आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
श्लोक 222 से 231 सूर्योदय और प्रकृति का जागरण
सूर्य किरणों से अंधकाररूपी किवाड़ खोलकर दिशाओं को प्रकाशित करता है। वह राजा-सा कमल विकसित करता है। बाहुबली जागते हैं, और बंदीजन मंगलपाठ पढ़कर उन्हें प्रेरित करते हैं। वे सूर्योदय को विजयलक्ष्मी की प्राप्ति से जोड़ते हैं। चकवा-चकवियां मिलते हैं, चंद्रमा कुमुदिनियों के साथ आलिंगन करता है। प्रकृति पक्षियों की बोली और कमलों की शोभा से जीवंत हो उठती है। प्रभात की लालिमा सिन्दूर और महावर-सी दिशाओं को अलंकृत करती है।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 35 – Shlok 222 to 231
श्लोक ( Shlok ) 222
किरणेस्तरुणैरेव तमः शार्वरमुद्धृतम् । तरणेः करणीयं तु दिनश्रीपरिरम्भणम् ॥ २२२॥
रात्रिका अन्धकार तो सूर्यकी लाल किरणोंसे ही नष्ट हो गया था अब तो सूर्यको केवल दिनरूपी लक्ष्मीका आलिंगन करना बाकी रह गया था ।।२२२।।
The darkness of night had already been dispelled by the crimson rays of the sun; now, all that remained was for the sun to embrace Day, the goddess Lakṣmī in her radiant form.222
श्लोक ( Shlok ) 223
कोककान्तानुरागेण समं पद्माकरे श्रियम् । पुष्णन्नुष्णांशुरुद्यच्छन्न मुष्णात्कोमुदीं श्रियम् ॥२२३॥
सूर्य चकवियों के अनुरागके साथ ही साथ कमलोंकी शोभा बढ़ा रहा था और उदय होते ही चांदनीकी शोभाको भी चुराता जाता था-नष्ट करता जाता था ॥२२३।।
The sun, along with the ardor of the cuckoos, enhanced the splendor of the lotuses, and as it rose, it gradually stole away and extinguished the radiance of the moonlight.223
श्लोक ( Shlok ) 224
तमः कवाटमुद्धाट्य दिङ्मुखानि प्रकाशयन् । जगबुद्धाटिताक्षं वा व्यधादुष्णकरः करैः ॥२२४।॥
सूर्यने अपने किरणरूपी हाथोंसे अन्धकाररूपी किवाड़ खोलकर दिशाओंके मुंह प्रकाशित कर दिये थे और समस्त जगत्के नेत्र खोल दिये थे ।। २२४।।
With its ray-like hands, the sun flung open the dark doors of night, illuminating the mouths of the directions and opening the eyes of the entire world.224
श्लोक ( Shlok ) 225
प्रातस्तरामथोत्थाय पद्माकरपरिग्रहम् । तन्वन् भानुः प्रतापेन जिगीषोर्वृत्तिमन्वगात् ॥ २२५॥
वह सूर्य विजयकी इच्छा करनेवाले किसी राजाकी वृत्तिका अनुकरण कर रहा था क्योंकि जिस प्रकार विजयकी इच्छा करनेवाला राजा बड़े सबेरे उठकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् लक्ष्मीका हाथ स्वीकार करता है उसी प्रकार सूर्य भी बड़े सबेरे उदय होकर अपने प्रतापसे पद्माकर अर्थात् कमलों के समूहको स्वीकार कर रहा था-अपने तेजसे उन्हें विकसित कर रहा था ॥ २२५॥
The sun emulated the court of a king who longs for victory; for just as a king rises early with great resolve to receive the hand of Lakshmi, the lotus goddess, so too did the sun at dawn arise, embracing the lotus cluster—Padmakar—with its radiant splendor, nurturing and causing them to bloom. 225
श्लोक ( Shlok ) 226
सुकण्ठा पेठुरत्युच्चैः प्रभोः प्राबोधिकास्तदा । स्वयं प्रबुद्धमप्येनं प्रबोधेन युयुक्षवः ॥२२६॥
यद्यपि उस समय महाराज बाहुबली स्वयं जाग गये थे तथापि उन्हें जगानेका उद्योग करते हुए सुन्दर कण्ठवाले बंदीजन जोर जोरसे नीचे लिखे हुए मंगलपाठ पढ़ रहे थे ।। २२६।।
Though at that moment Maharaja Bahubali himself had already awakened, the beautiful-voiced captives below, striving to rouse him fully, were fervently chanting the auspicious hymns inscribed beneath.226
श्लोक ( Shlok ) 227
अशिशिरकरो लोकानन्दी जनैरभिनन्दितो बहुमतकरं तेजस्तन्वन्नितोऽयमुदेष्यति ।नृवर जगतामुद्योताय त्वमप्युदयोचितम् विधिमनु सरन् शय्योत्सङ्गं जहीहि मुदे श्रियः ॥ २२७॥
हे पुरुषोत्तम, जो लोगोंको आनन्द देनेवाला है और लोग जिसकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसा यह सूर्य सब लोगोंको अच्छा लगनेवाले तेजको फैलाता हुआ इधर पूर्व दिशासे उदय हो रहा है इसलिये आप भी जगत्को प्रकाशित और लक्ष्मीको आनन्दित करनेके लिये सुर्योदयके समय होनेवाली योग्य क्रियाओंको करते हुए शय्याका मध्यभाग छोड़िये ॥ २२७॥
O Purushottama, the delight of all beings and the praised by many,Behold, this radiant Sun, beloved by all, rises from the eastern realm,Spreading his splendid light far and wide.
Therefore, arise from the midst of your couch,Perform the fitting rites at dawn to illuminate the world ,And to bring joy to Lakshmi herself.227
श्लोक ( Shlok ) 228
कतरकतमे नाक्रान्तास्ते बलैर्बलशालिनो भुजबलमिदं लोकः प्रायो न वेत्ति तवाल्पकः ।भरतपतिना सार्द्धं युद्धे जयाय कृतोद्यमो नृपवर भवान् भूयाद् भर्ता नृवीरजयश्रियः ॥ २२८॥
हे राजाओंमें श्रेष्ठ, आपकी सेनाओंने कितने कितने बलशाली राजाओंपर आक्रमण नहीं किया है, ये छोटे छोटे लोग प्रायः आपकी भुजाओंके बलको जानते भी नहीं हैं। हे नरवीर, आपने भरतेश्वरके साथ युद्धमें विजय प्राप्त करने-के लिये उद्यम किया है इसलिये विजयलक्ष्मीके स्वामी आप ही हों ।॥ २२८॥
O foremost among kings,Your armies have launched countless assaults upon mighty rulers—These humble folk scarcely comprehend the strength of your arms.O valiant hero, you have striven to conquer alongside Bharateshvara;Therefore, may you alone be the sovereign of Victory’s Lakshmi.228
श्लोक ( Shlok ) 229
रविरविरलानश्रून् जातानिवाश्रमशाखिनां तुहिनकणिकपातानाशु प्रमृज्य करोत्करैः ।अयमुदयति प्राप्तानन्दैरितोऽम्बु जिनीवनैः उदयसमये प्रत्युद्यातो धृतार्थमिवाऽम्बुजैः ॥२२९॥
हे देव, बगीचे-के वृक्षोंपर पड़ी हुई ओसकी बूंदोंको निरन्तर पड़ते हुए आंसुओंके समान अपनी किरणोंके समूहसे शीघ्र ही पोंछता हुआ यह सूर्य उदय हो रहा है और उदय होते समय ऐसा जान पड़ता है मानो कमलिनियोंके वन जिन्हें आनन्द प्राप्त हो रहा है ऐसे कमलोंके द्वारा अर्घ्य लेकर उसकी अगवानी ही कर रहे हों ॥ २२९।l
O Divine One,Behold the sun ascending,Swiftly wiping away with its radiant beamsThe dew drops clinging to the garden’s trees—like ceaseless tears.At the moment of its rising, it seems as if the lotus blooms of a joyous grove,Offering their homage in reverence,Welcoming its arrival with floral tribute.229
श्लोक ( Shlok ) 230
अयमनुसरन् कोकः कान्तां तटान्तरशायिनी मविरलगलद्वाष्पव्याजादिवोत्सृजतीं शुचम् ।विशति बिसिनीपत्रच्छन्नां सरोजसरस्तटीं सरसिजरजःकीणौं पक्षौ विधूय शनैः शनैः ॥२३०॥
इधर देखिये, जो दूसरे किनारेपर सो रही है और निरन्तर बहते हुए आँसुओं के बहानेसे जो मानो शोक ही छोड़ रही है ऐसी अपनी स्त्री चकवीके पीछे पीछे जाता हुआ यह चकवा कमलोंके परागसे भरे हुए अपने दोनों पंखोंको झटकाकर कमलि-नियोंके पत्तोंसे ढके हुए कमलसरोवरके तटपर धीरे धीरे प्रवेश कर रहा है ।। २३०।।
Behold here,The cuckoo follows its beloved Chakvi,Who sleeps on the distant shore,Weeping ceaseless tears as if to pour forth her sorrow.Shaking its wings laden with lotus pollen,The cuckoo gently advancesAlong the lotus-laden banks Of the lake veiled by the leaves of the lotus maidens.230
श्लोक ( Shlok ) 231
जरठ बिसिनीकन्दच्छायामुषस्तरलास्त्विष-स्तुहिनकिरणो दिक्पर्यन्तादयं प्रतिसंहरन् । अनुकुमुदिनीषण्डं तन्वन् करानमृतश्च्युतो द्रढयति परिष्वङ्गासंङ्गं वियोगभयादिव ।।२३१।।
यह चन्द्रमा पके हुए मृणालकी कान्तिको चुरानेवाली अपनी कान्तिको सब दिशाओंके अन्तसे खींच रहा है तथा अमृत बरसानेवाली अपनी किरणोंको प्रत्येक कुमुदिनियोंके समूहपर फैलाता हुआ वियोगके डरसे ही मानो उनके साथ आलिङ्गनके सम्बन्धको दृढ़ कर रहा है ॥२३१॥
That moon,Stealing the radiance of the ripe lotus stalks,
Draws forth its brilliance from the very edges of all directions,
And spreads its nectarous rays Over every cluster of water lilies—
As if, fearing separation,It seeks to strengthen the bonds of embrace with them.231
श्लोक 232 से 241
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202
आदिपुराण पर्व 34 – भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 35 – कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 44 | श्लोक 45 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
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