएँ, तब भी मन में भय उत्पन्न न हो। जो विवेकशील मनुष्य होते हैं, वे यदि कभी ऐसे एकांत स्थानों पर भटक भी जाएँ या रुकना पड़े, तो भी निर्भीक रहते हैं। इस पंक्ति में कविवर केवल कुछ स्थानों का उल्लेख नहीं करते, बल्कि जीवन में आने वाली कठिन, भयावह और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का भी प्रतीकात्मक चित्र प्रस्तुत करते हैं।
पर्वत ऊँची चढ़ाई, कठिन लक्ष्य और संघर्षपूर्ण मार्ग का प्रतीक है। जब जीवन में कोई कार्य अत्यंत कठिन प्रतीत हो, तब मन में भय या निराशा उत्पन्न नहीं होनी चाहिए।
नदी, विशेषकर उफनती हुई नदी, उन परिस्थितियों का प्रतीक है जिनमें जीवन अस्थिर और अनिश्चित दिखाई देता है। ऐसे समय में धैर्य और विवेक बनाए रखना आवश्यक है।
श्मशान (मरघट) मनुष्य को मृत्यु, नश्वरता और जीवन के कठोर सत्य का स्मरण कराता है। सामान्यतः यह स्थान भय और विरक्ति का भाव उत्पन्न करता है, परंतु साधक को वहाँ भी भयभीत होने के बजाय जीवन की वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए।
भयानक अटवी अर्थात घना, सुनसान और दुर्गम वन अथवा जंगल का मार्ग। यह उन परिस्थितियों का प्रतीक है जहाँ चारों ओर अंधकार, अनिश्चितता और अकेलापन दिखाई देता है तथा आगे का मार्ग स्पष्ट नहीं होता।
कविवर प्रार्थना करते हैं कि इन सभी प्रकार की परिस्थितियों—चाहे वे वास्तविक हों या जीवन के संघर्षों के रूपक—में हमारा मन भयभीत न हो। प्रायः जब मनुष्य किसी विपरीत या संकटपूर्ण स्थिति का सामना करता है, तो उसका धैर्य डगमगा जाता है और उसका आत्मविश्वास कमजोर पड़ने लगता है। किंतु आदर्श जीवन वही है जिसमें व्यक्ति कठिनाइयों के बीच भी संयम, साहस और विवेक बनाए रखे।
इसलिए कविवर प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि चाहे सामने पर्वत जैसी कठिन चुनौती हो, उफनती नदी जैसी विकट परिस्थिति हो, श्मशान जैसा भयावह वातावरण हो या घने जंगल जैसा अनिश्चित मार्ग—हम कभी भयभीत न हों। हमारा मन सदैव साहसी, धैर्यवान और आत्मविश्वास से परिपूर्ण रहे, ताकि हम प्रत्येक परिस्थिति का दृढ़ता के साथ सामना कर सकें।
आधुनिक जीवन का भय: एकांत और बंदिश
क्वारंटीन और मानसिक असंतुलन
यद्यपि आज के समय में अधिकांश लोगों को घने जंगलों या पर्वतों में भटकने जैसी स्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता, फिर भी भय का रूप बदल गया है। आधुनिक जीवन में सबसे बड़ा भय स्वतंत्रता का छिन जाना और एकांत में बंद होना है—जैसे कि कोरोना काल में 14-15 दिनों के लिए ‘क्वारंटीन’ हो जाना।
कई लोग किसी भी प्रकार की बंदिश में नहीं रह पाते। जब ऐसी परिस्थितियों या बीमारियों के कारण उन पर बंदिशें लगाई जाती हैं, तो उनका मानसिक संतुलन बिगड़ने लगता है। एकांत में रहने पर उनमें भारी निराशा, बेचैनी और घबराहट उत्पन्न होने लगती है।
प्रतिकूलता में समभाव का अभ्यास
यह घबराहट इसलिए होती है क्योंकि लोगों को कभी अकेले रहने या एकांत स्थानों में शांत भाव से जीवन जीने का अभ्यास नहीं रहा। इसी अभ्यास के अभाव में थोड़ी सी प्रतिकूलता आते ही लोग स्वयं को अत्यधिक दुखी महसूस करने लगते हैं।
इसके विपरीत, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो क्वारंटीन जैसी कठिन और एकांत परिस्थितियों में भी धैर्यपूर्वक और प्रसन्नचित्त रहते हैं। उदाहरण के लिए, जब अमिताभ बच्चन जैसे महानुभाव भी क्वारंटीन हुए, तो उन्होंने जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव देखे होने के कारण अपने मानसिक धैर्य और सकारात्मक दृष्टिकोण से उस समय को भी सहजता से पार कर लिया।
रहे अडोल-अकंप निरंतर, यह मन, दृढ़तर बन जावे
यहाँ अडोल – जो डगमगाए नहीं और अकंप – जो किसी भी परिस्थिति में हिले या विचलित न हो। उनका मन परिस्थितियों के प्रभाव से डगमगाने वाला न हो, बल्कि सदैव स्थिर, शांत और संतुलित बना रहे।
“यह मन दृढ़तर बन जावे”—अर्थात मेरा मन इतना मजबूत बन जाए कि बाहरी परिस्थितियाँ उसे अपने मार्ग से विचलित न कर सकें। वह सदैव सकारात्मक सोच, उच्च आदर्शों और आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर रहे। मानसिक दृढ़ता ही वह शक्ति है, जो मनुष्य को हर कठिनाई में सही निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती है।
अदम्य साहस और संघर्ष का महत्त्व – कठिनाइयों से उपजता अदम्य साहस
जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ भी आती हैं जब व्यक्ति के पास काम नहीं होता, उसकी कंपनियाँ डूबने लगती हैं और दिवालिया होने की नौबत आ जाती है। लेकिन जो व्यक्ति उन विपरीत परिस्थितियों से उबरकर स्वयं को बाहर निकाल लेता है, उसके अंदर एक अद्भुत ऊर्जा और साहस का संचार होता है।
इसी को अदम्य साहस कहते हैं। ‘अदम्य’ का अर्थ है जिसे कोई दबा न सके, जिसे छोटी-मोटी प्रतिकूलताएँ या दोष पराजित न कर सकें। यह अदम्य साहस केवल सुख-सुविधाओं में रहने से नहीं आता; यह उन दुखों और कठिनाइयों की भट्टियों से तपकर गुज़रने वाले व्यक्ति के भीतर ही उत्पन्न होता है। यदि आपने दुख की नदी को पार कर लिया, तो उसके बाद जीवन जीने का आनंद ही कुछ और होता है।
संकट के समय दृष्टिकोण: घबराहट या समभाव? समय बिताने के दो मार्ग
जब भी जीवन में भय या दुख का कठिन समय आए, तो हमेशा यह स्मरण रखें कि यह वक्त स्थायी नहीं है, इसे बीत जाना ही है। हालाँकि, इस कठिन समय को काटने के दो तरीके हैं:
- घबराहट और भय के साथ: यदि आप घबराकर, डरकर और विचलित होकर समय बिताएँगे, तो समय तो निकल जाएगा, लेकिन संभव है कि अत्यधिक घबराहट के कारण आपका स्वास्थ्य बिगड़ जाए या व्यक्ति हताश होकर जीवन ही हार बैठे।
- समभाव और शांति के साथ: यदि आप तटस्थ (neutral) और शांत मन से उस कठिन घड़ी का सामना करेंगे, तो आपको भीतर से एक नया साहस मिलेगा। उस समय को पार करने के बाद आप यह अनुभव करेंगे कि आपने एक बड़ी चुनौती पर विजय प्राप्त कर ली है।
जीवन की वास्तविकता और प्रकृति का नियम
सुख-दुख का प्राकृतिक संतुलन
आज की युवा पीढ़ी को प्रायः ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया में केवल सुख ही होना चाहिए। यह चाहत अच्छी है; माता-पिता, राजा, राष्ट्र और हम जैसे साधु-संत भी यही आशीर्वाद देते हैं कि सभी सुखी रहें। परंतु प्रकृति का नियम इससे भिन्न है।
कोई भी राजा या सरकार यह चाहे कि उसकी प्रजा में कभी कोई दुख न आए, या माता-पिता चाहे कि उनके बच्चे को कभी किसी कष्ट का सामना न करना पड़े—ऐसा होना असंभव है। यह प्रकृति का विधान है कि सुख और दुख बारी-बारी से आते हैं। हमें इन नियमों के अनुसार ढलना पड़ता है, और जो व्यक्ति दुख से तपकर निकलता है, वही जीवन में सच्चा और मजबूत इंसान बनता है।
कच्ची और पक्की ईंट का उदाहरण – अग्नि-परीक्षा से परिपक्वता
इसे ईंट के उदाहरण से समझा जा सकता है। कच्ची ईंट और पक्की ईंट में मुख्य अंतर क्या होता है?
- कच्ची ईंट: कमजोर होती है क्योंकि वह केवल धूप में सूखी होती है।
- पक्की ईंट: मजबूत और टिकाऊ होती है क्योंकि वह अत्यंत भीषण आग की भट्टी से होकर गुज़री होती है।
जिस प्रकार कच्ची ईंट आग में तपकर ही पक्की और दृढ़ बनती है, उसी प्रकार मनुष्य भी जीवन के दुखों, कठिनाइयों और संकटों रूपी अग्नि से गुज़रकर ही भीतर से सुदृढ़, साहसी और अडिग बनता है।
दुख की अग्नि और आंतरिक सुदृढ़ता – तपकर निकलने की सामर्थ्य
जब कच्ची ईंट अग्नि में तपकर पक्की हो जाती है, तो उसके ऊपर कितनी भी ईंटें रख दी जाएँ, वह बड़ी से बड़ी इमारत का बोझ सह लेती है और टूटती नहीं है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह तपन की उस कठिन प्रक्रिया से गुज़र चुकी होती है।
दुख और कठिनाइयाँ भी एक ऐसी अग्नि के समान हैं। यदि व्यक्ति एक बार उस कठिन परिस्थिति से धैर्यपूर्वक निकल जाता है, तो उसके भीतर अपार आत्मबल और परिपक्वता आ जाती है।
छोटी-मोटी निराशाओं पर विजय
जो लोग कठिनाइयों से तपकर आगे बढ़ते हैं, वे जब यह देखते हैं कि कुछ लोग छोटी-छोटी बातों या असफलताओं से घबराकर आत्महत्या (सुसाइड) कर लेते हैं या अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं, तो उन्हें अत्यंत दुख होता है। वे सोचते हैं कि ऐसे लोगों को किसी ने जीवन का सही दर्शन नहीं सिखाया। जो व्यक्ति बड़ी-बड़ी प्रतिकूलताओं को झेलकर बाहर निकलता है, वह जानता है कि जीवन में जैसे सुबह के बाद शाम होना अनिवार्य है, वैसे ही सुख के साथ दुख और दुख के साथ सुख का चक्र निरंतर चलता रहता है।
हमारी भूल और समभाव की आवश्यकता -सुख की एकमात्र चाहत
जीवन में हमारी सबसे बड़ी भूल यही होती है कि हम केवल और केवल सुख की इच्छा करते हैं। हम दुख का सामना करने की थोड़ी सी भी मानसिक तैयारी नहीं रखते और जब दुख आता है, तो उससे कोसों दूर भागने का प्रयास करते हैं।
‘मेरी भावना’ की ये पंक्तियाँ इसी भूल को सुधारने का मार्ग दिखाती हैं:
- सुख में अत्यधिक मग्न न होना और दुख में कभी न घबराना।
- चाहे कितनी भी भयानक या प्रतिकूल परिस्थिति सामने आ जाए, मन को व्यथित और विचलित न होने देना।
यदि आप अपने भीतर इस प्रकार के समभाव (समान भाव) का अभ्यास करेंगे, तो यह अभ्यास आपको भीतर से सुदृढ़ और साहसी बनाएगा।
सपनों की पूर्ति और संघर्ष की राह – कठिनाइयों को चीरकर आगे बढ़ना
जीवन में महान लक्ष्य और सपने केवल बड़ी बातें करने से पूरे नहीं होते; उनके लिए प्रतिकूल परिस्थितियों को सहने की अदम्य शक्ति चाहिए होती है। यात्रा में ऐसे लोग भी मिलेंगे जो मित्र बनकर खिंचाई करेंगे या मार्ग में बाधाएँ खड़ी करेंगे। परंतु जो व्यक्ति इन सब आलोचनाओं और बाधाओं को मुस्कुराते हुए चीरकर आगे बढ़ता जाता है, वही अंततः अपने सपनों को साकार कर पाता है।
कायरता बनाम सहनशीलता
जहाँ आप घबरा गए या निराश होकर रुक गए, समझिए वहीं से आपका पतन (downfall) प्रारंभ हो गया। जब मन में यह भाव आने लगता है—“अब मुझसे और सहन नहीं होता, अब मैं और नहीं झेल सकता”—तब व्यक्ति मानसिक रूप से कमजोर पड़ने लगता है।
चाहे वह गृहस्थ जीवन हो, व्यवसाय हो या कोई अन्य क्षेत्र—जहाँ मनुष्य ने घबराकर घुटने टेक दिए, वहीं वह पराजित हो जाता है। इसके विपरीत, जो सहनशीलता और धैर्य धारण करता है, वही जीवन की हर बाज़ी जीतता है।
पारिवारिक जीवन और प्रतिकूल परिस्थितियाँ – व्यावहारिक जीवन की चुनौतियाँ
पारिवारिक और सामाजिक जीवन में किसी को भी प्रतिकूल परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है। घर में बहू के लिए सास, देवर या जेठ परेशान करने वाले हो सकते हैं, तो वहीं किसी पुरुष के लिए उसकी परिस्थितियाँ या अन्य पारिवारिक संबंध कठिनाई का कारण बन सकते हैं।
भले ही माता-पिता ने अपने बच्चों को कितना ही लाड-प्यार से पाला हो और ‘फूलों की सेज’ पर रखा हो, लेकिन यदि उन्होंने बच्चों को विपरीत परिस्थितियों का सामना करने का साहस नहीं सिखाया, तो बच्चे भीतर से कमजोर रह जाएँगे। वे जीवन में आने वाली छोटी-मोटी समस्याओं से भी दुखी और व्यथित होने लगेंगे।
‘मेरी भावना’ को अपनी भावना बनाना
इसीलिए यह संदेश दिया जा रहा है कि इस ‘मेरी भावना’ काव्य को केवल पुस्तकों तक सीमित न रहने दें, बल्कि इसे अपने जीवन का अभिन्न अंग (अपनी स्वयं की भावना) बना लें।
इष्टवियोग अनिष्टयोग में सहनशीलता दिखलावे
छंद की मुख्य पंक्ति कहती है:
- इष्ट-वियोग: जो व्यक्ति या प्रिय वस्तुएँ (चाहे कोई प्रिय मनुष्य हो या कोई प्रिय भौतिक साधन) हमें बहुत पसंद होती हैं, उनका कभी-न-कभी हमसे बिछोह या वियोग होना निश्चित है। जब वे छूटती हैं, तो मन में भारी पीड़ा होती है।
- अनिष्ट-योग: जिन परिस्थितियों या व्यक्तियों को हम पसंद नहीं करते, न चाहते हुए भी उनका जीवन में आगमन हो जाना ही ‘अनिष्ट-योग’ है।
अक्सर हम सोचते हैं कि हम अपने जीवन में शुभ या सुखद (इष्ट) की शुरुआत कर रहे हैं—जैसे घर में शादी-विवाह का आयोजन—परंतु परिस्थितियों के वश वही संयोग कभी-कभी क्लेश या तनाव (अनिष्ट) का कारण बन जाता है। यदि आप किसी भी कॉलोनी या समाज में जाकर सर्वेक्षण करेंगे, तो अधिकांश घरों में इसी प्रकार की आपसी अनबन, वैचारिक मतभेद और दुखी मन से जीने वाले लोग मिल जाएँगे। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमें प्रतिकूलताओं में धैर्य और सहनशीलता रखना सिखाया ही नहीं गया।
इष्ट-वियोग – सामान्यतः जब हमारा कोई प्रिय व्यक्ति हमसे दूर चला जाता है, चाहे कुछ समय के लिए या सदा के लिए, तब मन में शोक, व्याकुलता और असहायता का भाव उत्पन्न होता है। यह स्वाभाविक है, क्योंकि मनुष्य अपने प्रियजनों और अनुकूल परिस्थितियों से गहरा लगाव रखता है। आज की भाषा में इसे हम अपना ‘कम्फर्ट ज़ोन’ भी कह सकते हैं। जब तक वह हमारे साथ रहता है, हमें सुरक्षा, आनंद और संतोष का अनुभव होता है; किंतु उसके दूर होते ही मन अशांत होने लगता है।
कविवर हमें सिखाते हैं कि ऐसी स्थिति में भी धैर्य और सहनशीलता बनाए रखनी चाहिए। प्रिय का वियोग जीवन का स्वाभाविक सत्य है। इसलिए शोक में डूबकर अपने विवेक और आत्मबल को नहीं खोना चाहिए।
अनिष्ट-योग – ऐसी परिस्थितियों में प्रायः मनुष्य घबरा जाता है, क्रोधित हो जाता है या उनसे भागने का प्रयास करता है। परंतु कविवर की शिक्षा है कि विपरीत परिस्थितियों से भागना समाधान नहीं है। उनके सामने धैर्य, विवेक और साहस के साथ खड़े होना ही वास्तविक पुरुषार्थ है। सहनशीलता का अर्थ केवल कष्ट सहना नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी अपने विवेक, संतुलन और सकारात्मक दृष्टिकोण को बनाए रखना है।
सहनशीलता और दृष्टिकोण (Attitude) – सहने की शक्ति का विकास
सहनशीलता का अर्थ यह है कि हमारे भीतर विपरीत परिस्थितियों को शांत भाव से सहने की आदत होनी चाहिए।
- यदि कोई बेवजह परेशान कर रहा है,
- कोई तंग कर रहा है, या
- कोई आप पर व्यंग्य (कमेंट) कर रहा है,
तो क्या इन बातों को सहन करना संभव है?
बिल्कुल संभव है, और यह केवल आपके दृष्टिकोण (Attitude) पर निर्भर करता है।
मानसिकता का खेल
यदि आप बार-बार यह सोचेंगे कि—“ये लोग मुझे तंग करते रहते हैं, मुझसे अब और सहन नहीं होता”—तो यह नकारात्मक सोच आपकी मानसिक शांति को पूरी तरह नष्ट कर देगी।
इसके विपरीत, यदि आप मन में यह दृढ़ विचार कर लेंगे कि—“इन्हें जो कहना या करना है करने दो, ये करते-करते एक दिन खुद थक जाएँगे, लेकिन मैं अपने मन की शांति नहीं खोऊँगा/खोऊँगी”—तो सामने वाले का प्रभाव आप पर निष्फल हो जाएगा। यह आंतरिक दृढ़ता ही मनुष्य को सच्चा संयम और विजय प्रदान करती है।
मानसिक मजबूती और सहनशीलता का अभ्यास – शिकायत की आदत से मुक्ति
जब तक व्यक्ति अपने भीतर शिकायत करने की प्रवृत्ति रखेगा—“मुझे अमुक व्यक्ति परेशान करता है”, “वह मुझ पर कमेंट करता है”, “मैं उसके साथ नहीं रह सकता/सकती”—तब तक यह शिकायत ही उसकी सबसे बड़ी मानसिक कमजोरी बनी रहेगी।
छोटी-छोटी बातों पर तुरंत शिकायत करना या घर-परिवार में दूसरों को भड़काना आपसी मतभेदों और लड़ाइयों को जन्म देता है। छोटी-छोटी व्यर्थ की बातों पर इतने दुखी या आहत हो जाना हमारी अपनी ही मानसिक कमजोरी को दर्शाता है।
गुलाब के फूल का दृष्टांत – कांटों के बीच खिलना
गुलाब के फूल का उदाहरण लीजिए—वह भी तीखे कांटों के बीच ही पनपता है।
- वह दिन भर कड़ी धूप, हवा और प्रतिकूलताओं को सहन करता है।
- इसके बावजूद वह मुरझाने के बजाय खिलता है और चारों ओर अपनी सुगंध फैलाता है।
- जब तक वह अपनी डाली से जुड़ा रहता है, तब तक अपना अस्तित्व और सौंदर्य बनाए रखता है।
इसी प्रकार, यदि हम भी अपने परिवार और समाज के बीच रहते हुए प्रतिकूल व्यवहार और कष्टों को सहन करके प्रसन्न रहना सीख लें, तो हम भी जीवन में उस गुलाब के फूल की भाँति महकेंगे। जब लोग देखेंगे कि प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद आप विचलित नहीं होते और सदैव प्रसन्न व सकारात्मक रहते हैं, तो वे भी आपके धैर्य और विवेक का लोहा मानेंगे।
सकारात्मक दृष्टिकोण (Positive Attitude) – व्यवहार में सकारात्मकता का समावेश
यदि कोई व्यक्ति स्वभाववश कुछ कठोर बोल भी देता है, तो भी यदि हम अपना दृष्टिकोण सकारात्मक रखें—“कोई बात नहीं, इनका स्वभाव ऐसा है लेकिन दिल के ये बुरे नहीं हैं”—तो हमारे भीतर क्लेश उत्पन्न नहीं होगा। संसार में शांतिपूर्वक और सुख से जीने के लिए इस प्रकार की सहनशीलता अत्यंत आवश्यक है।
आज की पीढ़ी और ‘टोलरेंस’ (सहनशक्ति) – आंतरिक सहनशक्ति का विकास
आज के युवाओं और बच्चों में सहनशीलता (Tolerance Power) और प्रतिकूल परिस्थितियों को झेलने की क्षमता बहुत कम होती जा रही है।
- ज़रा सी किसी ने बात कह दी,
- किसी ने आलोचना कर दी, या
- किसी काम में थोड़ा सा सराहना (Appreciation) नहीं मिला,
तो लोग तुरंत हताश और दुखी हो जाते हैं।
बचपन में ऐसी नादानी फिर भी समझ आती है, परंतु उम्र और समझ के बढ़ने के साथ-साथ मन में परिपक्वता आना आवश्यक है। चाहे आप किसी भी उम्र के हों, ‘मेरी भावना’ के इन सिद्धांतों को अपने जीवन में ढालना अत्यंत आवश्यक है।
इस छंद में प्रार्थना करते हैं कि हमारा मन सदैव अडोल, अकंप और दृढ़ बना रहे तथा सुख-दुख, लाभ-हानि और अनुकूल-प्रतिकूल सभी परिस्थितियों में संतुलित बना रहे। प्रिय के वियोग और अप्रिय के संयोग में भी धैर्य, सहनशीलता और आत्मसंयम नहीं खोना चाहिए। जीवन परिवर्तनशील है, इसलिए न सुख स्थायी है और न दुख; दोनों को समभाव से स्वीकार करना ही विवेक है। मानसिक दृढ़ता, सकारात्मक दृष्टिकोण और आत्मबल ही मनुष्य को प्रत्येक चुनौती का सफलतापूर्वक सामना करने योग्य बनाते हैं।
छंद 9
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