आदिपुराण पर्व 47 – प्रथम तीर्थंकर और प्रथम चक्रवर्ती का वर्णन पर्व 47 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 303 | श्लोक 304 से 321 | श्लोक 322 से 331
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 47- Shlok 332 to 342
श्लोक ( Shlok ) 332
“एवमालोकितस्वप्ना राजराजपुरस्सराः । पुरोधसं फलं तेषाम् अपूच्छन्नर्थ मोदये ॥३३२॥
इस प्रकार भरतको आदि लेकर सब लोगोंने स्वप्न देखे और सूर्योदय होते ही सबने पुरोहितसे उनका फल पूछा ॥३३२॥
Thus, beginning with Bharata, all the others saw these dreams, and as soon as the sun rose, they all approached the royal priest to inquire about their meanings. ॥332॥
श्लोक ( Shlok ) 333
कर्माणि हत्वा निर्मूलं मुनिभिर्बहुभिः समम् । पुरोः सर्वेऽपि शंसन्ति स्वप्नाः स्वर्गाप्रगामिताम् ॥३३३॥
पुरोहितने कहा कि ये सभी स्वप्न कर्मोंको बिलकुल नष्ट कर भगवान् वृषभदेवका अनेक मुनियोंके साथ साथ मोक्ष जाना सूचित कर रहे हैं ।। ३३३॥
The royal priest declared: “All these dreams signify that Lord Vrishabhadeva, having utterly destroyed his karmas, will soon attain liberation along with numerous ascetic monks.” ॥333॥
श्लोक ( Shlok ) 334
इति स्वप्नफलं तेषां भाषमाणे पुरोहिते । तदैवानन्दनामेत्य भर्तुः स्थितिमवेदयत् ॥३३४।॥
इस प्रकार पुरोहित उन सबके लिये स्वप्नोंका फल कह ही रहा था कि इतने में ही आनन्द नामका एक मनुष्य आकर भगवान् का हाल कहने लगा ॥ ३३४।॥
Even as the royal priest was interpreting the meanings of their dreams, a man named Anand arrived and began to recount the news of the Blessed Lord. ॥334॥
श्लोक ( Shlok ) 335
ध्वनौ भगवता दिव्ये संहृते मुकुलीभवत् । कराम्बुजा सभा जाता पूष्णीव सरसीत्यसौ ॥३३५॥
उसने कहा कि भगवान् ने अपनी दिव्यध्वनिका संकोच कर लिया है इसलिये सम्पूर्ण सभा हाथ जोड़कर बैठी हुई है और ऐसा जान पड़ता है मानो सूर्यास्तके समय निमीलित कमलोंसे युक्त सरसी ही हो ॥ ३३५॥
He said, “The Blessed Lord has withdrawn his divine discourse, and thus the entire assembly sits with folded hands in silent reverence, appearing like a lotus-filled lake at sunset, its blossoms closed in solemn stillness.” ॥335॥
श्लोक ( Shlok ) 336 – 337
तदाकर्णनमात्रेण सत्वरः सर्वसङगतः । चक्रवर्ती तमभ्येत्य त्रिः परीत्य कृतस्तुतिः ॥३३६॥महामहमहापूजां भक्त्या निर्वर्तयन्स्वयम् । चतुर्दश दिनान्येवं भगवन्तभसेवत ॥३३७।।
यह सुनते ही भरत चक्रवर्ती बहुत ही शीघ्र सब लोगोंके साथ साथ कैलाश पर्वतपर गया, वहां जाकर उसने भगवान् वृषभदेवकी तीन प्रदक्षिणाएं दीं, स्तुति कीं और भक्तिपूर्वक अपने हाथसे महामह नामकी पूजा करता हुआ वह चौदह दिन तक इसी प्रकार भगवान्की सेवा करता रहा ।।३३६-३३७।।
Hearing this, Emperor Bharata swiftly set out with all his attendants and ascended Mount Kailasha. There, he circumambulated Lord Vrishabhadeva three times, offered praises, and, with deep devotion, performed a grand worship called Mahamaaha with his own hands. For fourteen days, he continued to serve the Blessed Lord in this manner with unwavering reverence. ॥336–337॥
श्लोक ( Shlok ) 338 – 342
माघकृष्णचतुर्दश्यां भगवान् भास्करोदय । मुहूर्तेऽभिजिति प्राप्तपल्यङको मुनिभिः समम् ॥३३८॥प्राग्दिद्यनुखप्त्तृतीयेन शुक्लध्यानेन रुद्धवान् । योगत्रितयमन्त्येन ध्यानेनाघातिकर्मणाम् ॥३३९॥पञ्च ह्रस्वस्वरोच्चारणप्रमाणेन संक्षयम् । कालेन विदधत्प्रान्तगुणस्थानमधिष्ठितः ।॥३४०॥शरीरत्रितयापाय प्राप्य सिद्धत्वपर्ययम् । निजाष्टगुणसम्पूर्णः क्षणाप्ततनुवातकः ॥३४१॥नित्यो निरञ्जनः किञ्चिद्रूनो देहादतिभाक् । स्थितः स्वसुखसाद्भूतः पश्यन्विश्वमनारतम् ॥३४२॥
On the auspicious morning of the fourteenth day of the dark fortnight of the month of Magha, under the Abhijit constellation, Lord Vrishabhadeva, facing the eastern direction, sat in the paryankasana posture surrounded by numerous monks. Entering the third variety of subtle pure meditation known as sukshmakriyapratipati shukla dhyana, he restrained the activities of the three yogas—mind, speech, and body—and, abiding in the final stage of spiritual development (gunasthana), through the fourth type of pure meditation called vyuparata kriyanirvrti shukla dhyana, he destroyed the remaining non-destructive karmas (aghatiya karmas).Then, with the dissolution of his three bodies—gross physical (audārika), fiery (taijasa), and karmic (karmana)—he attained the state of absolute liberation (siddhahood), becoming endowed with the eight intrinsic attributes of a liberated soul, such as perfect knowledge and perception. In a moment, he rose into the tanuvat valaya (the Siddhashila at the summit of the universe), where he now eternally abides—immutable, pure, incorporeal, immersed in the bliss of the Self, and forever witnessing the endless cycles of worldly existence. ॥338–342॥
श्लोक 343 से 354
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211