राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 473 to 484
श्लोक ( Shlok ) 473 – 476
लङ्कापुरेऽप्यणुमतो विनिवृत्तौ दशाननः । कुम्भकर्णादिभिर्नास्मदुग्रवंशस्य भास्वतः ॥ ४७३ ॥ कर्मेदमुचितं ख्यातपौरुषस्य तव प्रभो । स्त्रीरत्नमेतदुच्छिष्टं तदस्मदनुरोधतः ॥ ४७४ ॥ विसृज्यतामिति प्रोक्तोऽप्यासक्तस्त्यक्तुमक्षमः । भूयस्तृणमनुष्यस्य रामनाम्नो बलं किल ॥ ४७५ ॥ सीतां नेतुमतोऽस्माकमुपर्यागच्छतीति वाक् । श्रूयतेऽद्य कथं सीतामोक्षः कुलकलङ्ककृत् ॥ ४७६ ॥
अथानन्तर- जब अणुमान् लङ्कासे लौट आया था तब कुम्भकर्ण आदि भाइयोंने रावणसे कहा था कि ‘हे प्रभो ! आप हमारे उच्च वंशमें सूर्यके समान देदीप्यमान हैं और आपका पौरुष भी सर्वत्र प्रसिद्ध है अतः आपको यह कार्य करना उचित नहीं है। यह स्त्रीरत्न उच्छिष्ट है इसलिए हमलोगोंके अनुरोधसे आप इसे छोड़ दीजिए।’ इस प्रकार सबने कहा परन्तु चूँकि रावण सीता में आसक्त था इसलिए उसे छोड़ नहीं सका। वह फिर कहने लगा कि रामचन्द्र तृण-मनुष्य हैं- तृणके समान अत्यन्त तुच्छ हैं, ‘उनकी सेना सीताको लेनेके लिए यहाँ हमारे ऊपर आ रही है’ ऐसे शब्द आज सुनाई दे रहे हैं इसलिए सीताको कैसे छोड़ा जा सकता है, यह बात तो कुलको कलङ्क लगाने वाली है ।। ४७३-४७६ ।।
“Thereafter—when Anuman (Hanuman) had returned from Lanka, Kumbhakarna and the other brothers said to Ravana, ‘O Lord! You shine like the sun in our noble lineage, and your prowess is renowned everywhere; therefore, it is not fitting for you to commit such an act. This jewel of a woman is now like a leftover (uchchishta); hence, at our request, please release her.’
Though everyone spoke to him in this manner, Ravana, being deeply infatuated with Sita, could not let her go. Instead, he began to say, ‘Ramachandra is a mere straw of a man—utterly insignificant like a blade of grass. To hear words today like “his army is marching upon us here to take Sita back”—how can Sita be released under such conditions? This would bring nothing but a stain upon our lineage.'” [473-476]
श्लोक ( Shlok ) 477 – 478
इत्याख्यत्तद्वचः सोढुमक्षमो रावणानुजः । सूर्यवंशस्य शौर्य किं रामस्तृणमनुष्यकः ॥ ४७७ ॥ न शृणोसि वचः पथ्यं बन्धूनां मदनान्धकः । परदारार्पणं दोषं वदन् दोषविदांवरः ॥४७८ ॥
रावणका छोटा भाई विभीषण उसकी यह बात सह नहीं सका अतः कहने लगा कि आप रामचन्द्रको तृणमनुष्य मानते हैं पर सूर्यवंशीय रामचन्द्रकी क्या शूरवीरता है इसका आपको पता नहीं है। आप कामसे अन्धे हो रहे हैं इसलिए भाइयोंके हितकारी वचन नहीं सुन रहे हैं। आप परस्त्रीके समर्पण करनेको दोष बतला रहे हैं इसलिए मालूम होता है कि आप दोषोंके जानकारोंमें श्रेष्ठ हैं ? (व्यङ्गथ) ।। ४७७-४७८ ॥
“Ravana’s younger brother, Vibhishana, could not bear to hear these words of his and thus began to say, ‘You look upon Ramachandra as a mere straw of a man, but you have no inkling of the sheer bravery that Ramachandra of the Solar Dynasty possesses. Blinded by lust, you refuse to listen to the beneficial counsel of your brothers. You view returning another man’s wife as a matter of dishonor; hence, it appears that you truly are the foremost among those who understand virtue and vice! (said sarcastically)‘” [477-478]
श्लोक ( Shlok ) 479 – 484
परस्त्रीग्रहणं शौर्य त्वदुपज्ञं भवेद् भुवि । मिथ्योत्तरेण किं मार्गविध्वन्सोन्मार्गवर्तनम् ॥ ४७९ ॥
दुर्द्धरं तव दुर्बुद्धेर्लोकद्वयभयावहम् । विषयाननिषिद्धांश्च परित्यक्तुं वयस्तव ॥ ४८० ॥
परामृशात्र किं युक्तं निषिद्धविषयैषणम् । विद्धि वैद्याधरीं लक्ष्मीमिमां तव गुणप्रियाम् ॥ ४८१ ॥ अनर्पयन्तं सीतां त्वां त्यजत्यचैव निर्गुणम् । अकार्यकारिणामत्र ‘गणनायां किमग्रिमम् ॥ ४८२ ॥ स्वं करोष्यभिलाषात्मकार्येण परयोषिति । प्रतिकूलोऽसि पुण्यस्य दुर्वृत्या पापसञ्चयात् ॥ ४८३ ॥ ततोऽननुगुणं दैवं विना दैवात्कुतः श्रियः । परस्त्रीहरणं नाम पापं पापेषु दुस्तरम् ॥ ४८४ ॥
परस्त्रीग्रहण करना शूर-वीरता है, संसारमें इस बातका प्रारम्भ आपसे ही हो रहा है। आप जो अपनी दुर्बुद्धिसे मिथ्या उत्तर दे रहे हैं उससे क्या दोनों लोकोंमें भय उत्पन्न करनेवाले एवं दुर्धर उन्मार्गकी प्रवृत्ति नहीं होगी और सुमार्ग-का विनाश नहीं होगा ? जो विषय निषिद्ध नहीं है उनका भी त्याग करनेकी आपकी अवस्था है फिर जरा विचार तो कीजिये इस अवस्थामें निषिद्ध विषयकी इच्छा करना क्या आपके योग्य है ? आप यह निश्चित समझिये कि यह विद्याधरोंकी लक्ष्मी आपके गुणोंकी प्रिया है। यदि आप सीताको वापिस नही करेंगे तो निर्गुण समझ कर यह आपको आज ही छोड़ देगी। पर-स्त्रीकी अभिलाषा करने रूप इस अकार्यसे आप अपने आपको अकार्य करनेवालोंमें अग्रणी- मुखिया क्यों बनाते हैं ? इस समय आप इस दुष्ट प्रवृत्तिसे पापका संचय कर पुण्यके प्रतिकूल हो रहे हैं, पुण्यके प्रतिकूल रहनेसे दैव अनुकूल नहीं रहता और दैवके बिना लक्ष्मी कहाँ प्राप्त हो सकती है ? पर-स्त्रीका हरण करना यह पाप सब पापोंसे बड़ा पाप है ।। ४७९-४८४ ॥
“To abduct another man’s wife is considered an act of bravery—this is a concept that is originating in this world from you alone. By giving false justifications born of your corrupt intellect, will it not give rise to a perilous and terrible path of deviance across both worlds, and cause the destruction of the righteous path? You are at a stage of life where one should renounce even those pleasures that are not forbidden; ponder a little then—is it fitting for you at this stage to crave a forbidden pleasure?
Understand this for certain: this sovereignty (Lakshmi) over the Vidyadharas is a lover of your virtues. If you do not return Sita, it will view you as devoid of virtue and abandon you this very day. Why do you make yourself the foremost leader among evildoers by committing this misdeed of desiring another man’s wife? At this moment, by accumulating sin through this wicked inclination, you are acting against righteousness (punya); and when you act against righteousness, fate does not remain favorable, and without fate, how can fortune be sustained? To abduct another man’s wife is a sin greater than all other sins.” [479-484]
श्लोक 485 से 493
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104| श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472
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